अथश्री जूनागढ़-डाकोर तीर्थयात्रा कथा

अथश्री जूनागढ़-डाकोर तीर्थयात्रा कथा

'तरति पापादिकं यस्मात्' यानी जिसके द्वारा मनुष्य पापादि से तर (मुक्त) जाए, उसे 'तीर्थ' कहते हैं। अथर्ववेद में तीर्थों का माहात्म्य बताते हुए कहा गया है कि बडे़-बडे़ यज्ञों का अनुष्ठान करनेवाले पुण्यात्माओं को जो स्थान प्राप्त होता है, शुद्ध मन से तीर्थयात्रा करनेवाले को भी वही स्थान प्राप्त होता है—‘तीर्थैस्तरन्ति प्रवति महीरिति यज्ञकृतः सुकृतो येन यन्ति।’ महाभारत के वनपर्व में वेद व्यासजी ने तीर्थयात्रा का महत्त्व बताते हुए कहा है कि तीर्थयात्रा पुण्यकार्य है, यह सब यज्ञों से बढ़कर है—‘तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते।’ वामन पुराण में वर्णन आया है कि तीर्थों का स्मरण पुण्य देनेवाला, तीर्थदर्शन पापों का नाश करनेवाला और तीर्थस्नान मुक्तिकारक है—‘तीर्थानां स्मरणं पुण्यं दर्शनं पापनाशनम्। स्नानं मुक्तिकरं प्रोक्तमपि दुष्कृतकर्मण॥’ स्कंद पुराण के काशीखंड में उल्लेख आया है कि मन के अंदर यदि दोष भरा है तो वह तीर्थस्नान से शुद्ध नहीं होता। मन यानी चित्त का निर्मल होना जरूरी है। अंतःकरण का भाव शुद्ध न हो तो दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थयात्रा और स्वाध्याय, ये सभी बेकार हो जाते हैं—‘दानमिज्या तपः शौचं तीर्थसेवा श्रुतं तथा। सर्वाण्येतान्य तीर्थानि यदि भावो न निर्मलः॥’ तीर्थ-सेवन भी प्रभुभक्ति का एक मार्ग बताया गया है।

हमारे मित्र आनंद शर्मा नववर्ष में अकसर तीर्थयात्रा पर जाया करते हैं, अकेले नहीं, दल-बल के साथ! सो नववर्ष २०१७ की पाँचवीं तिथि को गुजरात के तीर्थों के भ्रमण का कार्यक्रम बना। इस बार के यात्री-दल में मित्र आनंद शर्माजी के समधी बनवारीलाल शर्माजी, चाचा रवि शर्मा, इनके गाँव रनहेरा के डॉक्टर वेद प्रकाश शर्मा, लाला जयप्रकाश गर्ग तथा मुंबई से आकर जामनगर स्टेशन पर मिले भाई निरंजनलाल शर्मा उपाख्य ‘लाला’ एवं दिल्ली पुलिस से सेवानिवृत्त चौ. वीरेंद्र सिंहजी। हर बार कुछ नए तीर्थयात्री जुड़ते हैं तो सब तीर्थों पर पुनः-पुनः जाना होता है। पाठक बंधु ‘साहित्य अमृत’ के मार्च-२०१५ अंक में ‘मोक्षपुरी द्वारका में दो दिन’ तथा मई-२०१६ अंक में ‘सौराष्ट्र की तीर्थ-परिक्रमा’ यात्रा-संस्मरणों में यहाँ का विस्तृत वर्णन पढ़ चुके हैं, अतः पिष्टपेषण से बचते हुए एक रात्रि द्वारका तथा एक रात्रि सोमनाथ में ठहरकर हम लोग नौ जनवरी को स्नानादि कर प्रातः साढ़े छह बजे बस द्वारा सोमनाथ से चलकर लगभग साढ़े आठ बजे जूनागढ़ पहुँच गए।

संयोग ऐसा बना कि आनंदजी के मित्र बाबा अगस्त्य गिरीजी भी अचानक तीर्थदर्शन की इच्छा से कल ही जूनागढ़ पहुँचे हैं। बाबाजी का दिल्ली के मोतीबाग में अपना आश्रम है। वे गिरनार की तलहटी में स्थित जूना अखाड़ा आश्रम मेें ठहरे हुए हैं। यहाँ आम लोगों को रहने की इजाजत नहीं है, केवल बाबा लोग ही ठहरते हैं। बसअड्डा से ऑटो पकड़ हम लोग जूना अखाड़ा आ गए और बाबाजी से मिले, उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। उनके आग्रह पर अखाडे़ की ‘अन्नपूर्णा रसोई’ में चाय-नाश्ता किया। फिर जूनागढ़ दर्शन का कार्यक्रम बनाने लगे कि उसी समय एक ऑटोवाला वहाँ आ पहुँचा, वह जूना अखाड़ा के महंतजी का परिचित है। ऑटो ड्राइवर की उम्र है लगभग साठ वर्ष और उनका नाम है श्रीमान गोस्वामी। बातचीत से पता चला कि वे यहीं के बाशिंदे हैं, उन्हें जूनागढ़ के चप्पे-चप्पे और यहाँ के इतिहास की अच्छी जानकारी है। ड्राइवर के साथ-साथ वे एक अच्छे गाइड भी हैं। पहले तो उन्होंने हमें गिरनार तलहटी में ही श्री सनातन हिंदु धर्मशाला में दो-दो सौ रुपए में दो शानदार कमरे दिलवाए। सो कमरों में अपना सामान रखकर जूनागढ़ दर्शन के लिए निकल पडे़। बाबा अगस्त्य गिरीजी हमारे साथ हैं।

चलते-चलते ही आपको बता दूँ कि पौराणिक काल से ही जूनागढ़ एक तपोभूमि और अध्यात्म का केंद्र रहा है। नगर के पश्चिम में रेलवे स्टेशन तथा पूरब में गिरनार पर्वत है, इसे ‘गिरि नगर’ भी कहा जाता है। आज भी गिरनार तलहटी में सैकड़ों मंदिर हैं। वृंदावन की तरह यहाँ आठों पहर चहल-पहल बनी रहती है। गिरनार अत्यंत पवित्र पर्वत है। इसका नाम ‘रैवत गिरि’ तथा ‘उज्जयंत’ भी है। श्रीकृष्ण के बडे़ भ्राता बलदाऊ का यहाँ ससुराल है, रैवतक की पुत्री रेवती से उनका विवाह हुआ। बलराम ने यहीं पर द्विविद राक्षस का वध किया था। लंबे समय तक यह यादवों की क्रीड़ा-भूमि रहा। भगवान् दत्तात्रेय यहाँ गुप्त रूप से आज भी विराज रहे हैं। संसार-प्रसिद्ध नरसी को यहीं पर भगवान् का साक्षात्कार हुआ। कालयवन के खात्मे के साथ लीलाधारी श्रीकृष्ण को एक नाम ‘रणछोड़राय’ यहीं पर मिला। जैनियों के लिए भी यह अत्यंत पवित्र स्थान है। बब्बर शेरों के लिए जगन्प्रसिद्ध ‘गिरि फॉरेस्ट’ यहीं पर है। यहाँ के बारे में कहा जाता है—

सोरठ देश सुहावनो सुंदर गढ़ गिरनार।

वीर, शेर, पर्वत, गुफा योगी तपे निहार॥

हमारा ऑटो वापस जूना अखाड़ा के पास भगवान् भवनाथ महादेव मंदिर पर रुका। भूतेश्वर भोलेशंकर यहाँ स्वयं भवनाथ महादेव के रूप में विराजमान हैं। यह बड़ा ही प्रसिद्ध और भव्य मंदिर है। हम सभी ने पुष्प अर्पित कर भगवान् भवनाथ को दंडवत् प्रणाम किया। साथ में दाईं ओर मृगी कुंड है, जिसका निर्माण राजा भोज ने कराया था। यहाँ माघ की नौवीं से बड़ा मेला शुरू होकर शिवरात्रि तक चलता है। गिरनार की गुफा-कंदराओं में तपस्या-साधना कर रहे सैकड़ों नागा संन्यासी इस दिन यहाँ पूजा-अर्चना करने आते हैं और रात्रि में मृगी कुंड में स्नान कर लौट जाते हैं। इसके ठीक सामने वस्त्रपथेश्वर महादेव का मंदिर है। यह उपेक्षित हालत में है। सड़क के उस ओर अनसूया मंदिर है, यहीं पर माता अनसूया ने त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश को बालक रूप देकर उन्हें नग्नावस्था में भोजन कराया था। यहाँ से चलकर हम दामोदर कुंड पर आ गए। सीढि़यों से नीचे उतरकर पवित्र जल से आचमन किया, फिर चौरासी खंभों वाले प्राचीन राधा-दामोदर मंदिर में दर्शन किए। यह मंदिर भगवान् श्रीकृष्ण के वंशज वज्रनाभ ने बनवाया था। यहीं पर भगवान् कृष्ण ने अंतिम बार दर्शन देकर नरसी को माला पहनाई थी। इसके ठीक सामने रेवती कुंड है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ इसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करती हैं। यहीं पर महाप्रभुन की बैठक है। थोड़ा आगे इसी के सामने मुचकुंदेश्वर महादेव मंदिर तथा मुचकुंद गुफा है। यहीं पर श्रीकृष्ण ने गुफा में सो रहे राजा मुचकुंद से कालयवन को भस्म कराया था। यहाँ मंदिर में गणेश, देवी, पंचमुखी हनुमान, एक ओर नीलकुंठ महादेव और गुफा में कालीजी की मूर्तियाँ हैं। सब लोग गुफा में अंदर घुसे और वापसी में यहाँ के धूना की भभूत का प्रसाद लिया।

यहाँ भली प्रकार दर्शन कर हम आगे बढ़े तो थोड़ी ऊँचाई वाले साफ-सुथरे मार्ग पर हमारा ऑटो ठहर गया। गोस्वामीजी ने बताया कि यहाँ पर माता वाघेश्वरी का पाँच सौ साल पुराना मंदिर है। हम लोग सीढि़याँ चढ़कर ऊपर गए, माता वाघेश्वरी को दंडवत् प्रणाम किया। इसके साथ ही बाईं ओर गायत्री देवी का भव्य मंदिर है, यहाँ नवरात्रों में मेला लगता है। ये दोनों स्थान बिल्कुल पहाड़ के ढलान पर हैं। यहाँ से सीधे चलकर जूनागढ़ का प्रसिद्ध स्वामीनारायण मंदिर देखने आ पहुँचे हैं। बड़ा ही भव्य मंदिर है, राधा-कृष्ण की ऐसी नयनाभिराम झाँकी है कि अपलक देखता रह जाता हूँ, नजर हटती नहीं है, व्यक्ति अपनी सुधबुध भूल जाता है। इसके बाईं ओर इनका संस्कृत विद्यालय तथा सभामंडप है। यहाँ यात्रियों के ठहरने के लिए इनके पास सैकड़ों कमरे हैं। लगभग बारह बज रहे हैं, सो स्वामीनारायण मंदिर की रसोई में भोजन किया। भोजन में आलू-टमाटर की सब्जी, झोल, मीठा दलिया, खिचड़ी, पापड़ और लस्सी है। भोजन बड़ा ही स्वादु, सात्त्विक एवं पाचक है। अब धूप तेज हो गई है, गरमी लगने लगी है, सो जाकेट, स्वेटर आदि उतार दिए।

अब हम जूनागढ़ का किला देखने आए हैं। हमें यहाँ उतारकर ड्राइवर साहब भोजन करने चले गए। यह किला मथुरा के राजा उग्रसेन ने बनवाया था। जब श्रीकृष्ण द्वारका के राजा थे, तब यह यादवों का क्रीड़ा-स्थल रहा। सब लोग आगे निकल गए, मैं थोड़ा पीछे रह गया, किले के प्रवेश द्वार की बाईं दीवार पर मैं यह देखकर ठिठक गया कि वहाँ नन्हे-मुन्ने बच्चों की बहुत सारी फोटो लगी हैं। नीचे ध्यान दिया तो अगरबत्ती भी जल रही है, लेकिन स्थान बहुत गंदा सा है। यहाँ आसपास कोई नहीं है। किले के अंदर से आ रहे एक व्यक्ति से मैंने इस बारे में पूछा तो उसने बताया कि यहाँ पुत्र-प्राप्ति के लिए मन्नत माँगी जाती है, जिनकी मन्नत पूरी हो जाती है, तो वे माताएँ अपने बच्चे की एक फोटो भेंटस्वरूप यहाँ लगा जाती हैं। किले के अंदर देखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। एक कोने पर छोटी-बड़ी दो तोपें, बीच में पानी के संचय के लिए ३१० फीट गहरी बाव तथा १७१ फीट गहरा कुआँ है तथा ऊपर की ओर मंडपनुमा महल है। बाकी उजाड़ पूरे किले में झाड़-झंखाड़ खडे़ हैं। गरमी से थके हम सब ने यहाँ ठंडे तरबूज का आनंद लिया।

यहाँ से निकलकर अब हमारा ऑटो जगमल चौराहे के पास नरसी चौरा आ पहुँचा है। भक्त नरसी अपने परिवार के साथ यहीं रहा करते थे। अब यहाँ भगवान् दामोदर तथा नरसी की मूर्तियाँ विराजमान हैं। इसी के ठीक सामने नरसी अपने कीर्तनियों के साथ हरि-कीर्तन करते हुए सबकुछ भूल जाते थे। यह बड़ा ही पावन तीर्थ है कि यहाँ विभिन्न रूपों में आकर भगवान् कृष्ण बावन बार नरसी के सहाई बने, उनके बिगडे़ काम बनाए। यहाँ के पुजारीजी ने यहाँ के माहात्म्य की विस्तृत कथा सुनाई और भगवान् का भोग लगा प्रसाद दिया। उनकी पीड़ा है कि भक्त लोग यहाँ न के बराबर ही आते हैं। इस मंदिर के ऊपर के हॉल में नरसी के जीवन की चित्र-प्रदर्शनी देखी, फिर भक्त और भगवान् को दंडवत् प्रणाम कर हम इंद्रेश्वर महादेव मंदिर देखने के लिए निकल पडे़। यह नगर से लगभग बारह किमी. दूर जंगल में है। जब तक हमारा ऑटो वहाँ पहुँचे, तब तक मैं आपको इस प्राचीन मंदिर के माहात्म्य के बारे में बताए देता हूँ।

कहा जाता है कि सत्युग में जब देवताओं के राजा इंद्र ने गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या के साथ छल से व्यभिचार किया तो ऋषि ने उसे शाप दिया। उस शाप से मुक्ति के लिए इंद्र ने घोर तपस्या कर भगवान् भोलेनाथ को प्रसन्न किया। भोलेनाथ ने उसे शाप से मुक्ति दिलाई। तब इंद्र ने इस स्थान पर शिवमंदिर (शिवालय) बनवाया, इसे ही ‘इंद्रेश्वर महादेव मंदिर’ कहा जाता है। इस प्रकार से यह पूरा क्षेत्र तप और साधना का क्षेत्र है। कालांतर की विस्मृति के बाद यह फिर प्रसिद्ध हुआ। कुछ सौ वर्ष पहले यानी संवत् १४७० में भक्त शिरोमणि नरसी का जन्म जूनागढ़ में मेहता ब्राह्मण परिवार में हुआ। कुछ लोग उनका जन्म जूनागढ़ के पास ही स्थित ‘तलाजा’ गाँव में मानते हैं। बाल्यावस्था में उनके माता-पिता का देहांत हो गया तो वे बडे़ भाई बणसीधर के आश्रित हो गए। विवाह भी हो गया। पत्नी माणिकबाई दिनभर घर के सारे काम करतीं और नरसी गाय चराने से लेकर पशुधन की देखभाल का जिम्मा सँभालते। थोड़ा समय निकालकर भोलेशंकर की पूजा, साधु-संतों की सेवा तथा सत्संग भी कर लिया करते। उनकी भाभी दुरतिगौरी बड़ी कर्कशा थी, भक्तिभाव वाले नरसी उसे फूटी आँख नहीं सुहाते थे। उनका सत्संग में जाना भाभी की आँखों में खटकता। पूरे दिन कमरतोड़ काम करते के बावजूद उन्हें जली-कटी सुनाने तथा प्रताडि़त करने का कोई न कोई कारण वह ढूँढ़ निकालती।

एक बार उनके भाई किसी काम से बाहर गए थे। भाभी ने खूब खरी-खोटी सुनाकर नरसी को घर से निकाल दिया। पत्नी माणिकबाई बेचारी घर में विलाप करती रह गई। नरसी ‘क्या करूँ, क्या न करूँ’ की स्थिति में दुःखी मन से जंगल में कोसों दूर निकल गए। भूख-प्यास से बेहाल जब पैर डगमगाने लगे, आँखों के आगे अँधेरा छा गया तो एक वटवृक्ष की छाया में बैठ आँख मूँद विचार करने लगे—‘वर्षों से मैं शिवजी की पूजा करता हूँ। सावन भर उन्हें पुष्प, बेलपत्र आदि चढ़ाता हूँ, क्या भोलेनाथ मेरी कोई मदद नहीं करेंगे?’ यही सोचते हुए नरसी की दृष्टि पास ही स्थित एक जीर्ण-शीर्ण शिवाले पर पड़ी। वहाँ एक सरोवर भी था। कपडे़ उतार सरोवर में स्नान किया और बेलपत्र, पुष्प आदि से शंकर की पूजा की, फिर शिवलिंग पर माथा टेककर फूट-फूटकर रोने लगे—‘‘हे भोलेनाथ! आप प्रसन्न होइए, नहीं तो मैं अन्न-जल का त्याग करते हुए यहीं पर अपने प्राण त्याग दूँगा।’’ इसी बेसुध अवस्था में नरसी सात दिन सात रात पडे़ रहे। सातवीं रात्रि में भोलेनाथ साक्षात् प्रकट हुए और नरसी के सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ रखते हुए बोले, ‘‘वत्स! मैं तुम्हारी तपश्चर्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम अपनी इच्छा से कोई वरदान माँग लो।’’ नरसी भावविभोर होते हुए बोले, ‘‘प्रभु! मैं क्या माँगूँ, आपको जो सबसे प्रिय हो, वही मुझे दे दो।’’

भोलेनाथ मुसकराए, ‘‘वत्स, इस चराचर जगत् में श्रीकृष्ण से अधिक प्रिय वस्तु मेरी नजर में दूसरी कोई नहीं है। आओ, मैं तुम्हें उनके दर्शन करा दूँ।’’ भोलेनाथ ने भक्तराज नरसी को दिव्य देह प्रदान की और फिर उन्हें लेकर दिव्य द्वारका के लिए प्रस्थान किया। पूनम की रात्रि में सोलह सहस्र गोपिकाओं के साथ महारास में भक्त नरसी को मशाल उठाने की सेवा मिली और वे उसे लेकर रासमंडल के बीचोबीच खडे़ हो गए। नरसी प्रभुभक्ति में इतने लीन हो गए कि झूमते हुए कब आग कपडे़ में लगी और हाथ ही मशाल की तरह जलने लगा, उन्हें पता ही नहीं चला। रास की समाप्ति पर भगवान् कृष्ण की दृष्टि उनके जलते हाथ पर पड़ी, उन्होंने आगे बढ़ आग बुझाई। काफी समय तक नरसी दिव्य द्वारका में रहे। फिर एक दिन भगवान् कृष्ण ने उन्हें जूनागढ़ में जाकर अनन्य भाव से भक्ति करते रहने के लिए राजी कर लिया और अपनी प्रतिमा तथा करताल दे पीतांबर और मयूरपुच्छ का मुकुट पहना दिया, फिर योगेश्वर बोले, ‘‘अपने भक्त मुझे सबसे प्रिय हैं। भक्त, जब भी तुम पुकारोगे, मैं फौरन चला आऊँगा।’’ और भगवान् ने अपना वचन निभाया। आज से कुछ सौ वर्ष पूर्व नरसी पर आए संकटों में एक-दो बार नहीं, बावन बार आकर भगवान् श्रीकृष्ण ने मदद की। जीवनपर्यंत नरसी भगवान् दामोदर (श्रीकृष्ण) के भजन-कीर्तन में मस्त रहे। अब तक केवल तीन ही भक्त ऐसे हुए हैं, जो सदेह बैकुंठ धाम गए हैं, वे हैं—कबीर, तुकाराम और नरसी मेहता।

हमारा ऑटो भी मंदिर की सीमा में आ पहुँचा है। आज भी यहाँ जंगल है। यह इंद्रेश्वर महादेव मंदिर पहाड़ी के ढलान पर स्थित है। मंदिर की कुछ सीढि़याँ चढ़कर बारी-बारी से सभी ने शिवलिंग पर दंडवत् प्रणाम किया। मंदिर के बाहर हाल ही में स्थापित धवल-दूधिया संगमरमर की भोलेनाथ की प्रतिमा हर तीर्थयात्री को अपने आकर्षण में बाँध लेती है। प्रतिमा अलौकिक और दिव्य आभा से देदीप्यमान है। इसके पीछे बाईं ओर इंद्र गुफा है, जहाँ बैठ इंद्र ने तपस्या की थी। इसी प्रांगण में दाहिनी ओर कुछ सीढि़याँ चढ़कर एक मंदिर एवं आश्रम है, जहाँ के महंत अगस्त्य गिरीजी के परिचित निकले, सो मीठी-मीठी चाय के साथ स्वामीजी का मधुर प्रवचन भी सुनने को मिला। दर्शन करने के बाद मंदिर के बाहर कुछ साथी धूम्रपान कर सुस्ता रहे थे कि बनवारीलालजी ने बताया कि ड्राइवर साहब के रिश्तेदारी में गमी हो गई, संकोचवश वे कह नहीं पा रहे हैं। तुरंत सब लोगों ने कहा कि ड्राइवर साहब, आप पहले ही बता देते, चलिए, हमें धर्मशाला पर छोड़ दीजिए। लगभग चार बजे हैं, उन्होंने हमें हमारे डेरे पर उतार दिया और हमने उनके द्वारा बताया किराया ग्यारह सौ रुपए देकर उन्हें सधन्यवाद विदा किया।

हमारे ज्यादातर साथी थक गए और घूमने के अनिच्छुक भी थे, सो विचार बना कि शाम को गिरनार पर्वत की चढ़ाई करेंगे। अगस्त्य गिरीजी भी एक-डेढ़ घंटा ठहरकर और सायं आठ बजे जूना अखाड़ा में भोजन पर मिलने को कहकर चले गए। लेकिन भाई लोगों का आराम इतना लंबा खिंचा कि शाम हो गई। कोई भी गिरनार की ओर नहीं गया। मैं और बनवारीलालजी बिना आराम किए इधर-उधर घूमते रहे। हम दोनों सायं को भवनाथ महादेव मंदिर की आरती में शामिल हुए। यहीं पास के एक मंदिर में अखंड कीर्तन चल रहा है। रात्रि को आठ बजे जूना अखाड़ा की अन्नपूर्णा रसोई में भोजन किया और टहलते हुए अपने डेरे पर लौट आए। जहाँ हम ठहरे हुए हैं, यहीं से गिरनार की चढ़ाई शुरू होती है, सो यहाँ खासी चहल-पहल रहती है। आसपास के मंदिरों में हो रहे भजन-कीर्तन और घंटोें की टनटनाहट का मधुर स्वर सुनाई पड़ रहा है। यहाँ का वातावरण बड़ा रमणीक और मन को सुकून देनेवाला है। गिरनार चढ़ाई के रास्ते पर लगाई गई लाइटें दूर से ऐसी प्रतीत हो रही हैं, जैसे गिरनार बाबा के गले में मणियों की मालिका दिपदिपा रही हो!

रात्रि को सब लोग बैठे तो आनंदजी गिरनार के तीर्थों की कथा सुनाने लगे, अब कलियुग का असर कहिए या कुंभकर्ण की कृपा कि जल्दी ही अधिकतर साथी सो गए, मैं भी अपने कमरे में आकर कंबल तानकर सो गया। प्रातः में चौ. साहब, मैं और बनवारी लालजी तो जल्दी ही जाग गए और नहा-धोकर तैयार हो गए। अभी बाहर घुप्प अँधेरा है, कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है। हम तीनों लोग बाहर गए तो, पर चाय पीकर लौट आए। जब तक उजाला हो, तब तक आपको गिरनार के बारे में बताए देता हूँ। यह अत्यंत पवित्र और पूज्य पर्वत है। जिस प्रकार उत्तर भारत में वैष्णो की चढ़ाई और गोवर्धन की परिक्रमा होती है, उसी प्रकार यहाँ प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक गिरनार की परिक्रमा होती है। इसकी चढ़ाई में ९९९९ सीढि़याँ हैं। आबालवृद्धनारीनर सब श्रद्धा भाव से चढ़ाई करते हैं। दूर-देहात से झुंड-के-झुंड परिक्रमा करने आते हैं। जब हम तड़के जागे थे तो हमारे बराबर वाले कमरोें से कितने ही तीर्थयात्री पिट्ठू बैग लादे तथा हाथ में छड़ी लिये चढ़ाई के लिए निकल रहे थे।

चढ़ाई के शुरू में ही हनुमानजी का मंदिर तथा दूसरी ओर रामदरबार है। ऊपर तक अलग-अलग पड़ावों पर पवित्र स्थान तथा मंदिर हैं। ढाई हजार सीढि़याँ चढ़ने पर भर्तृहरि गुफा है, जिसमें भर्तृहरि तथा गोपीचंद की मूर्तियाँ हैं। इस प्रकार उत्तरोत्तर बढ़ते हुए राजुलजी की गुफा, सातपुड़ा कुंड, जिसमें सात शिलाओं के नीचे से जल आता है। कुंड के पास गंगेश्वर और ब्रह्मेश्वर मंदिर हैं। आगे अंबिका शिखर है, यह गिरनार का प्रथम शिखर है, यहाँ देवी का विशाल मंदिर है, जो ५१ शक्तिपीठों में गिना जाता है। इसके आगे गोरक्ष शिखर है, जहाँ गुरु गोरखनाथ ने तपस्या की थी, यहाँ उनका धूना तथा चरण-चिह्न स्थापित हैं। आगे के दत्त शिखर में भगवान् दत्तात्रेय का तपःस्थान है, यहाँ उनकी चरण-पादुकाएँ हैं। साथ के नेमिनाथ शिखर में स्वामी नेमिनाथजी की काले पत्थर की मूर्ति है और दूसरी शिला पर उनके चरण-चिह्न अंकित हैं। इसके आगे है महाकाली शिखर, यहाँ गुफा में महाकाली की मूर्ति तथा उनका खप्पर विराजमान है। थोड़ा आगे ही पांडव गुफा है, कहा जाता है कि पांडव यहाँ आए थे। नीचे की ओर उतरकर सीतामढ़ी में रामकुंड और सीताकुंड नामक दो कुंड हैं। इसके बाद पोला आम, भरत वन, हनुमानधारा, जटाशंकर आदि तीर्थ हैं।

उजाला हो गया है, पौने सात बज रहे हैं। हमारे बाकी साथियों में कोई अभी लेटा है तो कोई कंबल में ही बैठा है। अतः हम तीनों ही गिरनार तलहटी में आ पहुँचे हैं। गिरनार की प्रथम सीढ़ी पर हमने मत्था टेका। आगे बढ़े तो दाएँ-बाएँ झुंड के झुंड हनुमान बंदर यानी लंगूर दिखाई पडे़। यात्री उनको कुछ न कुछ खिलाते हुए आगे जाते हैं। सीढि़यों वाले चढ़ाई मार्ग के दोनों ओर प्रसाद, फोटो, किताब, खट्टी-मीठी गोलियों, नीबूपानी तथा जरूरत की अन्य वस्तुओं की अस्थायी दुकानें सजी हैं। कितने ही यात्री आ-जा रहे हैं। प्रकृति का दीदार करते हुए हम लोग ४२५वीं सीढ़ी पर एक ओर बने छतरीनुमा विश्राम-स्थल में थोड़ा बिरमाए। इतनी सी चढ़ाई में ही शरीर में गरमी आ गई, जबकि अभी भी कड़क ठंड है। सूर्य-रश्मियाँ पर्वत की चोटियों पर फैल रही हैं। बनवारीलालजी ने यहाँ हमारे कई फोटो उतारे। थोड़ा सुस्ताकर आगे बढ़े। इस प्रकार हम ६२५वीं सीढ़ी पर, जहाँ से एकदम मोड़ है, गिरनार को प्रणाम कर हम लौट पडे़। अब ज्यादातर टैंटनुमा दुकानें खुल गईं या खुल रही हैं। ४००वीं सीढ़ी पर अभी-अभी एक टैंट का द्वार खुला, यहाँ जोड़ों के दर्द का तेल, मंजन, कब्जनाशक चूर्ण आदि बेचा जा रहा है। भगवा वेशधारी बाबाटाइप इसके मालिक बोल नहीं रहे हैं। उन्होंने वहाँ रखी बड़ी केतली से चाय लेकर पीने का इशारा किया। स्टील की छोटी-छोटी प्लेटों में हमने चाय ले ली। मैंने और चौधरी साहब ने तेल लेकर घुटनों पर मला। उन्होंने मंजन आदि खरीदा। यहाँ से नीचे उतरे तो २००वीं सीढ़ी पर से दर्दनाशक तेल खरीदा। क्योंकि जीतभाई ने हमें यहीं से तेल लेकर आने को कहा था। यहाँ से हम आठ-दस सीढ़ी ही उतरे थे कि आनंदजी और रवि चाचा आते दिखाई दिए। ये ऊपर को गए और हम नीचे की ओर। हम लोग नीचे आए तो देखा कि तीनों आलसी लोग पत्थर की कुरसियों पर बैठे गप्पें हाँक रहे हैं। इन लोगों ने ऊपर जाने की हिम्मत नहीं दिखाई और इन्हीं के चलते हम लोग गिरनार की चढ़ाई करने से रह गए, जबकि इस बार हम चढ़ाई का कार्यक्रम बनाकर आए और इस निमित्त जूनागढ़ में एक रात्रि रुके भी।

यहाँ से हम लोग सीधे जूना अखाड़ा चले आए, यहीं चाय-नाश्ता किया। अगस्त्य गिरीजी जानेवाले हैं और हमें भी डाकोर (गोधरा) के लिए ट्रेन पकड़नी है, सो बाबाजी के चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और यहीं से स्टेशन के लिए ऑटो कर धर्मशाला पर ले आए। लगभग पौने दस बज रहे हैं। यहाँ का हिसाब-किताब कर ऑटो में बैठ स्टेशन आ गए हैं। जूनागढ़ रेलवे स्टेशन के सामने गीता लॉज में खाना खाने गए। गीता लॉज जैसा भोजन पूरी यात्रा में कहीं नहीं मिलता है। मैंने अपने और आनंदजी के लिए दो थालियाँ पैक करवा लीं। आज का यह भोजन लाला भैया के सौजन्य से है। लगभग साढ़े ग्यारह बजे जबलपुर मेल आ पहुँची और हम सब इसमें सवार हो गए। दिनभर गाड़ी रुकती-दौड़ती रही। लगभग साढ़े आठ बजे वडोदरा स्टेशन पर पहुँच गए, गोधरा पहुँचने तक रात के ग्यारह बज जाएँगे। आनंदजी की एक मित्र वहाँ मिलने आईं, उन्होंने सुझाव दिया कि गोधरा जाने के बजाय वडोदरा से बस पकड़ें तो ग्यारह से पहले ही डाकोर पहुँचा देगी।

तुरत-फुरत सामान उतार लिया गया। अपना-अपना सामान उठा बस अड्डा आ गए। बस अड्डा क्या है, आलीशान मल्टीस्टोरी बिल्डिंग है। साफ-सफाई ऐसी कि मक्खी भी फिसले। सख्त जाँच-पड़ताल, बीड़ी-सिगरेट भी अंदर नहीं ले जा सकते, पीना तो दूर की बात! पूरा परिसर रोशनी में नहाया हुआ, यहाँ दिन और रात का भेद ही मिट गया है। वेटिंग-हॉल में यात्रियों के बैठने की शानदार व्यवस्था है। अलग-अलग दिशाओं में जानेवाली बसें अपने-अपने स्टैंड पर आकर रुकती हैं, यात्रियों को बिठा आनन-फानन में अपने गंतव्य की ओर निकल जाती हैं। इन्क्वारी पर पता किया तो डाकोर जानेवाली बस नौ बजे निकल चुकी है, अब अगली बस रात्रि को ढाई बजे जाएगी। हम सब लोग तो अपने-अपने कंबल निकाल लंबे हो गए, बस रवि चाचा और बनवारीलालजी समय बिताने के लिए ताश खेलते रहे। अंततः हमने प्रातः साढ़े चार बजेवाली बस पकड़ी। मैं और बनवारीलालजी बाईं ओर की सबसे आगेवाली सीट पर बैठे, बाकी साथी अपनी सुविधानुसार बैठ गए। बस में टी.वी. लगा है, उस पर गुजरात के धार्मिक स्थलों की जानकारी आ रही है। सपाट सड़क पर बस सरपट दौड़ी चली जा रही है। बाहर केवल लाइटें ही लाइटें दिखाई पड़ रही हैं। आकाश में चाँद हमारे बाईं ओर साथ-साथ दौड़ रहा है। कभी वह पीछे रह जाता है तो कभी ओझल और फिर कुछ ही पलों में मेरी खिड़की से झाँकने लगता है। इस तरह चंदामामा बराबर आँख-मिचौली करते रहे। बस अपने गंतव्य की ओर दौड़ रही है, जब तक यह डाकोर पहुँचे, मैं आपको पावन तीर्थ डाकोर के बारे में ही कुछ बताए देता हूँ।

डाकोर गुजरात के खेड़ा जिला में एक छोटा सा कस्बा है। यहाँ की आबादी ३०-४० हजार से ज्यादा नहीं है। इसमें भी ब्राह्मणों की आबादी अधिक है। पहले यह एक गाँव भर था। देशभर में इसकी प्रसिद्धि का एकमात्र कारण है—भगवान् रणछोड़राय का मंदिर। यह वैष्णवों का पावन तीर्थ है। मंदिर से स्टेशन मात्र एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर है। बसअड्डा से एक चौड़ा रास्ता मंदिर तक जाता है। देशभर से तीर्थयात्री डाकोरधाम के दर्शन करने आते हैं। भगवान् रणछोड़राय द्वारका से डाकोर कैसे आए, इसकी बड़ी ही दिलचस्प कथा है। आज से करीब साढ़े आठ सौ वर्ष पहले डाकोर गाँव में भगवद्प्रेमी एक गरीब क्षत्रिय वीरसिंह बोडाणा रहता था। उसकी पत्नी गंगाबाई भी बड़ी धर्मपरायण और पतिव्रता थी। एक बार बोडाणा एक संन्यासी के साथ तीर्थयात्रा पर भगवान् द्वारकाधीश के दर्शन करने द्वारका गया। इसके बाद तो वह हर साल-छह महीने में पैदल ही द्वारकाधीश के दर्शन करने जाया करता। इस तरह निरंतर साठ वर्षों तक वह प्रभु के दर्शन करने जाता रहा। अब उसकी उम्र भी अस्सी वर्ष की हो गई थी, आने-जाने में तकलीफ होने लगी। इस बार भक्त बोडाणा जब भगवान् के दर्शन करने द्वारका पहुँचा तो द्वारकाधीश के समक्ष दंडवत् हो प्रार्थना करने लगा, ‘‘हे नाथ! अब हमसे चला नहीं जाता है और आपके दर्शन के बिना रहा भी नहीं जाता, अतः प्रभु, हमें अपने सान्निध्य में ले लो या भगवन्, ऐसी व्यवस्था करो कि डाकोर में ही आपके दर्शन होते रहें।’’

भगवान् द्वारकाधीश अपने इस भक्त पर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने स्वप्न दिया, ‘भक्त बोडाणा, अगली बार तुम पैदल नहीं, एक बैलगाड़ी लेकर आना, मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।’ भक्त बोडाणा खुशी-खुशी डाकोर लौट आया। अगली बार जैसे-तैसे एक कामचलाऊ बैलगाड़ी की व्यवस्था कर ली और रुकते-चलते द्वारका पहुँच गया। लीलाधारी ने अपनी लीला रची। मध्य रात्रि में बोडाणा को स्वप्न दिया, ‘भक्त, सब पहरेदार सोए हुए हैं। बैलगाड़ी पिछले द्वार पर लगाओ, मंदिर से मेरी मूर्ति उठाकर गाड़ी में रख लो।’ भक्त बोडाणा ने ऐसा ही किया। द्वारका से कुछ दूर निकलने पर ही बोडाणा को झपकियाँ आने लगीं औैर नींद की तीव्रता में वह वहीं पर लुढ़क गया। अब भगवान् द्वारकाधीश स्वयं गाड़ी हाँकने लगे। संसार को चलानेवाले के लिए बैलगाड़ी चलाना कौन बड़ी बात थी? सवेरा होते न होते बैलगाड़ी डाकोर की सीमा पर ला खड़ी कर दी। यहीं प्रभु ने नीम की टहनी से दातौन की। भगवान् का स्पर्श पाकर वह नीम भी कड़वाहट त्यागकर मीठा हो गया। उस घटना के ८६० वर्ष बाद आज भी यह नीम खूब स्वस्थ और भला-चंगा है। संवत् १२१२ में कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान् द्वारकाधीश डाकोर पधारे। गाँववासियों ने उनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया और मूर्ति बोडाणा के घर में स्थापित कर दी।

उधर द्वारका में द्वारकाधीश की मूर्ति चोरी होने की खबर से हाहाकार मच गया। मंदिर के पुजारियों ने अनुमान लगाया कि हो न हो, डाकोर का बोडाणा ही मूर्ति चुराकर ले गया है। पूरे दल-बल के साथ पुजारी डाकोर पर आ चढ़े। भगवान् की पे्ररणा से मूर्ति को गोमती तालाब में छिपा दिया गया। बोडाणा ने कह दिया कि मूर्ति मेरे पास नहीं है। लगभग सात दिनों तक दोनों पक्षों के बीच जोर आजमाइश होती रही और उतने दिनों तक भगवान् को गोमती के जल में रहना पड़ा। अंततः लालची पंडा-पुजारी मूर्ति के बराबर सोना लेने पर राजी हो गए। बेचारे बोडाणा के पास सोना तो क्या, भरपेट खाने को भी नहीं था। पंचों के फैसले से बोडाणा की जान आफत में आ गई। द्वारकाधीश की प्रेरणा से तराजू के एक पलडे़ में मूर्ति तथा दूसरे पलडे़ में बोडाणा की पत्नी ने अपनी नाक की बाली तथा तुलसीदल रखा तो पलड़ा बराबर हो गया। भगवान् ने बोडाणा की लाज रख ली। लेकिन खूब सारे सोने की उम्मीद लगाए बैठे लालची पंडा अब तो जार-जार रोने लगे, ‘हे द्वारकाधीश! हमारे बाल-बच्चों का पालन-पोषण कैसे होगा? हम तो आप ही के आश्रित हैं। आपके वहाँ न रहने से भक्त लोग अब द्वारका आएँगे ही नहीं तो हमारी गुजर-बसर कैसे होगी?’

भगवान् द्वारकाधीश ने उन्हें प्रेरणा दी कि ‘पुजारियो! तुम सब द्वारका लौट जाओ। आज से छह मास के बाद वहाँ स्थित सावित्री बाव में से मेरी मूर्ति निकालकर मंदिर में स्थापित कर देना। द्वारका में मैं द्वारकाधीश के रूप में तथा डाकोर में रणछोड़राय के रूप में भक्तों का कल्याण करने के लिए निवास करूँगा।’ खाली हाथ ही पंडा-पुजारी द्वारका लौट गए। जैसे-तैसे कुछ महीने बीते। कोई आमदनी न होने और दान-दक्षिणा के रूप में हो रही धन की हानि को देखते हुए लालची पुजारियों ने छह माह से पूर्व ही मूर्ति को कुएँ से बाहर निकाल लिया। इस मूर्ति में अभी प्रभु की आँखें नहीं खुली थीं। आज भी द्वारका में विराजमान द्वारकाधीश विग्रह की आँखें बंद हैं। लाखों तीर्थयात्री वहाँ दर्शन करने जाते हैं और पंडा-पुजारियों की चार हजार की आबादी उन्हीं के आश्रित पल रही है।

लगभग पौने छह बज रहे हैं और हमारी बस भी डाकोर के बसअड्डे में आ लगी है। अभी भी अँधेरे की चादर तनी हुई है। अखबार के हॉकर इनको व्यवस्थित कर रहे हैं, जिन्हें लेकर पेपर-बॉय अपनी-अपनी दिशा में निकल जाएँगे। हम सब अपना-अपना सामान उठा पैदल ही मंदिर की दिशा में चलते हुए बोडाणा चौक पर आ गए हैं। यहीं पर स्थित ‘श्री वल्लभ निवास’ में आठ सौ रुपए में एक बड़ा सा कमरा ले लिया गया। झटपट सामान कमरे में रख मंगला आरती में भगवान् रणछोड़राय के दर्शनों के लिए दौड़ पडे़। मंदिर में भक्तों की अच्छी खासी भीड़ पहले से ही है। भगवान् की आरती उतारी जा रही है। भक्तजन, विशेषकर स्थानीय लोग गुजराती में गा-गाकर और हाथ की विभिन्न मुद्राएँ बनाते हुए प्रभु को रिझा रहे हैं। कोई हाथ जोडे़ खड़ा है तो कोई ताली बजाते हुए दर्शनों की आनंदानुभूति में मगन है। बड़ा ही अलौकिक दृश्य उपस्थित हो रहा है। स्वर्णाभा से देदीप्यमान प्रभु रणछोड़राय सब भक्तों के केंद्र में हैं। भीड़ में जगह बनाकर हाथ जोडे़ मैं प्रभु की दिव्य छवि को अपलक निहारता रह जाता हूँ। पहले से सोचा हुआ सबकुछ भूल जाता हूँ। न कुछ माँगते बनता है, न कुछ कहते बनता है। आनंदातिरेक में बस प्रभु को एकटक देखता खड़ा हूँ, पलकें झपकाना ही भूल गया हूँ। आरती संपन्न होने के बाद सब भक्तजन लौट पडे़।

मैं चौक में खड़ा चारों ओर निहारकर मुआयना कर रहा हूँ। मंदिर में प्रवेश के चार दरवाजे हैं। उत्तर दिशा का दरवाजा दर्शनार्थियों के प्रवेश के लिए है तथा दक्षिण का द्वार भगवान् के चरण-स्पर्श के बाद निकलने के लिए है। मंदिर लगभग १२० फीट ऊँचा है। मुख्य मंदिर ऊँचे चबूतरे पर टिका है। वहाँ तक पहुँचने के लिए चारों ओर से १२ राशियों को इंगित करनेवाली १२-१२ सीढि़याँ हैं और २८ नक्षत्रों को इंगित करनेवाले मंदिर के २८ शिखर हैं। मंदिर के ऊपर बडे़-बडे़ गुंबद हैं। हर गुंबद पर स्वर्ण के पाँच कलश रखे गए हैं। मुख्य गुंबद पर रेशमी श्वेत ध्वजा फहरा रही है। पूरा मंदिर पत्थर का बना है और मंदिर के चारों ओर एक गलियारा, जिसमें परिक्रमा की जाती है, को छोड़कर ऊँची मजबूत दीवार से मंदिर परिसर की किलेबंदी की गई है। पूरब दिशा में मंदिर की रसोई है, जिसमें भगवान् का भोग-प्रसाद तैयार किया जाता है। गर्भगृह का अग्रभाग स्वर्ण का तथा कपाट चाँदी के हैं। भगवान् रणछोड़राय की काले पत्थर की साढ़े तीन फुट ऊँची तथा डेढ़ फुट चौड़ी चतुर्भुजी मूर्ति पश्चिममुखी है। प्रातः से रात्रि तक प्रभु का आठ बार भोग लगाया जाता है। हर भोग की प्रसादी अलग-अलग होती है। कपडे़ और भगवान् का रूप-विन्यास हर बार बदला जाता है और हर भोग के बाद दर्शन खुलते हैं। भोग लगा प्रसाद मंदिर के काउंटर पर बिक्री के लिए रखा जाता है।

मुख्यद्वार के पास एक ५० फुट ऊँचा अष्टकोणीय दीपमाला स्तंभ है। इसके हर कोण में १०० दीपक, यानी कुल ८०० दीपक प्रज्वलित होते हैं। मुख्य द्वार यानी उत्तर के द्वार के ऊपर रखे ढोल-नगाडे़ मंगला तथा शयन आरती के समय बजाए जाते हैं। मंदिर की सब व्यवस्था तथा देखभाल ट्रस्ट द्वारा की जाती है। पहली बार मंदिर का निर्माण खंभात के सेठ नंददास ने कराया और बोडाणा से रणछोड़राय की मूर्ति लेकर लक्ष्मीजी के साथ वहाँ स्थापित कराई। लेकिन वर्तमान का यह जो भव्य मंदिर है, इसका निर्माण प्रभु की प्रेरणा से दक्षिण के एक जागीरदार गोपाल राव ने यहाँ जमीन खरीदकर करवाया। मंदिर के दक्षिण में प्रभु का शयनगृह है, जहाँ गोपाल एवं लक्ष्मीजी की मूर्तियाँ विराजमान हैं। यहाँ एक सबसे सुंदर व्यवस्था मैंने यह देखी कि दर्शनों के समय भक्तों की भीड़ चाहे कितनी भी हो, आपकी भेंट प्रभु के चरणों तक अवश्य पहुँचती है। बाँस की कुछ टोकरियाँ भगवान् के सामने के भाग में रखी रहती हैं, इनमें भक्तगण पुष्प, माला तथा अन्य भेंट सामग्री रख देते हैं। भगवान् की सेवा में लगे तीर्थपुरोहित इन्हें ले जाकर प्रभु को अर्पण के बाद टोकरियाँ वापस वहीं लाकर रख देते हैं, सब अपनी-अपनी भेंट-सामग्री प्रसाद-स्वरूप उठा लेते हैं। मंदिर के आगे के मंडप में बडे़-बडे़ टीवी स्क्रीन लगे हैं, जिनमें भगवान् के दर्शन अधिकाधिक लोगों को भली प्रकार हो जाते हैं। इतना ही नहीं, उत्तर वाले मुख्य द्वार के ऊपर बडे़-बडे़ शीशे लगे हैं, चौक में रहनेवाले भक्तों को मंदिर में होनेवाली सब गतिविधियों के साथ-साथ दर्शन भी भरपूर होते हैं। देश के अन्य मंदिरों से अलग यह एक शानदार व्यवस्था है।

मंदिर से लौटकर हममें से कुछ साथी तो सो गए, क्योंकि वे रातभर जागे थे। मैं और चौधरी साहब नहा-धोकर चाय पीने के बाद मंदिर की ओर निकल आए। बाहर ही पुष्प आदि का दोना ले लिया। मंदिर के पट अभी बंद ही हैं। थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि धोती-कुरताधारी एक ठग पुजारी एक ट्रे लेकर आया और बोला, ये सब इसमें रख दो, मैं अच्छे से पूजा-दर्शन करवाता हूँ। हमने मना किया तो दूसरा आकर बोला कि इसे कोई दान-दक्षिणा नहीं चाहिए, फ्री सेवा करेगा। हमने फिर भी मना किया, वह नहीं माना और उसने हमें मंदिर के बाईं ओर ले जाकर, जहाँ तराजू लटकी हुई है, वहाँ के पुजारी के हवाले कर दिया। उसने मान न मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर नाम-गोत्र पूछकर मंत्रोच्चार शुरू कर दिया, दो मिनट तक न जाने क्या-क्या बकता रहा। अपनी वाणी को विश्राम दे दक्षिणा के दो सौ इक्यावन रुपए माँगने लगा। मैं और चौधरी साहब मूक बन उसकी ओर ताकने लगे। वह कुछ बोले, इससे पहले ही चौधरी साहब ने उसकी अच्छी खबर ली, उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। बेशर्म पंडा मुँह बनाता हुआ अगले शिकार की तलाश में निकल गया।

यहाँ दुष्ट पंडों का यह गिरोह सक्रिय है, मंदिर ट्रस्ट को इस ओर ध्यान देना चाहिए, इससे यहाँ आनेवाले तीर्थयात्रियों का मन खराब होता है, देव के प्रति अनास्था बढ़ती है। खैर, साढ़े आठ बजे बाल-भोग के दर्शन खुले, भीड़ बहुत कम है, सो बहुत तसल्ली से दर्शन हुए। महिलाएँ एकदम आगे से दर्शन करती हैं, बड़ी सहजता से भगवान् की ड्योढ़ी पर मत्था टेक सकती हैं। पुरुष वहाँ नहीं जा सकते। दर्शन के बाद मंदिर की परिक्रमा कर हमने पंचामृत तथा प्रसाद खरीदकर खाया। टहलते हुए डेरे की ओर लौटे। अब बाजार में दुकानें खुल चुकी हैं। गृहस्थ और रसोई में काम आनेवाली वस्तुओं की दुकानें ज्यादा हैं। यहाँ रेहड़ी पर सब्जियों के साथ हमने देखा कि अरहर की हरी फलियाँ भी बिक रही हैं। पूछने पर पता चला कि इनकी सब्जी बनाई जाती है। डेरे पर पहुँचे तो साथी लोग नहाना-धोना कर रहे हैं। होते-करते लगभग साढ़े दस बजे सब लोग दर्शनों के लिए पुनः मंदिर पहुँचे। राजभोग के दर्शन साढ़े ग्यारह बजे खुलने वाले हैं। स्त्री-पुरुष दर्शनार्थियों की अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गई है। दर्शन खुलने पर दर्शन किए, साथ ही भगवान् का स्नान भी देखा। यहाँ से निकल मंदिर के सामने स्थित गोमती तालाब में उस स्थान के दर्शन किए, जहाँ भगवान् रणछोड़राय को तालाब के अंदर छुपकर रहना पड़ा था।

तालाब का पानी काफी गँदला है, इसमें छोटी-बड़ी अनेक मछलियाँ तैर रही हैं। घाट तथा तालाब की जगत लाल पत्थर की बनी है। इससे थोड़ा हटकर मंदिर की ओर वह स्थान है, जहाँ भगवान् रणछोड़राय को सोने से तौला गया था। यहाँ एक छोटे से मंदिर में तराजू तथा भगवान् के चरण-चिह्न विराजमान हैं। यहाँ पर दंडवत् प्रणाम कर पैदल ही मीठा नीम देखने निकले। यह स्थान मंदिर से दो-ढाई किलोमीटर दूर तो होगा ही, अतः दो ऑटो कर वहाँ तक पहुँचे। इतने लंबे समय तक मौसम की मार झेलते हुए वृक्ष स्वस्थ हालत में है। यहाँ भगवान् रणछोड़रायजी का एक छोटा सा मंदिर भी है। इसकी यहाँ बड़ी मान्यता है। हमने देखा कि दूर कहीं देहात से बहुत सारे ग्रामीण बडे़ गाजे-बाजे के साथ मनौती पूरी होने पर भगवान् का यशगान करने आए हैं।

यहाँ के पुजारीजी ने हमें नीम के पत्ते तोड़कर खिलाए, वाकई पत्तों में कड़वाहट नहीं है। हालाँकि डाकोर में कई पवित्र तीर्थस्थल हैं, सब जगह हमारा जाना नहीं हो सका। दोपहर हो गया है, लगभग एक बज रहा है। यहीं पता चला कि अपराह्न डेढ़ बजे डाकोर से गोधरा के लिए लोकल ट्रेन जाती है। सो जल्दी से यहीं हाइवे पर स्थित कुंकुम रेस्टोरेंट में भोजन करने बैठे। पंजाबी थाली १२० रुपए की है। जल्दी से भोजन निबटाकर इन्हीं ऑटोवालों को स्टेशन छोड़ आने के लिए राजी कर लिया। तुरंत धर्मशाला लौट वहाँ का हिसाब-किताब कर, अपना सामान ऑटो में लाद दस मिनट में ही रेलवे स्टेशन आ गए। गाड़ी आने में अभी पंद्रह मिनट हैं। गोधरा के आठ टिकट ले लिये गए। रुकते-चलते इस गाड़ी ने हमें साढ़े चार बजे गोधरा उतार दिया। गोधरा से दिल्ली के लिए हमारी गाड़ी रात्रि साढ़े आठ बजे है।

हमारे साथी ताश खेलकर समय गुजारते रहे। मैं और बनवारीलालजी स्टेशन से बाहर निकलकर काफी दूर तक घूमने गए। लाला भैया ने सवा छह बजे यहीं से मुंबई के लिए ट्रेन पकड़ ली। उनके जाते ही माहौल में नीरसता छा गई, उनके कारण पूरी यात्रा में खूब मनोरंजन होता रहा! सच, लाला भैया न भुलाए जानेवाले व्यक्ति हैं। हमारी गाड़ी भी समय पर आ गई। गाड़ी में चढ़े, हमारी सीटों पर पहले से ही एक फैमिली ने कब्जा जमाया हुआ है, थोड़ा हील-हुज्जत के बाद वे लोग हटे, हम अपनी सीटों पर बैठ गए। रात्रि का भोजन रेलगाड़ी में ही किया। लगभग ग्यारह बजे सब अपनी सीटों पर लेट गए। कोटा के बाद ठंड से बुरा हाल हो गया। आनंदजी नीचे ही लेटे हुए थे, सो उनकी तो कुलफी ही जम गई। रवि चाचा, सेठजी और डॉक्टर साहब प्रातः मथुरा स्टेशन पर उतर अपने गाँव चले गए। गाड़ी के रुकते-चलते हम लोग भी लगभग ग्यारह बजे निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर उतर गए। हम तीन जन ही बचे थे, सो पहले बस-स्टैंड पर इत्मीनान से चाय पी, फिर बस में सवार हो घर आ गए। नए-नए अनुभव, आचार-व्यवहार, सभ्यता-शराफत, ज्ञान से संपन्न करनेवाली यह यात्रा स्मरणीय बन गई।

जी-३२६, अध्यापक नगर

नांगलोई, दिल्ली-११००४१

दूरभाष : ८५०६८११२८३

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