बुढ़ापे की डगर

बुढ़ापे की डगर

‘‘सुशीला! तुम्हें पता है, हमारा श्रीधर अब सेवानिवृत्त होकर घर आ रहा है। कितनी खुशियाँ छा जाएँगी अब घर में?’’

‘‘अजी, श्रीधर के पापा, मुझे पता है। वह दोनों बच्चों को बहू के साथ लेकर आज चंडीगढ़ एक्सप्रेस से सुबह दस बजे तक घर जरूर पहुँच जाएगा।’’

‘‘सुशीला! वर्षों बाद इन बूढ़ी आँखों को पोतों के साथ खेलने-कूदने का मौका मिलेगा। मैं उनके साथ बैंत से क्रिकेट खेलूँगा। लॉन में चहल-पहल होगी। होगी न सुशीला?’’

झुर्रियों भरे चेहरे पर बूढ़ी आँखों से अविरल हर्षित अश्रुधारा बह निकली थी। रमाकांत आज बहुत खुश नजर आ रहे थे। बैंत के सहारे धोती-कुरते में चलते हुए बार-बार अपने चश्मे को उतारकर आँसुओं से भीगे उनके ग्लासों को साफ कर रहे थे।

उधर सुशीला भी आज फूली नहीं समा रही थी। बहू-बेटे अबकी बार स्थायी रूप से घर आ रहे हैं। अब उसे बहू के हाथ की बनी गरमागरम रोटियाँ मिलेंगी। बाजरे और मकई की हाथ की रोटी बहू प्रीति बहुत अच्छी बनाती है। मुकुल और नकुल बेटे तो उसकी आँखों के तारे हैं। दोनों पोतों को वह ‘बेटा’ कहकर ही संबोधित करती थी। आज उसने बहू-बेटों की पसंद की सरसों की सब्जी बनाई थी। बथुआ मिलाकर बाजरे के आलन की बनी सरसों की हरी सब्जी बहू-बेटों के साथ रमाकांतजी को भी बहुत अच्छी लगती है।

दोनों बुजुर्गों में अपूर्व उत्साह और उमंग की लहरें तैर रही थीं। प्रतीक्षा में उनकी आँखें टकटकी लगाए फाटक पर टिकी हुई थीं। कब ताँगा आए। घोडे़ के गले और पैरों में बँधे घुँघरू की रुनझुन उन्हें सुनाई पडे़। वे दौडे़-दौडे़ ताँगे तक जाएँ, बहू-बेटे और दोनों पोतों को पाकर निहाल हो जाएँ। यही अभिलाषा आज उन्हें और कोई भी काम करने नहीं दे रही थी। हमेशा सुबह-सुबह जैसे ही कुलदीप के पेपर डालने की खड़खड़ाहट उन्हें सुनाई पड़ती तो बूढे़ रमाकांत गेट खोलकर शीघ्रता से अखबार उठा लाते थे। उसे सूरज चढ़ जाने पर भी पढ़ते रहते थे, लेकिन आज अखबार की हैडलाइन पढ़कर ही रमाकांतजी ने उसे मूढे़ पर डाल दिया था। आज अखबार पढ़ने की ललक नहीं थी। उत्कंठा थी बहू-बेटों के इंतजार की।

रमाकांतजी के दो बेटे हैं। एक का नाम विकास है, तो जैसा बताया जा चुका है, दूसरा श्रीधर है। विकास छोटा बेटा है। किसी फैक्टरी में अकाउंटेंट है। उसकी बहू नेहा सरकारी स्कूल में प्राचार्या है। स्वयं रमाकांतजी भी इनकम टैक्स ऑफिसर थे। हमेशा जिला मुख्यावास पर ही आजीविका अर्जित करते हुए उनका सर्विसकाल व्यतीत हुआ था। विगत एक दशक पूर्व ही उनकी सर्विस-संध्या का सूर्यास्त हुआ है।

बड़ा बेटा श्रीधर रमाकांतजी के दांपत्य जीवन की प्रथम सौगात होने के कारण उनके कलेजे का टुकड़ा है। पूरे बीस वर्ष सीमा सुरक्षा बल में सेवा कर आज वह मेजर के पद से सेवानिवृत्त होकर अपने पैतृक गाँव लौट रहा है। रमाकांतजी चाहते तो सर्विस में रहकर शहर के किसी मुख्यावास पर अच्छी-खासी कोठी बनाकर रह सकते थे। लेकिन उन्हें अपना गाँव अधिक अच्छा लगता है। ‘जहाँ हम पैदा हुए, पढे़-लिखे और जिस धरा की धूल में खेलकर बडे़ हुए, वह हमें जान से भी प्यारी है। मैं अपना शेष जीवन भी वहीं व्यतीत करूँगा। पूर्वजों की धरोहर है मेरा अपना घर। जो मुझे वे सौंपकर गए हैं।’ रमाकांतजी हमेशा यही कहा करते थे।

‘‘अरी श्रीधर की माँ! जल्दी आओ। ताँगा आ गया है। हमारे बहू-बेटे आ गए हैं। तुम कहाँ घुसी बैठी हो। बहू-बेटों का स्वागत करो। उन्हें अंदर लिवाकर लाओ। मैं तो ताँगे के पास जा रहा हूँ।’’ इतना कह रमाकांतजी ने लंबे-लंबे डग भरते हुए गेट के पास आकर उसे खोला और बच्चों के बीच जाकर खडे़ हो गए। बहू प्रीति व बेटे श्रीधर ने पिताजी के चरण-स्पर्श किए। मुकुल और नकुल ने भी दादाजी को ढोक लगाई। सबको छाती से लगाकर रमाकांतजी ने अश्रुपूरित नेत्रों से उनको अपना आशीर्वाद दिया। इतने में सुशीला भी आ गई। बूढ़ी माँ ने श्रीधर का माथा चूमा। श्रीधर माँ के चरणों का स्पर्श कर उनके हृदय से जा लगा।

श्रीधर को छाती से लगाकर माँ की आँखें भर आईं। दूसरी तरफ प्रीति बहू ने चरण-स्पर्श की परंपरा का निर्वहन कर अपनी सासू माँ की तरफ देखा तो सासू माँ उसे सीने से लगाकर फफककर रो उठीं। ‘‘प्रीति बहू, बहुत दिनों क्या, वर्षों तक तुम नौकरी पर श्रीधर के साथ अकेली रही हो। मैं तुम्हें कुछ भी लाड़-प्यार नहीं कर सकी। अब हम सब मिलकर एक साथ रहेंगे तो बहुत अच्छा लगेगा। बिना बच्चों के घर खाने को दौड़ता था।’’ सासू माँ ने आत्मीयता के साथ कहा।

‘‘अभी नेहा कुछ...।’’

हाँ बेटा! नेहा की गोद अभी सूनी ही है। बहुत से डॉक्टरों को दिखाया है। इलाज भी महीनों चला, लेकिन सभी ने हाथ खडे़ कर दिए हैं बेटा। तुम्हें क्या बताऊँ, प्रीति बेटा? अब तुम सभी पहले आराम से बैठो, चाय-पानी पियो, ये सब बातें तो बाद की हैं। अब कौन सा तुम्हें सर्विस पर जाना है?’’ सुशीला ने कहा।

प्रीति रसोई में गई। उसने सभी को अदरक डालकर चाय पिलाई और सामान व्यवस्थित कर कमरों में सैट कर दिया था। दोपहर को दो बजे नेहा स्कूल से आई। प्रीति को हाय-हैलो कहा और अपने कमरे में घुस गई। शाम को विकास फैक्टरी से लौटा। घर पर भैया-भाभी को देखकर बहुत खुश हुआ। उसने अपने भाई श्रीधर से चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त किया। कुशलता की बातें हुईं। भविष्य की योजनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे, तभी बूढ़ी माँ ने एक टे्र में तीन कप चाय व नाश्ते में नमकीन और कुछ ड्राई फू्रट लगाकर टेबल पर रख दिए थे। ‘‘अब तुम दोनों भाई चाय पियो और नाश्ता एक साथ बैठकर खाने का आनंद लो। ये भविष्य की बातों के लिए आगे सब समय तुम्हारा ही है।’’ यह कहकर हँसते हुए वे अंदर की तरफ आँगन में कुरसी पर आ बैठी थीं। मुकुल और नकुल खेलने चले गए थे।

जब घर आए तो अपने अंकल से लिपट गए। ‘‘अंकल, अब पहले तो आप हमारी टॉफी लाओ। उसके बाद आपसे बात करेंगे।’’ अंकल की जेब में लंच में उसके दोस्त के द्वारा दी गई चार टॉफियाँ यों ही पड़ी थीं। उसने तपाक से निकाली और मुकुल और नकुल को टॉफियाँ देकर उन्हें प्यार करने लगा।

कालक्रम के अनुसार सूर्योदय और सूर्यास्त होते रहे। दिन अपने-अपने क्रम से आगे बढ़ रहे थे। आपसी स्नेह के सूत्र में परिवार झूलते-झूलते आनंद का उपभोग कर रहा था। स्नेह सूत्र के झूले में झूलते हुए समय के थपेड़ों से सूत्र में घिसाव हो गया। स्नहेसूत्र कमजोर होकर टूटने के कगार पर आ गया था। भाइयों के मध्य दूरी में जो प्रेम था, उस प्रेम-कलश में रिसाव होने लगा था। घर में सब्जी और दूध का हिसाब होने लगा था। बूढे़ माँ-बाप की सेवा के लिए श्रीधर की पत्नी अपने हाथ खींचने लगी थी। मन छोटा करने लगी थी।

आखिर रमाकांतजी ने जब देखा कि इन बूढ़ी आँखों में अब मोतियाबिंद पक गया है। इसलिए ऑपरेशन करने के लिए मन के डॉक्टर से कहना पडे़गा। पर मन का डॉक्टर ऑपरेशन के लिए राजी नहीं था। उसका कहना था, ‘अभी ये कच्चा है। पक जाएगा, तभी ऑपरेशन करना अनिवार्य होगा।’

इस मध्य कालांतर में घर में दो-दो चूल्हे हो गए। रसोइयाँ जो दो दशक से खाली पड़ी थीं, अब दोनों में अलग-अलग खाना पकने लगा था। प्रीति का माँ-बाप की सेवा के संदर्भ में स्पष्ट बयान आ चुका था कि ‘वह नेहा तो मैम साहब बनकर स्कूल चली जाती है। उधर देवर भी यथा नाम तथा गुण को सार्थक कर अपना विकास करने में जुटे हैं। संतान उनके है नहीं। स्वयं दोनों मियाँ-बीवी रोज शाम को गुलछर्रे उड़ाने शहर निकल जाते हैं। अरे, माँ-बाप तो दोनों के हैं, फिर मैं अकेली इन बुड्ढे-बुढि़या का भार कब तक ढोती रहूँगी?’ नेहा ने दो-टूक जवाब देकर रमाकांतजी की अभिलाषाओं पर तुषारपात कर दिया था।

बूढ़ी माँ ने स्वयं जब अपनी आँखों के सामने कानों से स्पष्ट सुना तो वे रो पड़ीं। क्या यह दिन देखने के लिए हमने श्रीधर के सेवानिवृत्त होने पर घर आने की खुशी की आशा लगाकर एक नई सुबह की कल्पना की थी?

बसंत पंचमी का दिन आया। दोनों रसोइयों में पीले चावलों की मीठी खीर बनाई गई थी। रमाकांतजी विकास के साथ रह रहे थे। बूढ़ी माँ सुशीला भी नेहा के स्कूल जाने के बाद घर का शेष काम कँपकँपाते बूढे़ हाथों से संपन्न करती थी। बसंत पंचमी को बनाई गई खीर की गाँव में पड़ोसी भी एक-दूसरे को आदान-प्रदान करने की परंपरा का निर्वहन अभी तक कर रहे थे। लेकिन रमाकांतजी और बूढ़ी माँ सुशीला अपने-अपने हाथों में विकास के घर बनी खीर के कटोरे लेकर बैठे एक-दूसरे की तरफ मूक होकर देख रहे थे।

होलाष्टक प्रारंभ हुए। बसंत पंचमी के दिन गाँव में चौपाल के सामने बीच गाँव में डांडा गाड़ा गया, अर्थात् होली पर जो होलिका दहन होगा, उस स्थल का डांडा गाढ़कर श्रीगणेश कर दिया गया था। धीरे-धीरे होली नजदीक आ रही थी। गाँव में बालक पेड़ की डाली पर धागे में बबूल का काँटा टाँगकर राहगीरों की टोपी काँटे में फँसाकर उतार रहे थे। इधर-उधर बैठे सभी बडे़-बूढे़ हँस पड़ते थे। युवक-बालक-किशोर ‘होली है भई, होली है, बुरा न मानो होली है’ का शोर मचा रहे थे। आखिरकार बालक उस काँटे में फँसाई गई टोपी को इस शर्त पर लौटाते थे, जब वह टोपीवाले से रंग के लिए रुपए लेने का वचन भरवा नहीं लेते।

होली का दिन भी आया। रमाकांतजी के घर में एक होली आँगन में विकास की तरफ से रखी गई। दूसरी होली श्रीधर की बहू प्रीति ने घर के ऊपर छज्जे में एक परात में लगाकर रख दी थी। फाल्गुन की पूर्णिमा की दोपहर नेहा और प्रीति ने अलग-अलग होली का पूजन किया था।

पूर्णिमा की रात्रि में नौ बजकर चालीस मिनट पर चौपाल के सामने रखी होली में गाँव के परिवार विशेष कारिंदा के एक सदस्य द्वारा होली प्रज्वलित की गई। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। उसी होली में से गाँव का प्रत्येक परिवार अग्नि ले जाता है। उसी अग्नि से घरों की होली दहन की जाती है।

रमाकांतजी की बूढ़ी आँखों ने देखा कि विकास होलिका दहन के लिए चौपाल की होली से अलग अग्नि ला रहा था, दूसरी तरफ श्रीधर अलग। इस अलग-अलग के अलगाव से रमाकांतजी का वृद्ध शरीर थरथर काँप रहा था। सिसकियाँ लेकर वे रो रहे थे। दोनों ही बच्चों की बूढ़ी माँ रमाकांतजी को रोता देखकर उन्हें धैर्य बँधाते हुए स्वयं भी सिसकने लगी थीं।

‘‘सुशीला! एक घर की चहारदीवारी में कोई किराएदार भी अलग से होली नहीं मँगवाता है। और न ही गोवर्धन पूजन का निर्वहन अलग से करता है। सब एक साथ मिलकर होलिका दहन में सम्मिलित होकर जौ और कच्चे चने भूनते हैं। उन्हें साफ कर एक-दूसरे को आदान-प्रदान कर प्रसाद के रूप में उसका उपभोग करते हैं। पर सुशीला, मैं आज यह क्या देख रहा हूँ? क्या इसीलिए तुमने बुधवार का उपवास रखकर पुत्र की याचना की थी। श्रीधर गणेशजी के बुधवार के व्रत का सुफल था। लेकिन परमात्मा ने विकास जैसा पुत्र देकर पुनः हमारी फुलवारी को सुवासित कर दिया था। सुशीला, मैं आज बहुत दुःखी हूँ। नीली छतरीवाले ने यही दिन दिखलाने के लिए मुझे साँसें लौटा दी थीं।’’ रोते हुए रमाकांतजी की धोती का पल्ले का एक छोर आँसू पोंछते-पोंछते भीग गया था।

‘‘देखो जी, श्रीधर के पापा, तुम इतना क्यों दुःखी हो रहे हो? आज घर-घर मिट्टी के चूल्हे हैं। सब घरों में यही लीला हो रही है। इसी को तो कलयुग कहते हैं। एक रामायण काल था। जहाँ भाई-भाई के मध्य सरसता की सरयू प्रवाहित थी। विमाताओें को भी पुत्र अपनी माँ से अधिक स्नेह करते थे। एक हम अभागे हैं, जो आज अपने ही घर में अपने पुत्रों के स्नेह से तो वंचित हैं ही, साथ ही इनके आपसी स्नेह-कलश को अपनी आँखो के सामने रिसता देखकर हमारे आँसू नहीं रुक पाते हैं।’’ सुशीला ने रोते हुए आँसुओं को अपनी साड़ी से पोंछते हुए कहा।

‘‘सुशीला, मैं चाहता तो शहर में आलीशान कोठी बनाकर चार पहियों के वाहन खरीदकर शहरी जीवन जी सकता था। लेकिन मेरे हृदय में अपने गाँव की सरसता और उस जन्मभूमि के लगाव में जो सौंधी सुगंध गाँव की मिट्टी में मिलती है, वह और स्थान पर दुर्लभ थी। इसीलिए मैंने गाँव में बच्चों के साथ रहकर सुखी जीवन की कल्पना के स्वर्णिम स्वप्न सँजोए थे। लेकिन मेरे स्वप्न मेरे ही सामने तार-तार होकर टूट गए हैं। आत्मीय स्नेह और लगाव के भाव न जाने आज हमारे परिवारों से कितनी दूर छूट गए हैं? सुशीला, मुझसे अब यह सब नहीं देखा जाता। ऐसी परिस्थिति में यहाँ रहकर जीने से तो अच्छा है कि हम दोनों हरिद्वार जाकर किसी आश्रम में रहें और ईश्वराधना में शेष साँसें वहीं विसर्जित करें तो अधिक श्रेष्ठ है।’’ रमाकांतजी ने रोते हुए दृढ निर्णय की ओर संकेत करते हुए अपनी धर्मपत्नी सुशीला की रोती हुई लाल आँखों की ओर देखते हुए कहा।

‘‘तुम्हारा कहना सोलह आने सही है, जी। विकास अपनी फैक्टरी के कार्य में उलझा हुआ परेशान होकर आता है। सीधे पलंग पर जाकर अपने कमरे में आराम करने चला जाता है। दो मिनट बूढे़ माँ-बाप की राजी-खुशी लेने को आज उसके पास भी समय नहीं है। फिर नेहा तो प्राचार्या महोदया हैं, उनकी तो शान के ही खिलाफ है बूढ़ी सास-श्वसुर की सेवा करने के लिए समय निकालना। दूसरी तरफ श्रीधर तो हमेशा सीमा सुरक्षा बल में रहा है। उसे तो बस अपनी पत्नी प्रीति और नकुल और मुकुल ही नजर आते हैं। वही उसका अपना संसार है।’’ सुशीला ने दुःख भरे स्वर में कहा।

‘‘हमने एक वर्ष में बच्चों के साथ रहकर सबकुछ देख लिया है। अब हम एक पल भी यहाँ नहीं रहना चाहते, सुशीला। ईश्वर ने पेंशन की व्यवस्था भी पूर्व में ही कर दी है। किसी के आगे हाथ भी नहीं फैलाना पडे़गा। तुम सुबह तक अपना सामान सँभालकर बाँध लो। दो-चार साड़ी और मेरे धोती-कुरते भी रख लेना। हम सुबह की टे्रन से चले जाएँगे। शहर जाने के लिए मैंने रामसिंह प्रजापति से कह दिया है, वह सूर्योदय के साथ ही ताँगा लेकर हमारे घर पर खड़ा हो जाएगा।’’ रमाकांतजी ने दृढतापूर्वक अपने निर्णय के बारे में सुशीला को कहा।

दूसरे दिन पौ फटते ही ताँगा लेकर रामसिंह प्रजापति रमाकांतजी के घर पर तैनात खड़ा दिखाई दिया। बूढे़ माँ-बाप ने लोहे के एक संदूक में सामान रखा और एक थैला ले लिया। ताँगे में चढ़ने से पूर्व वे बच्चों को आवाज दे रहे थे—‘‘अरे विकास और श्रीधर, आओ बेटा, अब हम दोनों स्थायी रूप से हरिद्वार हरिकीर्तन को यह घर छोड़कर जा रहे हैं। तुम दोनों भाई जैसा चाहे रहना। अब हम भार नहीं बनेंगे तुम दोनों के लिए।’’ इतने में नकुल और मुकुल दोनों पोते ताँगे के पास आकर खडे़ हो गए। वे दोनों दादा-दादी का हाथ पकड़कर रोते-रोते कहने लगे—‘‘दादाजी और अम्माजी, हम आपको गाँव से दूर कहीं नहीं जाने देंगे। वर्षों से हम आपके प्यार से वंचित थे। अब अवसर मिला है तो आप हमसे दूर जा रहे हैं। आप अभी ताँगे में नहीं चढ़ पाओगे, दादाजी! नहीं चढ़ पाओगी अम्माजी। आप हमारी बात मान लीजिए। आपके जाने के बाद...।’’ रोते हुए दोनों पोते ताँगे के सामने आकर खडे़ हो गए।

बच्चों का आग्रह मानकर रमाकांतजी निर्णय बदल लेते, लेकिन दोनों बेटा-बहू अभिवादन करके उन्हें विदा कर रहे थे—टा-टा और बाए-बाए कहकर।

बूढे़ रमाकांतजी और बूढ़ी दादी सुशीला ताँगे में बैठकर अपने घर को देखते हुए आँखों में आँसू भर लाए। ताँगा रामसिंह हाँकने लगा था। ताँगा जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गया, तब तक तक दोनों पोते अपने आँसुओं को पोंछते ही रह गए। उधर बूढे़ रमाकांतजी और बूढ़ी दादी माँ भी सिसकती हुई बुढ़ापे की डगर पर ताँगे में चली जा रही थी।

 

गुप्ता सदन, एस.बी.के. गर्ल्स हा.से. स्कूल के पास,

मंडी अटलबंद, भरतपुर-३२१००९ (राजस्थान)

दूरभाष : ०९९८३४०९४५४

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