शेष कितने दिन

आज फिर से लौट आए

वे विगत के दिन

पर तभी मन पूछ बैठा

शेष कितने दिन।

 

सज-सँवरकर साथ आईं

पूनमी रातें

याद फिर आने लगीं वे

अनकही बातें

शेष जीवन के लिए जो

अब धरोहर हैं

जिनके बिना कारा बने हैं

शेष जितने दिन।

 

रोज कहता है सवेरा

भूल बीता कल

आज पर अधिकार तेरा

धुंध में है कल

आज को मत छोड़ पगले

फिर न लौटेगा

बाँह फैला और कर ले

प्रीति-आलिंगन।

 

अलविदा उसने कहा पर

सुन न पाए हम

काश बन पाता समय

हर चोट का मरहम

भूल हम जितना चुके हैं

याद ज्यादा है

याद के बिन जी सकें अब

है नहीं मुमकिन।

 

संन्यासी हो गया सवेरा

संन्यासी हो गया सवेरा

जोगन पूरी शाम हुई

छली रात झूठे सपनों ने

यों ही उमर तमाम हुई।

 

मन ने नित्य उजाले देखे

अंतरमन के दर्पण में

कर लें दूर अँधेरे हम भी

सोचा बार-बार मन में

हमने मन की करी चिरौरी

पर यही कोशिश रही अधूरी

मयखाने से जब गुजरी

हर कोशिश नाकाम हुई।

 

मटकी दूध कलारिन लेकर

मयखाने से जब गुजरी

होश में आए पीनेवाले

पल भर में हाला उतरी

इक पल ऐसा लगा कि उसने

आकर मदिरा हाथ छुई

पीनेवालों की नजरों में

बेचारी बदनाम हुई।

 

यों तो मिलीं हजारों नजरें

पर न कहीं वह नजर मिली

चाहा द्वार तुम्हारे पहुँचूँ

पर न कहीं वह डगर मिली

तुम कहते याद न हम आए

हम कहते कब बिसरा पाए

सारी उमर लिखे खत इतने

स्याही कलम तमाम हुई।

 

सोचा अब अंतिम पड़ाव पर

हम भी थोड़ी सी पी लें

मन में सुधियाँ जाम हाथ में

अंत समय जी भर जी लें

प्याला अभी अधर तक आया

साकी तभी संदेशा लाया

जाम आखिरी पी लो जल्दी

देखो दिशा ललाम हुई।

बी-१५९, योजना विहार

दिल्ली-९२

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