हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य : झींकना

हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य : झींकना

जीहाँ, हम हमारे राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। आप क्यों बाधा डाल रहे हैं? और बाधा डालकर ही आप क्या कर लेंगे? ‘झींकना’ को आप क्या केवल एक शब्द ही समझ बैठे हैं?

शब्द है तो उसका उपयोग भी होना चाहिए कि नहीं? बिना उपयोग तो किसी भी चीज में फँफूद लग जाती है कि नहीं?

(संदर्भ : एक पड़ोसन का हमारे घर गप्पें लगाने आना)

बहन, हमारे पास सबकुछ है भगवान् का दिया हुआ। हमें और चाहिए तो कोई भी क्या कर लेगा?

आज हम अपनी मोटर पर चढ़ते हैं, ड्राइवर है हमारे पास, पर पेट्रोल इतना महँगा क्यों है? पहले हम बस से आते-जाते थे, ऑटो पर चढ़ लेते थे, अब हमने भी इंस्टालमेंट देकर कार रख ली है।

बेटा दूसरी गाड़ी की जिद कर रहा है, ले आएगा दो-चार महीने में। आप तो जानती ही हैं कि पड़ोस के जिस घर में रहते हैं, काफी बड़ा है। उसका मकान मालिक हमें दूसरा गैरेज अलोट क्यों नहीं करता, क्या हम अपने घर का भाड़ा नहीं चुकाते? दूसरे गैरेज का लाखों माँगता है। यह भी कोई बात हुई? दूसरी मोटर रखना जैसे कोई गुनाह हो गया हो। दूसरे का सुख किसी से देखा ही नहीं जाता!

अब क्या बताएँ आपसे। पहले दूसरे गाँव हम केवल ट्रेन से आते-जाते थे, हवाई जहाज का भाड़ा बहुत था। बंबई-दिल्ली के ही एक तरफ के दस-बारह हजार लग जाते थे उस जमाने में, जब दाल का भाव कोई ५-७ रुपए किलो होता था। केवल इंडियन एयर लाइंस ही चलती थी।

इसलिए हमारे मर्द बताते हैं कि टिकट के लिए उनके ऑफिस जाना पड़ता था, टोकन लेकर बैठना पड़ता था, आधा दिन पूरा हो जाता था टिकट कटाने में। तब मर्द अकेले ही सफर कर लेते थे। जब बिजनेस का जरूरी काम होता था। कौन खरचे इतना पैसा परिवार के लिए? साथ जाते थे तो रेल से चले जाते थे। अब तो ये घर बैठे-बैठे पहले से जहाज का टिकट निकलवा लेते हैं, मरा पता नहीं किस-किस कंपनी का और हमारा परिवार भी साथ ही जाता है। ये महीनों पहले टिकट बनवा लेते हैं तो भाड़ा कम लगता है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि लगेज में ये केवल १५ किलो क्यों जाने देते हैं, जब केवल खाली सूटकेस का वजन ही पाँच-छह किलो हो जाता है? यह बड़ी जालिम बात है। आदमी की जरूरत ही नहीं समझते ये हवाई जहाजवाले, परदेस में दो-चार ढंग के कपड़े भी चाहिए होते हैं, दवा-दारू या कुछ इसी तरह की और चीजें। इनमें वजन होता है कि नहीं, कोई फूँक से तो नहीं बने होते ये सब! १५ किलो में क्या तो ले जाएँ और क्या छोड़ें? मरा क्या तो ओढ़े और क्या बिछाए? और क्या बताएँ बहन! एक बार इनके लिए डॉक्टर को बुलवाना पड़ा घर पर। मरा पहले तो आने को तैयार ही नहीं, बोला—यहाँ ले आओ मरीज को, मेरी क्लीनिक में दस पेशेंट बैठे हैं। अपनी बारी की वेट में।

मेरे देवर ने भी छोड़ा नहीं, बहुत मिन्नत की। सब तरह के लालच दिए, हाथ-पैर जोड़े, कहा—डॉक्टर साहब, भगवान् की कसम, मेरा भाई आने लायक हालत में नहीं है, आप नहीं आए तो पता नहीं क्या हो जाए। डॉक्टर देर रात को आया। इनके शरीर को इधर-उधर टीप-टाप के देखा, २-४ गोली लिख दी, एक मिक्स्चर। फीस के ८०० रुपए ले गया। बोलो बहन, पहले यही डॉक्टर बुलाने पर तुरंत आता था, घर-बर की मीठी-मीठी बात करता था, १०० रुपल्ली लेता था। अब किस तरह अपने मन को समझाएँ, जमाने को कोसें या अपने आप को?

हमने समझाने की कोशिश की—‘बहनजी, हमारी माँ बतलाती थीं कि लोग जो इस शहर में भाड़े के घर में रहते थे, जब दो-तीन महीने के लिए भी गाँव जाते थे तो घर छोड़ देते थे कि पीछे से भाड़ा चालू न रहे। आज क्या ऐसा कर सकते हैं? क्यों सालोसाल आज बंद करके रखते हैं। कमरे या फ्लैट? मकान-मालिक रकम-रकम के टैक्स चुकाता है, खाली जगह का भी। अब वह दूसरे गैरेज के पैसे आपसे चाहता है तो आप झींक रही हो। पहले जब प्लेन का भाड़ा बहुत ज्यादा था तो याद है आपने कभी सवारी भी की थी प्लेन की? अब जब बहुत कम भाड़े में आप सफर कर रही हो तो लगेज का १५ किलो आपको कम लग रहा है। ज्यादा ले जाना है तो ले जाओ, मना किसने किया है? खाली सूटकेस का ही ५-६ किलो हो जाता है तो पहले की तरह बाँधो पोटली में कपड़े या चुकाओ एक्स्ट्रा भाड़ा एयरलाइन को, जिसने आपको सस्ता टिकट दिया है। मान लो कि कोई एयरलाइन यह विज्ञापन करे कि हर तीन टिकट में एक टिकट मुफ्त में मिलेगा तो क्या गारंटी है कि आप नहीं कहोगी कि ये लोग दो टिकट मुफ्त में क्यों नहीं देते, घरवाला क्या अकेला ही जाएगा? रही डॉक्टर की बात। उनके भी बाल-बच्चे हैं, क्लीनिक का, मोटर का, स्टाफ का रोज-रोज का खर्चा है, उनको भी दाल-चावल उतने में ही मिलते हैं, जितने में आपको, इतने वर्षों की प्रैक्टिस में अनुभव हासिल किया है, लेकिन आपको उनको घर पर उसी १०० रुपल्ली में बुलाना है। झींकना हमारे मुल्क का स्वभाव हो गया है और आप अपवाद नहीं हो।’

पड़ोसन मुँह बिचकाकर चली गईं, उसे मेरे तर्क पसंद नहीं आए शायद या मेरे कहने का ढंग।

दि वुड्स, विस्टा जी-३०१

वाकड़, पुणे-४११०५७ (महाराष्ट्र)

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