क्या उसकी मृत्यु हो गई

अब्दुल करीम, जो कि बचपन से ही पूर्वी अफ्रीका में नैरोबी में रहता था, सन् १९३८ में बंबई वापस आया। वह अपने पिता के साथ अफ्रीका गया था। उस समय उसकी आयु पाँच वर्ष की थी। उसका पिता भारत में दिवाला निकाल अपनी किस्मत आजमाने के लिए वहाँ गया था।

अब्दुल करीम अभी छोटा ही था कि उसके माता-पिता का देहांत हो गया था। उसने बंबई के एक संपन्न ‘खोजा’ परिवार की कन्या से विवाह किया, जिससे उसके दो पुत्र हुए। सन् १९३८ में उसके श्वसुर का देहावसान हुआ, तो उसकी पत्नी, सास तथा अन्यान्य रिश्तेदारों के जोर देने पर उसने अपना अफ्रीका का व्यापार बंद कर दिया और सारी संपत्ति को एकत्र कर वह पूँजी के रूप में लेकर बंबई आ गया।

बंबई आकर उसने अपने श्वसुर के व्यापार को आगे बढ़ाया और उसमें अपनी भी पूँजी लगाकर वह बहुत बड़ा सरकारी ठेकेदार बन गया।

ज्यों-ज्यों कार्य बढ़ता गया त्यों-त्यों संपत्ति में भी वृद्धि हुई और उसके साथ ही अब्दुल करीम का लालच बढ़ता गया। सौभाग्य से सन् १९३९ में उसके नाना का अपने ग्राम में देहावसान हुआ, तो वह भी उसके लिए थोड़ी-बहुत संपत्ति छोड़ गया। उस पर अधिकार करने के लिए अब्दुल करीम उनके गाँव गया। वहाँ जाकर उसे विदित हुआ कि उसके नाना ने कई वर्ष पूर्व समीप के कस्बे के किसी व्यक्ति के पास लगभग ७०० रुपए में कुछ जमीन बेची थी और उसकी उजरदारी करने के लिए अभी समय है।

यह भूमि पाँच व्यक्तियों ने मिलकर खरीदी थी और अब तक उन्होंने उस पर सुंदर भवन भी निर्माण कर लिए थे। इस प्रकार कुल मिलाकर वह भूमि अब दस लाख की बन गई थी। अब्दुल करीम वहाँ गया, तो उस संपत्ति को देख उसके मुख में पानी भर आया। उसने निश्चय कर लिया कि उस संपत्ति पर वह अपने अधिकार का अभियोग प्रस्तुत करेगा।

मुसलिम उत्तराधिकार कानून के अनुसार पुत्री का पुत्र भी अपने नाना की संपत्ति का उत्तराधिकारी माना जाता है। जिस समय भूमि बेची गई थी, उस समय अब्दुल करीम जीवित था, इसलिए उसकी संरक्षिका के रूप में सेल-डीड में उसकी माता के हस्ताक्षर होने आवश्यक थे, किंतु खरीदारों में से कोई भी नहीं जानता था कि वृद्ध का कोई नातेदार जीवित है। इस प्रकार वह सेल-डीड अपूर्ण समझा गया।

जब खरीदारों को इस विषय का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने कानूनी सलाह ली। तब उन्हें विदित हुआ कि इसमें उनका पक्ष दुर्बल है, अतः उन्होंने अब्दुल करीम से ही समझौता करने का यत्न किया। अभियोग वापस करने के लिए उन्होंने मिलकर अब्दुल करीम को दस हजार रुपए देने चाहे, किंतु उसने स्वीकार नहीं किए। उसका यह कहना कि भूमि की बिक्री वैधानिक ढंग से नहीं हुई है, अतः उनको चाहिए कि उस भूमि पर बने भवनों को वहाँ से उठा लें।

इस प्रकार दो वर्ष तक अभियोग चलता रहा, किंतु किसी प्रकार का निर्णय न हो सका।

अब्दुल करीम ने स्थानीय वकील को अपनी ओर से कचहरी में उपस्थित होने के अधिकार दे रखे थे। वह स्वयं भी यदा-कदा उपस्थित हो जाता था।

यह लगभग सन् १९४२ की बात होगी कि उन प्रतिवादियों ने यह अनुभव किया कि मुकदमा टलता जा रहा है और उससे उनका पर्याप्त धन व्यय हो रहा है। अतः सबने निश्चय किया कि अभियोग को वापस लेने के लिए अब्दुल करीम को पचास हजार रुपए दे दिए जाएँ। उसके सम्मुख यह प्रस्ताव उस समय प्रस्तुत करने का निर्णय हुआ, जब अगली पेशी पर, अब्दुल करीम वहाँ आनेवाला था।

अगली पेशी के दिन अभियोग की सुनवाई के लिए दोनों पक्षों के वकील कचहरी के बॉर-रूम में बैठे थे कि प्रतिवादियों में से किसी ने वादी के वकील से पूछा, ‘‘आज अब्दुल करीम बंबई से आया है क्या?’’

‘‘मुझे पता नहीं।’’ अब्दुल करीम के वकील ने उत्तर दिया।

‘‘क्या वह आज व्यक्तिगत रूप में कचहरी में उपस्थित होगा?’’

‘‘मैं कुछ नहीं कह सकता।’’

‘‘क्या वह वास्तव में जीवित भी है?’’ एक अन्य प्रतिवादी ने हँसी-हँसी में वकील से पूछ लिया।

‘‘क्या?’’ आश्चर्यचकित हो वकील ने पूछा।

उस व्यक्ति ने बात को बढ़ावा देते हुए कहा, ‘‘कोई मुझसे कह रहा था कि पिछले सप्ताह अब्दुल करीम की बंबई में मृत्यु हो गई है।’’

केवल हँसी में कहे गए उक्त वाक्य से प्रतिवादियों के वकीलों में से एक के मस्तिष्क में यह विचार आया कि कम-से-कम इससे कुछ समय के लिए अभियोग स्थगित किया जा सकता है। अतः जब अभियोग सुनने का समय आया, उसने अपनी आपत्ति प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह अफवाह है कि वादी की मृत्यु हो गई है। अतः उसके वकील जब तक शपथपूर्वक यह लिखकर नहीं दे देते कि वादी जीवित है, तब तक काररवाई आगे नहीं बढ़ाई जा सकती।

वादी का वकील शपथपूर्वक लिखने के लिए उद्यत नहीं हुआ। न्यायाधीश ने यह अनुभव किया कि वादी का वकील इस विषय में अनिश्चित-मन है, तो उसने अभियोग को आगामी तिथि के लिए स्थगित कर दिया और वादी के वकील को कह दिया गया कि आगामी तिथि पर वह वादी को व्यक्तिगत रूप में प्रस्तुत करे। न्यायाधीश ने १५ दिन बाद की तारीख निर्धारित कर दी।

वादी के वकील ने अब्दुल करीम को तार द्वारा इस विषय में सूचना भेज दी। उसको सावधान कर दिया कि आगामी तिथि पर वह अनिवार्यतया व्यक्तिगत रूप में कचहरी में उपस्थित हो जाए।

अब्दुल करीम ने मध्य भारत, मद्रास, त्रावणकोर-कोचीन आदि विभिन्न स्थानों पर अनेक ठेके ले रखे थे और समय-समय पर अपने कार्य के निरीक्षण के लिए उसे इन स्थानों पर जाना पड़ता था।

अब्दुल करीम के सहायक को जब वकील का तार मिला, तो उसने वह रजिस्ट्री द्वारा लिफाफे में बंद कर वहाँ भेज दिया, जहाँ अब्दुल करीम के होने की संभावना थी, किंतु रजिस्ट्री के पहुँचने से पूर्व ही दुर्भाग्यवश अब्दुल करीम वहाँ से अन्यत्र चला गया था। वहाँ बिना खुले वह पत्र फिर अब्दुल करीम को री-डायरेक्ट कर दिया गया। परिणाम यह हुआ कि निश्चित समय तक अब्दुल करीम को वकील की सूचना का तार नहीं मिला और वह कचहरी में उपस्थित न हो सका।

जज ने वादी के वकील से पूछा, ‘‘क्या अपने ‘क्लाइंट’ को कोर्ट की आज्ञा से अवगत कर दिया था?’’

‘‘जी हुजूर, मैंने उसको तार भेज दिया था, जिसकी रसीद यह है।’’ उसने तार की रसीद प्रस्तुत कर दी।

‘‘क्या आपको इसका उत्तर प्राप्त हुआ है?’’

‘‘नहीं श्रीमान्।’’

‘‘क्या आप जानते हैं कि उसकी मृत्यु नहीं हुई?’’

‘‘मैं कुछ नहीं कह सकता।’’

इस पर जज कहने लगा, ‘‘इस परिस्थिति में अभियोग की काररवाई आगे नहीं चलाई जा सकती। वादी के जीवित होने का प्रमाण प्रस्तुत करना आपका ही कर्तव्य है।’’

‘‘जनाब, कृपा कर मुझे कुछ समय और दे दीजिए। यदि वह जीवित हुआ, तो आगामी तिथि पर मैं उसे न्यायालय में उपस्थित कर दूँगा।’’

इस प्रकार १५ दिन का समय और दे दिया गया, किंतु अब्दुल करीम मद्रास, त्रावणकोर, मध्य भारत के किन्हीं स्थानों में अपने कार्यनिरीक्षण के लिए भ्रमण कर रहा था। अतः इस बार भी उसको वकील की सूचना कि उसको व्यक्तिगत रूप में कचहरी में अनिवार्यतया उपस्थित होना है, नहीं मिली। यह सूचना उसको निश्चित तिथि के ठीक एक दिन बाद प्राप्त हुई।

आगामी तिथि पर भी जब अब्दुल करीम स्वयं कचहरी में उपस्थित नहीं हो सका, तो प्रतिवादियों के वकील ने जोरदार शब्दों में कह दिया कि इस स्थिति में अभियोग को किसी प्रकार भी आगे नहीं चलाया जा सकता।

अब न्यायाधीश के लिए और कोई चारा नहीं रहा और उसको निर्णय देना पड़ा कि वादी मर चुका है।

जब यह सूचना अब्दुल करीम के पास पहुँची, तो उसने जज के उक्त निर्णय के विरुद्ध अपील दायर करने के लिए अपने वकील को कह दिया। अपील सेशन कोर्ट में दायर हो गई, परंतु स्वीकार नहीं हुई।

हाईकोर्ट में अपील की गई और वहाँ भी उसको अस्वीकार किया गया। इन दोनों कचहरियों में सिद्ध करने की बात यह थी कि यह अपील करनेवाला अब्दुल करीम क्या वही आदमी है, जो मुकदमा चलानेवाला था और क्या यह वही अब्दुल करीम है, जिसके नाना ने यह भूमि बेची थी और जिसके विषय में मुकदमा चला रहा था। हाईकोर्ट का निर्णय था कि नया मुकदमा दायर किया जा सकता है, यदि उक्त बात सिद्ध हो जाए। इसको सिद्ध करने के लिए छोटी कचहरी में नए सिरे से प्रार्थना-पत्र देना चाहिए।

अब्दुल करीम ने यह विचार किया कि यदि वह अपने आपको अपने नाना का दुहिता सिद्ध करने के लिए गाँव के और बंबई तथा अफ्रीका के साक्षी भी उपस्थित कर दे, तो नया मुकदमा करने का समय नहीं था। पहले ही मुकदमा करने की अवधि व्यतीत हो चुकी थी। अतः अब्दुल करीम को संतोष करना पड़ा और कानून से वह मृत ही घोषित रहा।

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