पंचायत का फैसला

पंचायत का फैसला

मैंने पूछा, "पिताजी, आप उदास क्यों हैं?" थोड़ी देर तो उन्होंने आनाकानी की, परंतु फिर बताना पड़ा। पिताजी बोले, ‘‘कभी-कभी अपने ही काटने लगते हैं तो पीड़ा अधिक दुखदायी हो जाती है। तुम्हारे चाचा के लड़के ने ही हमारे घर की जमीन पर कब्जा कर लिया है।’’

मैंने कहा, ‘‘पर मंगत चाचा के पास तो अपना मकान है ही, फिर बड़े चाचाजी का घर का भी वे ही उपयोग कर रहे हैं।’’

पिताजी बोले, ‘‘सो तो सबकुछ है। उनका बड़ा लड़का तो चंडीगढ़ में है। दो छोटे गाँव में रहते हैं। कहते हैं, बीचवाले ने हमारीवाली जमीन पर दुकान बना ली।’’

 मैं बोला, ‘‘अच्छा, हमसे पूछा तक नहीं। फिर तो हमें पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए। परंतु आपसे किसने कहा?’’ पिताजी बोले, ‘‘यों तो गाँव से कोई-न-कोई आता ही रहता है, परंतु यह सूचना राम प्रसाद ने दी है। वह अपने खेत बेचने के लिए गाँव गया था। वहाँ उसने दुकान बनी हुई देखी।’’

मुझे बहुत बुरा लग रहा था। हम गाँव में नहीं रहते तो क्या, इस प्रकार हमारी जन्मभूमि कोई हथिया लेगा। मैं छुट्टी लेता हूँ। सुबह ही मैं गुलावठी थाने में जाकर रिपोर्ट कराता हूँ। पिताजी बोले, ‘‘बेटा! आपस का मामला है। पुलिस में नहीं, पंचायत में शिकायत करनी चाहिए। मंगत राम मेरे चाचा का ही तो बेटा है। मेरा भाई ही तो है। उसका पुत्र तुम्हारा भी भाई ही है। गाँव चलते हैं, पंचायत बुलाकर समस्या सुलझ जाएगी। पुलिस में तो बरसों लग जाएँगे। बार-बार थाने, कचहरी में कौन चक्कर काटेगा?’’ मैंने भी बात मान ली।

मुंशी प्रेमचंद की पंच परमेश्वर कहानी मेरे मानस-पटल पर कौंध गई। मुझे भी लगा, पंच तो सचमुच निस्स्वार्थ और सच्चा न्याय करते हैं। न्याय करते समय परमेश्वर ही उनमें प्रवेश कर जाता है।

अगले दिन हम दोनों (बाप-बेटे) सुबह छह बजे ही अपने गाँव चल दिए। मैं तो चार-छह साल में कभी ही गाँव जा पाता हूँ! मेरे बड़े भाई तो कभी गाँव जाते ही नहीं। छोटा भाई तो फौज में है। उसने तो गाँव देखा ही नहीं। वह तो दिल्ली में ही जनमा-पढ़ा और फौज में भरती हो गया। एक महीने की छुट्टी लेकर आता है तो रिश्तेदारी में भी नहीं जा पाता। फिर गाँव में हमारा बचा भी क्या है। गाँव में कुएँ के बाईं ओर दो सौ गज घेर की जगह थी। वह पिताजी ने बेच दी। बेचते नहीं तो क्या करते? पड़ोस के पडित रूपचंदजी हर महीने दिल्ली आ जाते। दिन में घूमते-फिरते, रात को हमारे घर ठहरते, दोनों समय भोजन करते और अगले दिन सुबह पाँच रुपए दक्षिणा लेकर विदा होते। साथ ही हर बार यह आग्रह करते, ‘चाचा! यो जमीन तो बेकार पड़ी है। मोय दे दोगे तो मेरो भी उद्धार हो जाएगा और या धरती को भी।’

मैं सदा पिताजी से विनती करता कि जमीन मत बेचना, क्योंकि दिल्ली में भी तो किराए के मकान में रहते हैं। कम-से-कम गाँव में तो अपनी जगह रहे।

एक दिन पिताजी ने कहा कि घेर की जमीन तो पंडितजी को देनी ही पड़ेगी। जितने की जमीन होगी, उतने रुपए तो हम दक्षिणा के रूप में दे बैठेंगे, और जब तक नहीं देंगे तब तक वे आते ही रहेंगे। फिर मैंने भी हाँ कर दी और पिताजी ने मात्र १४०० रुपए में दो सौ गज जमीन पंडित रूपचंद शर्माजी को दे दी। वहाँ से सौ गज दूर उसी सीधी गली में हमारा घर था। घर तो सौ गज में बना होगा, पर अब तो मिट्टी का ढेर हो चुका। दरवाजे-चौखट कड़ी और चक्की आदि तो सब मंगत चाचा ने पहले ही निकाल ली थी। अब गली की तरफ उनके सपूत ने दुकान भी बना ली। दरअसल, तीनों चाचाओं के घर अंदर जाकर पड़ते थे। हमारा हिस्सा गली की ओर पड़ता था।

दिल्ली से हमारा गाँव मात्र ११० किलोमीटर है, परंतु गाँव तक न तो बस जाती है न रेल। पहले दिल्ली बस अड्डे से गाजियाबाद की बस पकड़ी। धौलाना, दादरी एनटीपीसी और अनेक गाँवों से होती हुई बस १० बजे गुलावठी पहुँच गई। गुलावठी में अच्छा, बड़ा बाजार है। मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर जानेवाली बसें यहीं से गुजरती हैं। सब्जी बाजार में ताँगा स्टैंड है। ताँगेवाले परतापुर, निमचाना, गंगावली आदि के लिए आवाजें लगा-लगाकर यात्रियों को बुला रहे थे। पूछा, ‘‘नवादा जाने के लिए ताँगा मिलेगा क्या?’’ पता चला, नवादे का ताँगा आनेवाला है। वही वापस भी जाएगा। तब तक हमने दुकान पर चाय पी, आधा घंटे बाद ताँगा आया। ताँगेवाले से पूछा तो बोला, ‘‘आप बैठो, मैं कुछ सब्जी खरीद लूँ। चलेंगे तो तब जब ताँगा भर जाएगा।’’

उसकी गलती नहीं, यहाँ का रिवाज ही ऐसा है। यूपी में तो बसें भी तभी चलती हैं, जब भर जाती हैं। ग्यारह बजे ताँगा भर ही गया। ताँगा चल पड़ा। दस मिनट में बाजार पार किया तो रेलवे फाटक बंद मिला। दस मिनट बाद गाड़ी निकल गई तो ताँगा आगे बढ़ा। दोनों ओर आम के बाग देखकर मन प्रसन्न हो गया, फिर काली नदी का पुल दिखाई पड़ा। पुल से पहले ही सीधे हाथ को उस्तरा नामक गाँव में ताँगा मुड़ा। गाँव में एक बड़ा किला भी है, परंतु सड़क ठीक नहीं है। सड़क गाँव के बीच में से निकली है। सड़क पतली है। सड़क नहीं, एक गली ही कहें तो ज्यादा ठीक है। गाँव से पार होकर दोनों तरफ खेतों के बीच सड़क हवादार और चौड़ी हो गई है। गाँव के शुरू में ही कुआँ हुआ करता था, परंतु अब कुएँ से पहले जो माताओं के चबूतरे थे, उस पर भी मकान बन चुके हैं।

कुएँ के पास ताँगा रुका। मैं पिताजी से पूछ रहा था कि हम सुखबीर के घर चलें या रूपचंद शर्माजी के घर चलें। तभी आवाज आई—‘‘कौन-कौन? अरे माया है क्या?’’ मैंने आश्चर्य से देखा। एक अंधा चक्षु मुहँ उठाए ऊपर को देखकर बोल रहा था। मुझे पहचानने में देर नहीं लगी। नानक जन्मांध था, परंतु अभ्यास इतना कि खेत-क्यार का सब काम बखूबी कर लेता था। मैंने ताँगे से उतरते हुए कहा, ‘‘भैया! आप नानक हैं न, आपने कैसे पहचाना?’’ नानक का उत्तर था—‘‘का अपने भैया की आवाज भूल जाऊँगो? तुम्हें याद हो या न हो, मोय खूब याद है जबकि तोय याद न होएगी। मैं तोकू भजन गानो सिखाय करै हो। अर तू अपनी प्यारी मीठी बोली में भजन सुनतो तो यह पड़ोस के धोबी तोय बटन इनाम में दिए करै हे।’’ बचपन की यादें मेरे स्मृति-पटल पर कौंध गईं। पिताजी ताँगेवाले को पैसे दे चुके थे। नानक ने उनसे राम-राम करी। तब तक सुखवीर भी आ गया। उसने हमारा थैला उठा लिया, ‘‘ताऊजी, राम-राम! घर चलो, पहले खाना खाओ, फिर जैसे कहोगे, मैं आपको ही बच्चा हूँ, आपसे बाहर नाऊँ।’’

पिताजी की नाराजगी जाने कहाँ गई। चुपचाप सुखवीर के साथ चल दिए। मैं भी चल पड़ा। मैं बोला, ‘‘नानक भाई, फिर मिलेंगे। अच्छा राम-राम।’’ सुखवीर ने पानी पिलवाया। दस मिनट बाद ही खाने की थाली सामने आ गई। अरहर की दाल, बढि़या चुपडे़ फुलके और रायता। भूख भी लगी थी। चुपचाप खाना खा लिया। खाना खाकर बैठे तो सुखवीर ने ही बात शुरू की, ‘‘ताऊजी! माफ करना। मैंने आपकीवाली जमीन पर एक छोटी सी दुकान बना ली है। खेत की जमीन तो थोड़ी सी है। वासू गुजारो नाय चलै। हमारेवाली जगह दुकान चलेगी ना। ऊ भीतर कू है। या मारै आपवाली जगह पै बना ई। आगै आपकी मरजी, आप इजाजत दैं तो करूँ, नाय तो बंद कर दूँ।’’

पिताजी ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘पंचायत करनी है। जो पंचों की राय बनेगी, सोई करेंगे।’’ मुझे फिर याद आ गई प्रेमचंदजी की कहानी—पंच परमेश्वर। एक बार फिर मैं मन-ही-मन आश्वस्त हो गया कि पंचायत का फैसला तो गलत हो ही नहीं सकता। सुखबीर बोला, ‘‘ताऊजी, जैसी आपजी की मर्जी, मौकू तो आपही का हुक्म भी पंचायत को ही फैसलो है। तो ताऊजी! पंचायत तो साँझ कू छह बजे सू पहले नाय हो सकै। सब अपने-अपने काम धंधो सू निबट-निबटा कै ही आवै हैं। या फिर कल सुबेरे सात बजे बैठ सकै हैं।’’

पिताजी बोले, ‘‘साँझ कू ही बुलवा लै।’’

सुखवीर बोला, ‘‘अच्छा ताऊजी। दुकडि़या (पौली) में खाट बिछ गई हैं। आप आराम करें! कोई चीज की जरूरत होय तो यू आपको पोतो महेंदर है। आप आवाज दीजो! सब तरियां सेवा करैगो। मैं एक बेर पंचन कू बुलावा दे आऊँ! अच्छा जी।’’

सुखवीर हाथ में लाठी लेकर चला गया। हम दुवारी में खाट पर लेट गए। खाना खा चुके थे और कोई काम नहीं था। लेटते ही मन में विचार चलने लगा। हमारी जमीन खाली हो जाएगी। यह तो अपने ही भाई ने दुकान बनाई थी, फिर मान लो कोई और दबंग घेर ले तो फिर तो कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने ही पड़ेंगे। मेहनत की कमाई का धन परिवार पालन से हटाकर यहाँ लगाना पड़ेगा। दिन-रात की टेंशन भी रहेगी। एक विचार आया कि यहाँ सेवा भारती की ओर से एक शिशु मंदिर या बालवाड़ी केंद्र खुलवा दें। फिर मन हुआ कि क्यों न एक शिव मंदिर बनवा दें। बिना पुजारी रखे भी चलेगा, फिर भी सुबह-शाम साफ-सफाई की जिम्मेदारी तो किसी को देनी ही होगी। कभी विचार आया कि धर्मशाला सबसे ठीक रहेगी। किसी को जरूरत होगी तो प्रयोग करेगा और काम हो जाने पर सफाई करवा देगा। जब किसी और को चाहिए तो वह पुनः सफाई करवा के उपयोग कर लेगा। बड़ी समस्या यह खड़ी हो रही थी कि चाबी लेने क्या लोग दिल्ली आएँगे? पंचायत को भी चाबी दे दी तो वो भी इस सुखवीर को ही दे देंगे। जब हम गाँव में नहीं रहते तो मालिक तो सुखवीर ही रहेगा। और जाने क्या-क्या विचार आते-जाते रहे। फिर सोचा पहले पंचायत का फैसला तो आने दें, पता नहीं ऊँट किस करवट बैठे?

तभी सुखवीर आया, ‘‘बोला, ताऊजी! आज ही पंचायत साँझ कू बैठेगी, पर चौपाल में। हमें वहीं जानो पडे़गो।’’ पिताजी बोले, ‘‘ठीक है, वहीं चलेंगे।’’

पंचायत चौपाल में जमी थी। सुखवीर और हम दोनों पहुँच गए। पिताजी के लिए पाँच पंचों में कोई पराया नहीं था। तेजा जाट प्रधानजी के बड़े बेटे को दिल्ली में पिताजी ने नौकरी पर लगवाया था। चेता कुम्हार का बड़ा बेटा भी पंच था। चेता और पिताजी साथ पढे़ थे। चेता जब दिल्ली आता तो हमारे घर ही रहता था। किसनू बामन तो खुद पड़ोसी थे। उनके भतीजे रूपचंद को ही तो घेर की जमीन बेची थी। नत्थी गूजर पहलवान। पिताजी ने हमारे खेत तो बडे़ भाई की शादी पर ही नत्थी को बेच दिए थे और बुद्धन नाई उनमें सर्वाधिक पढ़ा-लिखा था। सब पंच पिताजी के सुपरिचित ही थे।

बुद्धन ने खड़े होकर कहा, ‘‘पहले दिल्ली से आए श्रीराम अपने पक्ष को पेश करें।’’

पिताजी खड़े हुए और संक्षेप में अपनी बात रखी, ‘‘प्रधानजी और आदरणीय पंचो! मेरी खेत और घेर की जगह बिक चुकी है, घर की जगह के भी बहुत ग्राहक आए, परंतु मैं गाँव से अपने संबंध समाप्त नहीं करना चाहता, इसलिए मैंने उस जमीन को नहीं बेचा। अब उसी जमीन पर मेरे ही भाई मंगत के पुत्र ने बिना इजाजत के दुकान बना ली है। यह अवैध कब्जा है। उसकी दुकान हटवाकर मेरी जमीन खाली करवाई जाए।’’ पिताजी अपनी बात कहकर बैठ गए। प्रधानजी ने सुखवीरा को इशारा किया। वह खड़ा होकर बोला, ‘‘हुजूर, मैं एक गरीब बाल-बच्चेदार गृहस्थ हूँ। खेत कुल पाँच बीघे भी पूरा नहीं है। उसमें दो भैंसों का चारा भी पूरा नहीं होता। मैंने ताऊजी की जमीन पर एक छोटी सी दुकान बना ली है। किसी गैर की जमीन पर कब्जा नहीं किया। ताऊजी का मैं भी एक बालक हूँ। वे कहें तो मैं किराया भी दे सकता हूँ। कीमत लगा दें तो मैं खरीद भी सकता हूँ। पर मेरे पास नकद रकम नहीं है। जो कीमत तय करेंगे, मैं धीरे-धीरे किश्तों में अदा कर दूँगा।’’

अब बारी पंचायत की थी। उन्होंने अंदर कमरे में आपस में दस मिनट चर्चा की। हम बाहर रहे। फिर हमें बुलाकर फैसला सुनाया। प्रधानजी बोले, ‘‘श्रीरामजी! आप तीस साल से दिल्ली में रह रहे हैं। हमें लगता है कि आप या आपका कोई पुत्र यहाँ गाँव में आकर नहीं रहनेवाला। खेत की जमीन आप बेच चुके, घर टूट गया। जब भी आप यहाँ आओगे तो आपको मकान बनाना पड़ेगा। पंचायत मानती है कि यह भी आपके परिवार का बालक है। आप या आपका कोई सा पुत्र गाँव में अपना मकान बनाकर रहने का इरादा करता है, तो पंचायत आपके साथ है। पंचायत सुखवीर से जमीन खाली करवाकर देगी। अब इसने रकम जुटाकर दुकान बना ली है तो इसे गुजारा करने दो। हम सब सुखवीर की ओर से आपसे आग्रह करते हैं।’’

पिताजी बोले, ‘‘पंचों का फैसला स्वीकार है। हम जब अपना मकान बनाना चाहें तो हमें पंचायत जमीन खाली करवाकर दे। दुकान हटवाने का हम कोई हरजाना नहीं देंगे।’’ मैं तो चुप ही रहा। मैं किस हैसियत से बोलता। एक तरह से फैसला सुखवीर के पक्ष में ही था। मैंने यही सोचा, पंच परमेश्वर होते हैं। परमेश्वर न्यायकारी हैं तो दयावान भी हैं। सुखवीर पर गरीब जानकार उन्होंने दया की और जमीन हमारी ही रहेगी। इस प्रकार न्याय का विश्वास भी दिलाया। रात को सुखवीर ने सरसों का साग और मक्का की रोटी प्रेम से खिलवाई। सुबह ही हमें दिल्ली की गाड़ी पकड़वाने के लिए वह गुलावठी तक छोड़ने आया और हमारे पाँव छूकर वापस गया। बार-बार मन में विचार आता है, क्या पंचायत ने सुखवीर का पक्ष लेते हुए फैसला नहीं किया? उन्होंने हमें बाहर का माना और सुखवीर को गाँववाला, फिर सोचता हूँ, पंच परमेश्वर होते हैं तो दीन पर दया भी तो करेंगे।

एफ-६३, गली नंबर-३, पंचशील गार्डन

नवीन शाहदरा, दिल्ली-११००३२

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