अनोखी माँग

"बाबूजी, आपने मेरा काम करवाया है, कोई सेवा बताएँ?" वह हाथ जोड़कर, नम्रता से राजेंद्र बाबू के पास खड़ा हो गया।

"अरे, नहीं-नहीं, यह तो मैंने अपना फर्ज समझकर ही किया है। जो तुम्हें मिलना चाहिए था या जो मिल सकता था, मैंने वही तो दिलवाया है, इसमें कौन सी बड़ी बात है?" राजेंद्र बाबू बोले।

‘‘नहीं बाबूजी, अगर कोई दूसरा बाबू होता तो इसके बदले में मुझसे पहले ही कुछ-न-कुछ जरूर माँगता, पर आपने तो बिना कुछ लिये-दिए ही मेरा अटका हुआ काम करवा दिया, आपको कुछ तो लेना ही पडे़गा।’’ उसने फिर दोहराया।

राजेंद्र बाबू हँस दिए, ‘‘अरे भई, अगर लेना ही होता तो मैं भी पहले ही न ले लेता, बाद में क्यों लेता?’’

मगर उसने फिर जोर दिया, ‘‘नहीं बाबूजी, कुछ तो...मैं अपनी खुशी से दे रहा हूँ।’’

‘‘अच्छा...’’ राजेंद्र बाबू ने कुछ सोचते हुए प्रश्न किया, ‘‘यह बता, तेरी घरवाली है?’’

‘‘हाँ, है।’’ सुनकर वह अचकचा सा गया।

राजेंद्र बाबू ने फिर पूछा, ‘‘कुछ बनाना-खिलाना भी जानती है?’’

‘‘हाँ बाबूजी, खाना-वाना सबकुछ अच्छा बना लेती है।’’ वह सोच रहा था, यह बाबूजी क्या ऊटपटाँग सा प्रश्न पूछ रहे हैं?

‘‘तो एक काम करना, उसके हाथ की बनी हुई कोई भी चीज या पकवान, जो भी वह बढि़या बनाती हो, लाकर मुझे खिला देना। समझो तुम्हारा फर्ज और कर्ज दोनों पूरे हो गए। मुझे घर की बनी हुई चीजें बहुत पसंद हैं।’’

‘‘ठीक है, बाबूजी।’’ कहकर वह इस अनोखी माँग के बारे में सोचता हुआ वहाँ से चला गया।

समझदारी

‘‘यार, तुम्हारे पड़ोसी से न तो तुम्हारा धर्म मिलता है, न जात-पाँत, न रहन-सहन, न विचार या स्वभाव तथा न ही कोई और खास बात, कुछ भी तो नहीं है, जो तुम्हारा एवं उसका मेल हो? फिर भी समझ नहीं आता कि तुम्हारे दोनों परिवारों में परस्पर इतना मेलजोल और भाईचारा कैसे है?’’ दोस्त ने हैरानी प्रकट करते हुए उससे पूछा।

‘‘एक चीज है, जो हम दोनों में बिल्कुल एक जैसी है और वह है हमारी समझदारी।’’ उसने उत्तर दिया।

‘‘कैसी समझदारी?’’ दोस्त और उलझ गया।

‘‘पड़ोसी धर्म निभाने की समझदारी! तुम तो जानते ही हो कि आजकल सभी जगह एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ गया है, कुछ जानकर और कुछ मजबूरीवश। मैं भी मजबूरी में यहाँ अपने परिवार से दूर रह रहा हूँ तथा यही बात मेरे पड़ोसी पर भी लागू होती है। यदि आज किसी भी परिवार पर किसी भी प्रकार का कोई संकट आता है तो सबसे पहले कौन काम आता है?’’ वह पूछ रहा था।

‘‘पड़ोसी...’’ दोस्त ने हामी भरी।

वह मुसकराया, ‘‘तो यह बात वह भी समझता है और मैं भी। इसलिए हम दोनों परिवार इतने विरोधाभासों के बावजूद एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर और भाईचारे से रहते हैं, ताकि जिंदगी में कभी कोई परेशानी न आए। वैसे रोजमर्रा के छोटे-मोटे कामों में भी हम एक-दूसरे की सुविधा का खयाल रखते हैं। वे हमारे काम आते हैं और हम उनके।’’

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