पर्यावरण संरक्षण एवं विकास, दोनों जरूरी

पर्यावरण संरक्षण एवं विकास, दोनों जरूरी

अनादिकाल से देश में पर्यावरण की चेतना से पंचमहाभूत (यानी आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी) को साधने का प्रयास किया गया। सदैव से पर्यावरणीय संतुलन को प्रकृति पर निर्भर पाया गया। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण, औद्योगीकरण एवं बदलती कृषि-व्यवस्था के अंधाधुंध विकास के फेर में लोगों ने धरती का पर्यावरण बिगाड़ दिया है। शुरुआत विकसित देशों ने की, परंतु विनाश की कीमत सभी को अदा करनी पड़ रही है। प्रकृति की रक्षा भारतीय संस्कृति से ही संभव है।

वायु एवं जल प्रदूषण, भूमि-क्षरण एवं उत्पादकता में कमी, मरुस्थलीकरण, निर्वनीकरण, जैविक विविधता का क्षरण एवं पारिस्थितिकी हृस से पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक पर्यावरण नुकसान के चलते हर साल भारतीय अर्थव्यवस्था को ८० अरब डॉलर की चपत लगती है। टिकाऊ विकास सुनिश्चित करने के लिए देश को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन पर ध्यान देना होगा तथा तकनीकी ज्ञान, नीतिगत दखल तथा ग्रीन जी.डी.पी. इंडेक्स विकसित करना होगा।

सुखद बात यह है कि विश्व स्तर पर राष्ट्रों ने सतत विकास का २०३० एजेंडा अपनाया है तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने हेतु पेरिस समझौता २०१५ के अंतर्गत विश्व के तापमान को २ सेंटीग्रेड से कम रखने का निश्चय किया है।

शुद्ध प्राणवायु जीवन के लिए अनिवार्य है, परंतु वायु प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष लगभग ७० लाख लोग वायु प्रदूषण के कारण मरते हैं तथा करोड़ों बीमार पड़ते हैं। बच्चों पर इसका सबसे अधिक कुप्रभाव पड़ता है। वायु प्रदूषण में कमी लाने हेतु निम्न प्रयास आवश्यक हैं—

१. सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, न्यूक्लीयर ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाना तथा २०२२ तक १७५ गेगाबाट उत्पादन की क्षमता विकसित करना।

२. बायो-इथानाल, बायोडीजल के उत्पादन एवं उपभोग में वृद्धि। हाईब्रिड वाहनों के प्रचलन को बढ़ावा देना।

३. ईको फ्रेंडली या ग्रीन वाहनों का प्रचार-प्रसार, ताकि सल्फर, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम हो सके।

४. देश में दो लाख इलेक्ट्रिक बसें चलाने की तैयारी।

५. घर में होनेवाले प्रदूषण में कमी लाने हेतु गैस चूल्हों, सौर चूल्हे तथा जट्रोफा के तेल से खाना बनाने एवं पानी गरम करने की व्यवस्था।

स्वच्छता अपनाकर हम प्रदूषण दूर कर सकते हैं। कहा भी गया है—

कि स्वच्छता विश्व को दिया

प्रकृति से मिला वरदान है,

कि मनुष्य को मिले दो हाथ

जानवरों को पूँछ, पक्षियों को चोंच

स्वच्छता के लिए

निर्मल, अविरल जल जीवन का प्रतीक है। धरती में जीवन की उत्पत्ति से लेकर सभ्यताओं के विस्तार तक हर संरचना की नींव में जल है। प्रकृति ने पृथ्वी पर जीवों के अनुपात में जल संसाधन सौंपे हैं। इनके कुशल प्रबंधन से ही इन्हें आनेवाली पीढि़यों के लिए सहेजा जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय संस्था वाटरएड की रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष में ६.३ करोड़ लोगों को स्वच्छ पानी नहीं मिल रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण देश को बेहद खराब मौसम (बाढ़, सूखा, प्रदूषण आदि) का सामना करना पड़ेगा। जल संरक्षण एवं सदुपयोग हेतु निम्न प्रयास आवश्यक हैं—

१. जल संसाधन का समन्वित विकास हो।

२. देश की प्रमुख नदियों, जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि को स्वच्छ, निर्मल एवं अविरल बनाना।

३. नदियों को जोड़ना, ताकि अधिक पानी को सूखेवाले क्षेत्र में पहँुचाया जा सके।

४. सीवेज एवं औद्योगिक इकाइयों से निकलनेवाले दूषित जल का शोधन एवं दोबारा उपयोग।

५. बाढ़ के जल को रोककर जमीन में डालना।

६. अत्याधुनिक तकनीकी के जरिए सिंचाई करके पानी की बरबादी को रोकना।

७. समुद्रीय द्वीपों में खारे जल का शोधन करके उपयोग में लाना।

जल का संरक्षण एवं सदुपयोग आवश्यक है, तभी कहा गया है—

बिन पानी सूनी सब दुनिया,

इस धरती का जीवन पानी।

बूँद-बूँद हर वक्त बचाओ,

है अनमोल बूँद भर पानी।

वनों में २९६ गेगाटन कार्बन इकट्ठा है तथा वे अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड शोषित करने की क्षमता रखते हैं। विश्व की ७५ प्रतिशत से अधिक जैविक विविधता वनों में पाई जाती है। विश्व का ७५ प्रतिशत शुद्ध जल फॉरेस्टेड वाटरशेड एवं वेटलैंड से प्राप्त होता है। ये भूमि एवं जल का संरक्षण करते हैं तथा पर्यावरण के संरक्षण में अत्यंत सहायक हैं।

वन विश्व के लिए वातानुकूलन तथा पृथ्वी के लिए आवरण का काम करते हैं। ये जल को संचय करते हैं, भूमिक्षरण को रोकते हैं, सूखा, अकाल तथा बाढ़ की विभीषिका से मुक्ति दिलाते हैं एवं जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करके सतत विकास को बढ़ावा देते हैं।

विश्वभर में वनक्षेत्र में कमी से वर्षा का पैटर्न बदला है। निर्वनीकरण से आर्द्रता, प्रभाव तथा जलधारण क्षमता में कमी आई है। निर्वनीकरण से नदियों में अधिक बाढ़ आने लगी है। इससे अपरदन बढ़ा है और नदियाँ गाद से भर गई हैं। जल-ग्रहण क्षेत्र में वनस्पतियों की क्षति से नदियों की जलमात्रा तथा गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई है। पर्वतों पर अधिक वृक्ष कटाई से भूस्खलन में वृद्धि होती है। जैविक विविधिता के हृस से आपदाओं के प्रति पर्यावरण की सुभेदता बढ़ती है।

पर्यावरण की सुरक्षा के लिए वन-वृद्धि हेतु निम्न प्रयास आवश्यक हैं—

• राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश के एक तिहाई क्षेत्र को वनों/वृक्षों से आच्छादित करना।

• कृषि-वानिकी को बढ़ावा देना, ताकि खेती को जलवायु स्मार्ट बनाया जा सके।

• वनवासियों को वन प्रबंधन में भागीदार बनाना, ताकि अवैध वन कटाई पर रोक लग सके तथा गरीबी, भुखमरी एवं शोषण का अंत हो सके।

• वन-उद्योगों में रोजगार सृजन की अपार क्षमता है। सही नीति अपनाकर तथा समुचित व्यवस्था द्वारा प्रतिवर्ष वन-कार्यों में लगभग ५० लाख लोगों को अतिरिक्त रोजगार देना संभव है।

• इको-टूरिज्म की माँग लगातार बढ़ रही है। इसकी समुचित व्यवस्था द्वारा २०२२ तक हम अंतराल के क्षेत्रों को भी विकसित कर सकते हैं।

वन विनाश को रोककर ही पर्यावरण संरक्षण संभव है—

कटी सघन वृक्षावली, मिटी चैन की ठाँव।

पंथी-पंछी खोजते, व्याकुल ठंडी छाँव॥

प्रवल ग्रीष्म के दाह को द्रुमदल देते रोक।

वन-उपवन शीतल रहें, वनचर रहें अशोक॥

कचरा प्रबंधन पर्यावरण संरक्षण के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। यदि यह काम सही तरह किया जा सके तो शहरों को साफ -सुथरा रखने के साथ पर्यावरण की रक्षा का लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है और रोजगार के अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि मौजूदा जीवनशैली ऐसी हो गई है कि अब कहीं अधिक कचरा पैदा हो रहा है। कचरा निस्तारण को हमें अभियान के रूप में अपनाना होगा। भारत सरकार ने ‘पर्यावरण दिवस’ अर्थात् पाँच जून २०१७ से चार हजार शहरों में ठोस एवं तरल कचरे को अलग-अलग एकत्र करने और निष्पादित करने का अभियान शुरू करने का निर्णय लिया है। इसे सफल बनाने की जिम्मेदारी सबकी है—

प्रकृति का ‘चर्चा’ तत्त्व का

कि कूड़े-कचरे गंदगी, कबाड़ का

मिट्टी हो धरती बनाना, और

कार्बन डाइऑक्साइड का

पेड़ों के पत्तों से प्राणवायु बनना।

पर्यावरण संरक्षण हेतु स्वच्छ भारत अभियान, स्मार्ट शहर योजना एवं मच्छरों के खिलाफ हाई-टेक जंग शुरू की गई है। अभी ९५ प्रतिशत मलेरिया प्रभावित इलाकों में देश की आबादी रहती है। चिकनगुनिया एवं डेंगू के मामले भी बढ़ रहे हैं। स्मार्ट मास्किटो डेसिर्टा सिस्टम का प्रयोग आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा, विशाखापटनम और तिरुपति में किया गया। मच्छरों एवं मलेरिया से छुटकारा दिलाकर ही हम भारत को एक विकसित एवं सुरक्षित देश की श्रेणी में लाने में सफल होंगे।

उत्थान सेंटर फॉर सस्टेनबल डेवलपमेंट एंड पॉवर्टी एलिवेशन

१८-ए, ऑक्लैंड रोड

इलाहाबाद (उ.प्र.)

दूरभाष : ०७२७५६६६६६६

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