नए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का अभिनंदन

भारत में नए राष्ट्रपति मान. श्री रामनाथ कोविंद और उपराष्ट्रपति मान. श्री वैंकय्या नायडू ने संविधान के अनुसार अपने पद की शपथ ग्रहण की। उनका हार्दिक-स्वागत अभिनंदन! प्रारंभ से ही चुनाव का गणित राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (एन.डी.ए.) के पक्ष में था, परंतु मुख्य विपक्षी दल और उनके सहयोगियों ने कहा कि सिद्धांतों के आधार पर फिर भी वे अपने प्रत्याशी खडे़ करेंगे। वैसे यू.पी.ए. में तो आपस में ही अनेक मतभेद हैं। फिर भी उन्होंने सेकुलरिज्म, सोशलिज्म, असहिष्णुता, विभेदकारी राजनीति, महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों की असुरक्षा आदि के मुद्दे उठाए। संविधान में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के अधिकार तथा दायित्व रेखांकित हैं। संविधान हर व्यक्ति और वर्ग को समान अधिकार देता है। सेकुलरिज्म और सोशलिज्म शब्द घिसते-घिसते अर्थहीन हो गए हैं। न्यायपालिका, विशेषतया सर्वोच्च न्यायालय का दायित्व है कि संविधान की लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन न हो। विरोध पक्ष की ओर से शुरू में नीतीश कुमार और ममता बनर्जी ने गोपाल कृष्ण गांधी का नाम राष्ट्रपति के लिए प्रस्तावित किया, पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उस समय इस प्रस्ताव को स्थगित कर दिया। इसी बीच राजग ने बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। वे एक साधारण गरीब परिवार एवं गाँव से आते हैं और कोरी अनुसूचित जाति के हैं। उनको जनसेवा और सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी प्रैक्टिस का अनुभव है। मोरारजी केस्टाफ में भी वे रहे हैं। बी.ए. और एल-एल.बी. की डिग्रियाँ उन्होंने अर्जित की हैं। राज्यसभा के दो बाद सदस्य और संसद् में एक समिति केअध्यक्ष तथा कुछ अन्य समितियों के सदस्य रहे हैं। वे सक्रिय सांसद थे। राज्यपाल का संवैधानिक पद उन्होंने गरिमा से सुशोभित किया।

 

कांग्रेस ने अंत में उनके मुकाबले में श्रीमती मीरा कुमार को प्रत्याशी घोषित कर दिया। जब कांग्रेस का चुनावी गणित सही हो, तब और जब नहीं हो, तब भी उसकी कोशिश यही रहती है कि कोई कांग्रेसी ही राष्ट्रपति बने। इसके पहले ही नीतीश कुमार ने घोषणा कर दी कि श्री रामनाथ कोविंद का राज्यपाल की हैसियत से व्यवहार निष्पक्ष एवं हर प्रकार से विवाद रहित रहा है और वे उनका समर्थन करेंगे। बी.एस.पी. की अध्यक्ष मायावती ने पहले कहा कि वे कोविंद का समर्थन करेंगी, क्योंकि वे दलित हैं, किंतु यदि उनसे अच्छा कोई प्रत्याशी आया तो फिर उसका समर्थन करेंगी। इसी को आधार बनाकर उन्होंने अंत में मीरा कुमार का समर्थन किया। वे भी अनुसूचित जाति की हैं। वे स्व. जगजीवनराम की बेटी हैं, विदेश सेवा में रहीं और मंत्री तथा लोकसभा की स्पीकर भी रहीं। दोनों प्रत्याशी वोट माँगने के लिए राज्यों में भी गए, क्योंकि विधानसभाओं के सदस्य और लोकसभा के सदस्य राष्ट्रपति के लिए इलेक्टोरेट बनाते हैं। मीराजी ने वक्तव्य दिए कि उनकी विचारधारा क्या है और उनका मंतव्य क्या है। कोविंदजी ने राज्यों की अपनी यात्रा बड़ी संजीदगी से की। ज्यादा वक्तव्य नहीं दिए। उनका केवल इतना कहना था कि अब वे राज्यपाल होने के बाद किसी दल से संबंधित नहीं हैं और बिना पक्षपात संविधान की अपेक्षा के अनुसार निर्णय करेंगे। माननीय कोविंद का बयान, जो उन्होंने राष्ट्रपति के चुने जाने केबाद दिया और जो आह्वान उन्होंने स्वाधीनता की पूर्व संध्या पर किया, वह उनकी प्रज्ञा, वृहद् सामाजिक संवेदना तथा देश की जमीनी परिस्थितियों की जानकारी का परिचायक है। जैसा पहले से स्पष्ट था, श्री रामनाथ कोविंद ने आशा से भी अधिक मत प्राप्त किए और वे भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित घोषित हुए।

उपराष्ट्रपति के लिए कांग्रेस अध्यक्ष ने गोपालकृष्ण गांधी को नामित किया। हम उन्हें मसूरी नेशनल प्रशासनिक अकादमी से भी जानते हैं, जब वे आई.एस. के प्रशिक्षु (प्रोवेशनर) के रूप में वहाँ प्रशिक्षण केलिए पहुँचे थे। बाद में भी सेवाकाल में मिलना-जुलना होता रहा। वे मेधावी हैं। प्रशासन का अच्छा अनुभव है। भारत के दक्षिण अफ्रीका में उच्चायुक्त नियुक्त हुए थे, बाद में कुछ देशों में राजदूत भी रहे। पश्चिम बंगाल केराज्यपाल भी नियुक्त हुए। सोनिया गांधी यदि उनको पहले राष्ट्रपति के लिए नामित कर देतीं तो विरोध पक्ष की शायद इतनी बड़ी हार न होती, क्योंकि नीतीश उस समय उनके समर्थक थे। अपनी विचारधारा के आधार पर गोपाल गांधी ने उपराष्ट्रपति प्रत्याशी होना भी स्वीकार कर लिया। चुनाव को आइडियालिकल रंग देने की चेष्टा की गई। चुनाव में कोई कटुता पैदा नहीं हुई। सत्तापक्ष और उनकेसहयोगियों ने श्री वैंकय्या नायडू को उपराष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशित बनाया। पार्टी संघटन का उनको दीर्घकालीन अनुभव है। पेशे से वकील रहे, वे दो बार आंध्र प्रदेश विधानसभा केसदस्य रहे। उनको भाजपा काअध्यक्ष होने का भी गौरव प्राप्त है। वाजपेयी और मोदी मंत्रिमंडल में उनको कई मंत्रालयों में काम करने का अवसर मिला। संसदीय कार्यप्रणाली की अच्छी जानकारी है। तेलुगू, हिंदी और अंग्रेजी के अच्छे वक्ता हैं। हाजिरजवाब हैं और अपनी बात को हास्य तथा प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता रखते हैं। सभी दलों के नेतृत्व से उनके अच्छे संबंध हैं।

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के समय यह कहा गया कि श्री कोविंद और श्री नायडू दोनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लंबे अरसे से जुडे़ रहे और भारतीय जनता पार्टी से भी, तो क्या वे उनकी विचारधारा से ऊपर उठ सकते हैं। यह एक प्रकार का दुष्प्रचार ही था। राजग के दोनों प्रत्याशियों ने बार-बार स्पष्ट किया कि वे सब दलों से अलग हैं, अपने संवैधानिक पदों के दायित्वों का निर्वहन बिना किसी भेदभाव के और संविधान के अनुसार करेंगे। अभी तक केवल भैरोंसिंह शेखावत ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से संबंधित थे, जो उपराष्ट्रपति के चुनाव में विजयी हुए थे। उनका कार्यकाल हर दृष्टि से प्रशंसनीय रहा। इस प्रचार में अंग्रेजी मीडिया खासकर शामिल रहा। वास्तव में जो शंकाएँ या शिकायतें रहीं, उन्हें खुलकर नहीं कहा जाता था। अंदर-अंदर प्रचार हो रहा था। पहली यह कि कोविंद और वैंकय्या नायडू उतने ‘सोफिस्टिकेटेड’ या ‘रिफाइंड’ नहीं, जैसे इन पदों पर पहले के लोग रहे हैं। वे हमेशा अंग्रेजी में ही बात नहीं करते हैं। दिल्ली में एक लुटाइनस सर्कल या सेट है, जिसमें कुछ राजनेता, कुछ पत्र-पत्रिकाएँ और दृश्य मीडिया के मालिक, कुछ पूर्व अधिकारी, मीडिया के लोग तथा कुछ पूँजीपति भी शामिल हैं, और जिनकी नाक सदैव ऊँची रहती है, वे इनको अपने क्लास का नहीं समझते। उनको यही दुःख है कि अब शायद वे सत्ता को पीछे रहकर इस्तेमाल नहीं कर पाएँगे या प्रभावित नहीं कर पाएँगे। अभी तक उनकी चलती थी, अब शायद न चल सकेगी। इस सीमित और क्लोज्ड सर्कल का यह भ्रम दूर हो गया है कि जो सरकार सत्तारूढ़ है, उसको वे अब कठपुतलियों की तरह नहीं नचा पाएँगे। यह लुटाइनस सर्कल अनौपचारिक है। इसके सदस्य अदलते-बदलते रहते हैं। यह एक प्रकार का प्रेशर ग्रुप है, जो चुपचाप सत्ता को प्रभावित करने की कोशिश करता है। इनमें से बहुतों के विदेश से संबंध हैं। वे चतुराई से काम करते हैं। राष्ट्रपति अनुसूचित जाति के हैं और उपराष्ट्रपति अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं। यह इलाइटिस्ट मेंटलिटी अथवा तथाकथित संभ्रांत वर्ग की मानसिकता है।

दूसरा दुःख यह है कि अब तीनों उच्च संवैधानिक पदों पर संघ और भाजपा से जुडे़ रहे महानुभाव आसीन हैं। प्रधानमंत्री संवैधानिक पद पर होते हुए भी एक राजनीतिक दल का नेता होता है। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। कोविंद राष्ट्रपति और नायडू उपराष्ट्रपति, अतएव सब सत्ता एक विचारधारा वालों में केंद्रित हो गई है, इसलिए देश के भविष्य के बारे में बहुत से संपादकीय और आलेखों में चुनाव के पहले और चुनाव के बाद भी समय-समय पर तरह-तरह से शंकाएँ प्रकट की गईं और की जा रही हैं। यह भी कहा गया कि आइडिया ऑफ इंडिया या भारत की परिकल्पना टूटने का डर है, मानी आइडिया ऑफ  इंडिया एक दल की या एक परिवार की धरोहर है। पहले भी तीनों पदों पर एक विचारधारा के व्यक्ति विराजमान रहे हैं। तब यह शंका क्यों नहीं उठाई गई? आपातकाल की घोषणा क्या ऐसे दिनों में नहीं हुई? असल में इन लोगों को घुटन और चिढ़ नरेंद्र मोदी से है। वह उन्हें लोनर लगते हैं, उनकी अपनी सोच है, उसका कोई क्या कर सकता है।

कुछ लोग ‘सोशलाइज’ करते हैं। मोदी पार्टियों-समारोहों में एक-दूसरे की पीठ नहीं ठोकते। मोदी ने सत्ता के गणित में जो उलट-पलट कर दी है, शायद सभी पुराने सत्ताभोगियों को वह खलती है, अखरती है। सत्ता का स्वभाव ही चंचल है। लोकतंत्र का तो आधार ही है कि राजनीतिक दल आएँगे, जाएँगे। फिर शंकालु होने की क्या और क्यों आवश्यकता है? वैसे तो न जाने कितनी बार दिल्ली बनी और बिगड़ी। जायसी ने तो वैसे भी दिल्ली को निबहुरी कहा है। किंतु आज तो लोकतंत्र है, जनता निर्णायक होगी कि सत्ता का दुरुपयोग किसने किया है। संविधान सत्ता को नियंत्रित करता है। किसी प्रकार की आशंका बेबुनियाद है। हमें संसद् में दोनों के सहयोगी होने का सौभाग्य प्राप्त है। हमें पूर्ण आशा है कि मान. राष्ट्रपति महोदय श्री रामनाथ कोविंद और मान. उपराष्ट्रपति श्री वैंकय्या नायडू अपने कार्यकाल में अपने पदों की सार्थकता पूर्णतया प्रमाणित करेंगे।

भारत छोड़ो आंदोलन और राजनैतिक दलों का रुख

संसद् के दोनों सदनों में ८ अगस्त के आंदोलन को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। वक्ताओं ने उसके महत्त्व पर अपने-अपने दृष्टिकोण से विचार प्रस्तुत किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि १९४२ से १९४७ का समय बडे़ उथल-पुथल का समय था, देश में जन-जागृति बढ़ रही थी। गांधीजी के नेतृत्व में अंततोगत्वा स्वाधीनता प्राप्त हुई। दोनों सदनों ने प्रस्ताव पारित किए, किंतु बहस के दौरान सामूहिक सम्मान के स्थान पर अगस्त आंदोलन विवाद के भँवर में फँस गया। जवाहरलाल नेहरू का नाम प्रधानमंत्री द्वारा न लेने के कारण कांग्रेस नाराज हो गई। नेहरूजी ने गांधीजी के भारत छोड़ो प्रस्ताव को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में औपचारिक रूप में पेश किया था और सरदार पटेल ने उसका समर्थन किया। अतएव सोनिया गांधी ने बिना संघ या भाजपा का नाम लिये कहा कि ऐसे दल भारत छोड़ो आंदोलन का श्रेय लेना चाहते हैं, जिन्होंने कभी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया और उसका विरोध किया। यहाँ तक कहा कि देश में ऐसी शक्तियाँ उभर रही हैं, जो देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा हैं और कांग्रेस उनका भरसक विरोध करेगी। पूरी नोकझोंक के विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। यह जरूर है कि उस समय स्थिति विचित्र थी। जो लोग उस काल के साक्षी रहे हैं, उन्हें ही इसका कुछ एहसास है।

प्रारंभ में पं. नेहरू और मौलाना आजाद किसी प्रकार के आंदोलन के विरुद्ध थे, क्योंकि प्रजातंत्रात्मक और फासीवादी देशों की लड़ाई में वे नहीं चाहते थे कि साम्राज्यवादी होते हुए भी प्रजातंत्रात्मक देश कमजोर हों। उनकी सहानुभूति ब्रिटेन और फ्रांस के साथ थी। राजाजी भी इसी विचार के थे और उन्होंने तो अंत में कांग्रेस छोड़ ही दी थी। मौ. आजाद ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि गांधीजी सुभाषचंद्र बोस से बहुत प्रभावित हो रहे थे। स्वतंत्रता की खोज में देश से बाहर जाने के बाद सुभाष बोस निरंतर कोशिश में थे कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जंग छेड़ी जाए। आजाद हिंद रेडियो से अपने भाषणों में वे लगातार ब्रिटेन से किसी प्रकार के समझौते के खिलाफ बोलते थे। चर्चिल सरकार की भारत की स्वाधीनता के प्रति अस्पष्टता और टालमटोल के कारण अंत में नेहरू और आजाद गांधीजी से सहमत हो गए, और इस प्रकार भारत छोड़ा आंदोलन का सूत्रपात हुआ।

उस समय जो मुख्य राजनीतिक दल देश में थे, उनके दृष्टिकोण अलग-अलग थे। जिन्ना की मुसलिम लीग, जो ब्रिटिश सरकार के समर्थन के कारण तथा कांग्रेस की सरकारों के इस्तीफा देने के कारण काफी मजबूत हो गई थी, वह मुसलमानों में लोकप्रिय हो रही थी। उसने विरोध किया कि यदि ब्रिटिश राज समाप्त हुआ तो हिंदू राज स्थापित हो जाएगा और मुसलमानों पर अत्याचार होंगे। १९४० में लीग का लाहौर प्रस्ताव देश-विभाजन के बारे में पारित हो चुका था। हिंदू महासभा के अध्यक्ष वीर सावरकर ने नारा दिया—‘हिंदुआइज पालिटिक्स ऐंड मिलीटराइज हिंदुज्म’। वे चाहते थे कि हिंदुओं में राजनीति के प्रति जागरूकता बढे़, वे अपने हितों को पहचानें, फौज में भरती हों और अधिकाधिक शस्त्रों की शिक्षा लें। कम्युनिस्ट पार्टी पहले द्वितीय विश्व युद्ध को साम्राज्यवादियों का युद्ध कह रही थी और ब्रिटिश सरकार विरोधी थी, पर जैसे ही जर्मनी ने सोवियत रूस पर आक्रमण किया तो उनका रुख बदल गया। अब वह जनता का युद्ध हो गया। पी.सी. जोशी और मैक्सवेल में समझौता हो गया। वह पूरी तरह सरकार के साथ चली गई और अगस्त आंदोलन की विरोधी हो गई। एम.एन. राय की रेडिकल पार्टी थी, जो कम्युनिस्ट पार्टी से अलग थी, किंतु अपने को मार्क्स की विचारधारा पर आधारित कहती थी, वह भी अगस्त आंदोलन के विरुद्ध थी।

डॉ. अंबेडकर का खयाल था कि दलितों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत बेहतर है एवं उस समय के वातावरण में वे भी अगस्त आंदोलन के विरोध में थे। संघ जो एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है, का कहना था कि संघ संस्था के रूप में अलग रहेगा, पर इसके सदस्य अपनी इच्छानुसार भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेना चाहें तो ले सकते हैं। किस्सा लंबा है। अब दस्तावेज उपलब्ध हैं, जो देखे जा सकते हैं। वास्तविकता यह है कि अंग्रेजी राज से स्वाधीनता सब चाहते थे, किंतु पहले वे प्रतीक्षा कर रहे थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद आखिर सत्ता कब, किस प्रकार और किसके पास जाती है। कांग्रेस में विशेषतया कांग्रेस सोशलिस्टों जयप्रकाश, अच्युत पटवर्धन, लोहिया आदि ने आंदोलन में बहुत सक्रियता से भाग लिया और कष्ट सहे, पर अब ये इतिहास की बातें रह गई हैं। विवादों से ऊपर उठकर अगस्त आंदोलन का स्वागत और सम्मान सामूहिक रूप से होना चाहिए। आगे आनेवाली पीढि़यों के लिए यह सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा।

संकल्प से सिद्धि

सत्तरवें स्वाधीनता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी के देश के नाम उद्बोधन की हम संक्षेप में चर्चा करना चाहेंगे। मुद्दे और समस्याएँ अनेक हैं तथा उनपर विचार-विमर्श चलता रहेगा। प्रधानमंत्री ने कई राज्यों में प्राकृतिक विपदाग्रस्त लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की और गोरखपुर के अस्पताल में हुई त्रासदी, बच्चों की मृत्यु पर दुःख और संवेदना प्रकट की। उन्होंने अपने तीन वर्षों की मुख्य उपलब्धियों की चर्चा की। स्वतंत्रता दिवस पर संकल्प लेने और सिद्धि प्राप्त करने का आह्वान किया। देश से सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, असहिष्णुता, भ्रष्टाचार और संकुचित वृत्तियाँ, गरीबी, गंदगी आदि दूर करने का संकल्प लें। उन्होंने कहा, धर्म के नाम पर हिंसा अस्वीकार्य है। जम्मू-कश्मीर की समस्या न गाली (वाक् युद्ध) से और न गोली से होगी, आवश्यकता है गले लगाने की। देखना है कि इसकी प्रतिक्रिया कश्मीर घाटी में क्या होती है। विदेश नीति के बारे में कुछ नहीं कहा। आश्वासन दिया कि आंतरिक और बाह्य सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है। तीन तलाक के विरुद्ध महिलाओं के आंदोलन का भी उन्होंने जिक्र किया। उन्होंने एक नए भारत की तसवीर प्रस्तुत की। आह्वान किया कि ‘सब चलता है’ की मानसिकता को हम बदल सकते हैं। ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के अवसर पर ‘भारत जोड़ो’ का संकल्प लें। उनका आह्वान सबके सहयोग का है। उन्होंने कहा, दौड़कर २०२२ तक नए भारत के संकल्प को पूरा करें। तब तक गरीब के पास कंक्रीट के मकान होंगे, किसान की आमदनी दो गुनी होगी और महिलाओं को बहुत सारे अवसर प्राप्त होंगे, तब तक भारत जातिवाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद से मुक्त होकर स्वच्छ भारत होगा। प्रधानमंत्री का आह्वान, आश्वासन सुहावना और पे्ररणादायक है। पर यह रास्ता लंबा और कंटकाकीर्ण है। सावधानी से हर कदम का आकलन आवश्यक है, अभी तक जो कदम उठाए गए हैं, उनका निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए, ताकि जो कमियाँ हैं, उनको दूर किया जा सके।

कुछ समस्याएँ हैं, जिनका समाधान अत्यावश्यक है। पहली समस्या कृषि संबंधी है, किसानों की कर्ज माफी का, उनकी आत्महत्या का और उनको उनकी उपज की उचित कीमत क्यों नहीं दी जाती है, ताकि वे कृषि से जुडे़ रहें। दूसरी समस्या स्वास्थ्य की है, जो शहरों से ज्यादा गाँवों में लचर स्थिति में है। गाँवों में तो है ही नहीं। स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत करोड़ों रुपए दिए गए, उनका क्या हुआ। गोरखपुर के अस्पताल में दिमागी बुखार से बच्चों की मृत्यु की घटना हृदयविदारक है। ऐसा वर्षों से हो रहा है। क्या कारण है? क्या उसका कुछ निदान है? हम किसी पर दोषारोपण नहीं करना चाहते हैं। गोरखपुर की त्रासदी की जाँच हो रही है। मुख्यमंत्री ने आवाश्सन दिया है कोई दोषी बख्शा नहीं जाएगा। इतने वर्षों से चली आ रही समस्या पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? अभी भी मौतें हो रही हैं। असम और ओडिशा भी इसकी चपेट में हैं। क्या इनकी रोकथाम का इंतजाम नहीं किया जा सकता है? आपातकाल के स्तर पर क्या कोई प्रबंध हो सकता है? इसी तरह प्राथमिक से लेकर सेकेंडरी शिक्षा पर उचित ध्यान अभी भी नहीं दिया जा रहा है। गुणवत्ता का तो सवाल ही नहीं। विकास की यह नीवँ है।

तीसरी समस्या है कि प्रधानमंत्री की बहुत सी योजनाओं को सफल बनाने में राज्यों की बहुत बड़ी भूमिका है। कॉआपरेटिव फेडरलिज्म, सहयोगी संघीय व्यवस्था एकांगी नहीं हो सकती। राज्यों की भी अपनी जिम्मेदारी है। सर्वोच्च न्यायालय ने अभी पिछले दिनों फूड सिक्योरिटी या भूख से सुरक्षा केसंबंध में बहस केदौरान टिप्पणी की थी कि यदि संसद् द्वारा पारित कानूनों का पालन राज्य नहीं करते तो क्या केंद्र असहाय बना रहेगा? यह विचारणीय है। केंद्र के कुछ आदेश या कार्य होते हैं, जो राज्यों को पसंद नहीं, तो तुरंत शिकायत शुरू हो जाती है कि संघीय व्यवस्था खतरे में है, राज्यों की स्वायत्तता का अतिक्रमण हो रहा है। आंतरिक सुरक्षा, महिलाओं और दलितों की सुरक्षा सामान्य कानून व्यवस्था की समस्याओं का समाधान राज्य सरकारों को कराना है। क्या ऐसा हो रहा है? चौथी समस्या है बेरोजगारी की। क्या यह समस्या बिना नए रोजगारों के सृजन के हल हो सकती है? क्या हर युवक स्वयं अपने लिए रोजगार पैदा कर सकता है? इसकी एक सीमा है। अच्छा है कि इस विषय पर प्रधानमंत्री युवा इंटरप्रेनोरो से बातचीत कर रहे हैं कि कैसे रोजगार के नए अवसर निकाले जाएँ। देशी पूँजी का भी निवेश देश में न होकर विदेश में हो रहा है, क्या काम-धंधा करने की सुविधाओं में सुधार हो रहा है? विदेशी निवेश तो इसी पर निर्भर करेगा।

इसी से जुड़ी है समाज में बढ़ती विषमता। एक प्रतिशत लोगों के नियंत्रण में ५८ प्रतिशत धन और सुविधाएँ हैं। अधिक कहना बेकार है। विषमता समाज को जोड़ने की जगह तोड़ती है। पाँचवीं बात यह कि कुछ लोगों का कहना है कि इतनी जल्दी-जल्दी नीतियाँ और कार्यक्रम आ रहे हैं कि एक अनिश्चितता का वातावरण बन रहा है और विकास की गति धीमी हो रही है। यह धुँधलापन दूर होना चाहिए। तभी आर्थिक निवेश और विकास संभव होगा। छठा मुद्दा है कि अभी कीमतें बढ़ नहीं रही हैं, किंतु कुछ अर्थशास्त्री और टिप्पणीकार चिंता व्यक्त कर रहे हैं कि छह महीने में स्थिति बदले, इनफ्लेशन बढे़, अतएव इस ओर सतर्क रहना होगा। सातवाँ सवाल भ्रष्टाचार और कालेधन का है, जिसके लिए प्रधानमंत्री इतने प्रयत्न कर रहे हैं। भ्रष्टाचार में अपने और दूसरे में भेद नहीं किया जा सकता। आज भाजपा परोक्ष और अपरोक्ष रूप से १३ राज्यों में सत्ता में है। अतएव भाजपा शासित राज्यों केबारे में यदि कोई आरोप लगाता है तो शीघ्र काररवाई होनी चाहिए और पारदर्शिता भी होनी चाहिए। हरियाणा सरकार की भूमिका वहाँ के राजनेता के पुत्र का हरियाणा के एक अधिकारी की बेटी की गाड़ी का अपनी गाड़ी द्वारा चंडीगढ़ में पीछा करने के मामले में जनता पर असर अच्छा नहीं पड़ा। अंत में उस युवक और उसके साथी को जेल जाना ही पड़ा और हेर-फेर की कोशिश बेकार रही। अब सर्वोच्च न्यायालय ने एक कटु टिप्पणी की है, किस प्रकार एक पार्टी को वह लाभ दिलाने की कोशिश की गई, जिसके लिए वह अयोग्य थी।

हम विवरण में नहीं जाना चाहते। उधर छत्तीसगढ़ केएक मंत्री केविरुद्ध आरोप है कि उनके पुत्र और पत्नी ने गलत तरीके से जंगल विभाग की जमीन खरीदी और वहाँ एक टूरिस्ट रिजोर्ट बनाया जा रहा है। अब समाचार आया है कि किस प्रकार जो स्थान पोस्ट ऑफिस के लिए निश्चित किया गया था, वह केंद्रीय राज्य मंत्री विजय गोयल को डी.डी.ए. द्वारा नियम या मापदंड बदलकर आवंटित किया गया। सिद्धांत रूप से उनकी चर्चा की है, क्योंकि इस प्रकार केआरोपों का जब तक स्पष्टीकरण नहीं होता है, प्रधानमंत्री के भष्टाचार के प्रयासों और उसकी नैतिक स्वच्छता के दावे पर प्रश्न उठने लगते हैं। आठवाँ सवाल है कि चाहे केंद्र के मंत्री हों अथवा राज्यों के, चाटुकारों, चमचों, खुशामदियों से कैसे बचें। जहाँ सत्ता होती है, वहाँ ये चाटुकार अपने हाथ सेंकने पहुँच ही जाते हैं। जहाँ शहद का पात्र होगा, वहाँ मक्खियाँ भिनभिनाने ही लगती हैं। कभी-कभी मंत्रिगण आत्ममोह से ग्रसित हो जाते हैं, क्योंकि आसपास चाटुकार हैं, जिनका काम ही है जी-हुजूरी करना और प्रशंसा के पुल बाँधना। सत्ता का नशा अच्छे और बुरे में  पहचान कठिन बना देता है। हम सब जानते हैं, किसी राय की आवश्यकता नहीं है, हर आलोचना नकारात्मक है, वे भ्रम पालने लगते हैं। इसलिए कबीर बाबा ने बहुत पहले आगाह किया था, ‘निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।’ कुछ नम्रता, दूसरों से अनुभव लेना या जानकारी का आदान-प्रदान सदैव लाभदायक होता है। यह वही कर सकता है, जिसे स्वयं अपने पर विश्वास है।

इस प्रकार की अनेकों समस्याएँ हैं, जिनकी चर्चा यहाँ संभव नहीं है। प्रश्न है कि क्या राजनेता और प्रशासनिक व्यवस्था इन समस्याओं का निराकरण करने में ईमानदारी से दिलचस्पी ले रही है, और क्या इन्हें भान है कि उत्तरदायित्व की धारणा की अधिक समय तक अवहेलना नहीं की जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले चुनाव से नहीं, बल्कि २०२२ में जब हमारी स्वाधीनता की ७५वीं वर्षगाँठ होगी, उसे नए भारत की प्राप्ति का लक्ष्य बनाया है, अपना विजन निर्धारित किया है, वह संकल्प से सिद्धि तक पहुँचने केलिए अत्यंत अर्थवान है। संयोग से ७०वाँ स्वाधीनता दिवस और जन्माष्टमी एक दिन पडे़। यह नियति का संकेत है कि देश को अब श्रीकृष्ण केगीता की शिक्षा ‘निष्काम कर्म और कौशल ही योग है’ को समझने और तदनुकूल कर्तव्य-पालन की आवश्यकता है।

जगदीश चंद्र माथुर की जन्मशती

साहित्य अमृत के अगस्त मास के अंक में सूचनार्थ लिखा गया था कि २०१७ प्रख्यात नाटककार श्री जगदीश चंद्र माथुर का शती वर्ष है। ऐसा लगता है कि पिछले कुछ दशकों से उनका नाम साहित्य-जगत् में विस्मृत हो गया है। उनका व्यक्तित्व व कृतित्व बहुपक्षीय था। संतोष और प्रसन्नता की बात है कि उनके शती वर्ष में उनके नाट्य साहित्य पर एक विवेचनात्मक ग्रंथ ‘जगदीशचंद्र माथुर का नाट्य साहित्य ः एक मूल्यांकन’ पुस्तक प्रतिष्ठान, अंसारी रोड, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है। यह एक शोधगं्रथ है, जिसका प्रणयन डॉ. (श्रीमती) शैलजा हिरेमठ ने किया है, जो कर्नाटक के कई विद्यालयों में हिंदी की प्राध्यापिका रही हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि उत्तर भारत के हिंदीवाले जगदीशचंद्र माथुर पर एक अहिंदी विदुषी ने डॉ. चंदूलाल दुबे (पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग) के मार्गदर्शन में यह शोधकार्य किया है। सामग्री खोजने और प्राप्त करने में कितना परिश्रम, पत्राचार और दौड़-धूप डॉ. (श्रीमती) हिरेमठ ने की है, यह गं्रथ का अध्ययन करते समय पता चलता है। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि तीन-चार दशक पूर्व माथुर पर लिखे गए अनुसंधान ग्रंथों को देखकर तय किया कि उनकी शोध की दिशा कुछ नई होनी चाहिए। समाजशास्त्र की विद्यार्थी रहने के कारण और उसमें दिलचस्पी की वजह से उन्होंने जगदीशचंद्र माथुर के नाटकों की सामाजिक पृष्ठभूमि और सामाजिक चेतना केपरिप्रेक्ष्य में शोध किया। यह बहुत उचित था, क्योंकि जो सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक वातावरण, विशेषतया पहले घर के और बाद में इलाहाबाद के वातावरण, जिसने जगदीशचंद्र माथुर को प्रभावित किया, एक प्रकार से उनके व्यक्तित्व को निर्मित किया, उसको उजागर किया जाना आवश्यक था।

लेखिका ने अपने प्राक्कथन में खेद प्रकट किया है कि थीसिस के दो प्रारंभिक अध्याय, जो सामाजिक चेतना के स्वरूप आदि से संबंधित थे, पुस्तक के आकार को सीमित करने के कारण वे पुस्तक में नहीं जोडे़ जा सके। हम समझते हैं कि उनके बिना भी प्रकाशित ग्रंथ में पूर्णता है और उनका अभाव किसी प्रकार नहीं खलता है, उनके पूरे विश्लेषण में सामाजिक चेतना परिलक्षित होती है। पाँच अध्यायों में डॉ. (श्रीमती) हिरेमठ ने न केवल जगदीशचंद्र माथुर के व्यक्तित्व तथा क्या क्रिएटिव प्रभाव रहे, बल्कि किस प्रकार से वे नाटक लिखने और समय-समय पर उनमें भाग लेने के लिए आकर्षित हुए और इतनी ख्याति प्राप्त की, इसका भी वर्णन किया है। विवरण के लिए तो गं्रथ का अनुशीलन आवश्यक है। विदुषी डॉ. हिरेमठ इस शोधगं्रथ के प्रणयन के लिए साधुवाद की पात्र हैं। जो भी विश्लेषण वे करती हैं, उसकी पुष्टि, समर्थन अधिकाधिक रूप में करती हैं। उनकेविश्लेषण में जगदीश चंद्र माथुर केशब्द ही नहीं, उनकी भावना, उनके आदर्श और उनकी आस्थाएँ प्रतिध्वनित होती हैं। देर से ही सही, पर उनका शोधगं्रथ जगदीशचंद्र माथुर की जन्मशताब्दी वर्ष में प्रकाशित हो सका, यह हर्ष का विषय है और स्वागतयोग्य भी।

अपने सेवाकाल के प्रारंभ में हमारा जगदीशचंद्र माथुर से कुछ परिचय हुआ था। प्रथम, जब जयपुर में ऑल इंडिया रेडियो का केंद्र स्थापित होना था और उस समय हमें राजस्थान के मुख्यमंत्री के सचिव होने का शुभावसर प्राप्त हुआ था। दूसरे, कुछ वर्षों केबाद पुनः संयोग बना, जब हम दिल्ली प्रशासन के मुख्य सचिव थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वाधीनता केपच्चीसवें वर्ष के उपलक्ष्य में स्वाधीनता सेनानियों को ताम्रपत्र प्रदान करने का निश्चय किया। पूरे देश से आमंत्रित स्वतंत्रता सेनानियों को ठहराने और भोजन आदि की व्यवस्था का दायित्व दिल्ली प्रशासन पर था। मार्गदर्शन माथुर साहब से मिलता था। उनको पूरे आयोजन के संयोजक का गुरुतर भार सौंपा गया था। जगदीशचंद्र माथुर आई.सी.एस. के अधिकारी थे। जैसा कि होता है, वे बिहार सरकार के अनेक पदों पर रहे—कमिश्नर रहे, शिक्षा-सचिव रहे। उनके लिए कोई दायित्व औपचारिक नहीं था। वे अपने को हर दायित्व में आत्मसात् कर लेते थे। १९४२ के आंदोलन के समय अपनी विचारधारा के कारण वे ब्रिटिश सरकार के घेरे में रहे और उनके पत्राचार पर कड़ी नजर रखी गई थी। शालीनता और विनम्रता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। किसी को भान नहीं होने देते थे कि वे इतने उच्चाधिकारी हैं। साहित्य अवदान के अतिरिक्त उनकी सांस्कृतिक देन भी कम नहीं है। ‘वैशाली अभिनंदन गं्रथ’ इसका एक उदाहरण है। जिन-जिन क्षेत्रों में उन्होंने काम किया, वे उसका गहराई से अध्ययन करते थे और अनुभवों के आधार पर लिखते भी थे। वे एक असाधारण अधिकारी थे, किंतु प्रशासन की आंतरिक दौड़-भाग और आपाधापी से उन्होंने अपने को दूर रखा।

शती वर्ष में हम आशा करते हैं कि साहित्य अकादेमी भी उनके साहित्य पर एक गोष्ठी करेगी। यही नहीं, ‘भारतीय साहित्य निर्माता’ की जो शृंखला है, उसमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक मोनोग्राफ प्रकाशित हो। इसके अतिरिक्त उनके नाटकों और अन्य लेखन का एक संचयन प्रकाशित होना चाहिए, क्योंकि उनकी पुस्तकें अब साधारणतया उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने कुछ व्यक्तियों के चरित लिखे हैं, वे आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं। यही नहीं, उनके कुछ एकांकियों तथा नाटकों का मंचन होना चाहिए। हिंदी भाषाभाषी राज्यों में जो अकादमियाँ हैं, उनको इस ओर पहल करनी चाहिए। बिहार सरकार के शिक्षा विभाग को इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। दिल्ली राज्य की अकादमी के अतिरिक्त भारतीय संगीत नाट्य कला अकादमी का भी इस ओर दायित्व बनता है। इस प्रकार न केवल हम जगदीशचंद्र माथुर के बहुमुखी अवदान को स्मरण करेंगे, वरन् इससे हिंदी नाट्य मंचन को भी बल प्राप्त होगा।

देवदत्त पटनायक और हनुमान चालीसा

देवदत्त पटनायक की विशेषता है कि ‘मिथकों की आज क्या प्रासंगिकता है’ विषय पर लिखते हैं। वे करीब तीस पुस्तकों के रचयिता हैं। हिंदू देवी-देवताओं पर उन्होंने कुछ अत्युत्तम छोटी-छोटी पुस्तकें लिखी हैं। पिछले दिनों रूपा प्रकाशन, दिल्ली द्वारा उनकी पुस्तक ‘मेरी गीता’ प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने कुछ चुने हुए श्लोकों को लेकर भगवद्गीता का विवेचन प्रस्तुत किया है, जो काफी लोकप्रिय हुआ। पुस्तक हिंदी और अंग्रेजी दोनों में उपलब्ध है। अब उन्होंने ‘माई हनुमान चालीसा’ नामक पुस्तक में, जो अंग्रेजी में है, हनुमान चालीसा का विश्लेषण एवं अर्थ संदर्भों सहित प्रस्तुत किया है, जो अत्यंत रोचक है। जिन देवी-देवताओं के नाम गीता में आते हैं, उनका हनुमानजी से क्या और किस प्रकार का संबंध है, यह बताने की चेष्टा भी की गई है। हनुमान विषयक और किंवदंतियाँ भी हैं, उनपर भी प्रकाश डाला गया है। हनुमान चालीसा में प्रयुक्त शब्दों का, विशेषतया जो विशेषण हैं, उनका क्या तात्पर्य है और उससे संबंधित कोई अन्य मान्यता है तो उन सबकी अच्छी व्याख्या की गई है। हनुमान चालीसा की भाषा अपने में बहुत साधारण, बोधगम्य है और इसी कारण लाखों लोग देश और विदेश में नित्य इसका पारायण करते हैं। तुलसीदासजी के हनुमान चालीसा के पूरे मर्म और महत्त्व को अच्छे से समझने के लिए यह पुस्तक सहायक है। हनुमान चालीसा अपने में सरल और सुबोध है, किंतु दार्शनिकता से भी ओतप्रोत है। प्रायः हनुमान चालीसा की इस प्रकार की व्याख्या देखने को नहीं मिलती है। लेखक बधाई के पात्र हैं। अपने बनाए हनुमानजी के बहुत से रेखाचरित्र भी लेखक ने पुस्तक में दिए हैं, वे भी अत्यंत अर्थपूर्ण हैं। आशा है, प्रकाशक रूपा, दिल्ली देवदत्त पटनायक की ‘माई हनुमान चालीसा’ पुस्तक शीघ्र हिंदी भाषा में भी पाठकों को उपलब्ध कराएँगे।

भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य और चुनौतियाँ

‘भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य ः पिछले सुधार और आगे आनेवाली चुनौतियाँ’ (ञ्जद्धद्ग स्नह्वह्लह्वह्म्द्ग शद्घ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ श्वष्शठ्ठशद्व4 र् क्कड्डह्यह्ल क्त्रद्गद्घशह्म्द्वह्य ड्डठ्ठस्र ष्टद्धड्डद्यद्यद्गठ्ठद्दद्गह्य ्नद्धद्गड्डस्र) नामक एक संकलन, जिसमें भारत की अर्थव्यवस्था के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण है, पिछले दिनों चर्चा में रहा है। प्रकाशक रूपा, दिल्ली है। इसका संपादन पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा और लेखन विनय श्रीवास्तव ने किया है। १९९१ के उदारीकरण की नीति के उपरांत भारत की अर्थव्यवस्था की तसवीर बदल गई है। जो परिवर्तन हुए हैं, उनमें कुछ लाभदायक रहे, पर कुछ नई समस्याएँ भी उत्पन्न हो गईं, जिनका निराकरण आवश्यक है। १९९१ में विदेशी मुद्रा की ऐसी स्थिति थी कि देश के सामने कोई अन्य विकल्प बचा ही नहीं था। प्रारंभ में जो आर्थिक सुधार देश में हुए, उसका एक संक्षिप्त ऐतिहासिक सर्वेक्षण संपादकों ने प्रस्तुत किया है। १९९१ के आर्थिक सुधार, जिनसे तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के नाम जुडे़ हैं, उनकी पृष्ठभूमि पहले ही बन चुकी थी। संजय वारु और जयराम रमेश की पुस्तकें इस विषय में पहले ही आ चुकी हैं। रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय आदि के जो उस समय अधिकारी थे, उनके लेख भी १९९१ के आर्थिक सुधार के २५वें वर्ष में दिल्ली के एक दैनिक में प्रकाशित हुए थे कि उस आर्थिक संकट के समय किस-किस की क्या भूमिका रही। पूरे घटनाक्रम में नीतियों के साथ-साथ कुछ ढाँचागत सुधारों की भी शुरुआत हुई।

इस पुस्तक के आलेखों को मोटे तौर पर तीन भागों में विभक्त किया गया है। पहला है, ‘उदारीकरण के पहले और उसके बाद आर्थिक व्यवस्था पर एक विहंगम दृष्टि’। इसमें छह लेख हैं। दूसरे भाग में सात लेख हैं। वित्तीय नीति, बजटरी तथा कैपिटल मार्केट के संबंध में तीसरे भाग में लेख हैं। पब्लिक सेक्टर की इकाइयों और उनके डिसइन्वेस्टमेंट की समस्यायों के विषय में सभी आलेख अनुभवी विशेषज्ञों और अधिकारियों द्वारा लिखे गए हैं। पुस्तक एक बहुत बडे़ फलक को समेटने की कोशिश करती है। हर एक लेखक का अपना-अपना दृष्टिकोण है। अतएव यह जरूरी नहीं है कि हम उनके विश्लेषण या सुझावों से सहमत ही हों, किंतु पुस्तक में शामिल किए गए आलेखों से आज अर्थव्यवस्था की एक अधिकृत तसवीर हमारे सामने आती है। अब क्या समस्याएँ हैं, कैसे उनका समाधान हो और आगे क्या समस्याएँ आ सकती हैं, इनको रेखांकित कर हमें स्वयं सोचने को विवश करती है यह पुस्तक। विद्वानों के आलेख जो परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं, उसकी अनदेखी करना दूरदर्शिता का परिचायक नहीं है। हर एक आलेख की विषयवस्तु को अति संक्षेप में प्रस्तुत करना संभव नहीं है। यह पुस्तक राजनेताओं, नीति-निर्धारकों और नीतियों के अनुपालन के दायित्व वहन करनेवालों के लिए आवश्यक रूप से पठनीय है। गवर्नेंस अथवा प्रशासन में राजनीति और आर्थिक नीति एक-दूसरे से कितनी मिली हुई हैं, इन समस्याओं पर भी विचार व्यक्त किए गए हैं। अर्थशास्त्र के छात्रों के लिए भी यह बहुत उपयोगी पुस्तक है। अधिक-से-अधिक छात्र इसका लाभ उठा सकें, क्योंकि देश के एक बहुत बडे़ भूभाग में हिंदी में ही ड्डअर्थशास्त्र का प्रशिक्षण हो रहा है। अतएव आवश्यकता इस बात की है कि प्रकाशक इसे शीघ्रातिशीघ्र हिंदी में अनुवादित कराने की व्यवस्था करवाएँ।

चंपारण सत्याग्रह

चंपारण सत्याग्रह का यह शती वर्ष है। नेशलन आर्काइब्ज में आयोजित प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रधानमंत्री ने किया था। बिहार सरकार ने भी कुछ आयोजन मोतिहारी, पटना आदि नगरों में किए, किंतु जितनी चर्चा चंपारण सत्याग्रह और उसके प्रभाव की होनी चाहिए, देश में उतनी हुई नहीं। अफ्रीका से भारत वापस आने के बाद स्वराज्य के संबंध में गांधीजी की यह पहली लड़ाई थी। इसके महत्त्व को इस बात से जाना जा सकता है कि गांधीजी के स्वयं अपने आत्मचरित ‘मेरे सत्य के प्रयोग’ में चार-पाँच अध्याय चंपारण प्रकरण से संबंधित हैं, जो पढ़ने योग्य हैं। चंपारण के महत्त्व को समझने के लिए एक और बात ध्यान देने की है, यह प्रयोग देश के एक अत्यंत पिछडे़ प्रांत में हुआ, जहाँ की भाषा, गाँवों की व्यवस्था आदि से गांधीजी अपरिचित थे। राजकुमार शुक्ल के उनके पीछे पड़ने के कारण वे निलहों और वहाँ के किसानों की व्यक्तिगत रूप से जानकारी लेना चाहते थे। पर वहाँ न वे केवल महीनों रुके, वरन् कस्तूरबा, देवदास और अनेक सहयोगियों को बाहर से वहाँ बुलाया। सी.एफ. एंड्रूज और हेनरी पोलक उन अनेकों प्रतिष्ठित व्यक्तियों में थे, जो वहाँ गए और उनमें से कई तो काफी अरसे तक रहे। साथ-ही-साथ निलहों के उत्पीड़न और अत्याचारों की सही गाथा लिखने के लिए उन्होंने स्थानीय लोगों की एक टीम तैयार की, जिसमें बडे़-बडे़ वकील तथा अन्य तबके के लोग थे, जैसे ब्रजकिशोर प्रसाद, राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, मो. मजहरुल हक, आचार्य कृपलानी आदि। इन लोगों ने पीडि़त किसानों के बयान लिखे और तसदीक की। मजहरुल हक के अलावा जिनसे उनकी मुलाकात लंदन में बैरस्टरी पढ़ने के समय हुई थी, प्रायः उन सबसे पहली बार मिलने का मौका था।

राजकुमार शुक्ल लखनऊ, कानपुर, कलकत्ता आदि कार्यक्रमों में किस प्रकार गांधीजी के पीछे पडे़ रहे और अंत में उनको चंपारण ले ही आए। राजकुमार शुक्ल का पहला पत्र, जो उन्होंने गांधीजी को लिखा था, वह अत्यंत मर्मस्पर्शी है। चंपारण सत्याग्रह के संपूर्ण विवरण में जाना संभव नहीं है। चंपारण में गांधीजी ने बड़ा प्रयोग यह किया कि अफ्रीका में जो हथियार उन्होंने खोजा था, उसका उपयोग एक शांतिपूर्वक माहौल बनाए रखकर भारत में किस प्रकार किया जाए। बारदोली आंदोलन आदि बाद में आए। इसके साथ-साथ गांधीजी को स्वराज्य की समस्या को समग्र रूप में देखने की दृष्टि चंपारण से मिली, हर वर्ग का विकास, आत्मनिर्भरता, स्वच्छता, अस्पृश्यता, महिलाओं का सशक्तीकरण, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, साधारण जीवनयापन, भाईचारे से रहने की आवश्यकता, निडरता, सत्य का पालन आदि-आदि जो कुछ विषय उनके कार्यक्रम के अभिन्न अंग बने, उन सबकी शुरुआत चंपारण में हुई। ये कुछ कारण हैं, जिनकी वजह से चंपारण सत्याग्रह का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपना विशेष स्थान है। चंपारण के संबंध में अंग्रेजी में कई अच्छी-अच्छी पुस्तकें हैं, पर हिंदी में नहीं। राजेंद्र बाबू की दो पुस्तकें अनुवादित होकर प्रकाशित हुईं, पर उनमें पूरी कहानी नहीं है। इस अभाव की पूर्ति अरविंद मोहन, जो एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ने अपने लेखन द्वारा की है। उनके अपने शब्दों में, ‘‘मेरा जन्म एक शुद्ध गांधीवादी परिवार में हुआ और वह भी चंपारण के एक परिवार में।’’ बहुत खोज और अत्यंत व्यापक पठन-पाठन के उपरांत उन्होंने चंपारण के संबंध में चार पुस्तकों का प्रणयन किया है। वे वास्तव में साधुवाद के पात्र हैं।

दो पुस्तकें ‘चंपारण सत्याग्रह की कहानी’ और ‘चंपारण सत्याग्रह के सहयोगी’ सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली से सुंदर कलेवर के साथ प्रकाशित हैं। ‘चंपारण की कहानी’ में गांधीजी के भारत में पहले सत्याग्रह के प्रयोग का विवेचनात्मक ढंग से संपूर्ण विवरण मिलता है। दूसरी पुस्तक ‘चंपारण सत्याग्रह के सहयोगी’ बडे़ परिश्रम से लिखी गई है। राजकुमार शुक्ल के संबंध में अरविंद मोहन ने विस्तृत जानकारी दी है, जो कहीं नहीं मिलती। कैसे चाणक्य की तरह राजकुमार ने अपना मिशन चुना और इतिहास के पन्नों से लुप्त हुआ। प्रसिद्ध लोगों को छोड़ दें तो गोरखप्रसाद, मोहम्मद यूनुस आदि के बारे में भी जानकारी नहीं है। यदि और अधिक साधन तथा सहयोग अरविंद मोहन को उपलब्ध होते तो वे पुस्तक को और अधिक पूर्णता प्रदान कर सकते थे। दोनों पुस्तकें अत्यंत उपयोगी हैं और इनको स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और सार्वजनिक पुस्तकालयों में पहुँचाना आवश्यक है। सरकारों का सहयोग अपेक्षित है, ताकि जनसाधारण और आज की पीढि़याँ चंपारण सत्याग्रह का अनुमान लगा सकें। उनकी तीसरी पुस्तक है, ‘प्रयोग चंपारण’, जो ज्ञानपीठ ने प्रकाशित की है। यह पुस्तक पहली दो पुस्तकों की पूरक है और ‘प्रयोग चंपारण’ को बेहतर तरीके से तभी समझा जा सकता है, जब हम चंपारण की कथा से पूरी तरह अवगत हों। उसमें उन्होंने ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टियों से चंपारण सत्याग्रह का आकलन करने का प्रयास किया है, प्रश्न भी उठाए हैं। अरविंद मोहन का बौद्धिक और भावनात्मक आत्ममंथन भी इसमें परिलक्षित होता है। उन्होंने एक और पुस्तक तैयार की है, ‘मि. एम.के. गांधी की चंपारण डायरी’, प्रकाशक प्रभात प्रकाशन, दिल्ली हैं, जो अरविंद मोहन की चंपारण शृंखला की चौथी कड़ी है। ये पुस्तकें गांधीजी के आंदोलन के संदर्भ में लाभदायक हैं।

एक बात की ओर ध्यान देना आवश्यक है कि निलहों के अत्याचार बंगाल में ब्रिटिश राज्य की स्थापना के साथ ही प्रारंभ हो गए थे। उस समय बिहार बंगाल का ही भाग था। १९१४ में बिहार और ओडि़सा प्रांत बंगाल से अलग हुए। उन्नीसवीं सदी में बंगाल में जब इसका कड़ा विरोध शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने सोचा कि बिहारवाले हिस्से को अपना चरागाह बनाया जाए। अंग्रेज अत्यंत प्रभावशाली थे। १९वीं सदी में बंगाल में कैसे विरोध शुरू हुआ, वह अपने आप में अत्यंत रोचक है। दीनबंधु मित्र के लिखे नाटक ‘नीलदर्पण’ ने इस समस्या को काफी हद तक उजागर किया है। उसके अंग्रेजी अनुवाद की भूमिका पादरी रेवेरेंड लांग ने लिखी थी, जिन्होंने काफी प्रयास करके बंगाल के निलहों केएक संगठन को चीफकोर्ट द्वारा दंडित कराया। ‘नीलदर्पण’ का अंग्रेजी अनुवाद माइकेल मधुसूदन दत्त ने किया था, पर उसकी जानकारी निलहों के पास नहीं थी। बंगाल के ले. गवर्नर जे.पी. ग्रांट के खिलाफ भी बवेला मचाया, क्योंकि उनके कमीशन की रिपोर्ट ने उनके काले कारनामों का पर्दाफाश किया। चंपारण सत्याग्रह के महत्त्व को, बंगाल में क्या हुआ था, उस पृष्ठभूमि का अवलोकन कर और अच्छी तरह समझा जा सकता है।

डॉ. कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद पर उन व्यक्तियों के संस्मरण, जो प्रेमचंद के संपर्क में आए थे, अथवा उनके समकालीन थे, कुछ समय पूर्व बडे़ परिश्रम से एकत्र किए थे। प्रेमचंद के शोधकर्ताओं के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। डॉ. गोयनका का यह संकलन काफी समय से अनुपलब्ध था। संतोष का विषय है, यह पुनः प्रकाशित हुआ है। उसकी उपादेयता निस्संदेह है। अच्छा होता कि डॉ. गोयनका रेखांकित कर देते कि उन्होंने कौन सा संस्मरण कहाँ से प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त जिन लोगों के संस्मरण संकलित किए हैं, उनमें अधिकतर ऐसे हैं, जिन्हें प्रायः सभी जानते हैं, पर कुछ ऐसे भी हैं, जिनके बारे में सर्वसाधारण को जानकारी नहीं भी हो सकती है, जैसे जनार्दन नागर, जो उदयपुर (राजस्थान) के अच्छे लेखक और साहित्यकार थे। उन्होंने विश्वविद्यालय में विद्यापीठ स्थापित की, वे राजस्थान की विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। यदि एक या दो वाक्यों में संस्मरण लेखनकर्ताओं का परिचय दे दिया जाता तो साधारण पाठक के लिए सुविधाजनक हो जाता।

 

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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