मोदी सरकार के तीन साल, विपक्ष में बेचैनी क्यों?

 

मई में मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने का लेखा-जोखा पिछले एक माह से चर्चा का विषय है। टी.वी. पर और पत्र-पत्रिकाओं में भी इसी की चर्चा है। सरकार ने अपनी उपलब्धियों को जनता को बतलाने के लिए भिन्न-भिन्न नामों से और भिन्न-भिन्न समय में कई बड़े कार्यक्रम बनाए हैं। जहाँ तक विरोधी दलों का सवाल है, उनका तो यही कहना है कि सब लफ्फाजी है, चुनाव के समय मोदी सरकार ने जो वादे  किए थे, उनमें से कोई पूरा नहीं किया है, केवल पुराने कार्यक्रमों की ब्रैंडिंग और पैकेजिंग है। विरोधियों के अनुसार मार्केटिंग में प्रधानमंत्री माहिर हैं और उनके द्वारा जनता को धोखे में रखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में हार के बाद विरोधी दल इस कोशिश में हैं कि किसी प्रकार कोई गठबंधन हो जाए, ताकि दो साल के बाद, यानी २०१९ के आम चुनाव में मोदी को टक्कर दी जा सके। इसलिए मोदी सरकार की तथाकथित असफलताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की चेष्टा उसी रणनीति का भाग है। कुछ विशेषज्ञों ने अपनी दृष्टि और अपने विश्लेषण के अनुसार अपने-अपने क्षेत्रों के बारे में तटस्थ शोधार्थी के रूप में सरकार की क्या सफलताएँ हैं, और कहाँ क्या खामिया हैं, उनका प्रस्तुतीकरण किया है। हम समझते हैं कि सरकार को ऐसे आकलनों पर ध्यान देना चाहिए। राजनीति में किसी प्रकार की आलोचना हो, सही या गलत, झुठलाने का प्रयत्न स्वाभाविक है, इस प्रवृत्ति से बचना चाहिए। यहाँ पर अलग-अलग विभागों के कार्यक्रमों या मंत्रालयों के कार्यकलापों के विश्लेषण में जाना संभव नहीं और न ही आवश्यक है। अकसर उपलब्धियाँ भी बढ़ा-चढ़ाकर बताई जाती हैं। मंत्रालयों के लिए आवश्यक है कि वे इस प्रकार के आलेखों, शोध-पत्रों के प्रस्तुतीकरण का विवेचन करें, ताकि कार्यक्रमों में जिन शिथिलताओं को सही पाया जाए, उनको तुरंत दुरुस्त करने की शुरुआत हो। इसीलिए समय-समय पर बाहर की एजेंसियों से आकलन कराना आवश्यक होता है, ताकि कमियों और कमजोरियों की अनदेखी न हो सके, वरन् शीघ्रताशीघ्र कमियों को दूर करने की प्रक्रिया प्रारंभ की जा सके। हम कभी आत्मप्रवचंना में न रहें। कार्यक्रम के चलते संशोधन करना कई बार संबंधित अधिकारियों को नहीं भाता है। वे उसे नापसंद करते हैं, क्योंकि कहीं यह सवाल खड़ा न हो जाए कि शुरू से इन कमियों को ध्यान में क्यों नहीं रखा गया और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। वाहवाही लूटने की इच्छा से राजनेता भी इसमें भागीदार हो जाते हैं। सुशासन लाना इस प्रकार संभव नहीं है। इस प्रक्रिया को आत्मनिरीक्षण और नैतिक उत्तरदायित्व का अभिन्न अंग माना जाना चाहिए। यह एक सैद्धांतिक प्रश्न है, जिसकी अवहेलना नहीं होनी चाहिए।

नीति आयोग : भूमिका, विकास व योजनाओं का आकलन

इन सब बातों को देखने के लिए संभवतः नीति आयोग सक्षम है। देश में जब योजना आयोग की शुरुआत हुई थी, तब योजना आयोग इस प्रकार की जिम्मेदारी निभाता था, जो कभी अपने उच्च अधिकारियों को जमीनी हकीकत जानने के लिए देश के राज्यों में भेजता था, अथवा निष्पक्ष व्यक्तियों से एक वैज्ञानिक आकलन करवाता था। जो भी हो, इस प्रकार की पहल आज की परिस्थितियों में पुनः आवश्यक है। पहले योजना आयोग को एक ‘एक्स्ट्रा कंस्टीट्यूशनल’ अथॉरिटी कहकर उसकी आलोचना की जाती थी। इसका प्रावधान संविधान में नहीं था, यद्यपि आजादी की लड़ाई के दौरान इस प्रकार की संस्था की वकालत अलग-अलग विद्वानों और राजनेताओं द्वारा होती रहती थी। सुभाष बाबू जब कांग्रेस के अध्यक्ष थे, पं. नेहरू के नेतृत्व में विशेषज्ञों की एक प्लालिंग कमेटी बनाई गई थी। उसने कई विषयों पर अच्छी रिपोर्ट बनाई थी। सन् बयालीस के आंदोलन तथा राजनीतिक उथल-पुथल के कारण वह काम ठप्प हो गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने संसद् में एक प्रस्ताव के द्वारा योजना आयोग की स्थापना की थी। यह समझ में नहीं आता है कि संविधान सभा ने योजना आयोग को संविधान का अंग क्यों नहीं बनाया। योजना आयोग की स्थापना के समय और उसके बाद भी कई राज्यों तथा कुछ अर्थशास्त्रियों को इस बात की शिकायत रही कि योजना आयोग केवल केंद्र का आयोग है, उसके गठन में राज्यों की राय नहीं ली गई है। कुछ लोगों का यह भी मत है कि यह संघीय ढाँचे पर कुठाराघात है। धीरे-धीरे, विशेषतया नेहरू के उपरांत राज्यों में यह भावना फैलने लगी कि योजना आयोग एक परामर्शदात्री संस्थान न होकर सीधे कार्यपालिका के बहुत से काम भी अपने हाथ में ले रहा है। यू.पी.ए. के समय में तो योजना आयोग ने बहुत से मंत्रालयों के अधिकार अपने हाथ में ले लिये और मंत्रालयों की एक प्रतिस्पर्धी संस्था जैसा बन गया। राज्यों के मुख्यमंत्री प्रतिवर्ष दिल्ली आते, कितनी धनराशि राज्य को उपलब्ध होगी, उस पर विचार-विमर्श होता था। योजना आयोग के उपाध्यक्ष इतने शक्तिशाली हो गए थे कि वे कैबिनेट की बैठकों में भाग लेते थे। जब किसी राज्य कामुख्यमंत्री आता तो उपाध्यक्ष को गुलदस्ता देते समय की उनकी फोटो छपती थी। राज्यों का यह भी कहना था कि योजना आयोग को राज्यों की स्थानीय समस्याओं और वास्तविकताओं की कोई जानकारी नहीं है, इससे राज्यों के लिए कठिनाइयाँ पैदा होती हैं। कुछ राज्यों ने ‘राज्य योजना आयोग’ भी कायम किए थे, किंतु शनैः-शनैः वे भी रस्मी हो गए। एक बात अवश्य थी कि योजना आयोग के उद्देश्य कम-से-कम व्याख्यायित किए गए थे, किंतुकभी उनके अनुसार कार्य नहीं हो सका। ‘नीति आयोग’ के उद्देश्यों, कार्यक्षेत्र तथा कार्यप्रणाली के विषय में अभी तक पूरी जानकारी नहीं है। राज्य सरकारों के मुख्यमंत्री नीति आयोग के कुछ कार्यक्रमों से जुड़े हुए हैं, यह भी समाचार-पत्रों से पता चलता है। ऐसा फिर भी नहीं लगता कि सब राज्यों के द्वारा उसकी स्वीकारोक्ति हो गई है। अच्छा होगा कि नीति आयोग के विषय में विस्तृत सूचना उपलब्ध कराई जाए। जैसा कि सुझाव दिया गया है कि नीति आयोग को मूल्यांकन को दायित्व हो, ताकि योजनाओं और स्कीमों की सफलता के अतिरेक के दावों से बचा जा सके। वास्तविक स्थिति जनता के सामने आए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोऑपरेटिव फेडरेलिज्म यानी सहकारी संघीय अवधारणा की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि राज्यों को विकास कार्यों में सहभागिता का एहसास हो। संभवतः प्रधानमंत्री की एक महत्त्वपूर्ण पहल योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना का मंतव्य यही है। नीति आयोग का पूरा नाम है National Institution for Transforming India। तदनुरूप इसके कार्यकलाप भी होने चाहिए। ‘सबका का साथ, सबका विकास’ का जो नारा प्रधानमंत्री ने दिया है, उसको सार्थक बनाने में नीति आयोग का वांछनीय सहयोग प्राप्त हो सकेगा।

मोदी आज देश के अप्रतिम नेता

पिछले तीन वर्षों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एन.डी.ए. सरकार ने जनमानस पर अपनी छाप छोड़ी है। हर प्रकार की आलोचनाओं के बावजूद अब नरेंद्र मोदी के विरोधी भी यह मानने लगे हैं कि उनके जोड़ का कोई अन्य नेता देश में नहीं है। आजकल सरकार की लोकप्रियता जानने के लिए मीडिया जो सर्वेक्षण कराती है, उनके अनुसार यदि आज चुनाव कराए जाएँ तो पूरे समर्थन के साथ पुनः मोदी की ही सरकार आएगी। प्रधानमंत्री मोदी ने देश में एक आशावादिता और सक्रियता का वातावरण उत्पन्न किया है। मई २०१७ के पहले जनता में जो नैराश्य का वातावरण था, वह अब नहीं है। जनता को आभास हो रहा है कि अच्छे दिनों के आगमन का नारा कोई शाब्दिक इंद्रजाल नहीं है, सरकार उस दिशा में कार्यरत है। यह काम इतना आसान नहीं है, क्योंकि पिछले दशकों में जो प्रशासनिक शिथिलता, भ्रष्टाचार, जातिवाद, भाई-भतीजावाद, असामाजिक तत्त्वों तथा भाँति-भाँति के माफियाओं को जो संरक्षण मिला है, उसको दूर करके ही सबके विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। नरेंद्र मोदी की सर्वहित केंद्रित स्कीमों ने जनता के हर वर्ग में विश्वास पैदा किया है। ‘उज्ज्वला’ कार्यक्रम को लें तो उसने महिलाओं के सशक्तीकरण में अभूतपूर्व योगदान किया है। यही बात ‘जनधन योजना’ के बारे में कही जा सकती है। प्रधानमंत्री ने युवा वर्ग में एक विशेष उत्साह और सक्रियता पैदा की है। उससे उन्होंने एक अनूठा तादात्म्य स्थापित किया है, क्योंकि किसी भी देश का भविष्य युवा वर्ग द्वारा ही निर्मित होता है। विदेशों में भी इस बात का मान होता जा रहा है कि भारत में अब दृढ निश्चयी और मजबूत नेतृत्व उभरा है, जिसकी स्वीकारोक्ति भारत में है।

चुनावी मशीनें और विरोधी दल उत्तर प्रदेश के चुनावों के बाद विरोधी दलों को एहसास हो गया कि मोदी का मुकाबला निकट भविष्य में संभव नहीं है, अतः कुछ और रणनीतियाँ बनाई जानी चाहिए। पहल बसपा अध्यक्ष मायावती ने की और शोर मचाना शुरू किया कि जिन मशीनों के द्वारा चुनाव कराया गया है, वे मशीनें खराब हैं, अतः अब मतपत्र से चुनाव होना चाहिए। यही माँग केजरीवाल ने भी की। उसके बाद कांग्रेस और अन्य दलों ने भी यह माँग उठाई। वे भूल गए कि जब वे जीते, तब भी यही मशीनें थीं। दूसरा, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि कई राज्यों में मतदान केंद्रों पर कैसे बाहुबली कब्जा कर लेते थे, फर्जी वोट डाले जाते थे और दलितों तथा गरीब तबके के मतदाताओं को मतदान केंद्र पर पहुँचने से रोका जाता था तथा उनके वोट कोई और ही डालता था। इसीलिए ई.वी.एम. मशीनों की व्यवस्था की गई। मशीनों के कारण ही भाजपा ने उत्तर प्रदेश में इतनी बड़ी जीत दर्ज की, इस शिकायत को लेकर सब कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रपति तक गए। चुनाव आयोग आश्वस्त करता रहा कि चुनावी मशीनों के साथ छेड़छाड़ संभव नहीं है। फिर भी भविष्य के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि बटन दबाने के बाद मतदाता स्वयं सात सेकंड के लिए देख सकेगा कि उसका मत उसी प्रत्याशी के पक्ष में गया है, जिसे वह देना चाहता है।

केजरीवाल ने फिर भी दिल्ली विधानसभा में एक दिन का विशेष सत्र बुलाकर व्यर्थ जनता के धन का अपव्यय किया। वहाँ आप के एक इंजीनियर सदस्य द्वारा एक बड़ा नाटक किया गया। कहीं से एक मशीन लाकर यह दिखाया गया कि कैसे छेड़छाड कर उससे एक पक्षीय मतदान कराया जा सकता है। अन्य विरोधी दलों के पर्यवेक्षक, जो वहाँ गए थे, उन्होंने कहा कि जो प्रदर्शन हुआ, उससे शक पैदा होता है। चुनाव आयोग ने विस्तार के साथ पुनः बताया कि उनकी मशीनों में कितनी सावधानियाँ बरती जाती हैं। कई बार गहन जाँच होती है, किसी गड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं होती है। इस प्रकार की आशंकाएँ बेबुनियाद हैं। चुनाव आयोग ने चुनौती के रूप में कहा कि सभी दलों के प्रतिनिधि चुनाव आयोग के दफ्तर में एक निश्चित दिन आएँ, और चार घंटे तक जो भी जोड़-तोड़ कर एकपक्षीय मतदान कराकर दिखाएँ। कांग्रेस, बसपा तथा अन्य विरोधी दलों ने पहले कहा भी कि वे उस दिन निश्चित रूप से आएँगे, पर बाद में उन्होंने भी अपने आप को उससे अलग कर लिया। वे आश्वस्त हो ही गए कि चुनाव आयोग की चुनावी मशीनें ठीक हैं और आयोग निष्पक्षता से कार्य कर रहा है। वास्तव में तो वे सब केवल मोदी विरोध की आग को फूँक मारने की कोशिश कर रहे थे। केवल आप पार्टी ने कहा कि चार घंटे का समय काफी नहीं है और वे नहीं आएँगे। यह तो ‘जल गई, पर रस्सी की ऐंठन नहीं गई’ वाली बात हुई। वास्तव में जनता को गुमराह करने के लिए और मोदी सरकार पर कीचड़ उछालने के लिए ही स्वाँग रचा गया था।

महागठबंधन की तलाश

विरोधी दलों, खासकर कांग्रेस को २०१९ के आम चुनावों में सफलता की आशा तो शायद नहीं है। इसलिए विरोधी दलों को अभी से २०१९ के अंगूर खट्टे नजर आ रहे हैं। लालूजी की डींगों के बावजूद उन्होंने फिर भी एक और अवसर तलाशा कि शायद इस प्रकार का गठबंधन मोदी को पराजित करने के लिए संभव हो सके। वह था, डी.एम.के. के वरिष्ठ नेता का ९३वाँ जन्मदिवस। राहुल भी चेन्नई पहुँचे और विरोधी दलों के नेता भी। जो आयोजन किया गया, उसमें स्वास्थ्य की दृष्टि से करुणानिधि का पहुँचना तो असंभव था। उनके पुत्र स्टालिन, जो द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष हैं, उनको मोदी विरोधी अभियान में मुख्य दायित्व उठाने का आह्वान किया गया। जयललिता की मृत्यु के बाद अन्ना द्रमुक दो धड़ों में बँट गया है, यद्यपि सरकार उसी की है। आयोजन में मोदी और भाजपा को जी भर कोसा गया तथा तीन साल की सरकार की तथाकथित असफलताओं और मोदी की तानाशाही का राग अलापा गया। ‘चेन्नई विलाप’ के बाद भी उनको कोई आशा की किरण नजर नहीं आई, फिर भी वाम दलों के कहने से आंध्र में एक और आयोजन किया गया तथा मोदी सरकार की पोल खालने का ऐलान कर दिया गया। वहाँ भी वही घिसी-पिटी बातें दोहराई गईं। आंध्र के आयोजन में अखिलेश यादव भी पहुँचे, जो चेन्नई नहीं जा सके थे। यूपी के ये दोनों नेता वहाँ मौजूद थे। वहाँ अपने मन की भड़ास निकाली। हाँ, राहुल गांधी ने चौंकानेवाली एक बात कही कि वे अब ‘गीता’ और ‘उपनिषद्’ पढ़ रहे हैं, ताकि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का असली चेहरा जनता के समक्ष प्रस्तुत कर सकें। यह एक खुशखबरी है, बहुत-बहुत बधाई। पर एक सुझाव है कि वे यदि अपने परनाना पं. जवाहरलाल नेहरू की लिखी ‘भारत की खोज,’ जो उन्होंने ३० साल के राजनीतिक अनुभव के बाद लिखी थी, उसे पहले अच्छी तरह पढें़ तो शायद वेद, उपनिषद्, गीता और भारत की अविरल सांस्कृतिक परंपरा का प्रारंभिक परिचय हो जाएगा और गीता या उपनिषदों का महत्त्व ठीक से समझ सकेंगे। समाचार-पत्रों में खबर आई है कि राहुल गांधी आराम और जगह परिवर्तन के लिए इटली में नानी के पास जा रहे हैं, संभवतः गीता और उपनिषदों का अध्ययन वहाँ से प्रारंभ हो।

भावी राष्ट्रपति की खोज

कांग्रेस सुर्खियों में कैसे रहे, किसी तरह उसका नेतृत्व दिखाई पडे़, उसके लिए अवसर की खोज निरंतर रहती है। जुलाई में राष्ट्रपति और अगस्त में उपराष्ट्रपति के चुनाव होने हैं। इसके लिए अटकलबाजियाँ चल रही हैं। कांग्रेसी तो चाहते हैं कि वह सदैव नेतृत्व में रहे। विरोधी पक्ष के नेतागण कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से विचार-विमर्श के लिए मिल रहे हैं। दोपहर के खाने पर मिले विरोधी पक्ष का कहना है कि राष्ट्रपति के चुनाव के बारे में सरकार पहले आम राय से इनका चुनाव करे, अगर आम राय नहीं बनती है तो वे अपना एक प्रत्याशी खड़ा करेंगे। भाजपा सरकार ने बातचीत के लिए अपने तीन मंत्री नामांकित किए। राष्ट्रपति के चुनाव का कार्यक्रम तय हो गया है। वैसे चुनावी गणित एन.डी.ए. के पक्ष में है और एन.डी.ए. ने बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को अपना प्रत्याशी बनाया है। देखना यह है कि कांग्रेस के नेतृत्ववाला विरोधी पक्ष किसको बलि का बकरा बनाता है। कई नाम उछाले जा रहे हैं, जैसे मीरा कुमार, गोपाल कृष्ण गांधी आदि-आदि।

क्या भारत की अवधारणा एक परिवार तक सीमित

अगले राष्ट्रपति के चुनाव संबंधी बैठकों के सिलसिले में सोनिया गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी भारत की अवधारणा के मूल तत्त्व को दूषित कर रहे हैं, उसको तोड़-मरोड़ रहे हैं, अतएव सबको संगठित होकर उसको बचाना है। भारत की अवधारणा संविधान की प्रस्तावना में निहित है। उसके साथ अब कोई खिलवाड़ संभव नहीं है। आपातकाल में जो होना था, वह हो गया। प्रश्न एक ही है कि हम भारत की अवधारणा को किस प्रकार व्याख्यायित करते हैं, संविधान को विशद दृष्टिकोण से अथवा आइडिया ऑफ इंडिया, केवल एक परिवार के रूप में देखते हैं। आइडिया ऑफ इंडिया एक परिवार के वर्चस्व के रूप में अब देश को स्वीकार नहीं है। भारत की अवधारणा लोकतांत्रिक है, एक परिवार तक सीमित नहीं है।

उ.प्र. विभाजन का नया प्रयास

एन.डी.ए. सरकार को चैन से न बैठने दिया जाए, इसलिए एक और शोशा छोड़ा जा रहा है। जून के दूसरे सप्ताह में मेरठ में एक तथाकथित गैर-राजनीतिक सम्मेलन किया गया। समाचारों के अनुसार यह एक अज्ञात संस्था ‘मेरठ शोषित मुक्ति वाहिनी’ द्वारा आयोजित किया गया। सम्मेलन के अध्यक्ष थे राष्ट्रीय लोकदल के नेता और पूर्वमंत्री डॉ. मेराजुद्दीन अहमद। इस गैर-राजनीतिक कहे जानेवाले आंदोलन में भाजपा को छोड़कर सब राजनीतिक दल सम्मिलित हुए थे। मुख्य वक्ता थे जनता दल (एकी) के महासचिव के.सी. त्यागी और उन्होंने गोरखालैंड की तर्ज पर आंदोलन करने का आह्वान किया। आंदोलन में सब वक्ताओं ने उ.प्र. के विशाल प्रदेश होने को उसके पिछडे़पन के लिए जिम्मेदार ठहराया, अतएव उ.प्र. के विभाजन की माँग उठाई जाएगी। त्यागी ने तो यहाँ तक कहा कि साधारण आंदोलन से काम नहीं बनेगा, उसके लिए कुरबानी देनी होगी। सात जुलाई को मेरठ कमिश्नरी (मंडल) के सामने दस हजार लोग धरना देकर अनशन करेंगे। वहाँ उ.प्र. के विभाजन के लिए संकल्प-पत्र पर हस्ताक्षर कराए जाएँगे। अध्यक्ष ने कहा कि जब तक २२ करोड़ आबादी के प्रदेश के चार टुकडे़ नहीं होंगे, विकास होना असंभव है। मायावती पहले इन मुद्दे पर मुखर थीं, पर अब चुप हैं। इन दिनों मेरठ मंडल का क्षेत्र पहले से ही संवेदनशील बना हुआ है। सहारनपुर में जातीय दंगों और भीम सेना के कारण उत्तेजना व्याप्त है। स्थानीय प्रशासन ने वहाँ मायावती की सभा करने की इजाजत देकर बड़ी गलती की। प्रशासन और खुफिया तंत्र भी असावधान रहे। उनका इरादा वातावरण को और गरमाने का है, ताकि प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा जाए। अतः पहले से सावधानी बरतने की आवश्यकता है। कोशिश यह है कि एक तीर से दो शिकार हों—योगी आदित्यनाथ उ.प्र. सरकार और नरेंद्र मोदी केंद्र सरकार, दोनों के विरुद्ध इस क्षेत्र में जनभावनाओं को उत्तेजित कर किसी-न-किसी तरह भड़काया जाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निगाह २०१९ के आम चुनाव तक सीमित नहीं है। विरोधी दलों की खिसियाहट है कि २०१९ का चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। प्रधानमंत्री २०२२ की बात करते हैं। उनकी दृष्टि एक दूरदर्शी राजनेता की है। २०२२ में १५ अगस्त को हम सब भारतीय स्वाधीनता दिवस की हीरक जयंती मनाएँगे। नरेंद्र मोदी का स्वप्न एक नए भारत का है, जिसका वाहक होगा देश का युवा वर्ग। नए भारत का उदय उनका स्वप्न है और संकल्प भी। १५ अगस्त पर श्रीअरविंद की जन्मतिथि है। १९४७ में ऑल इंडिया रेडियो को अपने संदेश में श्रीअरविंद ने कहा था कि यह केवल एक संयोग नहीं है, इसमें एक निहित अर्थ है। पांडिचेरी (अब पुदुचेरी) जाने के पहले अपने एक बयान में श्रीअरविंद ने एक तरह से भविष्यवाणी की थी कि परमशक्ति ने भारत की स्वाधीनता निश्चित कर दी है, भारत स्वतंत्र होकर रहेगा, अतएव सक्रिय राजनीति को छोड़कर उन्होंने अपने लिए मानव कल्याण का नया क्षेत्र चुना। २०२२ की १५ अगस्त को श्रीअरविंद की १५०वीं जयंती होगी। संभवतः नए भारत के उदय का संदेश और संकल्प का प्रारंभ भी तभी हम देख सकेंगे। हम आशा करते हैं कि भारत सरकार अवसर के अनुकूल उसका आयोजन भी भव्य रूप में करना चाहेगी। इसीलिए अत्यावश्यक है कि देशवासी बिखराव और अलगाववादी प्रवृत्तियों से बचें। देश में हजारों समस्याएँ हैं, उनका निराकरण सरल नहीं है। उन समस्याओं से जूझने के लिए देश की पूरी शक्ति को एकजुट करना आवश्यक है।

कृषि और किसानों की समस्या जटिल होती जा रही है। उसकी ओर समग्रता से विचार करके निस्तारण के रास्ते खोजने होंगे। कर्ज की माफी पर्याप्त समाधान नहीं है। उसके दुष्परिणाम भी हैं। पूर्व में कांग्रेस सरकार कर्ज माफी का अभियान चला चुकी है, पर कोई नतीजा नहीं निकला। इस स्तंभ में समय-समय पर हम ध्यान दिलाते रहे हैं। किसानों की आत्महत्या का सिलसिला कर्ज माफी से नहीं रुकेगा। भारत में कृषि के अर्थशास्त्र और गाँवों की बिखरती सामाजिक अवस्था का अध्ययन करना होगा। स्थानाभाव के कारण अधिक लिखना अभी संभव नहीं है। दूसरी समस्या है बढ़ती हुई बेरोजगारी, अतएव सरकारी और गैर-सरकारी, दोनों क्षेत्रों में वैज्ञानिक रूप से व्यवसाय के नए साधन खोजने हैं। तीसरी बात जो कहना चाहेंगे कि देश में कानून व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए। कानून को अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति को सख्ती से रोकना होगा। कानून और शांति व्यवस्था को केवल संकुचित राजनैतिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। असामाजिक तत्त्वों द्वारा गौरक्षा के नाम पर तरह-तरह की जो गुंडागर्दी हो रही है, उस पर काबू पाना अत्यंत आवश्यक है। उससे देश और विदेश में मीडिया द्वारा भ्रांतियाँ फैलाई जा रही हैं। भारत एक सहिष्णु देश है, इस छवि को किसी प्रकार से मलिन नहीं होने देना चाहिए— यदि हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए भारत के स्वप्न और संकल्प को साकार देखना चाहते हैं।

देश की राजनीति कितनी अधोगति को प्राप्त  कर चुकी है, नित्यप्रति की घटनाएँ और समाचार इस बात के प्रमाण हैं। नए-नए घोटालों और भ्रष्टाचार के समाचार आ रहे हैं। प्रशासन में भ्रष्टाचार के मामले लोगों के सामने उजागर हो रहे हैं। पुलिस तथा व्यवस्था तंत्र के अन्य अंगों की असामाजिक गुटों से साँठगाँठ है। राजनीति पैसे की चेरी हो गई है। राजनीति ने पिछले साठ-सत्तर वर्षों में कदाचार की परिभाषा ही बदल दी है। ऐसा लगता है कि राजनीति ने देश को भू-माफिया, शिक्षा माफिया, शराब माफिया, लकड़ी (टिंबर) माफिया, खनन माफिया, ड्रग माफिया आदि-आदि को सौंप दिया है। पहाड़ से लेकर नदियों और समुद्रतट तक खनन माफियाओं ने कोई क्षेत्र नहीं छोड़ा है। माफिया अपने को कानून से ऊपर समझता है, क्योंकि उनके लिए रेत और बालू सोना उगलते हैं। उत्तर प्रदेश का एक मंत्री प्रजापति, जो अब जेल में है, इसका जीता-जागता उदाहरण है। बदलती राजनैतिक सत्ता को कैसे अपने कब्जे में किया जा सकता है, नोएडा अॅथोरिटी का पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह इसका एक अन्य उदाहरण है। चाहे बसपा हो या समाजवादी दल, अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत ही इस स्थिति के लिए उत्तरदायी है। राजनीति बेशर्म भी है। कोई भी आरोप हो, राजनेता यह कहकर मूँछों पर ताव देते हैं कि यह सब राजनीति से पे्ररित है, इसमें कोई तथ्य नहीं है। जब न्यायालय हरकत में आता है तो कुछ आशा की किरण दिखाई देती है। चारा घोटाले के मामले में अब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण बिहार के दो मुख्यमंत्रियों लालूप्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र को दो अन्य मामले में फिर अदालत का मुँह देखना पड़ रहा है। एक केस में तो पहले सजा हो ही चुकी है। बिहार को ही लें तो वहाँ के स्वास्थ्य मंत्री के खिलाफ पद दुरुपयोग के तरह-तरह के मामले सामने आए हैं। एक पेट्रोल पंप लेने के लिए फर्जी दस्तावेज के इस्तेमाल के कारण उनको नोटिस मिला है। जमीनों की खरीद-फरोख्त के आरोप भी हैं। लालूजी की सुपुत्री मीसा, जो संसद् सदस्य भी हैं, उनके  और उनके पति के खिलाफ आयकर विभाग ने काररवाई शुरू की है। सत्ता के रुआब में नियमों को तोड़-मरोड़कर सेल कंपनियाँ खोलकर उन पर संपत्ति इकट्ठा करने का आरोप है।

हरियाणा में वाड्रा के जमीन खरीद-फरोख्त के मामले की एक न्यायिक जाँच हुई थी। उसकी रिपोर्ट अभी उच्च न्यायालय के आदेश से गोपनीय रखी गई है। अपने एक साक्षात्कार में कहा कि विभागीय अधिकारियों ने बताया कि चूँकि वे सोनिया गांधी के दामाद हैं, तो यह मान लिया गया उनके रुतबे के कारण एक नई कॉलोनी बनाने की उनके पास तकनीकी और वित्तीय क्षमता होगी ही। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की मृत्यु के बाद शशिकला और उनके परिवारवालों ने सत्ता हथियाने की कोशिश की। अन्ना द्रमुक की शशिकला जनरल सेक्रेटरी बन गईं। प्रदेश में अपनी मरजी का मुख्यमंत्री बनवा दिया, जिस सदस्य को जयललिता ने दो बार स्थानापन्न बनाया था, सत्ता और धन के इस लोभ ने एक नया खेल खिला दिया। शशिकला अब भ्रष्टाचार और अपनी आय से अधिक संपत्ति के पुराने मुकदमे में चार साल की सजा काट रही हैं। एक प्रकार से मृत्यु जयललिता के प्रति दयावान हो गई। एक टी.वी. चैनल पर एक पुराने मामले में, जो यूपीए सरकार के समय का था, सी.बी.आई. की छापेमारी और काररवाई को अभिव्यक्ति के अधिकार पर कुठाराघात कहा जा रहा है। कुछ लोग सरकार पर देश में एक डर का वातावरण पैदा करने का आरोप भी लगा रहे हैं। आखिर फैसला तो न्यायालयों द्वारा ही होगा। उसका इंतजार क्यों नहीं किया जाता? भ्रष्टाचार के आरोप और प्रत्यारोप राजनीति को खोखला बना रहे हैं। जनता में राजनीति के प्रति एक प्रकार की वितृष्णा पैदा हो रही है, जो चुनावी लोकतंत्र के लिए अत्यंत हानिकर है।

एक भूला-बिसरा साहित्यकार

एक साहित्य-प्रेमी और उनकी देन की कुछ चर्चा करना चाहेंगे। रेवतीलाल शाह न केवल गुणग्राही व्यक्ति थे, बल्कि स्वयं भी अभूतपूर्व गुणी थे। २९ नवंबर, १९३४ को राजस्थान के झुंझनू में जनमे तथा २५ जनवरी, २००३ को उनका निधन कोलकाता में हुआ। उन्होंने बिड़ला इंजीनियरिंग कॉलेज पिलानी से इलेक्ट्रॉनिक्स में एम.ई. की उपाधि प्राप्त की। मूलतः वैज्ञानिक रहते हुए उन्होंने विज्ञान, गणित और तकनीक पर उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने वैज्ञानिक के नाते तीन पुस्तकों का प्रणयन किया। १९९६ में एक पुस्तक के लिए उनको राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किया गया। वैज्ञानिक होने के साथ-साथ उन्हें साहित्य से बहुत प्रेम था। वे हिंदी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, बँगला, पंजाबी एवं राजस्थानी भाषाओं के ज्ञाता थे। साहित्य को क्षेत्रीय भाषाओं में नहीं बाँधा जा सकता। हमें उनका परिचय उनकी मृत्यु के बाद उनकी उपलब्धियों और बहुआयामी व्यक्तित्व से हुआ था, यानी ‘फिराक और फिराक का चिंतन’ नामक उनकी पुस्तक से। संभवतः इस पुस्तक का जिक्र इस स्तंभ में हुआ भी था। उसके उपरांत उनके कुछ पत्रों और संस्मरणों का एक संकलन ‘संवेदना के विविध आयाम’ देखने को मिला। रेवतीलाल शाह का स्वयं का व्यक्तित्व और कृतित्व उनकी इस पुस्तक के नाम से व्याख्ययित किया जा सकता है। उनकी पैठ जितनी फिराक गोरखपुरी, इकबाल, फैज, उमर खय्याम, रूमी, हाफिज, मीर, गालिब, इकबाल के साहित्य में थी, उतनी ही पैठ और रुचि गीता, उपनिषद, कामायनी या शैव दर्शन में भी थी। उन्होंने हरि प्रसाद मुखर्जी के ‘रामायण खुला चोखे’ का बँगला से हिंदी में अनुवाद किया था। उनकी मित्रता अपने समय के प्रायः सभी शायरों और हिंदी के लब्धप्रतिष्ठित कवियों व विद्वानों से थी। समय-समय पर इन महानुभावों ने उनके विषय में जो उद्गार व्यक्त किए, उनसे रेवतीलाल शाह का व्यक्तित्व एवं जीवनदर्शन उजागर होता है। उनका बहुत सा लेखन इधर-उधर बिखरा पड़ा है। प्रयास चल रहा है कि विद्वानों की सहायता से उनका अप्रकाशित साहित्य धीरे-धीरे पाठकों को उपलब्ध हो सके। इस सिलसिले में हमें हाल में उनकी तीन पुस्तकें देखने को मिलीं। एक में उमर खय्याम की चुनिंदा रुबाइयाँ हैं, मूल फारसी से भावानुवाद। दूसरी पुस्तक में संकलित हैं मिर्जा गालिब के चुनिंदा खत, चुनिंदा शेर, मूल उर्दू एवं भावानुवाद। तीसरे संकलन में हैं हाफिज शीराजी की कुछ चयनित गजलें, मूल फारसी एवं भावानुवाद। बहुतों ने मिर्जा गालिब तथा उमर खय्याम की रुबाइयों का अनुवाद किया है, जिसे पढ़ने में आनंद मिलता है। हर एक की अपनी-अपनी दृष्टि होती है। रेवतीलाल शाह का प्रयास अपनी एक सहृदय अध्येता की दृष्टि से है। तीनों संकलनों में मूल फारसी एवं उर्दू रचनाओं को देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया है। हर संकलन से उदाहरण देना कठिन है। हाफिज शीराजी की एक गजल, जो हमें विशेषतया पसंद आई, उसको उद्धृत करना चाहेंगे। शायद सुधी पाठकों को भी पसंद आए। शीराजी की गजल का अनुवाद इस प्रकार है—

चुनने को इक फूल गया था उषा बेला, मैं उपवन में

पड़ा सुनाई मुझे अचानक, बस आर्तनाद इक बुलबुल का

मुझ जैसे वो भी खोई थी किसी फूल ही के वियोग में

सारे उपवन में शोर मचा था, केवल उसके रोदन का

लगातार मैं धूम रहा था उस उपवन की क्यारी में

सोच रहा था उस बुलबुल की और फूल की प्रेम कहानी

आर्त्तनाद ने उस बुलबुल के, कुछ ऐसा दिल पर असर किया,

हालत ऐसी बिगड़ी मेरी, बस कुछ सहनशक्ति ना शेष रही गई,

फूल अनेकों इस उपवन में खिलते ही रहते हैं, लेकिन

बिना चमन के काँटों के इक फूल किसी को नहीं मिला

फूल संग में हैं काँटों के, अरु प्रेम दीवानी बुलबुल है

ना इसमें परिवर्तन कोई, ना उसमें परिवर्तन है

सुख की आशा मत रख ‘हाफिज’ इस नील गगन की चालों से

दोष हजारों हैं इसमें, गुण नाममात्र के लिए नहीं हैं

रेवतीलाल शाह की पुस्तकों को संपादित करने का कार्य कर रहे हैं, उनके छोटे भाई प्रमोद शाह नफीस। उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र तथा अन्य प्रबुद्धजन। प्रमोद शाह कलकत्ता विश्वविद्यालय से वाणिज्य में स्नातक हैं। वे पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं। वे स्वयं एक शायर भी हैं। उन्होंने बहुत सी गजलें और नज्में लिखी हैं। ‘जुस्तजू’ और ‘सूफीमत : एकता का पैगाम’ नामक दो संकलन उल्लेखनीय हैं। इनके लेख देश की अनेक साहित्यिक और सांस्कृतिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। कोलकाता आकाशवाणी, दूरदर्शन, डिसकवरी चैनल आदि पर समय-समय पर उनकी वार्त्ताएँ आती हैं। कुछ वर्षों पूर्व उन्होंने एक अत्यंत श्रमसाध्य कार्य किया था। वह था तीन खंडों में प्रकाशित संकलन ‘Thorgths on Religious Politics in India’ (१८५७-२००८), जिसका विस्तृत संज्ञान इस सतंभ में लिया गया था। वह पुस्तक भारतीय राजनीति के शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

रेवतीलाल शाह की उपरोक्त पुस्तकों के प्रकाशक हैं—शैली पब्लिकेशन प्रथम तल, १४, चाँदनी चौक स्ट्रीट, कोलकाता-७

प्रकाशन सुंदर है, मूल्य केवल सत्तर और अस्सी रुपए।

अक्तूबर में भगिनी निवेदिता की १५०वीं वर्षगाँठ है। स्वामी विवेकानंद की शिष्या होकर वे पूर्णतया भारतमयी हो गईं। अपनी लेखनी द्वारा और अनेक प्रयासों से भारत के नवजागरण में उल्लेखनीय योगदान किया। भगिनी निवेदिता की १५०वीं वर्षगाँठ से संबंधित आयोजन जगह-जगह हो रहे हैं। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व तथा उनके विशद संपर्क तत्कालीन भारतीय नेताओं विषयक सामग्री साहित्य अमृत में प्रस्तुत करने का प्रयास रहेगा। अगर सितंबर में उनके संबंध में विद्वानों से अच्छे आलेख प्राप्त होंगे तो उनका स्वागत होगा।

 

 

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

 

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