७१वाँ स्वाधीनता दिवस, भारत की समृद्ध लोक-संस्कृति

१५अगस्त को भारत स्वाधीनता के ७० वर्ष पूरे कर ७१वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इन वर्षों में देश ने बहुत उथल-पुथल, उतार-चढ़ाव देखे हैं। सब कठिनाइयों के होते हुए देश की जनता में उत्साह है, एक अच्छे भविष्य की आशा है, आकांक्षा है। उसका एक कारण यह है कि देश में इस समय जो सरकार है, उसको ज्ञात है कि उसको जनता का विश्वास प्राप्त है। जनता को भी सरकार में भरोसा है। इसी पारस्परिक विश्वास के कारण सरकार नोटबंदी और पहली जुलाई से देश में जी.एस.टी. की शुरुआत कर सकी है। कहीं-कहीं कुछ विरोध दिखाई देता है, किंतु हम समझते हैं कि उसके कार्यान्वयन में जो कमियाँ हैं, वे शीघ्र ही दूर हो सकेंगी। कोई बड़ा परिवर्तन होता है, तो प्रारंभ में कुछ कठिनाइयाँ आती ही हैं। वास्तव में देश में अविश्वास या नकारात्मकता का माहौल नहीं रह गया है। प्रशासन के हर क्षेत्र में सक्रियता दिखाई देती है। देश विशाल है, भाँति-भाँति की विविधताएँ हैं, अनेक समस्याएँ हैं; उनको ध्यान में रखते हुए सरकार और जनता को मिलकर समस्याओं का हल निकालना॒है।

१५ अगस्त को देशवासी देश के रक्षकों, विशेषतया सेना के सभी अंगों के जवानों तथा अधिकारियों के प्रति अपना सम्मान व आदर व्यक्त करते हैं। वे देश की सीमाओं की सुरक्षा के प्रति समर्पित हैं। उसी प्रकार पुलिस देश की आंतरिक सुरक्षा में संलग्न है। इनके अलावा कई प्रकार के सशस्त्र सुरक्षा बल भी आवश्यकतानुसार देश की बाह्य सुरक्षा में तरह-तरह से सहयोग करते हैं। प्रतिदिन हम देखते हैं कि सीमाओं पर सैनिक व सुरक्षा बल तथा नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस बल अपनी जान हथेली पर रखकर अपने कर्तव्यों का निष्पादन कर रहे हैं। बलिदानियों की संख्या बढ़ती जाती है, किंतु सुरक्षा बलों का मनोबल ऊँचा है। १५ अगस्त को हम इन सबके प्रति कृतज्ञतापूर्वक नमन करते हैं। यह पर्व देशवासियों की सामूहिक भावनाओं का प्रतीक-स्वरूप है। हमारा कर्तव्य है कि हम सदैव अपनी भावनाओं को व्यावहारिक रूप प्रदान करते रहें, ताकि हमारे रक्षकों को आभास हो कि देश की जनता उनके त्याग व बलिदान को कितना मूल्यवान समझती है और उनकी तथा उनके परिवारों की सुख-सुविधाओं के लिए भी चिंतित है। देशवासियों के लिए लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का उद्बोदन होता है। यह सरकार के कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने का अवसर होता है। भविष्य में किन कार्यक्रमों को लेने का विचार है, यह भी पता चलता है। केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं, इसलिए देशवासियों को प्रधानमंत्री के भाषण की प्रतीक्षा स्वाभाविक है। इस अवसर पर विश्व की सरकारें भी भारत की नीतियों और योजनाओं को जानने को उत्सुक रहती हैं। प्रधानमंत्री मोदी एक नए भारत की परिकल्पना कर रहे हैं।

१५ अगस्त को हम देश के स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए असंख्य हुतात्माओं तथा देश पर न्योछावर होनेवाले ज्ञात-अज्ञात सभी स्वतंत्रता सेनानियों को अत्यंत श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं। स्वाधीनता संग्राम की अनेक धाराएँ थीं, किंतु सबका उद्देश्य एक ही था—देश की आजादी प्राप्त करना। विचारों अथवा कार्य-प्रणालियों के आधार पर हम कोई भेद नहीं कर सकते। स्वाधीनता संग्राम के लंबे दौर में सन् सत्तावन के शहीदों से लेकर जो क्रांतिकारी परंपरा स्थापित हुई, हम उसकी अनदेखी नहीं कर सकते हैं। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय, बिपिनचंद्र पाल, श्रीअरविंद, दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोज शाह मेहता, महात्मा गांधी, मौलाना आजाद, जवाहरलाल नेहरू, वीर सावरकर, भाई परमानंद, लाला हरदयाल, नेताजी सुभाष बोस, श्यामजी कृष्ण वर्मा, मैडम कामा, बाघा जतीन, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला आदि कोटि-कोटि स्वाधीनता सेनानी हमारी श्रद्धा के पात्र हैं और हम उन सभी के सम्मान में नतमस्तक हैं। वे सतत हमारे प्रेरणापुंज रहेंगे।

लोक-संस्कृति की विपुलता और विविधताएँ

‘साहित्य अमृत’ इसी माह में प्रकाशन के २२ वर्ष पूर्ण कर २३वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। इस अवसर पर प्रकाशित यह विशेषांक लोक-संस्कृति पर केंद्रित है। भारत एक विशाल देश है, जहाँ अनेक जातियाँ, उपजातियाँ रहती हैं। प्राचीनकाल से भौगोलिक दृष्टि से देश अनेक क्षेत्रों में बँटा है। प्रयास है कि आज की जो राजनैतिक इकाइयाँ हैं, उनके आधार पर उन क्षेत्रों की लोक-संस्कृति पर प्रकाश डाला जाए। वैसे एक क्षेत्र की लोक-संस्कृति राजनैतिक सीमाओं में आबद्ध नहीं रहती है। उसका विस्तार और प्रभाव पास-पड़ोस के क्षेत्रों पर भी पड़ता है। देश में भाषाई, धार्मिक, सामाजिक, रंग-रूप में भी भेद दिखाई देते हैं। किसी भी क्षेत्र की लोक-संस्कृति पर खेती-बाड़ी वहाँ के भूगोल, वहाँ की आबोहवा, जीवनयापन के लिए क्या प्राकृतिक साधन उपलब्ध हैं, उन सबका गहरा असर होता है। पहाड़ी क्षेत्र, मैदानी और समुद्री इलाकों में भी इसे देखा जाता है। लोक-संस्कृति एक प्रकार से जीवन-शैली की परिचायक है। रीति-रिवाज, वेष-भूषा, खान-पान, आस्थाएँ तथा धार्मिक विश्वास, लोककथाएँ, लोकदेवता, मेले, त्योहार, मनोरंजन के साधन आदि-आदि सब उसमें शामिल हैं। उनका प्रस्फुटन उनके लोकगीतों, लोककथाओं और जिसे साहित्य कहा जाता है, उसकी विभिन्न विधाओं में होता है। लोक-संस्कृति एक समन्वयवादी विशाल अवधारणा है। लोक-संस्कृति को हम परिभाषित करने का प्रयास नहीं करना चाहते। उसके मनोवैज्ञानिक, आंतरिक और बाह्य पहलू हैं, जो दृष्टिगोचर होते हैं, उसके विविध पक्ष हैं। इसी कारण समाजशास्त्र की जो विभिन्न प्रकार की बौद्धिक विधाएँ हैं, वे अपने-अपने ढंग से लोक-संस्कृति की जाँच-पड़ताल करती हैं। आप इसमें देखेंगे कि अनेक लेखकों, समाजशास्त्रियों तथा मानवशास्त्र के विद्वानों की लोक-संस्कृति की अपनी-अपनी क्या परिकल्पना है। उन्होंने संस्कृति के सतरंगी ही नहीं, बहुरंगी स्वभाव को प्रकट किया है।

लोक-संस्कृति की बहुपक्षीय और बहुरूपी विविधता के कारण विशेषांक का विषय क्या हो, इसके बारे में कुछ दुविधा रही। क्या एक या दो लेख भारत के विभिन्न प्रदेशों की लोक-संस्कृति को चित्रित कर सकते हैं? यह प्रश्न सामने था, इसके लिए तो अनेक ग्रंथों की आवश्यकता होगी। अंत में यही निश्चय हुआ कि ‘साहित्य अमृत’ का यह विशेषांक मुख्यतया परिचयात्मक है। यह भारतीय लोक-संस्कृति की विपुलता और विविधता की एक झाँकी मात्र प्रस्तुत करने का लघु प्रयास है। इसे दुस्साहस भी कहा जा सकता है। मंतव्य हमारा यही है कि देश की विविध लोक-संस्कृतियों से परिचय कराने की कोशिश की जाए, ताकि हम सबको और अधिक जानने की उत्कंठा पैदा हो, हम एक-दूसरे को जानने की कोशिश करें, क्योंकि उसी से अपनत्व की भावना जाग्रत् होती है। हम गर्व से कहते हैं कि भारत उदाहरण है—एकता में अनेकता का और अनेकता में एकता का। प्रादेशिक लोक-संस्कृतियाँ ही भारतीय संस्कृति को पुष्ट करती हैं, समृद्ध बनाती हैं। भारतीय भाषाओं के विषय में डॉ. राधाकृष्णन ने एक बार कहा था कि सरस्वती की अनेक जिह्वाएँ हैं और उनसे अलग-अलग भाषाएँ निकलती हैं। भारत को हम एक कैलेडस्कोप (Kailedoscope) कह सकते हैं—चाहे जाति-प्रजातियों को लें, भाषाओं को लें, रीति-रिवाजों को लें अथवा संस्कृति के अन्य अंग-उपांगों को लें। अंततोगत्वा लोक-संस्कृतियाँ भारतीय संस्कृति के समवेत रूप में समाहित हो जाती हैं। देश की एक मौलिक एकता है, जिसमें अनेकता परिलक्षित होती है, संस्कृति उस मौलिक एकता को और अधिक बलवती तथा समृद्ध बनाती है। इस दृष्टिकोण से मृदुला सिन्हा का आलेख ‘भारतीय संस्कृति लोक-संस्कृति में जीवंत है’ अत्यंत अर्थपूर्ण है। गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में राजपथ पर आयोजित भारत की लोक-संस्कृति की झाँकी किसी-न-किसी रूप में प्रतिवर्ष देखने को मिलती है।

विद्वानों से आलेख आमंत्रित करते हुए हमारा अनुरोध यही था कि वे अपने प्रदेश की लोक-संस्कृति की एक झाँकी कुछ पृष्ठों में प्रस्तुत करने की चेष्टा करें, ताकि दूसरों को और अधिक जानने की उत्सुकता में वृद्धि हो। किसी प्रदेश जाए बिना भी वहाँ की लोक-संस्कृति का एक विहंगम परिचय प्राप्त हो सके। लोक-संस्कृति किसी प्रकार से हेय नहीं होती है। भद्रलोक की संस्कृति का उद्गम भी लोक-संस्कृति ही है। वृक्ष को निर्मूल करते ही वह सूखने लगता है। जिस प्रकार लोकतंत्र वंदनीय है, उसी प्रकार लोक-संस्कृति वंदनीय है। लोक-संस्कृति के साथ किसी हीनता की भावना के जुड़ने का प्रश्न ही नहीं है। लोक-संस्कृति गतिमान है, समयानुसार उसमें परिवर्तन होते रहते हैं। बदलती परिस्थितियों में परंपरा और आधुनिकता का मेल स्वाभाविक रूप से होता रहता है। आज के प्रदेशों की लोक-संस्कृतियों की जब हम बात करते हैं तो उसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे सदैव बिल्कुल अलग-थलग ही रही हैं। वास्तविकता यह है कि उनमें भी थोड़ा-बहुत आदान-प्रदान सदैव होता रहा है; एक-दूसरे से कुछ-न-कुछ सीखते रहे हैं, ग्रहण करते रहे हैं। कुछ विद्वान् लेखकों ने प्रदेश की लोक-संस्कृति को वृहद् रूप में प्रस्तुत करने की चेष्टा की है, कुछ लेखकों ने लोक-संस्कृति के एक या दो पक्षों पर ही प्रकाश डाला है, किंतु उससे भी वहाँ की संस्कृति की झलक पाने के लिए खिड़की तो खुल ही गई है। हर आलेख में प्रदेश की लोक-संस्कृति की भव्यता का आभास तो हो ही जाता है।

एक और ध्यान देने का विषय है। सभी लेखकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से, अपने विवेक से अपने प्रदेश की लोक-संस्कृति को चित्रित करने की कोशिश की है। लोक-संस्कृति के किसी अंग को लेखक ने प्राथमिकता दी है, तो दूसरे ने समग्र चित्र प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। देश के कुछ बड़े राज्य हैं, जैसे उत्तर प्रदेश; उसके कई भाग हैं, जैसे पूर्वांचल, मध्य के कई जिले, जिन्हें पांचाल प्रदेश कहा जाता था, बुंदेलखंड है, पश्चिम प्रदेश, उसमें समानताएँ हैं, किंतु कुछ भिन्नताएँ भी हैं। ब्रज की तो छटा ही निराली है। ब्रज-वैभव की गाथा अपने में अनूठी है। अवध की लोक-संस्कृति पर विचार करते हुए हम फैजाबाद और लखनऊ के नवाबों के प्रभाव को नकार नहीं सकते हैं। अवध की तहजीब, खान-पान, रीति-रिवाज, जनाना नृत्य आदि की अपनी विशेषताएँ हैं। अभी हाल में रूपा प्रकाशन, दिल्ली ने अवध की संस्कृति पर एक दिलचस्प व बहुमूल्य जानकारी देनेवाली एक पुस्तक च््न2ड्डस्रद्ध स्4द्वश्चद्धशठ्ठ4ज् प्रकाशित की है, जो अवध की लोक-संस्कृति पर अच्छा प्रकाश डालती है। लेखक स्व. असलाम अहमद हैं। बुंदेलखंड मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों में बँटा हुआ है। लोकगाथा आल्हा दोनों प्रदेशों में लोकप्रिय है, पर शैलियाँ अलग-अलग हैं। कन्नौज अथवा पांचाल प्रदेश में वर्षा के दिनों में कुछ लोग बड़े मनोयोग से आल्हा गाते हैं। जगनिक को वाचिक परंपरा में आल्हा-ऊदल काव्य का रचयिता माना जाता है। ये दोनों क्षेत्र पिछड़े हुए हैं। ऐसे विद्यालय अथवा विश्वविद्यालय नहीं हैं, जहाँ लोक-साहित्य पर शोध हो। टी.वी. आदि केंद्रों की सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं, जहाँ स्थानीय कलाकार वहाँ की लोककलाओं का प्रदर्शन कर सकें। राज्य सरकारों के प्रोत्साहन की अत्यंत आवश्यकता है, क्योंकि लोकसाहित्य और लोककलाएँ विलुप्त होती जा रही हैं। आज का मध्य प्रदेश भी एक बड़ा प्रदेश है, जिसके अनेक भाग हैं, जैसे बुंदेलखंड, मालवा, महाकौशल आदि। मोटे रूप में मध्य प्रदेश की विशद लोक-संस्कृति को जानना आसान नहीं है। कितने लोगों ने बुंदेलखंड के ‘फड़’ साहित्य का नाम सुना है? बिहार भी बड़ा प्रदेश है। मैथिली और भोजपुरी लोक-संस्कृतियाँ अत्यंत समृद्ध हैं। झारखंड की लोक-संस्कृति की तो अपनी क्षेत्रीय विशिष्टताएँ हैं ही। कर्नाटक को देखें तो उसमें कुछ भिन्नताएँ हैं, यद्यपि समानताएँ अधिक हैं। कर्नाटक प्रदेश की लोक-संस्कृति को एक आलेख में समेटना मुश्किल है। गुजरात की लोक-संस्कृति में विविधता है, अपना वैभव और क्षेत्रीय छटा है। उत्तराखंड एक छोटा राज्य है, किंतु वहाँ गढ़वाल और कुमाऊँ की अपनी लोक-संस्कृतियाँ हैं। अंडमान-निकोबार और सिक्किम की संस्कृतियों को रूपायित करने का प्रयास किया है। अंडमान-निकोबार का प्रदेश विशेष राजनैतिक परिस्थितियों में निर्मित हुआ, किंतु स्थानीय परिवेश में अब वहाँ एक नई संस्कृति का उदय हो रहा है। छत्तीसगढ़ सदियों तक मध्य प्रदेश का भाग रहा, पर आज एक अलग राज्य है, अपनी लोक-संस्कृति की विशेषताओं के साथ। इतना ही नहीं, तमिलनाडु, गोवा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों—असम, त्रिपुरा, सिक्किम, मेघालय, अरुणाचल, मणिपुर, नागालैंड और मिजोरम की शस्य श्यामला लोक-संस्कृति पर सुंदर आलेख हम प्रमुखता से दे रहे हैं। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की लोक-संस्कृतियों को एक या दो आलेखों में प्रस्तुत करना संभव नहीं है, पर जैसा मैंने पहले लिखा—हम सबका परिचय भर देने का प्रयास कर रहे हैं। लोक-संस्कृति की दृष्टि से ये दोनों राज्य अत्यंत समृद्ध हैं। मणिपुरी नृत्य से सब परिचित हैं। त्रिपुरा मणिपुर की तरह अलग राजनैतिक इकाई रहा है। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का त्रिपुरा से काफी गहरा संबंध रहा। नागालैंड की अपनी विशेषताएँ हैं।

भारतवंशियों की वैश्विक लोक-संस्कृति पर प्रकाश डालनेवाला एक आलेख भी इसमें शामिल है। भारतीय मूल के निवासी अनेक देशों में फैले हुए हैं। भूमंडलीकरण के कारण इसमें और भी वृद्धि हो सकती है। लोकगाथा एवं लोक-संस्कृति के तत्त्व और तंत्र का विवेचन करते लेख भी हैं, कुछ और विषयों का भी विश्लेषण है, जैसे भारतीय लघु चित्रांकन में लोकचित्रण। हमें विश्वास है कि भारत की लोक-संस्कृति की कम-से-कम एक झलक प्रस्तुत करने का यह लघु प्रयास पाठकों को रुचिकर लगेगा। एक बात की ओर हम अपने प्रबुद्ध पाठकों का ध्यान दिलाना चाहेंगे। आजकल फैशन डिजाइनरों का बोलबाला है, चाहे महिलाओं के नए परिधान हों, शरीर के अलग-अलग भागों में पहनने के लिए विभिन्न प्रकार के आभूषण या गहने हों, केश विन्यास की शैलियाँ हों, इन सबकी प्रेरणास्रोत हमारी लोक-संस्कृतियाँ ही हैं। इन्हें आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता का नाम दिया जाता है। कच्छ, राजस्थान तथा कई घुमंतू जातियों के पहरावे की नकल कर महिलाओं के लिए नई-नई पोशाकें तैयार हो रही हैं। यह है लोक-संस्कृति की दृढता और अनिवार्यता।

लोक-संस्कृति की विविधता का सही अर्थ

लोक-संस्कृतियों की बहुलता और विविधता का सही मायने में लौकिक तथा दैनिक व्यवहार में अर्थ क्या है, यह हम ठीक से समझ नहीं पाते हैं। इससे देश के सौष्ठव को ठेस पहुँचती है। भारत के उत्तर-पूर्वी प्रदेश नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम के निवासी जो दिल्ली या अन्य राज्यों में कार्यरत हैं, अकसर उनके साथ दुर्वव्यहार की घटनाओं के समाचार आते हैं। इन राज्यों के विद्यार्थी, जो देश के अन्य प्रदेशों में अध्ययन करते हैं, उनके साथ मारपीट होती है। यही नहीं, कई घटनाओं में इन प्रदेशों के विद्यार्थी या निवासी की मृत्यु तक हो गई। वेशभूषा, रंग, चेहरे की बनावट अथवा खान-पान भिन्न होने के कारण हम उनको अपने से अलग समझते हैं। उन पर छींटाकशी करते हैं; ‘अपने देश जाओ’ इस प्रकार के ताने देते हैं, यह असहनीय है। वे इसी देश के नागरिक हैं। संविधान के अनुसार उनके भी वही अधिकार हैं, जो हमारे हैं। इन बातों से अलगाव की भावना पैदा होती है। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के ये राज्य देश की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इन राज्यों के निवासियों से रामायण और महाभारत काल से नहीं, अपितु और भी पहले से हमारे संबंध रहे हैं। देश की एकता और सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि बाहरी भिन्नता होते हुए भी वे हमारे अपने हैं, उनके साथ प्यार और भाई-चारे का व्यवहार होना चाहिए। खेद इस बात का है कि तथाकथित संभ्रांत संस्थाओं में भी इस प्रकार के दुर्व्यवहार की शिकायतें आती हैं। पिछले दिनों मेघालय की एक महिला, जो अपने यहाँ की पारंपरिक वेशभूषा पहने हुए थी, वहाँ के प्रबंधकों ने उसको गोल्फ क्लब से निकल जाने का आदेश दिया। देश में इसकी तीव्र भर्त्सना हुई। प्रबंधकों ने माफी माँगी। यह व्यवहार दूषित मानसिकता का परिचायक है। लोकतंत्र समरसता का प्रतीक है। यह हमारे दैनिक व्यवहार में प्रदर्शित होना चाहिए।

भारत की परंपरा विश्वबंधुत्व

इसी प्रकार अफ्रीका के एक देश के निवासियों के साथ मारपीट की घटना ने तूल पकड़ लिया। अफ्रीका के सब राजदूतों और उच्चायुक्तों ने विदेश मंत्रालय में इसे नक्सलवादी भेदभाव के रूप में प्रस्तुत किया। रंग, रूप, लिंग, किसी भी प्रकार का भेदभाव हमारी सभ्यता और संविधान में वर्जित है। ईससे दूसरे देशों में भारत की छवि धूमिल होती है। आज भारतीय मूल के कार्मिक अन्य देशों में अनेक प्रकार की महत्त्वपूर्ण योजनाओं में कार्यरत हैं, उनकी सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए। इतिहास साक्षी है, हजारों वर्षों से भारतीय विदेशों में जाते रहे हैं। विदेशी भारत आते रहे हैं। अपनी समझ के अनुसार उन्होंने भारत के विषय में लिखा भी है। भारत ने यहूदियों और पारसियों को उनके बुरे समय में आश्रय दिया। अरमीनियन, यूनानी, चीनी तथा अन्य देशों के लोग भारत में आए और अपनी बस्तियाँ स्थापित कीं। वे भारत में घुल-मिल गए। वैश्वीकरण के युग में तो इस दिशा में और अधिक सचेत रहना चाहिए। पुलिस और सिविल सोसाइटी दोनों का दायित्व है कि इस प्रकार की घटनाओं को न होने दें। विश्वबंधुत्व भारत की परंपरा रही है। चाहे आंतरिक और बाह्य कितनी ही भिन्नताएँ हों, उनको बौद्धिक रूप से समझना चाहिए और उनको खुले हृदय से स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार की सकारात्मक मानसिकता को हमें प्रोत्साहित करना चाहिए। वह भारत की देन है, एक मानवीय विरासत है।

कुछ घर की, कुछ बाहर की

जम्मू-कश्मीर में सेना तथा सुरक्षा बल कठिन परिस्थितियों में अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर रहे हैं। कुछ विरोधी यह चाहते हैं कि महबूबा मुफ्ती और भाजपा की सरकार किसी प्रकार टूटे, ताकि अशांति भड़काने का और मौका मिले। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है और वह गाहे-बगाहे सीमा पर गोलाबारी करता है, ताकि आतंक का वातावरण बना रहे। हमारे सुरक्षा बलों के कुछ जवान शहीद होते हैं, कुछ नागरिक, विशेषकर निरीह बच्चे और महिलाएँ मारी जाती हैं। अमरनाथ यात्रा में गुजरात की एक बस पर आतंकवादियों ने दो बार आक्रमण किया और अब हताहतों की संख्या दस तक पहुँच गई है। अमरनाथ यात्रा पर आनेवालों पर सन् २००० के बाद यह पहला  हमला है। आतंकवादियों का उद्देश्य यही है कि दहशत फैले, हिंदू और मुसलमानों में तनाव बढ़े। यह संतोष की बात है कि जम्मू-कश्मीर की साधारण जनता ने इस आक्रमण का विरोध किया। कश्मीर के अलगाववादी दलों ने भी अपने शब्दों में इसे अवांछनीय कहा। इसीलिए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि कश्मीरियत की अवधारणा अभी भी जीवंत है। इसमें पुलिस को शक लश्करे तैयबा पर है। सेना आतंकियों का पीछा कर रही है। तीन मारे भी गए हैं। फिर भी प्रश्न उठता है कि ये आतंकी श्रीनगर रोड पर इतना लंबा सफर तय करके कैसे गए? भले वे पुलिस की वरदी पहने साइकिलों पर थे, पर स्थानीय पुलिस को उनकी कुछ जाँच-पड़ताल तो करनी ही चाहिए थी, क्योंकि यह सर्वविदित तथ्य है कि आतंकवादी पुलिस या सेना की वरदी का ही दुरुपयोग करते हैं। इसके बाद यह भी अजीब है कि जब बस यात्रा के लिए रजिस्टर्ड नहीं थी और बसों के जाने की समय-सीमा भी निकल गई थी, फिर इस बस को क्यों जाने दिया गया, खासकर जब इस तरह की खुफिया सूचना थी कि आतंकवादी अमरनाथ यात्रियों पर आक्रमण कर सकते हैं। इन बातों की जाँच होनी ही चाहिए।

पाकिस्तान की हृदयहीनता उजागर होती है, जब वह कुलभूषण जाधव की माँ की वीजा देने की प्रार्थना की बार-बार अनदेखी करता है। यह एक मानवीय समस्या है। भारत की विदेश मंत्री पाकिस्तानी रोगियों को भारत में चिकित्सा हेतु तुरंत वीजा के आदेश देती हैं। यह है भारतीय हृदय की विशालता। कुलभूषण जाधव की दया याचिका पाकिस्तान के सैनिक अध्यक्ष ने नामंजूर कर दी है। वह मेरिट के आधार पर विचार करेंगे। सितंबर में अंतरराष्ट्रीय अदालत की होनेवाली बैठक कुलभूषण जाधव के मामले को सुनेगी, अतएव वह अत्यंत महत्त्व की होगी। अब चीन भी कश्मीर समस्या के हल के लिए अपनी सर्जनात्मक सेवाएँ देने को प्रस्तुत है। भारत की पुरानी घोषित नीति है कि मामला भारत और पाकिस्तान के बीच का है और तीसरी शक्ति का हस्तक्षेप भारत को स्वीकार नहीं है, यद्यपि पाकिस्तान इसके लिए बेचैन रहता है। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री का कहना है कि चीन अपनी टाँग अड़ा रहा है, पीछे से कश्मीर की अशांति को हवा देने की कोशिश कर रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आरोप है कि उनके राज्य में जो अशांति है, उसमें चीन दखल दे रहा है। भूटान-सिक्किम-चीन, तीनों देशों के ट्राईजंक्शन डोकलाम पर चीन और भारत की सेना आमने-सामने खड़ी हैं, तनाव बना हुआ है। भारत के सामने अपनी सुरक्षा का प्रश्न है। एक छोटी सी सड़क चिकेननेक देश को उत्तरी-पूर्वी राज्यों से जोड़ती है। भारत विरोधी कुछ गुटों को पहले से ही उत्तर-पूर्वी राज्यों में अशांति पैदा करने हेतु शह और सहायता मिल रही है। पहले भी उग्रवादी चीन से हथियार और शरण प्राप्त करते रहे हैं। चीन नाराज है, चूँकि भारत उसके बेल्ट और रोड इनीशिएटिव में शामिल नहीं हुआ, हालाँकि अन्य कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। भारत को एतराज इस कारण है कि जो सड़क निकल रही है, वह भारत की उस धरती से होकर निकल रही है, जिसपर पाकिस्तान ने अनधिकृत कब्जा कर रखा है। वैसे सिल्क रोड की परंपरा रही है। चीन की नाराजगी का एक कारण यह भी है कि भारत अमरीका व जापान के साथ मिलकर समुद्री सेना के अभ्यास में भाग ले रहा है। भारत दक्षिणी समुद्र के स्वामित्व के विषय में अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले का समर्थक है, जबकि चीन का उसपर अकेले स्वामित्व का दावा है। भारत सरकार बडे़ धैर्य के साथ इन समस्याओं के समाधान का प्रयत्न कूटनीतिक तरीके से कर रही है।

गौरक्षकों को मर्यादित होना होगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन-चार बार खुले तौर पर गैर-कानूनी तौर-तरीकों की भर्त्सना की है, जो गौ-रक्षा के नाम पर असामाजिक तत्त्व अपनाते हैं। तथाकथित गौरक्षकों को कानून हाथ में लेने पर राज्य सरकारों को सख्त-से-सख्त कदम उठाने चाहिए। भीड़ द्वारा मार-पीटकर किसी की हत्या करना एक जघन्य अपराध है। इसके अनेक कारण बना लिये जाते हैं, जैसे—कभी यह महिला डायन है, कभी अनुसूचित जनजाति का है, कभी किसी ने शोर मचा दिया कि चोर आया है, कभी रेल में सीट के लिए झगड़े में; तुरंत भीड़ उमड़ पड़ती है और हत्या कर दी जाती है। पहले यूपीए के समय में भी इस प्रकार की घटनाएँ हरियाणा, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान आदि राज्यों में हुई हैं। इनको किसी दल से नहीं जोड़ना चाहिए। यह अपराध है और इसको नियंत्रण में करने के लिए पुलिस को कानूनी जाँच-पड़ताल के बाद बिना किसी भेदभाव के सजा दिलाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। सिविल सोसाइटी का भी इस दिशा में कर्तव्य है। चाहे कोई अल्पसंख्यक समुदाय का हो, चाहे दलित हो, चाहे महिला हो, सब नागरिकों को सुरक्षा मिलनी चाहिए। यह राज्य का प्रथम कर्तव्य है। आशा करते हैं कि राज्य सरकारें अब आगे से इस मामले में कोई कोताही नहीं बरतेंगी। विश्व में इसका बड़ा गलत संदेश जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भूमाफियाओं और फिजूलखर्ची की योजनाओं, जिनका विशेष लाभ जनसाधारण को न हो तथा जिन योजनाओं में भ्रष्टाचार की शिकायत है, उनके विरुद्ध जो कदम उठाए हैं, वे सराहनीय हैं। साथ-ही-साथ कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के निष्पक्ष प्रयास जारी रहने चाहिए। इसमें राजनेताओं, विशेषकर विधायकों का हस्तक्षेप घातक होता है। स्थानीय पुलिस-प्रशासन व अधिकारियों को अपना काम करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। यदि वे गलती करते हैं, तो उनको उसके लिए दंडित करना चाहिए। उत्तर प्रदेश में कुछ नेताओं की शिकायतों पर एक महिला डी.एस.पी. का ट्रांसफर करना उचित नहीं कहा जा सकता है। इससे गलत संदेश जाता। इसी प्रकार कर्नाटक में एक महिला पुलिस अधिकारी सुश्री रूपा का, जो जेल विभाग में डी.आई.जी. हैं, के पद से स्थानांतरण करना अनुचित है। शशिकला को पंचतारा होटल की सुविधाएँ देने के बाबत दो करोड़ की घूस ली—ऐसी एक रिपोर्ट उसने जेल विभाग के डायरेक्टर जनरल के खिलाफ दी। उसकी जाँच होनी चाहिए थी, न कि अपराध पर परदा डालने की कोशिश। इसमें उसने न कोई अनुशासनहीनता की और न कोई प्रशासनिक गलती है। आर.टी.आई. और मीडिया की सूचना के आधार पर यह निर्विवाद है कि शशिकला को जो सुविधाएँ दी गईं, वे अनधिकृत हैं; और उसके पीछे केवल पैसा अथवा राजनीतिक दबाव ही हो सकते हैं। आजकल दोनों पर्यायवाची हो गए हैं। हम देश में कानून के राज्य की दुहाई देते हैं, तो हमें यह भूल जाना चाहिए कि दोषी कौन है, कितना बड़ा है। कानून उससे बड़ा है। यदि यह नहीं होगा तो राजनीति अपनी विश्वसनीयता खो देगी। देश को ऐसे जनाधिकारियों की आवश्यकता है, जो योग्य हों, ईमानदार हों और अपने कर्तव्यों का पालन बिना डर या लोभ तथा बिना किसी भेदभाव के करते हैं और जिन्हें जनसेवक के रूप में अपनी भूमिका पर गर्व है।

एक नई मधुशाला

बच्चनजी की ‘मधुशाला’ का हिंदी-जगत् में महत्त्वपूर्ण स्थान है। सर्वप्रथम १९३३ में प्रकाशित बच्चनजी की मधुशाला आज भी उतनी ही लोकप्रिय है। अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ। प्रकाशित होने के बाद बच्चनजी की शैली में लोकप्रियता पाने के लिए कुछ अन्य कवियों ने प्रयास किए, किंतु सफलता या लोकप्रियता प्राप्त नहीं हुई। कुछ ने खिल्ली उड़ाने की भी कोशिश की। उसकी पैरोडी भी लिखी गई। यह सब विस्मृति के गर्भ में विलीन हो गया, परंतु बच्चनजी की मधुशाला आज भी उतनी ही लोकप्रिय है। अब सुनील वाजपेयी ‘सरल’ की ‘नई मधुशाला’ प्रभात प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुई है। इसमें हिंदी के जाने-माने कवि और साहित्यकार अशोक चक्रधर की एक विद्वत्तापूर्ण प्रस्तावना है, जिसमें उन्होंने बच्चनजी की मधुशाला का विश्लेषण किया है, साथ ही सुनील वाजपेयी की ‘नई मधुशाला’ के लिए प्रोत्साहनपूर्ण शब्द लिखे हैं। सुनील वाजपेयी ने बच्चनजी को भावपूर्ण शब्दों में अत्यंत आदर के साथ अपनी ‘नई मधुशाला’ समर्पित की है। बच्चनजी के मधुछंद को उन्होंने कृतज्ञतापूर्वक अपनाया है, अनुकरण किया है। उनकी अपनी विस्तृत भूमिका भी है, जिसमें उन्होंने बताया है कि कैसे उसकी रचना हुई। उन्होंने अपनी भूमिका में भी बच्चनजी के प्रति आदर और कृतज्ञता ज्ञापित की है, सारा श्रेय बच्चनजी को दिया है। यह तो एक युवाकवि से अपेक्षित है, किंतु किसी अपराध-बोध की भावना की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। उनकी (वाजपेयी) रचना अपनी है। मधुछंद के प्रयोग और बच्चनजी की शैली का अनुकरण प्रतीक है कि हर प्रकार से वे उनके प्रेरणास्रोत हैं। साहित्य की प्रगति इसी भाँति होती है। सुनील वाजपेयी ने दस अध्यायों में अपने छंदों को संकलित किया है। उन्होंने युवा कवि के अपने दर्शन, अपनी सोच और अपने अनुभवों को समाहित किया है। सुधी पाठक पुस्तक का अवलोकन कर उसका आनंद लेंगे। वाजपेयी की ‘नई मधुशाला’ में शृंगार, नीति, वैराग्य तीनों परिलक्षित होते हैं। सुनील वाजपेयी की पृष्ठभूमि टेक्नोलॉजी में उच्च शिक्षा की है, पर प्रारंभ से उनकी रुचि अध्यात्म और साहित्य में रही है। वे भारतीय राजस्व सेवा के एक उच्च अधिकारी हैं।

उदाहरणस्वरूप कुछ छंद उद्धृत किए जा रहे हैं—

माता-पिता प्रथम साकी हैं

हर बालक पीनेवाला।

उनके हाथों पी बचपन में,

वह कितनी अद्भुत हाला।

मदिरालय वह कब से छूटा

फिर न कभी वह प्राप्त हुआ,

अब रोता हूँ कभी सोचकर

कहाँ गई वह मधुशाला।

माना मुश्किल समय आज है

खाली है तेरा प्याला।

तेरा साकी रूठ गया है,

मिलती नहीं तुझे हाला।

अगर न अच्छा समय रहा तो,

बुरा समय भी जाएगा।

समय बदलते देर न लगती,

फिर भय देगी मधुशाला।

केवल जो सपने ही देखे,

उसे न कुछ मिलनेवाला।

कर संकल्प बढे़ आगे जो

मंजिल वह पानेवाला।

मदिरा पीने के सपने तू,

कब से बैठा देख रहा।

अब उठ सही राह पर चल पड़,

मिल जाएगी मधुशाला।

पंचतत्त्व के इस प्याले से,

पीता जीव प्राण हाला।

मदिरा जब समाप्त हो जाए,

स्वतः टूट जाए प्याला।

स्वतःस्फूर्त सभी कुछ होता,

इस जीवन मदिरालय में।

सभी परस्पर निर्भर होते,

हाला-प्याला-मधुशाला॥

कवि कृष्णभक्त हैं। वाजपेयी ने भगवद्गीता के श्लोकों का काव्यानुवाद किया है और गीता पर वे प्रवचन करते हैं। उनके गीता काव्यानुवाद को देखने का अवसर नहीं मिला है, किंतु नई मधुशाला उनकी काव्यात्मक प्रतिभा की प्रतीक है। ‘नई मधुशाला’ एक सराहनीय प्रयास है और पाठकों को रुचिकर लगेगी। सुनील वाजपेयी ‘सरल’ को उनकी कृति के लिए बधाई। भविष्य में उनसे और आशाएँ हैं।

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डॉ. शंभूनाथ सिंह आधुनिक हिंदी साहित्य के एक जाने-माने हस्ताक्षर हैं। १७ जून, १९१६ को जनमे शंभूनाथ सिंह की शती वर्ष का समापन १७ जून, २०१७ को हिंदी भवन में हुआ। साहित्य को उनका बहुआयामी अवदान है। उनकी विशेष ख्याति एक गीतकार के रूप में है। उनके एक गीत ‘समय की शिला’ ने गीतकार के रूप में उनको अमर कर दिया। अगले अंक में डॉ. शंभुनाथ सिंह और समापन समारोह के विषय में कुछ जानकारी दी जाएगी।

प्रसिद्ध नाटककार के रूप में जगदीश चंद्र माथुर की ख्याति हिंदी-जगत् में रही है। यद्यपि उनका अवदान भी बहुपक्षीय है। १६ जुलाई, १९१७ को जनमे श्री जगदीश माथुर का भी यह शताब्दी वर्ष है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के विषय में भी स्मृति स्वरूप सामग्री पत्रिका के आगामी अंकों में प्रस्तुत की जाएगी।

‘साहित्य अमृत’ के एक प्रबुद्ध पाठक का एक रोषपूर्ण पत्र प्राप्त हुआ। नाम उन्होंने नहीं लिखा, पर हम उनकी भावनाओं का आदर करते हैं। जून के अंक में प्रतिस्मृति स्वरूप गुरुदत्तजी का एक तथ्यात्मक लेख प्रकाशित हुआ। उनका विरोध था कि उससे क्या शिक्षा मिलती है। गुरुदत्तजी एक ख्यातनाम उपन्यासकार और कहानीकार थे। इसमें दो राय हो सकती है कि उस लेख की जगह उनकी और अधिक प्रभावी रचना को प्रकाशित होना चाहिए, यद्यपि यह लेख भी अर्थहीन नहीं है। उसमें कानून की विडंबना और जटिलता का प्रस्तुतीकरण है। उनका कहना है कि जब अपसंस्कृति पनप रही है, हमें उसके विरोध में अभियान चलाना चाहिए। वैश्वीकरण के इस युग में जब कानून बदल रहे हैं, मान्यताएँ बदल रही हैं, सिविल सोसाइटी का कर्तव्य है कि जो अवांछनीय है, उसका एकजुट होकर जोरदार विरोध करे। ‘साहित्य अमृत’ किसी भाँति भी अपसंस्कृति का न कभी समर्थन करती है और न उस प्रकार की रचनाओं को प्रोत्साहन देती है। हमारा विश्वास भारत के शाश्वत मूल्यों में है और उसी से हम प्रेरणा ग्रहण करते॒हैं।

सुविज्ञ लेखकों व सुधी पाठकों को स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएँ!

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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