आजादी के बाद की संस्कृति

आजादी के बाद की संस्कृति

यदि कोई गंभीरता से सोचे तो पाएगा कि आजादी के बाद, अधिकतर दशक एक ही परिवार विशेष को समर्पित रहे हैं। यह भी सच है कि प्रजातंत्र हो या एकतंत्र, शासक ही अधिकतर सांस्कृतिक रुचि या अरुचि का प्रोत्साहक है। मुगलों या अंग्रेजों के आधिपत्य के बावजूद भारतीय सांस्कृतिक विरासत पर थोड़ा-बहुत प्रभाव तो पड़ना ही था, पर ऐसा प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा कि सदियों की संपदा का विनाश हो जाए। यों भी संस्कृति कोई ऐसी ईंट-पत्थर, गारा-मिट्टी की इमारत तो है नहीं कि उसे कोई राजकीय ताकत की तोप से ढहा सके। यह पीढि़यों की ऐसी देन है, जो अंतर को उल्लसित करती है; ऐसी खुशबू है, जो हवाओं में बिखरी है, पर नजर नहीं आती है, न परिभाषित की जा सकती है। उल्टे मुगलों के जमाने में ताजमहल जैसा अभूतपूर्व स्मरणीय मकबरा ही नहीं बना, रामचरित मानस जैसे विश्व के चुनिंदा महाकाव्यों में से एक का सृजन भी हुआ। इतना ही नहीं, यह महाकाव्य मानवीय संबंधों को निभाने का आदर्श मानक भी बन गया है। दीगर है कि आज कोई यह माने-न-माने!  इसी संदर्भ में, जब औरंगजेब जैसे शासक को कोई याद करेगा तो उसे धार्मिक कट्टरता के खूँखार चेहरे के अलावा और नजर ही क्या आएगा?

जो मुगल नहीं कर पाए, वह उपलब्धि अंग्रेजों की रही। जहाँ एक ओर उन्होंने हमसे हमारी भाषा छीन ली, वहीं एक प्रभावी संचार व्यवस्था के माध्यम से देश में रेल और फोन से संपर्क का सुभीता बढ़ाया, अपनी सैन्यशक्ति के त्वरित आवागमन के लिए, साथ ही काले साहबों की आयातित भाषा के विस्तार से मौलिक चिंतन के अभाव का भी। यह उसी की देन है कि एक विद्वान् हिंदी क्षेत्र में अंग्रेजी देवी का मंदिर बनवाने की सोचते हैं। नहीं, बनवाते भी हैं। इसके लिए उनके तर्क बेतुके भले हों, पर ऐसा कहनेवाले हम कौन हैं? हिंदी के कलम घिस्सुओं की क्या मजाल कि उन ऐसे अंग्रेजीदाँ पर टिप्पणी कर सकें? वह विश्व को जोड़नेवाली भाषा से जुड़े हैं। चाहे आंग्ल भाषा के स्वघोषित प्रवर्तक के प्रयासों पर अंग्रेजी के दिग्गज विद्वानों में से कोई घास न डाले, पर उनसे क्या? वह तो अपने इस योगदान पर इठलाते घूमते हैं।

आजादी के बाद से यदि सबसे अधिक हानि हुई है तो वह लोक-संस्कृति की हुई है। कल्पना कीजिए कि गाँव में एक बड़ा सा भरा-पूरा वृक्ष है। कभी कोई अति महत्त्वपूर्ण व्यक्ति पधारता है तो पहले ग्रामवासियों को वृक्ष की पत्तियाँ तोड़कर पारंपरिक परिधान में सजने की हिदायत दी जाती है, फिर उसके स्वागत में लोकनृत्य या संगीत के प्रदर्शन की। अति महत्त्वपूर्ण व्यक्ति कभी पत्तियों के परिधान में प्रकट होता है, कभी प्रतीकात्मक रूप में उनका साफा, पगड़ी या टोपी धारण करके। जो फसल की बुआई, कटाई, शादी, ब्याह, बच्चे के जन्म वगैरह के अवसर पर स्वतः स्फूर्ति से प्रसन्नता, चिंता या सौभाग्य की अभिव्यक्ति के विभिन्न गीत-नृत्य आदि हैं, उन्हें बड़े व्यक्ति की अभ्यर्थना में प्रस्तुत करना कहाँ तक उचित है?

ऐसा नहीं है कि इतना ही पर्याप्त है। महत्त्वपूर्ण हस्ती पधारी है तो उसके साथ पूरे कार्यक्रम की फोटो खींचने की टीम का आगमन भी अनिवार्य है। प्रारंभ में यह श्वेत-श्याम हुआ करती थी, अब तो रंगीन है और वह भी ठहरी नहीं, चलती-फिरती। स्थानीय लोगों से जुड़ाव के खातिर बड़ा व्यक्ति गीत, नृत्य में उनका साथ भी देता है। दूसरे हँसते हैं तो क्या हुआ? बड़े व्यक्ति का लक्ष्य उनके प्रति अपना दिखाऊ लगाव प्रदर्शित करना है। इस में वह सफल है कुछ हद तक। महाराष्ट्र की ‘लावणी’ अब केवल ‘तमाशा’ बनकर रह गई है।

लोकजीवन के हरे-भरे संपन्न झाड़ की डाल और पत्तियाँ नोच-नोचकर हम उसे गंजा करने पर उतारू हैं। रही-सही कसर भारतीय फिल्में पूरी करने को कटिबद्ध हैं। लोकनृत्य फिल्मों में केवल अंग-प्रदर्शन का बहाना है, चाहे वह गुजरात का डांडिया रास हो या गरबा अथवा असम का बीहू, नहीं तो वहीं का बागू रूंबा। यही हश्र तामिलनाडु के पांपूअट्टम या नाग नृत्य का हुआ है। जहाँ जीवन की वास्तविकता से दूर प्रेमी-प्रेमिका पेड़ों के इर्द-गिर्द दौड़-भागकर गाने गाते हों, वहाँ क्या संभव नहीं है? गाँव या वहाँ की संस्कृति फिल्मों में केवल नायिका और उसकी सहेलियों को न्यूनतम वस्त्र पहनाकर दिखाना मात्र है। पता नहीं मैदानी इलाकों में झरने या प्रपात कहाँ से और कैसे जन्म लेते हैं? नायिका को और कहीं स्नान का स्थान नहीं मिलता है। क्या करें? वहाँ नहाना उसकी विवशता है और कैमरे तथा नायक का आस-पास मौजूद होना महज संयोग!

ऐसे भी फिल्में, कुछ अपवादों के अलावा, उस जीवन को दरशाती हैं, जिसका अजिंदगी से दूर-दूर का रिश्ता-नाता नहीं है। उनका इतना योगदान अवश्य है कि आजादी के बाद की फिल्मों ने पश्चिम के कपड़े, रहन, सहन और जीवन-शैली की स्वीकार्यता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। अब कपड़े हों या उन्मुक्त प्रेम, कहीं कोई बंधन नहीं रह गया है। देश की आजादी के बाद यदि कोई क्षेत्र हर नैतिक अनुशासन से आजाद हुआ है तो वह भारतीय फिल्में हैं। इनको कोई देखे तो उसे ऐसी नाव का खयाल आए, जो बिना चप्पू के, पानी में लक्ष्यहीन, तैरती-उतराती रहती हैं। वह न डूबती है, न किनारे लगती है। कुछ फिल्मों की आर्थिक सफलता उन्हें और ध्येयहीन कर जाती है। कहीं गलती से वहाँ कोई लोक-नृत्य की झलक भी हुई, तो यह कामयाबी के नए फॉर्मूला का आवश्यक हिस्सा बनता है। जब तक लोग देख-देखकर ऊब न जाएँ, गाँव, लोक नृत्य और गीत, वस्त्रहीनता की प्रतियोगिता के अंतर्गत, मनोरंजन के नाम पर लगातार परोसा जाता है। ऐसी नाव दो-तीन निर्माताओं का दीवाला निकलवाकर ही डूबती है।

कहते हैं कि भारत की पोशाक, खान-पान और भाषाई विविधता में सांस्कृतिक एकता है। हमने एक बार रेल का लंबा सफर किया है, जहाँ उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत के यात्री हमारे डिब्बे में सवार थे। हमने वहाँ सांस्कृतिक एकता की तलाश की और पाया कि अलग-अलग भाषाई टोले आपस में चर्चा और खानपान में व्यस्त हैं। हम अकेले अपनी सीट पर बैठे रहे और मजाल है कि किसी ने यह जानने की उत्सुकता भी दिखाई हो कि हम कहाँ तक जा रहे हैं? सामान्य तौर पर डिब्बे में बैठे किसी अनजान से बातचीत की शतरंज की यह पहली चाल होती है। तब से हमें इस सांस्कृतिक एकता के दावे पर संशय बना हुआ है। कहीं ऐसा तो नहीं है, जब हम ‘सांस्कृतिक’ कहते हैं तो हमारा आशय धार्मिक से होना है? दरअसल, कोई कितना भी सेक्युलर के झाँसे से झुठलाए, भारत आज भी एक आस्थावान देश है।

यों भी पूरी दुनिया से अलग और विशिष्ट होने का दावा हमने सेक्युलर नामक एक नए-नवेले धर्म के ईजाद से सिद्ध कर दिया है। इसी से यह भी साबित होता है कि हम अतीत में ही नहीं, वर्तमान में भी दुनिया के धर्मगुरु हैं, वरना नए धर्म का आविष्कार कैसे करते? संसार भर में सरकारें सेक्युलर हैं। वह हर धर्म को समान नजरिए से देखती हैं। रहनेवालों पर न धर्म के आधार पर कोई बंधन है, न अंतर। सबको अपनी पूजा पद्धति की छूट है। तब क्यों भारत ने ‘सेक्युलर’ को राष्ट्रीय धर्म का दर्जा दे दिया! कहीं ऐसा तो नहीं है कि अंग्रेजी शब्द होने के कारण इसके अनुवाद में कोई खामी आ गई है? हमें नहीं लगता है कि यह मानने को कोई साक्षर भी तैयार होगा। दुनिया जानती है कि आज अंग्रेजों के अंग्रेजी-ज्ञान से कहीं अधिक भारतीयों का है। कई भारतीय लेखक अंग्रेजी में लिखते ही नहीं, ब्रुकर जैसे पुरस्कारों से पुरस्कृत भी होते हैं। कुछ को तो गर्व है कि उन्हें अपनी मातृभाषा से बेहतर आंग्ल-भाषा आती है। वह उसी में बोलते-सोचते ही नहीं, सपने तक अंग्रेजी में ही देखते हैं। यह उसका दुर्भाग्य है कि तन से वह कालू है, पर मन से विशुद्ध गोरा अंग्रेज। हमें उनसे हमदर्दी है, जब वह भारत में क्यों पैदा हो गया, जैसा रोना रोज रोते हैं।

हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि भारत की बहुसंख्यक आबादी में उस संस्कृति की एकता है, जो एक उदार और सबको स्वयं में समाहित करनेवाले धर्म की देन है, शायद इसीलिए भारत के चारों पावन धाम चारों दिशाओं में स्थित हैं। हम उनसे भी सहमत हैं, जो यह मानते हैं कि हिंदुस्तान में रहनेवाला हर नागरिक हिंदुस्तानी है। यह हमारी लोक की कल्पना का ही विस्तार है, वरना हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की आस्था को कैसे मानते?

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम अपनी पहचान से अजनबी बनें। अपने लोक संगीत व नृत्य की संपदा को भूलें और छब्बीस जनवरी को एक दिन उनकी शोभा यात्रा निकालकर, उन्हें विस्मृति के कूड़ेदान में डाल दें। अपनी राष्ट्रीय धरोहर को और सँवारकर भी हम आधुनिक हो सकते हैं। जापान जैसे टापू ने यह सिद्ध कर दिखाया है तो हम अपनी पाँच हजार वर्षों की विरासत को क्यों भुलाएँ?

इक्कीसवीं सदी दुनिया का तमाशा युग है। उसके अनुरूप अपने लोकगीत और संगीत का तमाशा बनाना कहाँ तक उचित है? एकाध अकादमी बना देने या कुछ पेशेवर कलाकारों को प्रोत्साहन देने से क्या हम अपनी विविध लोक-संस्कृतियों को बढ़ावा दे रहे हैं? कुछ की मान्यता है कि सरकार का स्पर्श ही पर्याप्त है, किसी जीवंत कला को निर्जीव फाइल में तब्दील करने के लिए। ऐसे भी सरकार के अधिकतर कार्य प्रतीकात्मक होते हैं, जैसे लोककलाकरों को सांस्कृतिक उत्सवों में भेजना या रेडियो-दूरदर्शन पर उनके कार्यक्रम करवाना। तात्पर्य यह है कि लोकगीत या नृत्य सामूहिक उत्सव के समान हैं, जिन्हें सामान्य रूप से, सीखने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। यह शास्त्रीय संगीत नहीं है, जहाँ गुरु का प्रशिक्षण होना ही होना है। जैसे बड़े-बुजुर्गों को सम्मान देना भारतीय परंपरा है, वैसे ही लोककलाओं और संस्कृति का सम्मान ही उनका वास्तविक प्रोत्साहन है। तमाशा बनाना उनके महत्त्व और महत्ता के साथ अपनी इस महान् विरासत को नकारना है, जैसे मंदिर या गुरुद्वारे जाकर कोई आराध्य की मूर्तियों के कलापक्ष की आलोचना॒करे।

लोक-संस्कृति सामान्य नागरिकों के जीवन की गतिविधियों से एकाकार है। उनकी खुशी, उत्सवप्रियता का पर्याय है। बुद्धिजीवियों सा गंभीर चिंतन का बोझ उन पर ऐसा हावी नहीं होता है कि वह हर वक्त उदासी का लबादा ओढ़े रहे। दुःख किसके जीवन में नहीं है? पर सुख के पलों को त्योहार सा मनाना कोई लोककलाओं और संस्कृति से सीखे। हम धीरे-धीरे अनुकरण की संस्कृति के दास बनते जा रहे हैं। कभी रूस हमारा आदर्श है, कभी अमेरिका। लोक-संस्कृति हमें अपनेपन की पहचान देती है। यह आम आदमी के हर्ष और उल्लास का लोकोत्सव है। इसे तमाशा बनाकर शोकोत्सव में परिवर्तित करने का अधिकार विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण हस्तियों को किसी ने नहीं दिया है। सरकार का भी इस नाइनसाफी से दूर ही रहना उचित है। हमें यह भी नहीं भूलना है कि आजादी के बाद घोटाले, घपले और घूस की नई संस्कृति का प्रादुर्भाव हआ है। इससे बचने का एक ही तरीका है, अपनी संस्कृति से जुड़ना, जो बाहरी प्रभावों को आत्मसात् करना भी जानती है और अपनी उदारता से ही पनपी है!

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

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