भारतीय संस्कृति में लोक की प्रतिष्ठा

लोक का व्युत्पत्तिजन्य अर्थ है—दिखाई पड़ना अथवा गोचर होना, अर्थात् सारा संसार जो इंद्रिय-गोचर है अथवा सामने है, वह सभी लोक है। भारतीय संस्कृति के बारे में एक धारणा विशेष रूप से उन्नीसवीं सदी से प्रचलित रही है कि यह लोकोत्तर को अधिक महत्त्व देती है, लौकिक को कम। मूलतः यहाँ की संस्कृति आध्यात्मिक है, जैसा कि आध्यात्मिक एवं लौकिक में कोई मूलतः विरोध ही नहीं है। इन दोनों में कोई विरोध वैदिक काल से ही स्वीकृत नहीं रहा है और बराबर अनुष्ठान के इस पथ पर लौकिक एवं शास्त्रीय दो प्रकार के स्तर माने जाते हैं। यहाँ शास्त्रीय लोक-जीवन नहीं है और शास्त्र लोकाचार के विरुद्ध नहीं है। शास्त्र देश एवं काल के साथ-साथ लोकाचार के महत्त्व पर भी बल देता है। यह एक प्रकार से मानी हुई बात है कि जो कार्य शास्त्र से शुद्ध हो, किंतु लोक के विरुद्ध हो, उसे नहीं करना चाहिए। इसी को ‘चलन’ कहा गया॒है।

यह लोक बहुत ही अमूर्त पदार्थ है या जैसा इसकी व्युत्पत्ति से स्पष्ट है, सामने दिखनेवाला संसार और उसका व्यवहार है। व्याकरण शास्त्र में यह बराबर कहा गया है कि लोक एक प्रमाण है। शब्द एवं भाषा के प्रयोग में लोक ही प्रमाण है। दोनों बातें एक साथ दिखाई पड़ती हैं। लोक का एक अमूर्त रूप है तो दूसरा उसका मूर्त रूप है। प्रधानात्मक स्तर पर लोक से तात्पर्य एक निरंतर अजस्र प्रवाह के रूप में चली आती हुई परंपरा है। इसीलिए इन परंपराओं के बारे में वेद एवं उपनिषदों के काल से लेकर लोककथाओं तक में बराबर यह सुनने को मिलता है कि यदि मन में किसी बात का संदेह हो अथवा किसी के बारे में जानने की उत्सुकता हो तो अपने बीच में जो वृद्ध हैं, जो विशेष गुणों से युक्त हैं अथवा जिनके भीतर राग-द्वेष कम है, उनके पास जाना चाहिए और शंका का समाधान ढूँढ़ना चाहिए। लोक के स्तर पर आज भी शहरीकरण के बावजूद हर गाँव में कुछ प्रथाएँ हैं, जिसके अंतर्गत लोग विशेष अवसरों पर प्रधान से ही पूछने जाते हैं कि ऐसे अवसरों पर हम क्या करें? ऐसी स्थिति में वे जो निर्णय देते हैं, उसे मानकर चलना होता है। यह जो लोक का अमूर्त अवधारणात्मक पक्ष है, वह एक निरंतर चलती हुई मौखिक ज्ञान की परंपरा है। उस परंपरा का उल्लेख अशोक ने भी ‘पुराण प्रकृति’ के रूप में अपने शिलालेखों में किया है। प्राचीन भारतीय राज शासन जिन मौखिक नियमों से चलता था, उसे ही पुराण प्रकृति कहते हैं। यही नियामक है, राजा नहीं। राजा को नियमित एवं नियंत्रित करने वाली वह जो पुराने समय से चली आ रही नई होती हुई परंपरा है, लोक-समाहित, लोक-समीकृत अथवा लोक के द्वारा सतत नवीकृत एक जीवन-प्रणाली है, वही नियामक है और वही प्रमाण है। दूसरी ओर जो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है, वह प्रमाण है। बृहस्पति से लेकर कौटिल्य तक के प्राचीनकालीन जो व्यवहार-शास्त्र हैं, वही लोकायत है। इस लोकायत का कोई असम्मानजनक अर्थ नहीं है। लोक में जिसका घर हो, वही लोकायत है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि जहाँ व्यवहार का निर्णय करना हो, वहाँ अलौकिक या दैव की दुहाई नहीं दी जाती है। यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने चोरी की है अथवा यह मेरी भूल है। इस संसार में जो दिखाई देता है, उसी के आधार पर निर्णय होता है।

भारतीय संस्कृति में एक विशेष प्रकार की व्यवस्था के अंतर्गत लोकायत मत को स्वीकार किया जाता था। जबकि अपने दैनंदिन जीवन के एक अन्य क्षेत्र में उसको अलग रख दिया जाता था। एक साथ दोनों प्रकार का जीवन जी लेने की व्यवस्था थी। इसमें कोई अंतर्विरोध नहीं था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र को पश्चिमी विद्वानों ने ठीक से नहीं पढ़ा। इसमें यह उनके लिए मोहजाल के सिवा कुछ नहीं लगा। जबकि यह बात नहीं है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘शासनस्यमूलं इंद्रियनिग्रह अर्थात् शासन की जड़ इंद्रियनिग्रह या संयम है। उसमें मानव-मूल्यों की उपेक्षा कही गई है वरन् व्यावहारिक अपेक्षाओं का निरादर है। वाल्मीकि ने तो अपने काव्य का प्रारंभ ही इसी अर्थ में किया है। इनके अनुसार इस लोक में इस समय कौन विद्वान् और वीर्यवान है, कौन कृतज्ञ है अर्थात् इस लोक में और इस समय के महत्त्व से ही काव्य का आरंभ हुआ। यह देवकाव्य था, परंतु ऐसे काव्य का, जिसमें इस समय का भविष्य नायक हो, इसी चेतना के अर्थ में लोक का उदय हुआ और उसमें ही लोक की प्रतिष्ठा है। जिस लोक को वाल्मीकि के हजारों साल बाद भी मौखिक परंपरा ने जीवित रखा है और जो लोक में साक्षात् है अथवा लोक के अनुभव में है, वह अतीत के रूप में नहीं वरन् वर्तमान के रूप में महत्त्व रखता है। दिखना और इस समय दिखना, इन दोनों बातों का महत्त्व है। केवल अतीतकाल के विवरण के रूप में ही उसका महत्त्व नहीं है। वरन् उसका दिखते रहना अथवा लोगों के प्रत्यक्ष अनुभव का विषय बना रहना ही महत्त्व रखता॒है।

पश्चिम के समाजशास्त्रियों ने मनुष्य के विकास-क्रम में जिस ‘फोक’ तत्त्व का वर्णन किया है, वह आदि व्यवस्था का अविकसित रूप है। छोटा-से-छोटा समुदाय धीरे-धीरे बड़े समुदाय में परिवर्तित होता है, क्योंकि सभ्यता का जो चरम बिंदु है, उसमें एक के बाद एक का विकास होता है, लेकिन भारत के ऊपर यह साँचा लागू नहीं होता। इस साँचे में शहर का कोई प्राधान्य नहीं है और न तो जंगल का ही, वरन् यहाँ जो आस-पास के छोटे-छोटे स्थान हैं, उनका प्राधान्य है। जब एक नागर कवि एक तपस्वी बालक की दृष्टि से शहर की तसवीर खींचता है तो ऐसा लगता है कि एक जंगल है और उसमें आग लगी है। राजा के दरबार में उसकी पहली प्रतिक्रिया होती है कि ऐसा लगता है कि जंगल में आग लगी है और चारों ओर आग से घिरा जंगल है, वह कितना भयावह है। भवभूति ने भी कहा है कि तुम्हारे पास बहुत सी चीजें सुलभ हैं, लेकिन ‘तदपि न पराधीन विभवः,’ यहाँ जो चीज मिलती है, वह किसी के अधीन नहीं है। प्रकृति कभी पराधीन नहीं है। यह जो स्वयं वरण की हुई स्वयं की सुविधा की स्वतंत्रता है, वह बहुत महत्त्व की है। लोक उसे बड़ा आदर देता है, अर्थात् नगर सभ्यता का चरम बिंदु नहीं था। वह जो अपने को अलग करके नगर का हित करनेवाली, सीमित साधनों पर उसके हित को सोचनेवाली अरण्य परंपरा थी, शुद्ध चिंतन की परंपरा थी, वही महत्त्व रखती है अर्थात् यहाँ एक सहज भाव ही है, यह सहज लोकभाव ही महत्त्व रखता है। यह कभी संस्कृति की धारा में तिरोहित नहीं हुई।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण का काल जब आता है, चाहे वह भक्ति काल हो या रामकृष्ण परमहंस का काल हो, तब यहाँ सामान्य की प्रतिष्ठा होती है। चैतन्य महाप्रभु ने तीन गुण बतलाए हैं—तृण से भी नीचे हो और तरु (वृक्ष) से भी अधिक सहिष्णु हो, स्वयं सम्मान न स्वीकृत कर, दूसरे को सम्मान देनेवाला हो, उसी के द्वारा फलित प्राप्त होता है। अर्थात् विशाल का अनुभव करना है या संपूर्ण सत्ता का अनुभव करना है तो ये तीनों गुण आवश्यक हैं। सामान्य होना आवश्यक है। उस सामान्य की निरंतर ठोस संस्कृति रही है। सामान्य में निहित जो अनायास विशिष्टता है, उसकी खोज ही भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। इसीलिए भारत में लोकशास्त्र का अनुवर्ती मात्र नहीं है। हमारी संस्कृति संस्थागत नहीं है। यहाँ कोई एक ही केंद्र नहीं है, जो संचालित करता है। शुद्ध रूप से यदि कोई संस्कृति विवर्तमान धारणा को लेकर चलती है तो वह भारतीय संस्कृति ही है। यहाँ सारी चीजें विवर्त हैं। यहाँ तक कि देवता भी मंत्रों के विवर्त रूप हैं। अर्थात् मंत्र ही उनका विश्वसनीय रूप है और वे उसी मंत्र के रूप में देखे जाते हैं। अवतार की शासन सत्ता लीला रूप होती है। अवतार भी जितना अपने लीला गान में रहते हैं, उतना अपने प्रकृत रूप में भी रहते हैं। उनकी शाश्वत सत्ता लीला रूप ही होती है, इसीलिए वह लीला पुरुष हैं। लोक के सामने सहज रूप में जो चरम सत्ता प्रदर्शित होती है वही लोक-संस्कृति है।

लोक का महत्त्व शास्त्र से कम नहीं है। एक स्थान पर शास्त्र का महत्त्व होता है तो दूसरे स्थान पर लोक का। दोनों संपूरक हैं। इनकी निरंतर आवश्यकता होती है। जो लोग समझते हैं कि शास्त्र के विरुद्ध बुद्ध, महावीर एवं कबीर आदि ने कोई जेहाद छेड़ा हो तो ऐसा नहीं है। ध्यान से देखें तो बुद्ध वचनों में उपनिषद् वाणी के सार-तत्त्व हैं। महावीर के अहिंसा सिद्धांत में एक पूर्ववर्ती तत्त्व-चिंतन मौजूद है। यहाँ प्रस्तुत किया गया है कि यज्ञ सार्थक नहीं है, पर प्रतीकात्मक होना चाहिए। वह प्रतीकात्मक ही था। देवता तो परोक्षप्रिय होते हैं, प्रत्यक्ष नहीं। बुद्ध, महावीर, कबीर आदि ने इसी लोक को महत्त्व दिया है। चिंतन का बीज एक है, किसी ने अधिक आग्रह से स्वीकार किया है तो किसी ने कम आग्रह से, किसी ने उसका नाम लिया, किसी से नाम नहीं लिया, वरन् काम किया। कबीर-वाणी में पातंजलि योगसूत्र के बहुत से बीज पल्लवित मिल जाएँगे। कबीर की अनुभव वाणी एवं उपनिषदों की वाणी में बहुत कुछ समानता है।

अनुभव की भाषा अलग होती है, परंतु इसके पीछे पहले से किए गए अनुभवों का सार रहता है। पहले की यात्रा पूरी करके जब आदमी आगे जाता है तो लगता है कि वह आगे गया, लेकिन पहले की यात्रा जो पूरी तरह तय ही नहीं की हो तो आगे कहाँ जाएगा? वास्तविकता तो यह है कि उसे पता ही नहीं कि वह कहाँ जा रहा है। उसके आगे जाने का कोई प्रमाण ही नहीं। अतः इस संस्कृति में लचीलापन या परिवर्तन में भी निरंतरता की स्पष्ट रूपरेखा दिखाई पड़ती है। यही कारण है कि यहाँ पर एक केंद्र हैं। वह केंद्र विष्णु की कल्पना है। कभी देवता मुख्य हो जाता है तो कभी एक व्यक्ति और कभी समिधावाला पेड़ या कभी कन्यादान ग्रहण करनेवाला लड़का मुख्य हो जाता है। कब कौन मुख्य होगा, यह अवसर के ऊपर निर्भर करता है। प्रत्येक छोटे एवं बड़े-से-बड़े को एक अवसर पर मुख्यता प्राप्त होती है। विशेष अवसर पर उसी प्रकार प्रत्येक अपेक्षाकृत कम मुख्य हो जाते हैं, अर्थात् अनेक केंद्र काम करते हैं। इसीलिए जो आज परिधि में है, वह केंद्र हो जाता है और जो केंद्र है, वह परिधि में चला जाता है। इससे संस्कृति की संपूर्णता की कोई क्षति नहीं होती, बल्कि संस्कृति की व्यापक समझदारी उत्पन्न होती है और संसार एवं मनुष्य के संबंध का व्यापक आधार मिलता है।

आदमी को एक ओर दिखाई पड़ता है कि वह संसार का निषेध कर रहा है तो दूसरे स्तर पर लगता है कि संसार में रहते हुए ही संसार का निषेध कर रहा है। जो संसार में रहा ही नहीं, वह संसार का निषेध करके ही आदमी एवं संसार के हित की बात करता है—अर्थात् बार-बार जो मोक्ष के पुरुषार्थ को चुनौती दी गई कि मोक्ष लेकर क्या होगा, यदि वह सत् नहीं और दूसरों के दुःख में उपस्थित नहीं है। यदि एक ही समाज में रहते हुए एक अक्षय मोक्ष लेकर अलग बना रहा तो इससे क्या लाभ? इसीलिए देवताओं की अपेक्षा मनुष्य की योनि साधना में निरंतर उच्च मानी गई है। भागवत पुराण में आया है कि भारतभूमि में जो लोग क्षण-भर भी आयु पाकर जन्म लेते हैं, वे अपेक्षाकृत कल्प भर की आयु रखनेवाले देवताओं से अधिक उत्कर्ष को प्राप्त होते हैं। क्षण भर में ही कठोर निश्चय से जो अपने को एक विशाल सत्ता के महासागर में विलीन कर देते हैं और उससे एक ऐसे अनुभव से गुजरते हैं, जब कि उन्हें लगता है कि बिंदु में सिंधु समा गया है और बिंदु का पता ही नहीं चलता, क्योंकि सिंधु के सामने बिंदु विशिष्ट हो जाता है। तात्पर्य यह है कि हमारी संस्कृति में जो प्रत्यक्ष व्यवहार के स्तर पर दिखाई पड़ता है, उसका विशेष मूल्य है।

छांदोग्य उपनिषद् की एक कथा में कहा गया है कि हमारे जीवन में इच्छा एक यज्ञ की इच्छा है। इस इच्छा का प्रारंभ होता है अनुभवों से, भूख-प्यास लगने से। आदमी अपनी भूख के बारे में सोचता है, जो उसे वह दिखाई पड़ता है कि ऐसी ही भूख सबकी होगी। यह प्यास अकेले मेरी नहीं है, वरन् सबकी है। यह अकेलापन मेरा ही नहीं है, ऐसा ही सबका होगा। इसी प्रकार जब उसकी भूख मिटती है तो अकेले की भूख नहीं मिटती है। यही लोक-दृष्टि है एवं यज्ञ के अर्थ का मूल है। यज्ञ संस्था एक प्रकार से विस्तार की भावना को जाग्रत् करनेवाली सामाजिक संस्था है। ‘सामाजिक’ तो छोटा शब्द है, वह समस्त लोक को समेटनेवाली संस्था है।

अब दूसरा पक्ष है लोक का। जैसा कि मैंने पहले कहा है कि लोकायत को हम लोग राज्य-व्यवस्था का आधार मानते हैं, उसे स्वीकार कर लेते हैं। अदृष्टि को वहाँ स्थान नहीं था, वरन् दृष्टि को स्थान मिला है। इसका कारण है कि जो प्रमाण सबकी समझ में आ जाए उसे स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि व्यक्तिगत स्तर पर उपासना अथवा साधना निरंतर स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है और उलटकर सूक्ष्म से स्थूल की ओर ले जाती है। यह एक प्रक्रिया है। उपासना में दोनों चीजें हैं। हम चाहे सोचकर विचार करें कि वह क्रिया है, स्थूल है या गंध है। इनसे एक ओर अनेक क्षणों का ध्यान करते हैं, सूक्ष्म की ओर ले जाते हैं। उसके बाद फिर उन तन्मात्राओं की ओर लौट आते हैं और इसी स्थूल के रूप में अभिव्यक्त करते हैं। अंत में घंटे, आरती आदि से पूजन करते हैं। प्रकाश एवं ध्वनि के अतिरेक से एवं दोनों के सम्मिलन से उसका अंत करते हैं। इसके पीछे भी यही कारक है। व्यक्ति के स्तर पर स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से स्थूल की और सोचना महत्त्व रखता है। इसी से उपासना अथवा साधना व्यक्ति की होती है, समुदाय की नहीं, लेकिन समुदाय के स्तर पर जो भी कार्य होता है, जैसे यज्ञ आदि कार्य, वह सामुदायिक संस्था है।

प्रत्येक यज्ञ के अंत में एक मंत्र बोला जाता है—‘ये यजामहे’, अर्थात् मैं यज्ञ नहीं कर रहा हूँ। वरन् सब लोग मिलकर यज्ञ कर रहे हैं। होता भी यज्ञ कर रहा है और ऋत्विक् भी यज्ञ कर रहे हैं। महाभारत में युधिष्ठिर ने इसी को प्रमाण माना कि यह भावना की कसौटी है। उक्त ग्रंथ में आया है कि तुम्हारे साथ सब शरीक हैं कि नहीं। ‘वयम्’ के रूप में सोच सकते हो कि नहीं। अगर अहम् के रूप में सोचकर निर्णय लेते हो तो सही नहीं है। वयम् के रूप में सोचकर निर्णय लेते हो तो वही सही है। इसीलिए इस रूप में जो निर्णय लिया जाता है, उसमें किसी चीज का प्राधान्य नहीं होता। न तो जन्म का प्राधान्य होता है और न ही शील-आचरण का प्राधान्य होता है, क्योंकि यह जन्म से नहीं प्राप्त होता, यह अर्जित होता है। सबकी साझेदारी का अनुभव कराना ही सबसे बड़ी बात है।

लोकदृष्टि के बारे में भागवतकार ने एक अच्छा विवरण प्रस्तुत किया है। इसमें आया है कि ऋषियों ने पूछा कि परीक्षित ने उपवास करके प्राण छोड़ने का निश्चय क्यों किया? यह विचारणीय है कि शरीर तो उनका है, परंतु जो भगवान् में प्राणायाम होते हैं, उनकी कसौटी यही है। यह कसौटी नहीं कि संसार से अलग रहा जाए। उनकी कसौटी यह है कि ‘शिवाय लोकस्य भवाय मूलेः’ अर्थात् समस्त लोक के कल्याण, उद्भव, विलय एवं ऐश्वर्य के लिए जो जीते हैं, उनका शरीर पराश्रय होता है। उस शरीर को छोड़ने का अधिकार अथवा उससे वैराग्य लेने का अधिकार उन्हें नहीं था। पूरा ग्रंथ इसी एक प्रश्न का उत्तर है कि भगवान् में रहने का अर्थ लोक में रहना है और लोक में इस प्रकार रहना कि लोक-बंधन न हो, वरन् लोक मोक्ष हो। लोक के लिए रहना तो है, लेकिन लोक में आसक्त नहीं रहना है। यह जो स्थिति है, वह हम सब में और सब हम में जैसी है। कबीर ने जो कहा है कि उसमें यही स्थिति है। सर्वमयता, सर्वसमाविष्टता का अनुभव करनेवाला एक व्यक्ति हो और इस अनुभव के साथ-साथ दोनों का साक्षात्कार करनेवाला हो एवं अलग खड़ा होकर देखनेवाला हो कि हमने अनुभव किया कि हम सब में हैं। यह अनुभव करने से ही हम उन सबसे अकेले हो गए। इसलिए सही प्रकार से लोक-दृष्टि का अंत जिस आध्यात्मिक अकेलेपन में होता है। उसका अनुभव प्रत्येक बड़े साधक, चाहे कृष्ण रहे हों और चाहे बुद्ध एवं महावीर रहे हों, सभी को हुआ है। वह अनुभव सही रूप में लोक-दृष्टि है। अतः वही लोक-दृष्टि शास्त्र के सत्य के आलोक के लिए है। वही सत्य के ढके हुए मुख को प्रत्यक्ष करती है। यही लोकदृष्टि का महत्त्व है। हमारी परंपरा में बिना लोक की मूल भावना के समाज रूपी गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकती है। हम लोग आज लोक के नाम पर उसे एक छोटी चीज ही समझते हैं। यही समझते हैं कि जो स्त्रियाँ गीत गाती हैं, वही लोक-संस्कृति है। पर यह ठीक नहीं है। हम इस लोक की ओर एक आश्रयदाता की मुद्रा में देखते हैं, जैसे नाम नष्ट हो रहा हो। हमें इसकी रक्षा करनी चाहिए। हम यह नहीं सोचते हैं कि जीवन की सहजता जो अपने आप में सत्य की सहजता है, उसे देखें। इतना अधिक निष्कलुष हों कि कलुष मात्र ही, यथा—राग-द्वेष, मान, ईर्ष्या आदि सब एक साथ सहज ही शुद्ध भाव में परिणत हो जाएँ। यह आसान नहीं है, लेकिन उस सहजता को हमने बराबर महत्त्व दिया है। इसीलिए हमारी संस्कृति में निरंतर परिवर्तन की संभावना बनी रहती है।

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