विष्णु प्रभाकर : खुले मन के बडे़ लेखक

विष्णु प्रभाकर की जीवन-कथा सहज कदमों से बढ़ते हुए एक संवेदनशील मनुष्य की गुमनाम घाटियों से उच्च शिखर तक पहुँचने की अचरज भरी कहानी है। उत्तर प्रदेश के एक साधारण गाँव में जनमे विष्णुजी को अपने जन्म से लेकर किशोर होने तक गाँव-कस्बे का गँवई वातावरण ही मिला, जहाँ पढ़ने-लिखने के साधनों या साहित्यिक चर्चाओं की गुंजाइश कम थी, पर उन्होंने खुली आँखों से अपने आसपास के जीवन को देखा और जो कुछ पढ़ने को मिला, उसे अपने भीतर उतारते हुए धीरे-धीरे ग्राम्य संस्कृति के सहज मूल्यों और संस्कारों को ग्रहण करने लगे।

हिसार में आर्यसमाज के प्रभाव में आने पर उन्हें विचार और चिंतन का अपेक्षाकृत खुला परिवेश मिला। इससे हर चीज, हर घटना के बारे में अपने ढंग से सोचने-विचारने की लय उनके भीतर बनी। वे पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं में छपी कविता-कहानियाँ बहुत रुचि से पढ़ते, और कहीं भीतर से आवाज आती, ऐसा तो मैं भी लिख सकता हूँ...! कुछ अरसे बाद बहुत झिझकते कदमों से उन्होंने उस साहित्य-संसार की ओर कदम बढ़ाए, जिसमें बड़े-बड़े नामों की गूँज-अनुगूँज सुनाई देती थी और उन बड़े साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़कर लगता था, इस शिखर तक पहुँचने की तो बात ही क्या, उसे छू पाना भी कठिन है। यहाँ तक कि कोई उन्हें लेखक मानेगा, यह विश्वास भी नहीं होता था। खुद उनका मन भी डरा-डरा सा था। उनके हर कदम पर संकोच का साया था, पर अपने जीवन-मूल्यों के प्रति ईमानदारी, आत्मचेतनता और परिवेश के प्रति सजगता ही उनकी ताकत थी, जिसने उन्हें जाने-अनजाने लेखक बनाया। विष्णुजी ने धीरे-धीरे मन और आत्मा के संबल के साथ यात्रा शुरू की। सतत चलते रहने से उनके मन में आत्मविश्वास पैदा हुआ और जल्दी ही उनकी रचनाओं का असर नजर आने लगा। वे हिंदी के चर्चित और सुविख्यात साहित्यकारों में गिने जाने लगे।

विष्णु प्रभाकर का जन्म २१ जून, १९१२ को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक गाँव मीरापुर में हुआ था। इस छोटे से गाँव और उसकी सुंदर सांस्कृतिक परंपराओं के बारे में उन्होंने स्वयं अपनी आत्मकथा के पहले खंड ‘पंखहीन’ में लिखा है। गाँव में अलग-अलग जातियों के लोग थे, पर उनमें आपसी भाईचारा था। दूर-दूर तक सांप्रदायिक वैमनस्य की छाया तक न थी। मेले-ठेले, पर्व-त्योहार, रामलीला सबमें लोग बड़े उत्साह से जुटते। ईद हो दीवाली या दूसरे त्योहार, इन्हें मिलकर मनाने का आनंद था। ईद का त्योहार आता तो हिंदू लोग इस अवसर पर मुसलिम समुदाय के लोगों में विशेष रूप से दूध बाँटते थे, ताकि वे हँसी-खुशी सेवइयाँ बनाएँ। ताजिए निकलते तो पूरा गाँव आनंद से उमगता था। आपसी सौजन्य के ऐसे उदाहरण बहुत थे। कभी-कभी छिटपुट मतभेद उभरते तो उन्हें भी प्यार से सुलझा लिया जाता।

विष्णु प्रभाकरजी के नाम का भी बड़ा अजब किस्सा है। बचपन में उनका नाम तो था विष्णु, पर घर-परिवार के लोग और गाँववाले कभी विष्णु सिंह तो कभी विष्णु दयाल कहकर पुकारते। कुछ और बड़े हुए तो परिवारवालों को बालक की पढ़ाई-लिखाई की चिंता हुई। बारह वर्ष की अवस्था में वे पढ़ने के लिए मीरापुर से अपने मामाजी के पास हिसार आ गए। यहाँ आने पर हिसार के आर्यसमाजी स्कूल में दाखिला लिया तो नाम विष्णु गुप्त लिख लिया गया और इसी नाम से उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास की। आगे चलकर सरकारी फार्म पर नौकरी लगी तो संयोगवश वे विष्णु गुप्त से विष्णु दत्त हो गए और आगे चलकर भी यही उनका आधिकारिक नाम रहा।

विष्णुजी ने जब लिखना शुरू किया तो वे एक सरकारी नौकरी में कार्यरत थे। इसलिए उन्होंने ‘प्रेम बंधु’ छद्मनाम से लिखना शुरू किया और उनकी शुरुआती कुछ रचनाएँ इस नाम से छपीं। कुछ वर्षों तक यही नाम चला। फिर उन्होंने अपने नाम से लिखना शुरू किया। पर वे सिर्फ ‘विष्णु’ नाम से लिखते थे। अपने नाम से जुड़ा ‘दत्त’ उन्हें प्रिय न था। इसके अलावा संभवतः पहचान छिपाने की कोशिश यहाँ भी रही हो। कारण यही कि वह पराधीनता का काल था और विष्णुजी सरकारी नौकरी में थे, इसलिए कई तरह के संकट थे। समीक्षाएँ वे ‘सुशील’ नाम से लिखते थे। बाद में वे विष्णु प्रभाकर हुए। सुविख्यात लेखक के रूप में इसी नाम से साहित्य-जगत् में चर्चित हुए।

पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, जो अपने विशिष्ट साक्षात्कारों के लिए मशहूर हुए, ने ‘मैं इनसे मिला’ पुस्तक के दूसरे भाग के लिए विष्णुजी से मुलाकात की, तो बातचीत का प्रारंभ इसी दिलचस्प सवाल से हुआ। कमलेशजी ने जानना चाहा, ‘‘आपके नाम के साथ यह जो प्रभाकर शब्द जुड़ा है, उसका क्या अर्थ है? यह आपका गोत्र है या प्रभाकर परीक्षा पास करने के कारण आपने इसे अपने नाम का अंग बना लिया है?’’

इस पर विष्णुजी मुसकरा दिए। उनका जवाब भी वैसा ही रोचक था, जिससे उस समय और समाज की रीतियों पर भी प्रकाश पड़ता है। विष्णुजी ने कहा, ‘‘आपने बड़े रोचक ढंग से प्रश्न की शुरुआत की है, कमलेश भाई। न जाने कितने व्यक्तियों ने मुझसे यह प्रश्न पूछा है। मन करता है कि एक प्रहसन लिख डालूँ। वस्तुतः मेरे नाम की कहानी इतिहास बन गई है। बात यह है कि मेरे माता-पिता ने मेरा नाम केवल विष्णु रखा था। उसके कई कारण थे। वह सुधार का युग था।...आज की तरह साहित्यिक नामों का आविष्कार तब तक नहीं हुआ था। लेकिन देवी-देवताओं और महापुरुषों के नाम पर संतान का नाम रखने में लोग रुचि लेने लगे थे। इसलिए मेरे बड़े भाई का नाम ब्रह्मा रखा गया। ब्रह्मा के बाद स्वाभाविक है कि विष्णु हों। इसलिए मैं विष्णु बन गया।...घर के लोग प्यार से मुझे विष्णु सिंह या विष्णु दयाल कहकर पुकारते थे। फिर एकदम हिसार पहुँच गया। मामाजी आर्यसमाजी थे। वहाँ के सुप्रसिद्ध आर्यसमाजी स्कूल में नाम लिखाने का अवसर आया तो मैं विष्णु गुप्त हो गया। इसी नाम के सहारे दसवीं पास की। परंतु आर्थिक कारणों से कॉलेज जाना संभव न हो सका और वहाँ के सरकारी फार्म पर नौकरी करनी पड़ी।...संबंधित क्लर्क ने मेरी सर्विस बुक भी तैयार कर दी। लेकिन जब मुझे हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया तो मैं चौंक पड़ा। मेरा नाम विष्णु गुप्त नहीं, विष्णु दत्त लिखा हुआ था। क्लर्क महोदय ने उत्तर दिया, ‘‘इस कार्यालय में कई गुप्त पहले ही मौजूद हैं। एक और बढ़ जाने से असुविधा भी बढ़ जाती, इसलिए मैंने दत्त कर दिया।’’ तब से आज तक मैं अधिकृत रूप से दत्त ही कहलाता हूँ। यह नाम मुझे कभी पसंद नहीं आया और जब मैंने लिखना शुरू किया तो इस दत्त शब्द का प्रयोग कभी नहीं किया।

‘‘एक संपादक बोले, विष्णु नाम बहुत छोटा है, आपने कोई परीक्षा पास की है? मैंने उत्तर दिया, जी हाँ, मैंने हिंदी प्रभाकर की परीक्षा पास की है। वे बोले, तब मैं आपका नाम विष्णु प्रभाकर लिखूँगा। मुझे यह नाम प्रिय लगा और मैंने निश्चय किया कि अब मेरा नाम विष्णु प्रभाकर ही रहेगा।’’ (विष्णु प्रभाकर : संपूर्ण साक्षात्कार, पृ. १७-१८)

विष्णुजी का परिवार संयुक्त परिवार था। उन्होंने अपने बाबा मुरब्बी और स्नेहवत्सला दादी का बड़े आत्मीय ढंग से वर्णन किया है। बाबा गाँव के जाने-माने शख्स थे, जिनका दूर-दूर तक नाम था। उनका व्यक्तित्व एकदम कड़क, प्रभावशाली और आकर्षक था। खरे आदमी थे, बगैर लाग-लपेट के सीधी बात कहते। इसी कारण लोग उनकी इज्जत करते थे। उनका व्यक्तित्व बहुत खुला हुआ था। यों तो वे परंपरावादी थे, पर नएपन को ग्रहण करने में भी पीछे नहीं रहते थे। उनमें एक तरह का खुलापन और उदारता भी थी। विष्णुजी ने लिखा है कि दीवाली आती तो जब तक वे हरिजनों के घर जलेबी नहीं बाँट आते थे, अपने मुँह में मिठाई का एक दाना तक नहीं डालते थे। दीवालीवाले दिन हरिजन परिवारों में वे घर-घर जाते और सबको थोड़ी-थोड़ी जलेबियाँ अपने हाथ से देते। उसके बाद ही घर में दीवाली मनाई जाती। विष्णुजी ने इस बात का भी जिक्र किया है कि उनके बाबा के हृदय में दलित और उपेक्षित वर्ग के लोगों के लिए एक विशेष तरह की ममता थी और वे कष्ट में हों तो उनकी मदद करने के लिए वे उत्सुक हो उठते थे।

बचपन में दादी बच्चों को कहानियाँ सुनाया करती थीं। सबको आँचल की ओट बैठा लेतीं और तरह-तरह की कहानियाँ सुनातीं। उनमें जीवन के नए-नए अनुभव थे, रस था और रोमांच भी। बालक विष्णु को दादी से कहानियाँ सुनना बहुत अच्छा लगता था। इन कहानियों को सुनते हुए वे कल्पना के पंखों पर उड़ने लगते और आनंद से भर उठते थे। उनके लेखक बनने की नींव शायद यहीं से तैयार हुई।

विष्णु जब मीरापुर की एक पाठशाला में पढ़ने गए तो उनकी खुशी का पार न था। दादी उन्हें कहानी सुनाया करती थीं कि राजकुमार जब पढ़ने गया तो उसके पास सोने की तख्ती, चाँदी की कलम और हीरे की दवात थी। बालक विष्णु ने भी मन में अपने लिए ऐसा ही सपना सँजो रखा था, पर उन्हें तो ऐसा कुछ न मिला। इससे वे हतप्रभ से हो गए। उनकी आत्मकथा के पहले खंड ‘पंखहीन’ में यह प्रसंग बड़े मार्मिक शब्दों में उभरा है—

‘‘सबकुछ हुआ, लेकिन एक बात न हो सकी। मैंने कल्पना की थी, जब मैं पढ़ने जाऊँगा तो दादी की कहानी के राजकुमार की तरह मेरे पास भी सोने की तख्ती, चाँदी की कलम और हीरे की दवात होगी। लेकिन मिली काठ की तख्ती, सरकंडे की कलम और मिट्टी की दवात, बड़ी निराशा हुई। तब यह तक मेरे बाल मन को प्रभावित नहीं कर सकता था कि दीया सोने का हो या मिट्टी का, महत्त्व उसकी लौ का ही होता है। फिर भी पाठशाला जाने की खुशी थी। याद नहीं पंडित उमादत्त की पाठशाला में कितने दिन पढ़ना हुआ। इतना अवश्य याद है कि वहाँ पहाड़े बहुत रटने पड़ते थे। तब दशमलव प्रणाली तो प्रचलित थी नहीं, इसलिए पव्वा, अद्धा, पौना, सवैया, ड्योढ़ा, ढैया, हूँटा, खींचा, पौंचा सबकी तोतारटंत होती थी। सभी बालक सामूहिक स्वर में प्रार्थना जैसे बोलते थे, जैसे एक पव्वा पव्वा, दो पव्वा आध, तीन पव्वा पौना, चार पव्वा एक। आदि-आदि।’’ (वही, पृ. ४७)

विष्णुजी के पिता का नाम था दुर्गाप्रसाद और माँ थीं महादेवी। माँ बड़े घर की बेटी थीं और स्वाभिमानी थीं। उनमें आत्मसम्मान बहुत था। इतना ही नहीं, वे बहुत विचारशील थीं और दूर तक की सोच सकती थीं। उन्होंने ही बेटों की पढ़ाई के बारे में सोचा और उन्हें पढ़ने के लिए हिसार भेजा। इसके बरक्स उनके पिता बिल्कुल दुनियादार न थे और हर वक्त पूजा-पाठ में लगे रहते। पिता की तंबाकू की दुकान थी, जो बहुत अधिक नहीं चलती थी। वे सुबह तीन बजे उठकर पूजा-पाठ में लग जाते। दस बजे दुकान खोलते। शाम को चार बजे दुकान बंद कर देते, फिर एक मंदिर में बैठकर घंटों पूजा करते। यही उनका नित्य का नियम था। पर पढ़ने का चाव था, बेचने के लिए तरह-तरह के तंबाकू के टोकरे। ऐसे ही एक टोकरे में किताबें भरी रहतीं, जिनमें ‘सुखसागर’ से लेकर किस्से-कहानी की किताबें भी थीं। ‘किस्सा साढ़े तीन यार’ और ‘हातिमताई’ सबसे पहले उन्होंने वहीं पढ़ा। विष्णुजी ने लिखा है कि उनका पहला पुस्तकालय वही था।

अपनी आत्मकथा में विष्णुजी ने पिता की शख्सियत को भी उकेरा है। उन्हें लोग ‘भगतजी’ कहकर पुकारते थे और यह नाम उन पर फबता भी खूब था। दिन भर पूजा-पाठ में लगे रहनेवाले धर्मभीरु पिता दुनियादार नहीं थे और किसी और ही दुनिया के शख्स जान पड़ते थे। मानो वे इस संसार में रहते हुए भी संसार के प्राणी न हों। आत्मकथा में विष्णुजी ने इसकी भी खुलकर चर्चा की है—

‘‘मेरे पिता मेरी याद में भगतजी के नाम से जाने जाते थे। पिछला जन्म यदि होता हो तो वे निश्चय ही बैरागी रहे होंगे। उनके पूजा-पाठ का कोई अंत नहीं था। सवेरे तीन बजे से रात दस बजे तक पूजा करते। उसके बाद दुकान खोलते। चार बजे बंद कर देते और रात के दस बजे तक एक मंदिर में पूजा-पाठ करते। दुकान पर काम न रहा तो भागवत या सुखसागर आदि पढ़ते रहते। ज्योतिष का भी अच्छा अध्ययन किया था। जन्मपत्री बनानेवाले पंडितों से लंबी बहस करते देखा है मैंने उनको। उनकी दुकान में नाना रूप तंबाकू के टोकरों के साथ एक और टोकरा रहता था, उसमें किताबें भरी रहती थीं। मेरा पहला पुस्तकालय वही था। यहीं पर मैंने भागवत से लेकर ‘किस्सा साढ़े तीन यार’ तक से परिचय प्राप्त किया था। ‘हातिमताई’ के किस्से पढ़ते मैं अघाता नहीं था। उन दिनों ‘चंद्रकांता’, ‘चंद्रकांता-संतति’ और ‘भूतनाथ’ के साथ-साथ राधेश्याम की रामायण भी बहुत लोकप्रिय थी। इन पुस्तकों ने कितने लोगों को हिंदी पढ़ने के लिए प्रेरित किया, इसका लेखाजोखा आज किसके पास है। मुझे याद है कि मेरे पिताजी की दुकान के बराबर हबीब दर्जी की दुकान थी। मशीन चलाते-चलाते भी वह राधेश्याम रामायण का सस्वर पाठ किया करता था। खुशी की बात है कि आज फिर हमारा ध्यान ‘चंद्रकांता’ और ‘चंद्रकांता संतति’ की ओर जा रहा है। हम फिर से अपने को खोज रहे हैं। मैं तो केवल इतना ही कह सकता हूँ कि इन पुस्तकों ने ही मुझे कल्पना के पंखों पर बैठकर उड़ना सिखाया था।’’ (वही, पृ. ३५)

उन दिनों साधन सीमित थे, पर लोग हँसी-खुशी आपस में मिलते-जुलते थे। आपस में प्रेम था और सादगी के साथ-साथ जीवन में खुशियाँ थीं। इसी तरह उन दिनों त्योहारों का आनंद निराला था। और दीवाली तो ऐसी थी कि दीयों के प्रकाश में सारी दुनिया जगमग-जगमग हो जाती थी। कतार की कतार जलते दीयों और कंदीलों का सौंदर्य भी क्या खूब था! विष्णुजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है—

‘‘उन दिनों बिजली नहीं थी, मोमबत्तियाँ भी नहीं थीं। कड़वे तेल से भरे छोटे-छोटे हजारों दीये जगमग-जगमग कर देते थे। अमावस्या की उस काली रात को जनशक्ति का इससे सुंदर प्रतीक और क्या होगा? बाँसों के बड़े-बड़े साँचे बनाकर उन्हें अपनी-अपनी दुकानों के खंभों से बाँध देते थे। उन पर गीली मिट्टी के सहारे दीये जमाते, उनमें तेल और बत्तियाँ डालते, फिर उन्हें प्रज्वलित करते, रंगीन कागजों के तरह-तरह के कंदील भी बनाते थे। तब एक कंदील बहुत बड़ा होता था। उसके भीतर पशु-पक्षियों की वैसी गोलाकार घूमती पट्टी रहती थी। दीया जलने पर हवा के दबाव के कारण ये आकृतियाँ बड़ी तेजी से घूमती थीं।’’ (वही, पृ. ६७)

इतना ही नहीं, त्योहार पूरे समाज को एकता के सूत्र में बाँध देते थे। उससे भाईचारा मजबूत होता था और आपसी प्यार भी बढ़ता था—

‘‘अच्छी-बुरी नैतिक-अनैतिक बातें तब भी होती थीं, लेकिन तब ये त्योहार जिस तरह हम सबको एक सूत्र में बाँधे रखते थे, यह स्थिति अब नहीं रह गई है। होली, ईद और मोहर्रम पर भी ऐसे ही दृश्य देखने की मुझे याद है। मैंने पहले एक प्रसंग में बताया है कि ईद के दिन हिंदू लोग अपनी गायों का दूध मुसलमानों में बाँट देते थे। मोहर्रम के अवसर पर जब ताजिए निकलते थे, तो हिंदू लोग भी भेंट चढ़ाकर पूजा किया करते थे।’’ (वही, पृ. ६७)

इसी तरह संयुक्त परिवार का अपना आनंद था, पर उसकी मुश्किलें अपनी जगह थीं, जिसे बचपन में विष्णुजी ने महसूस किया। उन्होंने एक दिलचस्प घटना का वर्णन भी किया है कि जब वे छोटे थे, तो चाचा ने उन्हें गोद लेना चाहा और इसकी पूरी तैयारियाँ भी हो गईं। जब उसके लिए धार्मिक रस्म की जाने लगी, तो बालक विष्णु से भी पूछा गया, पर उन्होंने इनकार कर दिया। इस पर गोद देने की वह रस्म रोक दी गई और वे चाचा के दत्तक पुत्र बनते-बनते रह गए। उस समय तो विष्णु इतने छोटे थे कि उन्हें कुछ बोध ही नहीं था। जो कुछ उन्होंने कहा होगा, वह भी सचेत भाव से न कहा होगा। पर कुछ बड़े होने पर माँ ने बताया तो उन्हें कुछ अचरज हुआ।

पर यहीं से उनके व्यक्तित्व में कुछ उलझन और बेचैनियाँ भी शुरू हुईं। चाचा अमीर थे। उनकी कपड़े की दुकान थी, जो खूब चलती थी। चाचा खूब कमाते थे तो उनका रहन-सहन भी अमीरी का था और घर में वैसा ही रोबदाब भी था। बाद में हुआ यह कि विष्णुजी को तो वे गोद न ले सके, पर उनके छोटे भाई को गोद ले लिया। इससे फर्क क्या पड़ना था? दोनों भाइयों में प्रेम था और वे साथ-साथ ही खेलते थे। पर सामाजिक-पारिवारिक वातावरण में बहुत सी ऐसी चीजें थीं, जो मन में गुत्थियाँ पैदा कर देतीं। विष्णुजी के साथ भी यही हुआ।

उन्हें बार-बार यह अहसास कराया जाता कि अगर चाचा गोद ले लेते तो उसका पूरा जीवन ही बदल जाता। चाचा अमीर हैं तो खूब सुख भोगता, ठाट से रहता और कोई मुश्किल न होती। और सच तो यह है कि चाचा ने छोटे भाई को गोद लिया तो उसके जीवन-स्तर में फर्क आ गया था। उसके कपड़े, रहन-सहन, सब में अमीरी झलकने लगी थी। विष्णु सोचते, इससे क्या फर्क पड़ता है? पर धीरे-धीरे उनके भीतर हीनता घर करती गई।

एक छोटी सी घटना बरसों तक उन्हें याद रही। एक बार चाचा ने उन्हें चार पैसे दिए, पर छोटे भाई को पाँच पैसे मिले। बालक विष्णु ने शिकायत की। इस पर चाचा ने उन्हें एक पैसा और दिया, पर साथ ही छोटे को भी एक पैसा और दे दिया। यानी उसके पास फिर भी एक पैसा ज्यादा ही रहा। बात सिर्फ एक पैसे की थी, पर विष्णु को चोट पहुँची। वे दुःख और अपमान से छटपटा उठे। बाद में ऐसी घटनाएँ कम होने की बजाय बढ़ती गईं और विष्णुजी के भीतर हीनता-बोध भी बढ़ने लगा। इसके लिए अनायास उनके मन में यह कोशिश शुरू हो गई कि वे औरों से कुछ अलग दिखें। शायद उनके लेखक होने की बुनियाद यहीं से पड़ी।

उन दिनों स्वराज्य के लिए देश भर में आंदोलन चल रहा था। जगह-जगह सभाएँ होतीं। एक बार चाचा के साथ बालक विष्णु भी एक जनसभा में गया। उसमें एक कांग्रेसी नेता के पाँच बरस के बेटे ने मंच पर खड़े होकर अपनी तुतलाती भाषा में अपील की कि सब लोग खद्दर पहनें। इस पर खूब तालियाँ बजीं। एक छोटे से मासूम बच्चे द्वारा कही गई इस बात ने सबको प्रभावित किया।

चाचा ने विष्णु की ओर देखते हुए कहा, ‘‘देखो, एक छोटे से बच्चे ने कैसा कमाल कर दिया!’’

बात विष्णु के भीतर घर कर गई। कुछ दिन बाद की बात है, पिता के साथ वे कहीं जा रहे थे तो बाजार में खद्दर की धोती देखकर उसे लेने की जिद की। पिता ने एक नजर उस धोती पर डाली, फिर बच्चे को जोर का चाँटा जड़कर बोले, ‘‘तू जरा सा बच्चा इसे पहनेगा कैसे?’’ बच्चा हक्का-बक्का रह गया, जैसे उसके भीतर की उमंग को वहीं बुझा दिया गया हो। उस बच्चे को खादी पहनने की अपील करने पर खूब तालियाँ और वाहवाही मिली, पर उन्हें खद्दर पहनने की बात कहने पर जोर का चाँटा। भला यह कैसा न्याय?

तभी उन्होंने मन-ही-मन प्रतिज्ञा की कि वे जीवन में खद्दर पहनेंगे। और इस व्रत को उन्होंने जीवन भर निभाया। उस समय परिवार में और लोग भी खद्दर पहनते थे। आजादी मिलने के बाद धीरे-धीरे सबने छोड़ दिया, लेकिन विष्णुजी ने बचपन में जो संकल्प किया था, उसे कभी भूले नहीं। खद्दर का पाजामा, कुरता और टोपी, यही उनकी पहचान बन गए।

बारह वर्ष की अवस्था में विष्णु अपने मामा के पास रहकर पढ़ने के लिए मीरापुर से हिसार आए। यहाँ पढ़ने के लिए बहुत कुछ था। उनकी दुनिया विस्तृत होने लगी। वे लिखते हैं—

‘‘मामाजी के घर में बहुत किताबें थीं। फिर आर्यसमाज का पुस्तकालय भी था। खूब पढ़ा मैंने प्राचीन साहित्य। वेद (हिंदी भाष्य), पुराण, बाइबिल, कुरान, महाभारत, रामायण सब पढ़ डाले। इसके अतिरिक्त प्रेमचंद, प्रसाद, बंकिम, रवींद्र, शरत और खांडेकर आदि उस समय के लेखकों से भी परिचय हुआ। पढ़ते-पढ़ते मेरे मन में अपना नाम भी छापे में देखने की इच्छा प्रबल हो उठी। यह सन् १९२६ की बात है। मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन चुपचाप ‘बालसखा’ पत्रिका को एक पत्र लिखा और आश्चर्य, वह छप भी गया। कितना खुश हुआ था मैं, कैसे बताऊँ! मेरे साथी मेरी ओर गर्व से देखने लगे। परिणाम यह हुआ कि पढ़ने-लिखने की लालसा बलवती होने लगी।’’

इस तरह प्रारंभ से ही विष्णुजी के मन में अपने लेखक होने की जो धुँधली सी अस्पष्ट छवि थी, उसका पहला संकेत सन् १९२६ में मिला। घर में बच्चों की प्रसिद्ध पत्रिका ‘बालसखा’ आती थी। उसे वे रुचि से पढ़ते थे। उसमें बच्चों के पत्र भी छपते थे। एक दिन उन्होंने उसमें पत्र लिखा, ‘‘मेरा छोटा भाई मुझे बहुत तंग करता है। मैं क्या करूँ?’’ उनका वह नन्हा सा पत्र प्रकाशित हुआ। संपादक ने उसका बड़ा सुंदर उत्तर भी दिया। अपना छपा हुआ नाम और पत्र देखकर विष्णुजी की खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी। उन्हें जान पड़ा, यह खुशी कुछ अलग सी है। इसमें कुछ ऐसी आत्मिक तृप्ति मिलती है, जो विरल है। यह अहसास देर तक उनके मन में बना रहा।

इतना ही नहीं, उन्होंने भाषण देना और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेना भी शुरू किया। उनका शब्दों का उच्चारण बहुत साफ था। हिंदी बहुत अच्छी बोलते थे और वे जो कुछ पढ़ते थे, उसकी गहरी छाप भी उनके भाषणों में नजर आती थी। इसलिए सब ओर उनकी चर्चा होने लगी। अब आगे का रास्ता मानो खुद ही प्रकाशित हो रहा था। स्वयं विष्णुजी ने इस बारे में लिखा है—

‘‘शुद्ध हिंदी बोलता था, इसलिए स्कूल की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में मेरी धाक जम गई। कुमार सभा में भाषण देने लगा। दसवीं पास करने के बाद तो आर्यसमाज में भी भाषण देने लगा। बाद में तो गुरुद्वारों, मसजिदों, जनसभाओं, सभी जगह मेरी पुकार होने लगी।’’

यह अपने ‘होने’ के अहसास की शुरुआत थी।

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मई १९२९ में विष्णुजी ने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी समय उन्होंने हिसार में गवर्नमेंट कैटल फार्म में दफ्तरी के रूप में नौकरी शुरू की। कुछ समय बाद क्लर्क हो गए, पर मन में सपना तो कुछ और ही था। घर में साहित्यिक पुस्तकें और पत्रिकाएँ आतीं। उन्हें पढ़ते तो लगता, ‘अरे, ऐसा तो मैं भी लिख सकता हूँ।’ अपने आसपास के जीवन को देखते तो लगता, ‘इस दुनिया में कितना कुछ है, जो मुझे लिखने के लिए न्योत रहा है। मुझे भी लिखना चाहिए। जरूर लिखना चाहिए। लिखने का आनंद ही कुछ अलग है।’ और एक दिन उन्होंने स्वामी दयानंद पर जो भाषण दिया था, उसी को एक अखबार में लेख के रूप में छपने भेज दिया। लेख की स्वीकृति मिली तो वे रोमांचित हो उठे। उस समय की अपनी मनःस्थिति पर उन्होंने लिखा—

‘‘हाँ, तब चुपके-चुपके लिखा भी करता था। लाहौर से उन्हीं दिनों हिंदी में एक नया पत्र निकला ‘हिंदी मिलाप’। दीवाली के अवसर पर मैंने स्वामी दयानंद के जीवन पर एक लिखित भाषण दिया था। उसी को मैंने लेख के रूप में उस पत्रिका को भेज दिया। आर्यसमाज की पत्रिका थी। लेख तुरंत स्वीकृत हो गया। तब मेरी क्या दशा हुई, बाप रे...मेरा लेख छपेगा! मैं लेखक...न-न, नाम मैंने अपना नहीं दिया था, क्योंकि तब मैं सरकारी नौकर था। यह त्रासद कहानी भी मुझे लेखक बनाने में सहायक हुई और मैंने अपना छद्म नाम रखा, ‘प्रेम बंधु’। कई वर्ष चला यह नाम।’’

पर यह तो बात हुई लेख की। मन में तो उसी तरह का रचनाकार होने की बात उमग रही थी, जैसे प्रेमचंद थे, जैनेंद्र थे और उस दौर के बहुत से और लेखक थे, जिनकी कहानी और उपन्यासों की धूम थी। विष्णुजी के मन में अपने कहानीकार होने का बिंब बनने लगा। पहली कहानी उन्होंने लिखी ‘दीवाली के दिन’। नवंबर १९३१ में लाहौर के ‘हिंदी मिलाप’ में उनकी यह कहानी छपी। यों ‘दीवाली के दिन’ उनकी प्रकाशित पहली रचना थी, जिसके आगे एक लंबा सिलसिला चलनेवाला था। कहानी कच्ची थी, स्थूल थी, पर भाषा कुछ सधी हुई थी। विष्णुजी के बड़े भाई ब्रह्मानंदजी ने पढ़ा तो उन्होंने भी कहानी की भाषा की प्रशंसा॒की।

सच तो यह है कि विष्णुजी इस समय किसी नव विहग की तरह अपने पंखों को तौल रहे थे। अभी लेखकीय आत्मविश्वास पूरी तरह नहीं आया था। छिटपुट कुछ और चीजें भी छपने लगीं तो धीरे-धीरे लगा, हाँ, मैं भी कुछ लिख सकता हूँ। उन्होंने जैसे अपने आपको ठकठकाया, ‘मुझे लिखना है...लिखना है! मैं लिखने के लिए बना हूँ और यही मेरी पहचान भी है।’

१९३४ से विष्णुजी ने नियमित लिखना शुरू कर दिया। इस समय उनकी अवस्था थी चौबीस वर्ष। पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ निरंतर छपने लगीं। मित्रों और आसपास के लोगों को भी पता चला। सबके मन में विष्णुजी के प्रति आदर का भाव था। विष्णुजी खुद भी बड़ी सार्थकता और तृप्ति का अनुभव कर रहे थे। उन्हें लगा, कलम की शक्ति कम नहीं है। निरंतर लिखकर भी मैं कुछ बड़े काम कर सकता हूँ। अपने शब्दों की ताकत से सोए हुए देश और समाज में नई चेतना फूँक सकता हूँ।

२६ वर्ष की अवस्था में ३० मई, १९३८ को विष्णुजी का विवाह सुशीला मांगलिक से हुआ। बरात कनखल (हरिद्वार) गई। बरात में जैनेंद्र, नेमिचंद्र जैन और प्रभाकर माचवे सरीखे हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार शामिल हुए। सुशीलाजी की साहित्य में रुचि थी। वे बहुत समझदार, पढ़ी-लिखी और संवेदनशील महिला थीं। उन्होंने गर्व से अपनी सहेलियों को बताया कि उनके पति एक बड़े साहित्यकार हैं। जीवन भर उन्होंने विष्णुजी का साथ दिया और सही अर्थ में जीवन सहचरी बनीं।

इसी तरह समय बीता। विष्णुजी अपने भीतर एक नई ऊर्जा, नया स्फुरण महसूस कर रहे थे। जैसे शब्दों के सहारे आकाश में उड़ने का सुख क्या है, वे जान गए थे। सन् १९३८ में सुभाषचंद्र बोस हिसार आए तो उन्हें अभिनंदन-पत्र दिया गया। वह विष्णुजी ने ही लिखा था। जिस सभा में वह पढ़ा गया, उसमें विष्णुजी भी उपस्थित थे। बाद में जब सुभाषचंद्र बोस को बताया गया कि यह अभिनंदन-पत्र विष्णु प्रभाकर ने लिखा है तो उन्होंने बहुत प्रशंसा की। गद्गद होकर विष्णुजी ने झट सुभाष बाबू के पैर छू लिये। उस क्षण वे इतने भावावेश में थे कि शरीर की कोई सुध-बुध नहीं। मानो वे वहाँ थे ही नहीं।

धीरे-धीरे प्रसिद्ध पत्रिकाओं में विष्णुजी की रचनाएँ छपने लगीं तो साहित्यिक जगत् में भी एक पहचान बनी। एक उभरते हुए सचेत लेखक के रूप में पहचान, पर साथ ही वे स्वाधीनता संग्राम में भी बराबर हिस्सा लेते रहे। सरकारी नौकरी थी। हर समय खतरा सिर पर मँडराता रहता, पर विष्णुजी ने ज्यादा परवाह नहीं की। उन्हें लगा, देश पुकार रहा है। अगर मैंने उसकी पुकार को अनसुना किया तो भला मैं कैसा लेखक हूँ!

विष्णुजी लिख ही नहीं रहे थे, असंख्य पाठकों के दिलों में उनके लिखे हुए के प्रभाव-बिंब बनने लगे थे। उनकी कहानियों की खासी प्रशंसा होने लगी थी। यहाँ तक कि प्रेमचंद और जैनेंद्र ने भी उनकी कहानियों को सराहा। ‘हंस’ में उन्होंने अपनी कुछ कहानियाँ भेजीं तो प्रेमचंद का पत्र मिला। उन्होंने कहानियों की तारीफ करते हुए कहा कि वे कुछ सुधारकर इन्हें ‘हंस’ में छापेंगे। विष्णुजी को इस बात से गहरी तृप्ति मिली। पर प्रेमचंद के आकस्मिक निधन से बात वहीं की वहीं रह गई। बाद में शिवरानी देवी और फिर जैनेंद्र ने ‘हंस’ का संपादन सँभाला। विष्णुजी के ‘हंस’ से पारिवारिक संबंध बन चुके थे। उनकी कहानियाँ सम्मान के साथ ‘हंस’ में छपीं, पर जैनेंद्र ने एक बात लक्षित की। उस दौर की विष्णुजी की कहानियों में भावुकता कुछ अधिक थी। उन्होंने भावुकता के अतिरेक से बचने की सलाह दी। जैनेंद्र के शब्द थे, ‘‘तुम्हारी कहानियों में भावुकता बहुत है। इससे बचो। अगर कहानियों में भावुकता की मुलायमियत के बजाय परपज का कुछ काठिन्य आ जाए तो बेहतर है।’’

जैनेंद्रजी बड़े लेखक थे। विष्णुजी के मन में उनके लिए बड़ा आदर था। उन्होंने बड़े विनम्र भाव से उनकी सीख को ग्रहण किया। अपनी कहानियों को खुद ही सतर्क निगाहों से देखते हुए कुछ माँजा भी। अब उन्होंने नई ऊर्जा के साथ कहानियाँ लिखीं। सभी जानी-मानी साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ बड़ी प्रमुखता से छपने लगीं।

कुछ समय बाद विष्णुजी एक लंबी साहित्यिक यात्रा पर निकल पड़े। एक ओर चिरगाँव (झाँसी) में मैथिलीशरण गुप्त और सियारामशरण गुप्त सरीखे साहित्यिकों से वे मिले तो दूसरी ओर बनारसीदास चतुर्वेदी से, जिन्होंने कुंडेश्वर को एक साहित्यिक तीर्थ जैसा बना दिया था।

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हिसार से दिल्ली आने के बाद एक संस्था में विष्णुजी ने कुछ समय पार्टटाइम काम किया, फिर मुक्त हो गए। बाद में सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत और नाटककार जगदीशचंद्र माथुर के आग्रह पर वे कुछ समय के लिए आकाशवाणी के नाट्य प्रभाग से जुड़े। आकाशवाणी को आम जनता का प्रिय माध्यम बनाने के लिए उस समय उन्होंने बहुत से रोचक कार्यक्रम शुरू किए। नए से नए विषयों पर नाटक प्रस्तुत किए जाते, जिनमें खासी विविधता थी। लगता था, जैसे जीवन का इंद्रधनुषी रूप इन नाटकों की शक्ल में उतर आया हो। आकाशवाणी के कार्यक्रमों को उन्होंने अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने की कोशिश की। उन दिनों बड़े से बड़े साहित्यकारों से मिलना हुआ। खासकर इलाचंद्र जोशी सरीखे साहित्यकारों के साथ काम करने का अनुभव बड़ा रोमांचक था। इससे विष्णुजी के अंदर आत्मविश्वास आया और उन्होंने बहुत कुछ सीखा भी।

इसी तरह समय-समय पर उन्होंने एक से एक बड़ी जिम्मेदारियों को निभाया। रूस के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भारत आए, तो विष्णुजी को रिपोर्टिंग का काम मिला। उस समय बड़ा अभूतपूर्व दृश्य था। रूस के राजनेताओं का बड़ा ही भव्य स्वागत हुआ। लोग घरों से निकल आए। रास्ते में लोगों की अपार भीड़ थी और हवा में जय-जयकार के नारे गूँज रहे थे। आत्मकथा के दूसरे खंड ‘मुक्त गगन में’ के पन्नों पर यह पूरा प्रसंग बड़े रोचक ढंग से उभरा है—

‘‘मझे जनपथ पर स्थित आर्काइव्ज के भवन में शोभायात्रा का विवरण देना था। कोई सवारी मेरे पास नहीं थी। सब भाग रहे थे। मैं भागकर एक चलती टैक्सी पर चढ़ गया। ड्राइवर भला था। उसने मुझे रिकॉर्ड ऑफिस पहुँचा दिया, पर द्वार पर खड़े संतरी ने मुझे अंदर नहीं जाने दिया। मेरे पास प्रवेश-पत्र नहीं था। मैंने उसे समझाना चाहा, पर वह अडिग था। तभी अंदर से एक सज्जन आए। वे वहीं पर काम करते थे। उन्होंने मुझे लेखक के रूप में पहचाना और अंदर जाकर उपाधीक्षक से बात की। उपाधीक्षक ने अंततः मुझे जाने दिया और मैं रिकॉर्ड ऑफिस की छत पर जाकर शोभा यात्रा का विवरण देख सका। वहाँ से तुरंत मुझे राष्ट्रपति भवन जाना था। आकाशवाणी पहुँचकर पाया कि कोई भी गाड़ी नहीं है, तब उपनिदेशक मुझे अपनी गाड़ी में राष्ट्रपति भवन ले गए। वहाँ की रूपसज्जा और व्यवस्था का वर्णन शब्दातीत था। उल्लास और वैभव एकरूप हो गए थे। समारोह स्थल पर सबसे आगे राष्ट्रपति, मुख्य अतिथि, मंत्रिमंडल के सदस्य तथा राजदूत आदि के बैठने की व्यवस्था थी। इसके बाद सचिव आदि थे। उन्हीं के बीच मेरे बैठने का मंच था। वह एक घूमती मशीन के समान था, जिसमें मैं चारों ओर देख सकूँ। मेरे पीछे थे संसद् सदस्य।...’ (वही, पृ. १६८)

जाहिर है, आकाशवाणी में जाने पर विष्णुजी को जो मान-सम्मान मिला, और जो बड़ी जिम्मेदारियाँ उन्होंने सँभालीं, उससे उन्हें न सिर्फ आत्मिक संतुष्टि मिली, बल्कि उनके अनुभव-संसार में भी बहुत कुछ नया जुड़ा। पर फिर भी मुक्त होकर काम करने का उनका जो सपना था, वह पूरा न हो सका। और यही कारण है कि बहुत अधिक समय तक वे वहाँ न टिक सके। सन् १९५५ में वे आकाशवाणी से जुड़े थे। ३१ मार्च, १९५७ को स्वतः त्याग-पत्र देकर वहाँ से मुक्त हो गए।

इसमें संदेह नहीं कि आकाशवाणी में रहते हुए विष्णुजी को जो रोचक अनुभव हुए, उन्हें वे कभी नहीं भूले। अपनी आत्मकथा में उन्होंने बहुत रुचि लेकर, बड़े विस्तार से उन सबका वर्णन किया है। उसे पढ़ना किसी भी सहृदय को सचमुच आनंदित करता है।

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विष्णुजी मुख्य रूप से कथाकार हैं, पर उन्होंने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में लिखा है और अपने रचनात्मक स्पर्श से उसे कुछ-न-कुछ दिया है। उन्होंने उपन्यास लिखे, जीवनियाँ लिखीं, संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत लिखे और बच्चों के लिए भी प्रचुर साहित्य लिखा। यह सारा गद्य साहित्य ही है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि विष्णुजी ने कविताएँ भी लिखी हैं। ऐसी कविताएँ जो मन को छू जाती हैं। एक कविता में वे उस वैदिक उजाले की बात करते हैं, जो आज भी हमारी आत्मा को आलोकित कर रहा है। वह हमें सूरजमुखी तो बनाता है, परमुखापेक्षी नहीं बनने देता—

वैदिक ऋषियों ने

गाया था

गहन रात्रि के अंधकार में

तमसो मा ज्योतिर्गमय

हम तो सूरजमुखी हैं

चिंतन मुक्त

चिंता मुक्त

तम से मुक्त

सूरजमुखी हूँ

परमुखापेक्षी नहीं हूँ

विष्णुजी की कविताओं में ‘चलता चला जाऊँगा’ बड़ी सुंदर कविता है, जिसमें उनका मन बोल रहा है। कविता में उनके मुक्त जीवन और सततप्रवाही लेखक का संपूर्ण बिंब नजर आता है, ‘मैं बीते युग का भटका राही/नहीं जानता मेरी मंजिल कहाँ है/मैं चलता चला आ रहा हूँ/चलता चला जाऊँगा/दिन, पल, क्षण और पहर।’ एक साहित्यकार होने का अर्थ क्या है, इसे वे कविता की आखिरी पंक्तियों में बड़ी आशा और आत्मविश्वास से छलछलाते शब्दों में व्यक्त करते हैं। मानो आत्मिक आनंद से उमगते हुए शब्दों में वे कहते हैं—

मैंने प्रकाश को उगते हुए देखा है

अंधकार में

मैंने शब्द को जगते हुए देखा है शून्य में

कहीं भी तो थकी नहीं है दृष्टि

कहीं भी तो रुकी नहीं है सृष्टि

इसलिए शब्द शब्द नहीं रहा मेरे आगे

अर्थ हो गया है

सृष्टि सृष्टि नहीं रही, दृष्टि हो गई है

फिर भी रुका नहीं हूँ मैं

चलता चला आ रहा हूँ

चलता चला जाऊँगा

क्योंकि मुझे अभी दृष्टि को अर्थ देना है

और अर्थ को उसका आकार देना है

इसलिए चलता चला आ रहा हूँ

चलता चला जाऊँगा...

सुशीलाजी विष्णु प्रभाकर की पत्नी ही नहीं, सही मायने में हमसफर थीं, जिन्होंने उन्हें संकट के समय बल दिया। उनके लेखक होने में उनका बड़ा हाथ था। विष्णुजी उन्हें अपनी शक्ति मानते थे। उनकी आत्मकथा में भी बीच-बीच में जीवन सहचरी सुशीलाजी के बारे में उनकी कभी न भूलने योग्य ऐसी टिप्पणियाँ हैं, जिनके शब्द-शब्द में उनके अंतर का प्यार और मधुर भावनाएँ गुँथी हुई हैं—

‘‘मैं बयालीस वर्षों के उस संघर्षपूर्ण जीवन में जिधर भी झाँकता हूँ, उस साधारण लड़की की भाषा में मुझे वही असाधारण प्यार और अनिर्वचनीय माधुर्य परिलक्षित होता है, वह किसी मध्ययुगीन पतिव्रता का आत्मसमर्पण नहीं था, बल्कि बीसवीं सदी की जाग्रत् नारी की सही साहचर्य की कामना थी। और वह कामना उस प्रेम में से शक्ति पाती थी, जो नर-नारी के सह संबंधों का आधार है। श्रीमती लीलावती मुंशी ने पो कैरोल को उद्धृत करते हुए एक स्थान पर लिखा है, स्त्री का प्रभाव जहाँ होता है, वहाँ वह अधिकांशतः मूक होता है।...सन् १९३८ से सन् १९७९ तक की इस अवधि में शब्द जरूर बदले, पर अर्थ कभी नहीं बदला।...’’ (वही, पृ. १९१)

पत्नी का न रहना विष्णुजी के जीवन की ऐसी त्रासदी थी, जिसने उन्हें भीतर-बाहर से हिला दिया। उसे सहन कर पाना उनके जीवन का सबसे कठिन इम्तिहान था। हालाँकि वे तरह-तरह से खुद को समझाने की कोशिश करते हैं। एक जगह वे दार्शनिक ढंग से टिप्पणी करते हैं—

‘‘मनुष्य ने अपने जन्म से लेकर आज तक कितनी प्रगति की, परंतु क्या जन्म-मरण पर अंकुश लगा सका। नर है, नारी है तो नया जन्म अनिवार्य है और जब जन्म है तो मरण को कौन रोक सकता है? यह दूसरी बात है कि कुछ मरण बलिदान की संज्ञा पा जाते हैं, कुछ व्यक्ति को अमर कर देते हैं, और कुछ किसी के लिए दर्द बन जाते हैं। ऐसा दर्द, जिसको न तो स्वर दिया जा सकता है और न ही भुलाया जा सकता है। बस सहा जा सकता है। सबके बीच में रहकर अकेले सहा जाता है। यह अकेलापन कितना त्रासद होता है, यह मैं पत्नी के देहांत के बाद ही जान सका...’’ (वही, पृ. १९९)

यों विष्णुजी एकांतिक नहीं, जीवनधर्मी लेखक हैं। खुले मन के लेखक। जो भी मिलने आता, उससे खुलकर मिलते थे। लेखकों और पाठकों दोनों को ही उनका बड़ा स्नेह हासिल होता। विष्णुजी सबसे इतने प्रेम से मिलते थे कि हर कोई चकित होता था। एक बार सुप्रसिद्ध लेखक मस्तराम कपूर उनसे मिलने गए। लौटकर वे चकित थे—

‘‘मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य था। मैं दर्शनाभिलाषी नए लेखक की हैसियत से वहाँ गया था और मुझे मिला स्थापित लेखक का सम्मान। मैं इतना अभिभूत था कि कुछ कह भी नहीं पाया। विष्णुजी काफी युवा दिख रहे थे। उनके निचले होंठ ऊपर के होंठों से थोड़ा स्थूल होने से मुझे कुछ ऐसा लगा कि वे निश्छल प्यार करनेवाले और बाँटनेवाले व्यक्ति हैं।’’

विष्णु प्रभाकर ने देहदान करके एक नया आदर्श सामने रखा। उन्होंने मानो अपने शरीर को भी मानव-मुक्ति के यज्ञ में अर्पित कर दिया। यह कोई छोटी बात नहीं। इससे उनकी बड़ी सोच पता चलती है, और जो कहा, उसे पूरा कर दिखाने की जिद भी। इससे अभिभूत होकर डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं—‘‘लोग परलोक-चिंता में घुलते रहते हैं। देखो इस आवारा मसीहा को, जिसने अपने शव की अंत्येष्टि भी नहीं होने दी, जो मरकर भी काम आया।’’

सच तो यह है कि विष्णु प्रभाकर की जीवन-यात्रा और सृजन-यात्रा दो अलग-अलग चीजें न होकर, वस्तुतः एक ही थीं। उनके लेखक होने और वास्तविक जीवन के बीच कोई फाँक न थी। जो जीवन के आदर्श थे, वे लेखन के आदर्श भी बने। जो कुछ कहा, उसे जीवन में उतारा। यह भी एक बड़ा तप ही है। शब्द-तप...आत्म-तप और वाणी-तप भी!

५४५ सेक्टर-२९, फरीदाबाद-१२१००८ (हरियाणा)

दूरभाष : ९८१०६०२३२७

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