रूप-रचना पर आधारित हिंदी क्रियाओं का सम्यक् विधान

रूप-रचना पर आधारित हिंदी क्रियाओं का सम्यक् विधान

आज से कोई सौ वर्ष पहले वैयाकरण पं. कामता प्रसाद गुरु ने अपने हिंदी व्याकरण में हिंदी क्रियाओं के शिष्ट रूपों और प्रयोगों का विवेचन-विश्लेषण करने के लिए अंग्रेजी व्याकरण की काल-पद्धति अपनाई थी। जो या जैसा विवेचन-विश्लेषण हुआ, उससे वे स्वयं भी संतुष्ट न थे। अंग्रेजी व्याकरण में वर्तमान तथा भविष्यत् कालों के भेद-प्रभेदों में जैसी समानता या समरूपता थी, वैसी हिंदी क्रियाओं के कालों के भेद-प्रभेदों में न दिखी। परिणामतः गुरु ने ‘हिंदी व्याकरण’ की भूमिका में लिखा कि ‘वह दिन हिंदी के लिए बड़े गौरव का होगा, जब संस्कृत के अद्वितीय विद्वान् हिंदी को एक स्वतंत्र भाषा समझकर अष्टाध्यायी और महाभाष्य के मिश्रित रूप में उसका व्याकरण लिखेंगे।’ ‘हिंदी व्याकरण’ की भूमिका में गुरु ने यह रहस्य भी प्रकट किया कि वे स्वयं हिंदी क्रियाओं का विवेचन संस्कृत की लकार-पद्धति के आधार पर करना चाहते थे; परंतु ऐसा न कर सकने के कई कारण भी उन्होंने गिनाए।

गुरुजी के बाद हिंदी व्याकरण की कमान आचार्य पं. किशोरी दास वाजपेयी ने सँभाली। वाजपेयीजी संस्कृत के अद्वितीय विद्वान् भी थे और उन्होंने हिंदी को एक स्वतंत्र भाषा भी माना था। उनके अनेक निर्णायक अभिमत स्वागत योग्य हैं, कुछ निष्कर्ष चमत्कृत करनेवाले भी हैं और कुछ हवाई ऊहाएँ भी। परंतु लकार-पद्धति के अनुरूप हिंदी क्रियाओं के वर्णन-विवेचन की ओर वे प्रवृत्त नहीं दिखे।

भाषा का सम्यक् ज्ञान, शिक्षण-प्रशिक्षण तथा प्रसार-प्रचार सरलता और त्वरित गति से हो, इसके लिए क्रियाओं का विवेचन किसी स्पष्ट और बोधगम्य पद्धति पर होना आवश्यक है। भाषा की गतिशीलता और निर्वहण-क्षमता में क्रियाएँ ही अग्रसर तथा मुखर होती हैं।

हिंदी क्रियाओं के संबंध में चिंतन-मनन करने का मेरा स्वभाव सा पिछले कुछ वर्षों से बन गया था। किसी क्रिया-पद्धति की सर्जना की कोई बात तो मेरे मन में नहीं थी, परंतु विभिन्न आधारों पर क्रिया रूपों के भेद-प्रभेद अवश्य करता रहता था। एक दिन मन में आया कि वाक्यों में प्रयुक्त किसी विशिष्ट क्रिया के विभिन्न, विशेषतः प्राथमिक या मूल रूपों की सूची बनाई जाए। ‘आना’ क्रिया सामने थी, उसके निम्न आठ रूप सामने आए—आ, आता, आया, आना, आए, आएगा, आइए और आइएगा। पहला रूप धातु है और शेष रूप उस धातु में प्रत्ययों के योग से बने कृदंत रूप हैं। इन सभी रूपों की सही पहचान के लिए व्याकरणिक नामों की आवश्यकता अनुभूत हुई। पहले एक-दो नाम वर्तमानकालिक कृदंत (आता के लिए) या भूतकालिक कृदंत (आया के लिए) अवश्य थे, परंतु ये भ्रामक थे। इसलिए नए सिरे से सभी के नाम इस प्रकार रखे—क्रियामूल या धातु (आ के लिए), ताकृदंत (आता के लिए), आकृदंत (आया के लिए), नाकृदंत (आना के लिए), एकृदंत (आए के लिए), एगाकृदंत (आएगा के लिए), इएकृदंत (आइए के लिए) और इएगाकृदंत (आइएगा के लिए)। सुविधा के लिए कृदंतों के नाम उनमें लगनेवाले प्रत्ययों से जोड़े गए हैं। ये सभी रूप क्रियापद के रूप में स्वतंत्र रूप से अर्थात् वाक्य के एकल या एकपदीय इकाई के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इनके अतिरिक्त चार ऐसी क्रियाएँ हैं, जिन्हें मूल क्रिया (अथवा कुछ अवसरों पर सहायक क्रिया) कहते हैं, जो स्वतंत्र रूप से भी प्रयुक्त होती हैं तथा चार कृदंत क्रियारूपों के साथ भी प्रयुक्त होती हैं। ये चार कृदंत क्रियारूप हैं—ताकृदंत, आकृदंत, नाकृदंत और इएकृदंत। मात्र ‘चाह’ एक क्रियामूल (धातु) से बना इएकृदंत ‘चाहिए’ इस वर्ग में आता है। ‘चाहिए’ के अतिरिक्त अन्य इएकृदंतों के साथ सहायक क्रियाओं का प्रयोग नहीं होता। आना, पढ़ना, और चाहना क्रियाओं के क्रियारूपों तथा मूल क्रियाओं के रूप में एकपदीय और द्विपदीय क्रियापदों का विवरण दिया जा रहा है। इन्हें आधारभूत क्रियापदों की संज्ञा दी गई है।

क्रियामूल (धातु)          आ        पढ़          चाह

ताकृदंत                  आता      पढ़ता        चाहता

आकृदंत                 आया      पढ़ा          चाहा

नाकृदंत                  आना      पढ़ना        चाहना

एकृदंत                   आए       पढे़          चाहे

एगाकृदंत                 आएगा     पढे़गा        चाहेगा

इएकृदंत                  आइए     पढि़ए        चाहिए

इएगाकृदंत                आइएगा   पढि़एगा      चाहिएगा

मूलक्रिया—है                 

मूलक्रिया—था

मूलक्रिया—हो

मूलक्रिया—होगा

ताकृदंत + है     आता है      पढ़ता है      चाहता है

ताकृदंत + था    आता था     पढ़ता था      चाहता था

ताकृदंत + हो    आता हो     पढ़ता हो      चाहता हो

ताकृदंत + होगा  आता होगा   पढ़ता होगा    चाहता होगा

आकृदंत + है    आया है      पढ़ा है        चाहा है

आकृदंत + था   आया था     पढ़ा था       चाहा था

आकृदंत + हो   आया हो     पढ़ा हो       चाहा हो

आकृदंत + होगा आया होगा   पढ़ा होगा     चाहा होगा

नाकृदंत + है     आना है      पढ़ना है      चाहना है

नाकृदंत + था    आना था     पढ़ना था      चाहना था

नाकृदंत + हो    आना हो     पढ़ना हो      चाहना हो

नाकृदंत + होगा  आना होगा   पढ़ना होगा    चाहना होगा

इएकृदंत + है                               चाहिए है

इएकृदंत + था                              चाहिए था

इएकृदंत + हो                               चाहिए हो

इएकृदंत + होगा                             चाहिए होगा

‘हिंदी क्रियाओं की रूप-रचना’ के प्रथम प्रकरण में उक्त आधारभूत क्रियापदों का रचना-संबंधी पूर्ण विवरण दिया गया है। पाठकों के लिए ध्यान रखने की बात बस इतनी सी है कि उन्हें आठ क्रियामूली कृदंतों की पहचान ठीक से करनी है और उनके नाम स्मरण रखने हैं। पूरा विधान या ढाँचा इन आठ क्रियारूपों और चारों मूल क्रियाओं की नींव पर आप सरलता से खड़ा कर लेने में अल्प समय में ही समर्थ होंगे।

दूसरे प्रकरण में आधारभूत क्रियापदों को विकारी आधारभूत और अविकारी आधाभूत दो वर्गों में बाँटा गया है। अट्ठाइस में से चौबीस क्रियापद विकारी हैं और चार अविकारी हैं। अविकारी आधारभूत क्रियापदों में विकार नहीं होता। अविकारी क्रियापद हैं—क्रियामूल (धातु), एकपदीय नाकृदंत, इएकृदंत और इएगाकृदंत। शेष विकारी हैं। द्विपदीय नाकृदंत भी विकारी है। विकारी क्रियापदों की चार कोटियाँ लिंग-वचन के आधार पर बनाई गई हैं। ये कोटियाँ हैं—पुंलिंग-एकवचन कोटि, स्त्रीलिंग-एकवचन कोटि, पुंलिंग-बहुवचन कोटि, स्त्रीलिंग-बहुवचन कोटि। इस संबंध में नियमों का उल्लेख हुआ है। विकारी क्रियापदों को पुनः दो वर्गों में बाँटा गया है। उनमें से एक कर्ता-अनुगामी क्रियापदों का है, जो सदा कर्ता के लिंग-वचन के अनुरूप अपनी कोटि निर्धारित करेगा। इस वर्ग के क्रियापदों का कर्ता सदा परसर्ग से रहित रहता है। और दूसरा वर्ग है उन क्रियापदों का, जिनका कर्ता सदा परसर्ग से युक्त होता है तथा जो या तो परसर्ग रहित कर्म के लिंग-वचन के अनुरूप कोटि अपनाएगा अन्यथा पुंलिंग-एकवचन कोटि का वरण करेगा। किन क्रियारूपों का कर्ता ‘ने’ परसर्ग ग्रहण करता है, और किनका ‘को’ परसर्ग ग्रहण करता है, इस बात का स्पष्ट उल्लेख है। अविकारी आधारभूत क्रियापद कर्ता-अनुगामी है।

तीसरे प्रकरण में संयुक्त क्रियाओं की रूप-रचना पर विचार हुआ है। मुख्य क्रिया यहाँ किसी एक अर्थात् निश्चित रूप में रहती है और संयोज्य क्रिया सभी आधाररूप क्रियापदों का रूप ग्रहण करेगी। किस-किस संयोज्य क्रिया के साथ मुख्य क्रिया किस रूप में अथवा किस-किस रूप में रहेगी, विस्तार से वर्णन है। संयुक्त क्रिया कर्ता-अनुगामी है या कर्मादि-अनुगामी, इस पर प्रकाश डाला गया है।

चौथा प्रकरण बृहत् संयुक्त क्रियापदों की रूप-रचना का है, जिनमें दो या दो से अधिक संयोज्य क्रियाओं का योग रहता है। समझने की बात इतनी सी है कि हर संयोज्य क्रिया मुख्य क्रिया के रूप में पूर्व निर्धारित विशिष्ट क्रियारूप (तीसरे प्रकरण में उल्लिखित) ग्रहण करेगी और अंतिम संयोज्य क्रिया आधारभूत क्रियापदों के रूप में होगी।

अंतिम पाँचवें प्रकरण में कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य के क्रियापदों की रूप-रचना के आधार पर स्पष्ट और सरल पहचान बताई गई है। कर्मवाच्य तथा भाववाच्य क्रियापदों की सरल पहचान की दो शर्तें हैं। पहली यह कि ‘जाना’ या ‘बनना’ में से कोई संयोज्य क्रिया अवश्य होनी चाहिए और दूसरी यह कि ‘जाना’ संयोज्य क्रिया के साथ मुख्य क्रिया आकृदंत होगी और ‘बनना’ संयोज्य क्रिया के साथ मुख्य क्रिया रूप में ताकृदंत या आकृदंत होगी। वाच्य से संबद्ध अन्य अनेक तथ्यों का भी विस्तार से वर्णन मिलेगा।

इस प्रकार हिंदी क्रियाओं के कितने रूप-रूपांतर दृष्टिगोचर होते हैं, उन्हें थोड़े से प्रयास से और अल्प समय में जाना जा सकता है। अब तक जिन हिंदी क्रियाओं के अगणित रूपों का आर-पार नहीं सूझता था, वे अब मुट्ठी में हैं। यह भी कहा जा सकता है कि देखने-सुनने में विकराल और भयावह लगनेवाला क्रियाओं का फैलाव आँवले की तरह हथेली पर सामान्य आकार-प्रकार का दिखने लगता है।

कुछ वर्षों से मुझे ऐसा प्रतीत होता था कि क्रियापद के सहारे वाक्य का (अनुमानित) ढाँचा खड़ा किया जा सकता है। हिंदी क्रियाओं की रूप-रचना का लेखन-कार्य पूर्ण होते-होते मेरा यह दृढ विश्वास हुआ है कि कर्ता और कर्म की सही तथा निर्णायक पहचान का एकमात्र साधन ‘क्रिया’ का रूप ही है।’ ‘क्रिया’ के रूप से ही अब यह भी जान सकते हैं कि वाक्य का कर्ता परसर्ग से युक्त है या परसर्ग से रहित। और यदि वह परसर्ग से युक्त है तो किस परसर्ग से। आप क्रिया के रूप से यह भी जान सकते हैं कि वह कर्ता-अनुगामी है या कर्मादि-अनुगामी। इसी प्रकार यह भी जान सकते हैं कि क्रिया कर्तृवाच्य से संबद्ध है, कर्मवाच्य से संबद्ध है या भाववाच्य से।

उक्त तथ्यों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचने का मार्ग प्रशस्त हुआ कि हिंदी क्रिया-प्रधान भाषा है, अंग्रेजी या संस्कृत की तरह कर्ता-प्रधान भाषा नहीं। स्वाभाविक है कि पद्धतियों की विभिन्नता के कारण रचनागत विभेद भी गहन होंगे। प्रश्न उठता है कि हमने संस्कृत और अंग्रेजी की कर्ता, कर्म आदि की परिभाषाएँ अपनाने की भूल तो नहीं की? इसे सुखद संयोग ही कहिए कि दस-बारह वर्ष पूर्व प्रकाशित ‘नवशती हिंदी व्याकरण’ में कर्ता, कर्म, कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य आदि की जो नई परिभाषाएँ सुझाई गई थीं, वे क्रिया-आधारित निकलीं और आज उनकी सहायता से क्रियाओं का प्रस्तुत ढाँचा तैयार करने में विशेष सहायता मिली है।

अंत में अपने आदरणीय पाठकों से निवेदन है कि प्रस्तुत विवेचन-विश्लेषण है तो नियमबद्ध, परंतु है कर्ता, कर्म आदि की नवीन पारिभाषाओं पर आधारित, जो पुरानी परिभाषाओं, धारणाओं तथा मान्यताओं से यथेष्ट भिन्न है। इसे नवीन परिभाषाओं से ही जाँचें-परखें, पुरानी परिभाषाओं के आधार पर नहीं। मेरा ऐसा विश्वास है कि पाठकों को अपने अधिकतर प्रश्नों का उत्तर उसमें उल्लिखित नियमों से मिल जाना चाहिए।

शब्दलोक, ४७, लाजपत नगर, माल्दिया

वाराणसी-२२१००२ (उ.प्र.)

दूरभाष : ०७२७५०५६६७१

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