अपना ईश्वर

अपना ईश्वर

जाड़े की ठंडी रात। पूरा गाँव अँधेरे में डूब चुका था। बीच-बीच में दूर से कुत्तों के भौंकने का स्वर सुनाई दे जाता था। मुकुंद खाना खाने के बाद चारपाई पर पड़ा लगातार सोच रहा था।

उसके बूढ़े माता-पिता बगल के कमरे में मुकुंद के कारसेवा में जाने को लेकर चिंतित बैठे थे। मैंने जाकर मकान की कुंडी बजाई तो दरवाजा मुकुंद ने खोला।

मोहक मुसकान के साथ मुझसे बोला, ‘‘आओ दद्दा, मैं तो आपको ही याद कर रहा था।’’

मैं बोला, ‘‘क्यों क्या बात है?’’

तब तक मुकुंद दरवाजा बंद कर मुझे अंदर तिबारे में अपनी चारपाई के पास ले आया। मैं भी चारपाई पर टिक गया। मुकुंद भी चारपाई के दूसरे सिरे पर बैठ गया। दीपक के हलके प्रकाश में मुकुंद के चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक मुझे स्पष्ट दिखाई दे रही थी।

मुकुंद बीस वर्ष का डील-डौल में मजबूत साहसी युवक है। अभी उसने इसी वर्ष बी.ए. उत्तीर्ण किया है तथा माता-पिता को आस बँधी है कि जल्दी ही कोई नौकरी ढूँढ़कर वह उनकी आशाओं को साकार कर पाएगा।

मैंने कहा, ‘‘सुना है मुकुंद, तुम कारसेवा में जाओगे?’’

‘‘हाँ, जाऊँगा दद्दा, प्रभुभक्ति के लिए मैं यह अवसर नहीं छोड़ूँगा।’’

‘‘मुझे तुम्हारी भक्ति पर आपत्ति नहीं है, मुकुंद। मैं तो तुम्हारे ईश्वर-प्रेम की प्रशंसा करता हूँ। वही तो सबकी पार लगाता है। लेकिन भीड़ इतनी होगी, पता नहीं कब, क्या भगदड़ मच जाए और मामला बिगड़ जाए।’’ मैंने कहा।

वह उठा, पानी का गिलास भरकर लाया और मुझे थमाकर बोला, ‘‘भगदड़ मच जाए तो क्या हो जाएगा, दद्दा। लाखों लोग जा रहे हैं। मैंने बचपन से ही प्रभुभक्ति का पाठ सीखा है। यह प्रभु ही तो हैं, जो सबकी नैया पार लगाते हैं।’’

‘‘मानता हूँ मुकुंद, मैं भी आस्तिक हूँ। लेकिन भैया, तुम्हारे मन में जो दया, धर्म और प्रेम की लौ जल रही है, वह भक्ति का मूल है। बाकी तो व्यर्थ का भटकाव है। कारसेवा की बजाय तुम फिर कभी चले आना मंदिर निर्माण का काम देखने। तुम्हारे माता-पिता वृद्ध हैं, उनकी देखभाल करना तुम्हारा दायित्व भी है। यदि उन्हें कुछ हो गया तो क्या होगा?’’

‘‘अभी तुम्हारे पिता की पेंशन ही तुम्हारा सहारा है। तुम्हारी नौकरी का कोई ठिकाना नहीं है।’’ मैंने समझाया।

मुकुंद ने मेरे हाथ से पानी का खाली गिलास लेकर चारपाई के नीचे सरका दिया तथा मुझे आश्वस्त करता हुआ बोला, ‘‘दद्दा, आप भी क्या सोच रहे हैं। मुझे प्रभुभक्ति पर विश्वास है, कुछ भी नहीं होगा। यदि यह मौका मैं चूका तो ठीक नहीं होगा।’’

‘‘लेकिन तुम बहुत भोले हो, समझते नहीं। यह सब राजनीति है। तुम्हें असलियत को समझना चाहिए। कल भगवान् न करे, तुम्हें कुछ हो जाए तो तुम्हारे माता-पिता का तो बुढ़ापा बिगड़ जाएगा।’’ मैं बोला।

मुकुंद ने हँसने को हलका सा मुँह खोला और बोला, ‘‘आप चिंता मत करिए। हो सके तो अम्माँ-बापू को समझाइए। वे खामख्वाह चिंता में डूबे हुए हैं।’’

‘‘उन्हीं की चिंता का खयाल दिला रहा हूँ मुकुंद तुम्हें। जिस जत्थे के साथ तुम जा रहे हो, वे सब राजनीति से प्रेरित हैं। तुम ठहरे निरे भावुक और भोले, धार्मिक भावनाओं से भरे जोशीले युवक। हालात को समझने में भूल कर रहे हो। मान लिया, कारसेवा प्रभु की है, लेकिन इस भीड़-भाड़ में कुछ हो जाए तो अनर्थ हो जाएगा।’’ मैंने समझाया।

तभी उसके अम्माँ-बापू भी वहीं आ गए। उसके बापू का खाँसी-दमा से दम घुटा जा रहा था। वे मुझे संबोधित करके बोले, ‘‘निरंजन, इसे समझाओ। ईश्वर तो सब जगह है। यदि ये चला जाएगा तो हमारा क्या होगा?’’

‘‘लेकिन बापू, मैं दस दिन बाद तो लौट आऊँगा। जा तो देश में ही रहा हूँ, कोई विदेश तो जा नहीं रहा।’’ उसने सहजता से हँसते हुए कहा।

उसकी अम्माँ ने रुआँसा होकर कहा, ‘‘मुकुंद, मेरे बच्चे! तुम नासमझ और नादान हो। जमाने की नब्ज को नहीं पहचानते। हमारा कहा मानो और जाने का कार्यक्रम मत बनाओ।’’

मुकुंद ने फिर बहुत ही सहजता से कहा, ‘‘अम्माँ, इतनी डर क्यों रही हो, तुम्हीं ने तो मुझे प्रभुभक्ति का पाठ पढ़ाया है तथा इसी भक्ति के सहारे जीवन यात्रा पूरी करने का हौसला दिया है और आज तुम ही मुझे विचलित कर देना चाहती हो।’’

मुकुंद कारसेवक बनकर प्रभु के लिए कुछ श्रमदान करने का मानस बहुत ही दृढता से बना चुका था, इसलिए उसने फिर कहा, ‘‘बापू, क्या भूल गए आप?’’

‘‘बिना पूजा-पाठ के भोजन नहीं करने का मार्ग भी आप ही ने बताया। जिस प्रभु ने हमें यह सब दिया है, यदि उसे ही भूल जाएँगे तो फिर यह कैसी भक्ति हुई? मैं वहाँ जाकर प्रभु के दर्शन करके धन्य हो जाऊँगा।’’

‘‘लेकिन वहाँ कारसेवा का मतलब दूसरे संप्रदाय के पूजा-स्थल को गिराने के लिए कारसेवा का प्रयोजन निश्चित किया गया है।’’

‘‘दूसरे के पूजा स्थलों को तोड़ने का तो प्रश्न ही नहीं। वे भी ईश्वर ही हैं। ईश्वर-अल्लाह एक समान। फिर झगड़ा कैसा?’’ मुकुंद ने कहा।

‘‘लेकिन झगड़ा यही तो है। राजनेता तथा धर्मगुरु कारसेवा के नाम पर राजनीति कर रहे हैं। वहाँ गए और कोई दंगा-फसाद हो गया तो आना मुश्किल हो जाएगा।’’ मैंने उसे फिर समझाना चाहा।

तभी बाहर से सरपंच साहब ने आवाज लगाई, ‘‘मुकुंद, क्या सो गए?’’

वह प्रसन्नता से दरवाजा खोलने को भागा तथा दरवाजा खोलकर सरपंच साहब को भी भीतर ले आया। सरपंच साहब मुझे देखकर बोले, ‘‘अरे निरंजनजी, आप कैसे? मुकुंद को समझाने आए होंगे। अरे भाई, गाँव से तीन बसें जानी हैं। वे नहीं गईं तो सारा मामला चौपट हो जाएगा।मैंने तो अपनी पार्टीवालों को तीन गाडि़याँ भरकर कारसेवक लाने की ‘हाँ’ भरी है। फिर भगवान् का काम है। धर्म के लिए भी जीवन में कुछ करना चाहिए। मुकुंद की भावनाएँ तो शुरू से वैसे भी धार्मिक रही हैं।’’

‘‘लेकिन सरपंच साहब, यह धर्म है या राजनीति?’’

‘‘राजनीति और धर्म को अलग नहीं किया जा सकता। फिर मंदिर के लिए कार सेवा करना राजनीति नहीं हो सकता।’’ वे बोले।

मैंने कहा, ‘‘यह चालाकी और धूर्तता है। इसकी आड़ में राजनेता अपनी रोटी सेंक रहे हैं। सीधे-सादे उत्साही युवकों को बहकाकर उनकी युवा चेतना को काठ मार रहे हैं। नई पीढ़ी की इसी ऊर्जा को यदि सही दिशा दी जाए तो पूरे देश के दिन फिर जाएँ। लेकिन लोकतंत्र में वोट की राजनीति ने बेचारी जनता को सदैव आगे कर अपना उल्लू सीधा किया है।’’

‘‘आप प्रगतिवादी लगते हैं, जो सिवाय पारंपरिक सोच के आगे की नहीं सोचते। आपको पता है, अपने धर्म के लिए हर वर्ग व संप्रदाय एक हो रहा है और एक हम हैं, जो पीछे हट जाते हैं। लेकिन आप तो विरोधी दल के होने से हमारी नीतियों के पक्ष में कैसे बोलेंगे?’’ सरपंच साहब तैश में आ चुके थे।

मुकुंद के बापू ने खाँसते हुए कहा, ‘‘सरपंचजी, नाराज मत होइए। हो सके तो निरंजन की बात को समझ लें। निरंजन ठीक ही तो कहता है कि धर्म व राजनीति दोनों अलग हैं। जबकि राजनेता वोट बैंक तैयार करने की राजनीति कर रहे हैं।’’

‘‘राजनीति...राजनीति...आप लोग जानते भी हैं, राजनीति होती क्या है?’’ सरपंच फिर थोड़ा ऊँची आवाज में बोले।

मैंने कहा, ‘‘मैं जानता हूँ सरपंच साहब। राजनीति बहुत ही घटिया चीज है। थूककर चाटने तथा कथनी-करनी में फर्क करने का फलसफा है, जिसे कुछ व्यवसायियों ने धंधे का रूप दे दिया है।’’’

सरपंच साहब ने मेरी ओर से मुँह फेर लिया तथा मुकुंद से मुखातिब होकर बोले, ‘‘मुकुंद, सुबह तैयार रहना। आठ बजे चल देंगी बसें। वही मैदानवाले हनुमानजी के मंदिर पर आ जाना। मैं अभी चलूँ। हमारे यहाँ तो निरंजनजी जैसे लोग भी तो हैं, जो भगवान् के पुण्य कार्य में भी आड़े आते हैं। चंदे के नाम पर भी फूटी कौड़ी नहीं दी, उल्टे जनता को बहकाते फिरते हैं।’’ यह कहकर वे चले गए।

मैंने मुकुंद को देखा और कहा, ‘‘मैं भी चलता हूँ। मुकुंद हो सके तो तुम अपना यह छप्परवाला गरीबखाना मत छोड़ना। हमारा तो यह दौलतखाना है। माता-पिता की सेवा से बढ़कर नहीं है कारसेवा।’’

मुकुंद बोला कुछ नहीं। मेरे पीछे-पीछे आया। मेरे बाहर आ जाने के बाद चुपचाप दरवाजा बंद करके चला गया। मैं भी अपने घर लौट आया। लेकिन मन मुकुंद के भोलेपन को लेकर उद्विग्न था।

दूसरे दिन मुकुंद कारसेवा के लिए चला गया। उसके मन में भक्ति का उत्साह था तथा प्रभु के दर्शनों की अभिलाषा भी। उसने जब वहाँ का नजारा देखा तो उसकी आँख प्रसन्नता से भर उठी। उसे लगा कि कितने लाख लोग हैं, जो अपनी ईश्वर-भक्ति के लिए दूर-दराज से यहाँ चले आए थे। लेकिन उसे हैरानी इस बात की थी कि वहाँ पुलिस के प्रतिबंध क्यों लगाए हुए थे। उसने सरपंच साहब से पूछा भी, ‘‘लेकिन सरपंच साहब, मंदिर-निर्माण के कार्य में यह पुलिस क्यों आई है?’’

‘‘अभी ये बातें तुम नहीं जानोगे, मुकुंद। समय आने पर सब समझ जाओगे। हम भगवान् की पूजा-अर्चना करेंगे तथा कारसेवा के लिए निर्माण-स्थल की ओर भी जाएगे।’’ सरपंच ने उसे दिलासा दिया।

दो दिन यों ही बीत गए। लेकिन उसकी परेशानियाँ इस मध्य बढ़ती रहीं। वहाँ लगाए प्रतिबंधों से उसका माथा ठनक रहा था। फिर चुपचाप लोग जो बातें करते, वह सुनकर उसकी समझ में मामला आने लगा था कि लोग अपने मंदिर-निर्माण के लिए दूसरों के पूजा-स्थल हटा देना चाहते हैं।

यह उसकी समझ से परे था। जब ईश्वर समान है तो यह खाई कैसी? दूसरे के पूजा-स्थलों को तोड़ने की इजाजत इनसानी धर्म भी नहीं देता, फिर यह साजिश और समाज में यह बाँट क्यों की जा रही है?

कारसेवा के दिन तक तो उसकी समझ में सारा माजरा आ गया था। लोगों ने सारे प्रतिबंध तोड़कर उस दिशा में जाना प्रारंभ कर दिया था, जहाँ जाना वर्जित था। वह घबराया, हाँफता सा लोगों को रोकने को दौड़ पड़ा और चीखा, ‘‘नहीं...इधर कोई नहीं जाएगा। मंदिर उधर बन रहा है।’’

दौड़कर सरपंच उसके पास पहुँचे और बोले, ‘‘पागल हो गए, मुकुंद। चलो यहाँ से। कारसेवा करने आए हो या भगवान् के काम में बाधा डालने?’’

‘‘लेकिन यह गलत है।’’

‘‘यह गलत नहीं है। यह मंदिर की भूमि है। इस पर मंदिर ही बनना चाहिए। सारे पुराने निर्माण गिराकर नया निर्माण किया जाना है।’’

‘‘नहीं सरपंच साहब, सारे पूजा-स्थल इनसान के हैं। उन्हें तोड़ना इनसानियत को तोड़ना है।’’ मुकुंद बोला।

तभी गोली चलने की आवाज आई। सरपंच साहब ने कहा, ‘‘चलो हट जाओ यहाँ से। पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी है।’’

‘‘नहीं, मैं नहीं हटूँगा। जब तक सारे लोग यहाँ से नहीं हट जाएँगे, मैं भी नहीं हटूँगा।’’

तभी एक गोली आई और उसके दाईं टाँग को चीरकर निकल गई। मुकुंद धड़ाम से वहीं गिर गया। सरपंच उसे उठाकर दौड़े। उधर सैकड़ों लोग पुलिस की गोली के शिकार होकर घायलावस्था में चीत्कार कर रहे थे।

एंबुलेंस घायलों को लेकर अस्पताल की तरफ  दौड़ पड़ीं। मुकुंद के पाँव से काफी खून निकल जाने से वह अचेतावस्था में था। प्राथमिक उपचार करके उसे पलंग पर लिटा दिया गया था। सरपंच चिंतामग्न पास ही खड़े थे। वे परेशान हो रहे थे कि वह उसके माता-पिता के पास जाकर क्या जवाब देंगे?

कारसेवा में पुलिस फायरिंग के परिणामस्वरूप तथा कारसेवा को रोक देने के कारण उधर देरभर में दंगे भड़क उठे। दंगे की यह आग मुकुंद के गाँव को भी नहीं छोड़ पाई तथा उसके कच्चे फूसवाले घर में लगी आग में झुलसकर उसके माता-पिता ने दम तोड़ दिया। सारा गाँव उजाड़ बस्ती में बदल गया। इनसान इनसान के खून का प्यासा हो गया था। बर्बरता और हिंसा के नंगे नाच ने समूचे गाँव की सभ्यता को निगल लिया था।

पंद्रह दिन बाद जब लौटकर वह गाँव आया तो मुकुंद का दिल धड़क उठा। उसका घर जलकर राख हो गया था। गाँव उजड़कर श्मशान बन गया था। एक पड़ोसी ने बताया कि दंगे में लगी आग में उसके माता-पिता इस कदर झुलस गए थे कि उन्हें बचाया नहीं जा सका। वे ही नहीं, गाँव में दोनों ही वर्गों के आठ दूसरे लोग भी जान से हाथ धो बैठे थे। मुकुंद की आँखों के आगे अँधेरा छा गया और वह धम्म से वहीं गिर पड़ा।

मुझे मालूम चला कि मुकुंद आ गया है तो मैं दौड़कर उसके पास पहुँचा, वैद्यजी उसकी नब्ज देख रहे थे। मैं उसे अपने घर ले आया। धीरे-धीरे वह ठीक होने लगा।

एक दिन वह मेरे पास आकर बोला, ‘‘दद्दा, अब मुझे अपने घर जाने दो। मैं कब तक बोझ बना रहूँगा?’’

‘‘बोझ कहते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती। मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ, पड़ोसी हूँ, तुम्हारे साथ जो बीती है, वह तो तुम ही जानते हो, मुकुंद। हम लोग तुम्हें सहानुभूति तो दे ही सकते हैं।’’

‘‘सही कह रहे हैं दद्दा आप। अब मुझे घर जाने दीजिए।’’

‘‘लेकिन घर पर तो छप्पर भी नहीं है, रहोगे कैसे?’’

‘‘सब धीरे-धीरे करूँगा दद्दा, खुद ही।’’

बहुत समझाया उसे, नहीं माना। वह अपने घर चला गया। माता-पिता की स्मृतियाँ वहाँ फिर जीवंत हो गईं। उसे बहुत पछतावा था कि उसने उनका कहा नहीं माना, उसी का परिणाम था यह सब।

वह चुपचाप चबूतरे पर बैठ गया। उसकी आँखों में आँसू भर आए थे। रह-रहकर मेरी बातें उसे याद आ रही थीं। तभी सरपंच साहब उधर से निकले और मुकुंद को देखकर बोले, ‘‘मुकुंद ठीक तो हो?’’

‘‘ठीक, देख नहीं रहे। बिना छप्पर के मकान में बैठा हूँ, कुछ करिए।’’

‘‘क्या करूँ, पंचायत के पास तो कोई बजट है नहीं, वरना मैं तुम्हारी सहायता अवश्य करता।’’

‘‘लेकिन मुझे काम दिलवा दीजिए, मैं मेहनत करके घर बना लूँगा।’’

‘‘काम मिलता कहाँ है, मुकुंद। फिर तुम तो बी.ए. पास हो। मेहनत-मजदूरी कर नहीं पाओगे।’’

मुकुंद बोला, ‘‘आप उसकी चिंता न करिए। मैं सब कर लूँगा, मैं तो लुट गया, सरपंच साहब।’’ यह कहकर वह रो पड़ा।

सरपंच बोले, ‘‘रोओ मत मुकुंद, सब ठीक हो जाएगा। होनी को कौन टाले। तुम कोई बुरे काम में तो गए नहीं थे। अब तुम्हारा पैर गोली से अलग खराब हो गया, कैसे क्या कर पाओगे? यह चिंता की बात तो है, लेकिन प्रभु सब ठीक करेंगे।’’

वह रोता हुआ बोला, ‘‘प्रभु तो सब ठीक करेंगे ही, लेकिन आप भी तो मुझे सँभालिए अभी। आपके कहने से ही तो गया था मैं कारसेवा में।’’

‘‘लेकिन मैं तुम्हें कोई गलत जगह थोड़े ही ले गया था। प्रभुभक्ति में जाना तुम्हारी अपनी रुचि भी थी। माना तुमने बहुत खोया है, पार्टी तुम्हारे लिए कुछ करेगी।’’ सरपंच साहब ने कहा।

वह बोला, ‘‘लेकिन कब?’’

‘‘थोड़ा समय लगेगा, मुकुंद। सब ठीक हो जाएगा।’’ यह कहकर वे खिसक लिये।

वह फिर घुटनों में मुँह देकर फफक-फफककर रो पड़ा। तभी गाँव का रमजान उसके पास आया और बोला, ‘‘उठो मुकुंद!’’ मेरे साथ घर चलो। मैं तुम्हें काम दूँगा। मेरे धंधे में लिखने-पढ़नेवाले की जरूरत है।’’

मुकुंद ने सिर उठाकर देखा तो बोला, ‘‘रमजान भाई आप?’’

‘‘हाँ मैं! चलो देर मत करो। हमें लोग बाँटने में लगे हैं। तुमने असलियत को समझ लिया। तुम्हारा प्रभु तो तुम्हारे मन के भीतर है तथा मंदिर तुम्हारे घर में, फिर यह भटकाव कैसा? मेरा अल्लाह मेरे पास है, हम दीवारों के लिए कब तक लड़ेंगे। जो तुमने खोया है, वह कोई नहीं देगा। सारी विपदाएँ अकेले ही झेलनी होती हैं, फिर क्यों फरेबों के चक्कर में आएँ?’’

मुकुंद उठा और रमजान के साथ चल दिया। उसे पछतावा था तो इसी बात का कि उसे ये बातें पहले क्यों नहीं समझ में आ पाईं। सच्ची कारसेवा तो यह है कि हम अपने ईश्वर को अपने में पा लें।

१२४/६१-६२, अग्रवाल फार्म,

मानसरोवर, जयपुर-३०२०२० (राजस्थान)

दूरभाष : ०९८२८०२४५००

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