साहित्य के इवेंट मैनेजर

साहित्य के इवेंट मैनेजर

शहर के मुख्य बाजार में एक बड़ा बोर्ड लगा है, ‘साहित्य प्रबंधन’। उसके नीचे अंकित है, ‘प्रकाशन से विमोचन तक’। कोई भी देखे तो महज उत्सुकता के नाते आकृष्ट हो उस ओर। अभी तक हमने ‘इवेंट मैनेजर’ का नाम सुना है। इनका काम बच्चों के जन्मदिन से लेकर शादी तक के उत्सवों का आयोजन करवाना है। फार्म हाउस की पार्टी हो या संपन्न धनपति के बँगले के लॉन की। इनको फोन घुमाने के बाद साज-सज्जा से लेकर मैन्यू तक का प्रबंध इनका सिरदर्द है। दरअसल हमारे एक दूर के रिश्तेदार हैं। जैसे हमारी पारिवारिक परंपरा सरकारी बाबूगिरी की रही है, उनकी आयात-निर्यात की। कभी-कभार वह कृपा करते हैं छुट्टी के दिन दर्शन देने की। वह जब मर्सीडीज में पधारते हैं तो सरकारी कॉलोनी में अपनी हैसियत बढ़ जाती है। आस-पास के घरों में ताक-झाँक पड़ोसी धर्म का अनिवार्य अंग है। बगल के नन्हे जासूस पप्पू भेजे जाते हैं, हमारे लाड़ले लल्लू से मिलने के लिए।

वह गाड़ीवाले अंकल की विस्तृत खोज-खबर लेते हैं। ‘‘यह अंकल तुम्हारे पापा के दोस्त हैं क्या?’’ ऐसे प्रश्न के उत्तर में लल्लू कहाँ चूकनेवाले हैं, ‘‘अरे यार! दोस्त-वोस्त नहीं, हमारे रिश्तेदार हैं। बर्थ-डे पर सबसे अच्छी गिफ्ट इन्हीं की आती है। देश में हों या विदेश में, हमारा जन्मदिन कभी भूलते नहीं हैं।’’

आज की पीढ़ी समझदार है। उपयोगिता के आधार पर सच और झूठ के प्रयोग का फैसला करती है। उपयोगी झूठ से उसे कोई परहेज नहीं है। अगर पप्पू को प्रभावित करना है तो गिफ्ट आए न आए, वर्षगाँठ अंकल को याद हो न हो, कहने में क्या जाता है? बहरहाल, इतना जरूर है कि वह हमें विवाह आदि के पावन अवसर पर भूलते नहीं हैं। उन्हीं से पहली बार हमें ‘इवेंट मैनेजर’ की जानकारी मिली थी। हमने उनसे जिज्ञासा जताई थी कि व्यस्त जीवन में उन्हें कहाँ से समय मिलता होगा पार्टी, उत्सव आदि के आयोजन का? मुसकराकर उन्होंने बताया था कि सब पैसे का खेल है। हफ्ते में एक या दो पार्टी उनके धंधे की विवशता है। कोई विदेश से ग्राहक आया या किसी से यहाँ काम पड़ा तो कौन फाइव स्टार में जाए, ब्रिजवासन का फार्म हाउस तो है ही। बस ‘उत्सव’ को बताना ही तो है, सब इंतजाम हो जाता है। थोड़े महँगे जरूर हैं, पर अपने काम में माहिर हैं वह। हमें यही चाहिए भी।’’

इस जानकारी से साहित्य के इवेंट मैनेजर के विषय में हमारी जिज्ञासा में और इजाफा हुआ। इसके प्रकाशन से विमोचन तक का क्या अर्थ है? क्या यह प्रकाशक भी हैं? क्या इनके दफ्तर में कोई सभागार है, जहाँ यह विमोचन करवाते हैं? कलम घिस्सू तो हम भी हैं। किसी पत्रिका में जाकर रचना ऐसी भूलभुलैया में फँसती है कि न छपती है, न लौटती है, पता लिखा, टिकट लगा लिफाफा होने के बावजूद। अब तो हमें विश्वास हो चला है कि जो हश्र दफ्तर में किसी पत्र का होता है, वही मैगजीन के कार्यालय में रचना का। इस मामले में सरकार और संपादक में कोई अंतर नहीं है। सामान्य नागरिक का पत्र और अनजाने लेखक की रचना की नियति केवल कूड़ेदान है। उत्तर देना तो दूर, किसे फुरसत है कि उसे पढ़ने की जहमत उठाए? उत्तर देने का तो प्रश्न ही व्यर्थ है। समय के साथ संपादक भी बदले हैं। परिचितों या प्रसिद्ध लेखकों को ही छापते हैं, वह भी बिना पढ़े, सिर्फ नाम देखकर। प्रकाशन के अभाव में एक छपास का मारा लेखक संपादक के बारे में और सोच ही क्या सकता है?

एक दिन हम दफ्तर से तड़ी लगाकर साहित्य के इवेंट मैनेजर के कार्यालय में जा धमके। हमारे दफ्तर की तरह वहाँ बावर्दी सुरक्षाकर्मी तो तैनात नहीं थे, पर ‘स्वागत कक्ष’ समान था। हमारे मित्र इसे ‘शासकीय अपमान कक्ष’ कहते हैं। यहाँ ऐसा नहीं है। मेज के पीछे कुरसी पर एक सुंदर कन्या विराजमान है। उसके आस-पास कई फोन हैं। उसका चयन शायद सुंदरता के आधार पर ही हुआ है। उसने हमें देखकर यंत्रवत् मुसकान के साथ प्रश्न किया, ‘‘किससे मिलना चाहते हैं ?’’ हमने उत्तर दिया कि हमें साहित्य प्रबंधन के मालिक से मिलना है। आपने पहले से भेंट का समय लिया है? उसने सामने रखी एक सूची पर दृष्टि डालते जानना चाहा। दफ्तर के रिकॉर्ड रूम में रखी फाइल की जानकारी का सवाल होता तो हम शर्तिया अपना अज्ञान या ज्ञान प्रगट कर सकते थे, पर यहाँ ‘नहीं’ के अलावा कोई विकल्प नहीं था। तब तो ‘सर’ से भेंट संभव नहीं है। आज यों भी वह कुछ ‘मीटिंग्स’ में ज्यादा व्यस्त हैं, उसने सूचित किया। ‘मिलने का समय कैसे तय करें?’ हमने जानना चाहा। उत्तर में उसने हमारे मालिक के वैयक्तिक सहायक से बात करवा दी।

‘आप शर्मा सर को पहले से जानते हैं?’ उसने छूटते ही पूछा। एक बारगी तो हमारा मन हुआ कि उसे स्पष्ट रूप से बता दें कि उसके शर्मा सर न प्रांत के मुख्यमंत्री हैं, न देश के प्रधानमंत्री कि सामान्य ज्ञान के समान सब उनके नाम से परिचित हों। उसका आशय व्यक्तिगत परिचय था। हमने उससे कतई इनकार किया। इसके पश्चात् उसने मिलने का उद्देश्य पूछा। हमने परिचय का अभाव होने पर भी ‘निजी काम’ बताया। निजी काम एक ऐसा व्यापक और रहस्यमय शब्द है, जिसमें शर्माजी की कुंडली बाँचने से लेकर, उनके यहाँ नौकरी की अरजी देने तक सब शामिल है। फोन पर सन्नाटा छा गया। फिर उसने अगले हफ्ते की दस तारीख को तीन बजे दस मिनट का समय देने का प्रस्ताव किया। हालाँकि अपनी लंबी कविता सुनाने को दस मिनट कतई अपर्याप्त थे, पर अपने पास कोई चारा भी न था। हमारे साहब भी ऐसे ही कुछ तो करने में व्यस्त रहते हैं। कोई दोस्त या बैच मैट से भेंट को उनका निजी सचिव शासकीय मीटिंग का भारी-भरकम नाम देता है। उनकी चहेती महिला कर्मी बैठी हो तो तब भी यह सरकारी रोमांस इसी श्रेणी में आता है। इस सबके पीछे या मूल में एक ही भावना है कि कैसे किसी ‘बाहरी’ को टाला जा सके या प्रभावित किया जाए। हमें लगा कि यह देश ऐसा सरकार निर्भर है कि जहाँ बहाने बनाने तक को निजी संस्थान भी सरकार का ही अनुकरण करते हैं। हर छोटे-बड़े संस्थान ने काम न करने को सचिवालय, ऐसा ही तंत्र विकसित कर लिया है।

फिर भी हम लौटते वक्त इसी शंका में घिरे रहे कि ‘साहित्य प्रबंधन’ को तो संभावित ग्राहकों से मेल-मुलाकात सुलभ होनी चाहिए वरना उनका गुजारा कैसे होगा, खर्चा कैसे चलेगा? फिर हमें खुद ही खयाल आया कि देश ऐसा छपास पीडि़त है कि लेखक सहर्ष प्रतीक्षा करने को प्रस्तुत हैं, विशेषकर कवि। हर मोहल्ले में कूड़े के ढेर हैं और उस पर भिनभिनाते मच्छर-मक्खी से कवि। हर कवि को भ्रम है कि वह कालिदास है। कविता को इन्होंने ऐसा कैक्टस बना दिया है, जिस में न छंद की उपस्थिति है, न विचारों के फूल। कैक्टस में काँटे हैं, जो दिखते हैं। इनकी कविता में लयहीनता के ऐसे काँटे हैं, जो काटने को दौड़ते हैं। हमें यकीन हो चला है कि ऐसों के रहते ‘साहित्य प्रबंधन’ को ग्राहकों का अभाव होने की गुंजाइश नहीं है।

समय की दिक्कत है। वह ठहरता नहीं है। हम नियत वक्त और निश्चित तारीख को शर्मा के ‘साहित्य प्रबंधन’ में जा टपके। इस बार काव्य-पुस्तक की पांडुलिपि हमारे ब्रीफकेस में थी। मिलनेवालों को इंतजार करवाने से बड़ों के अहं की तुष्टि होती है। शर्मा सर की हैसियत किसी किराने की दुकान से भले बेहतर न हो, पर अपने आकलन में वह कौन बिरला-टाटा से कम हैं? चार बजे इस साहित्यिक सौदागर के दर्शन की अपनी बारी आई। उन्होंने ‘आइए’ कहकर कुरसी की ओर इशारा किया और शब्दों की बचत करते बोले ‘कहिए’। हमने उन्हें कविता की पांडुलिपि पेश की इस प्रार्थना के साथ कि ‘इसे छपवाना है।’ उन्होंने हमारी अभी तक की उपलब्धि के न पन्ने पलटे, न पढ़ के परखा बस दोनों हाथों में लेकर जैसे उसे तौला और बोले, ‘‘चालीस हजार रुपए लगेंगे, पुस्तक प्रकाशन के और फ्लैप पर तीन-चार स्थापित कवियों द्वारा आपकी प्रशंसा के।’’ जैसे सब्जीवाले से करते हैं, हमने उनसे मोल-भाव भी किया पर अपने चालीसे से वह टस-से-मस न हुए, ‘‘देखिए हमारी एक रेट है।’’ इतना कहकर उन्होंने दराज खोलकर एक रेट कार्ड हमारी ओर बढ़ा दिया। फिर पांडुलिपि लौटाते हमें प्रकाशन की प्रक्रिया से परिचित कराया, ‘‘जल्दी से जल्दी, आप हमारे लेखा कक्ष में बीस हजार जमा करवा दीजिए और रसीद के साथ पांडुलिपि प्रकाशन विभाग के शर्माजी को सौंप दीजिए। तीन माह में आपकी पुस्तक, चित्र व परिचय के साथ प्रकाशित हो जाएगी। जब आप शेष बीस हजार जमा करवाएँगे तो हम आपको ‘काव्य-कुसुम’ की पचास प्रतियाँ निजी उपयोग के लिए भेंट करेंगे। उत्तम छपाई और कागज के कारण एक प्रति की कीमत चार सौ रुपए रखी जाएगी।’’

इतना कहकर उन्होंने फोन का बजर दबाकर व्यक्तिगत सहायक से ‘नेक्स्ट’ का आदेश दिया। ‘अपनी इज्जत अपने हाथ’ का सोचते हम चुपचाप बाहर निकल आए। हमें प्रकाशन की दर कुछ ज्यादा लगी, पर उसके साथ बड़े कवियों की सम्मति भी जुड़ी है। हमें इसके लिए खासी भाग-दौड़ करनी पड़ेगी। यहाँ सारा मामला ‘सैट’ है। शर्मा सर का क्या भरोसा? उनको भी कुछ देते-दिवाते हों। घर बैठे, अनर्गल प्रशंसा की पंक्तियाँ लिखने में उनका क्या जाता है? कोई आलोचना करेगा तो उनके पास ‘नए कवियों’ के प्रोत्साहन का प्रतिरोधी अस्त्र है।

दिल्ली की बस में सवारी आदमी को जीवन के हर छोटे-बड़े संकट से जूझने का लाभप्रद प्रशिक्षण है। जो बैठा है, वह निरपेक्ष भाव से नए प्रवेशार्थियों की धक्का-मुक्की का आनंद लेता है। कल वह भी इस अनुभव से गुजर चुका है। हमें याद है। हमें एक बार पीछे से किसी ने यों ठेला कि हमारा हाथ सामने खड़े एक सज्जन के सिर पर जा लगा। उनकी बालों की टोपी, जिसे ‘विग’ भी कहते हैं, खिंची चली आई उन्हें बस के मनोरंजन का शिकार बनाकर।

हमारी इच्छा तो बहुत थी, पर इस आपा-धापी में शर्माजी की रेट लिस्ट हम देख न पाए। बस धीरे-धीरे रेंग रही है, हमारे मन में उत्कंठा है, सूची देखने की। जिंदगी मजबूरियों का सिलसिला है। कुछ बड़ी, कुछ छोटी है। पुस्तक प्रकाशन के लिए बीस हजार क्या बुरे हैं? बीस हजार तो दफ्तर में बिल पास हुआ या नहीं, जैसी सूचना के बदले प्रति पुस्तक चार सौ की वसूली से ही उगाहे जा सकते हैं। पहले यह नेक विचार क्यों नहीं आया? कौन कहे, शर्मा सर अधिक किताब देने की इनायत कर देते? फिर भी अभी हमारे शर्मा से सौदे की कोशिश मुमकिन है। इन्हीं स्वार्थी खयालों से जूझते हम अपने बस स्टैंड तक आ लगे। हमने जेब टटोली, पर्स और साहित्य प्रबंधन की सूची मौजूद है कि नहीं? किसी भी दिल्ली ऐसे महानगर में बस की भीड़ भरी यात्रा सही-सलामत संपन्न करके मन में संतोष का वही भाव उभरता है, जो कि पत्थरबाजों की भीड़ से सुरक्षित लौटकर सैनिक या अर्धसैनिक बल के जवान के मन में जगता होगा।

हम घर पहुँचकर पत्नी की प्रतीक्षा करने लगे। लल्लू स्कूल से आकर क्रिकेट के अभ्यास में जुटे हैं। जिस दिन किसी न किसी पड़ोसी या मोहल्लेवाले के घर का काँच नहीं टूटता है, क्रिकेट का अभ्यास अधूरा रहता है। भविष्य के सहवाग या धोनी बनने के लिए बॉल का एक निश्चित ऊँचाई तथा दूरी पर जाना आवश्यक है। अब जहाँ घरों के बीच की पंद्रह फीट चौड़ी सड़क पर प्रैक्टिस होगी तो वहाँ तोड़-फोड़ का कुछ खतरा तो होना ही होना। यों माता-पिता भी आशान्वित हैं। नौकरी के ऐसे ही लाले पड़े हैं, क्रिकेट से ही भविष्य बने! पत्नी के कार्यालय से लौटने तक महिलाओं की सुरक्षा का संशय मन को घेरे रहता है। जब वह सेफ  लौट आईं और बिना किसी टूटे काँच की शिकायत के लल्लू भी, तो हमने पूरी आश्वस्ति और मनोयोग से साहित्य प्रबंधन की सूची का अध्ययन किया। उसमें पाँच शीर्षकों के अंतर्गत विभिन्न आयोजनों का खर्चा दिया गया है। यह निम्नलिखित है—

 

विषय—स्थान—विद्वानों की उपस्थिति—संभावित दर—टिप्पणी

पुस्तक—इंडिया इंटरनेशनल—राष्ट्रीय स्तर के—रुपए पचास हजार—सिर्फ साहित्य प्रबंधन

परिचर्चा—सेंटर———के माध्यम से छपी पुस्तकें

————इसकी पात्र

किसी भी—इंडिया इंटरनेशनल—राष्ट्रीय स्तर के—पचहत्तर हजार

मुद्दे पर—सेंटर———हर संस्था का स्वागत है

गोष्ठी

किसी भी—अन्य किसी—एक दो के अलावा—चालीस हजार—हर संस्था का स्वागत है

मुद्दे पर—स्थान  पर—स्थानीय विद्वान्

पुस्तक—इंडियन इंटरनेशनल—राष्ट्रीय स्तर के—पचास  हजार—किसी भी पुस्तक का

विमोचन—सेंटर

पुस्तक—अन्य  किसी—दो राष्ट्रीय स्तर के—चालीस  हजार—किसी भी पुस्तक का विमोचन———स्थान पर

गारंटी : यह हमारा दायित्व है कि हर कार्यक्रम में हॉल भरा होगा।

इन मुख्य मदों के अतिरिक्त पत्रिकाओं आदि में प्रकाशन की सुविधा भी साहित्य प्रबंधन के कार्यों में सम्मिलित है। कविता, कहानी, उपन्यास आदि की रेट दी गई है। इसमें कविता के राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में प्रकाशन की दर एक हजार है और स्थानीय मैगजीन अखबार आदि में तीन सौ से लेकर के पाँच सौ रुपए तक। इससे हम हड़के भी और हतोत्साहित भी हुए।

पूरी शाम हम ‘साहित्य प्रबंधन’ का ही सोचते इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि साहित्य प्रबंधन का धंधा खूब फल-फूल रहा है। इसके चलते साहित्य का भविष्य भले ही भगवान् भरोसे हो!

 

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४४८४३८

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