लालबत्ती की हवश और खुमार

एक मई से तथाकथित वी.आई.पी. की गाडि़यों से लालबत्ती उतर गई है, किंतु बहुतों को उसका नशा अभी भी नहीं उतरा है। उसका खुमार अभी भी है। बहुत समय से विवाद चल रहा था कि वी.आई.पी. कल्चर समाप्त होनी चाहिए। समाचार सुनने में आते थे कि फलाने वी.आई.पी. के काफिले के कारण बीमार बच्चे को अस्पताल न पहुँचाया जा सका, रास्ते में ही दम तोड़ दिया। चंडीगढ़ के एक मामले में जहाँ वी.आई.पी. के आवागमन के इंतजाम करनेवालों ने लाश को श्मशान में ले जानेवाली गाड़ी और साथ के लोगों को रोक लिया, जिससे अंतिम संस्कार करने में पाँच-छह घंटे की देरी हुई। जनता की परेशानियों को देखते हुए सर्वसाधारण और मीडिया में इसकी बहुत आलोचना होती रही। मामला शीर्ष अदालत में पहुँचा। उसने आदेश दिया कि कुछ गिने-चुने महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों को छोड़कर दिल्ली और देश के अन्य राज्यों में लाल या नीली बत्ती गाडि़यों पर न लगाई जाए। केवल एंबुलेंस और कानून व्यवस्था की देखभाल करनेवाली गाडि़यों में ये बत्तियाँ लगाने या साइरन के इस्तेमाल की इजाजत दी जानी चाहिए। पर फिर मामला ठंडा पड़ गया।

हालात ऐसे हो गए थे कि जिन लोगों को यातायात नियमों के अनुसार लाल/नीली बत्ती की इजाजत थी, उसके अलावा अन्य लोगों ने भी लाल/नीली बत्ती लगाना शुरू कर दिया। मंत्रियों, राज्यमंत्रियों या उनके बराबर पदवाले व्यक्ति तो हकदार हो ही गए। कुछ अपवाद छोड़ दें तो सांसदों, विधानसभा सदस्यों और जिला पंचायत के अधिकारियों ने भी लाल बत्तियाँ लगानी शुरू कर दीं, जो नियमानुसार इसके अधिकारी नहीं थे। यही बात नौकरशाही व पुलिस में शुरू हुई और विश्वविद्यालयों व अन्य संस्थानों में भी यह बीमारी फैल गई। यहाँ तक कि ठग, गुंडे, अपराधियों ने भी लाल/नीली बत्ती को अपना कवच बना लिया। ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है।’ कार की बत्ती देखकर ट्रैफिक पुलिसवाला लिहाज करेगा या डरेगा और अगर टै्रफिक के नियमों का उल्लंघन करेंगे तो उसकी भी अनदेखी की जाएगी।

भला हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी का कि कैबिनेट में गाडि़यों में लाल-नीली बत्ती इस्तेमाल के नियमों में परिवर्तन का प्रस्ताव पारित कर दिया। एक मई से कुछ अपवाद छोड़कर कोई लाल/नीली बत्ती का इस्तेमाल नहीं कर सकता और न कटुकर्णा साइरन का, जो ध्वनि प्रदूषण बढ़ाता है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद एक मई से लाल/नीली बत्तियाँ प्रतिबंधित हो गईं, तो कुछ मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों व अन्य लोगों ने वाहवाही लूटी, अपनी कारों से लालबत्ती हटाने की फोटो टी.वी. पर आईं, मानो महान् बलिदान कर रहे हैं। किंतु विचित्र यह लगा, कर्नाटक के एक मंत्री ने कहा कि पद के साथ हमारे मुख्यमंत्री ने लालबत्ती वाली कार भी दी है और जब तक वे नहीं कहेंगे, हम कार से लालबत्ती नहीं हटाएँगे। सिरफिरों की कमी नहीं है। एक हैं नूसर रहमान बारकाती साहब, जो कोलकाता में टीपू सुल्तान की मसजिद के इमाम हैं। समय-समय पर फतवे देते रहते हैं। राष्ट्रीय नेताओं के खिलाफ अनाप-शनाप बोलते रहते हैं। अपने आप को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की नाक का बाल समझते हैं। एक मई के बाद अपनी गाड़ी से लाल बत्ती हटाने से इनकार कर दिया। पुलिस को चालान करना पड़ा। पहले जिहाद की धमकी दी और एक नया पाकिस्तान बनाने की माँग की। कहा कि नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनको और मुसलिम समुदाय को कष्ट देने के लिए बदले की भावना से कानून बना रहे हैं। उनका कहना है कि वह जो लालबत्ती इस्तेमाल कर रहे हैं, टीपू सुल्तान मसजिद के शाही इमाम के नाते, कोई सरकार उनका यह अधिकार नहीं ले सकती। यह उनके पिता को बर्तानिया सरकार ने दिया था और यह उनके धार्मिक पद की विरासत है। उनका यह भी कहना था कि मुख्यमंत्री ने उनको लाल बत्ती इस्तेमाल करते रहने को कहा है। कुछ समय बाद कहा कि अब लालबत्ती हटा रहा हूँ, क्योंकि मुख्यमंत्री ने एक मंत्री चौधरी द्वारा ऐसा कहलवाया है। इस तरह की तुनकमिजाजी और बड़बोले नहीं समझ पाते हैं कि कानून के हाथ लंबे हैं। अब यह भी समाचार आया है कि टीपू सुलतान की मसजिद चलानेवाले ट्रस्ट ने उनकी इन हरकतों से आजिज आकर उनको पद से हटा दिया है। उनकी जिद है कि ट्रस्ट को उन्हें पद से हटाने का कोई अधिकार नहीं है। खैर, यह अलग मामला है। कुछ सांसद और विधायक यह कहते सुने गए कि हमको टोल पर इंजतार करना पड़ता है तथा हमारे कार्यक्रमों में विघ्न पड़ता है। मानो अन्य नागरिकों को कोई काम ही नहीं है। सत्ताधारियों को भी धैर्य रखना पडे़गा।

लालबत्ती की हवश हमारी सामंती मानसिकता की परिचायक है। कहने को तो प्रधानमंत्री ने कह दिया कि देश का हर नागरिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है। वी.आई.पी. कल्चर आसानी से नहीं जाता है। कोशिश करनी पड़ेगी। समभाव और समरसता की भावना को जहन में उतरने में समय लगेगा। कुछ वर्ग दशकों से वी.आई.पी. कल्चर की मलाई लूटते रहे हैं, उसे छोड़ना आसान नहीं है। उनकी संतानों में भी इसी प्रकार की मानसिकता विकसित हो जाती है। कानून को इस दिशा में सतर्क रहना पड़ेगा। सुविधाएँ सभी को प्राप्त हो सकें, यह सुशासन का दायित्व है। हम कुछ विशेष हैं, दूसरों से भिन्न ही नहीं कुछ ऊपर हैं, यह भावना बहुतों में व्याप्त है। हम देखते हैं कि गाडि़यों पर लिखा रहता है, आर्मी, प्रेस, जज, एसडीएम, सीए आदि। कहीं-कहीं लिखा दिखता है, यादव, गुज्जर, जाट, कावेटा, पंडित आदि-आदि। इसी प्रकार कारों या अन्य यातायात के साधनों के नंबर अलग-अलग रंगों में तथा भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाई देते हैं, वैसे कानून का निर्देश है कि किस प्रकार नंबर प्रदर्शित होने चाहिए। इसके पीछे भी यही भावना है कि हम विशिष्ट हैं। व्यवहार और आचरण में जब तक अपने को अभिजात वर्ग होने का अहं एवं प्राथमिकता पाने की चाह नहीं जाएगी, तब तक लोकतंत्र की समरसता और समभाव की परंपरा पनप नहीं सकेगी।

जस्टिस करनान का शिगूफा समाप्त होने में नहीं आ रहा है। कोलकाता से वह हवाई जहाज से अपनी व्यक्तिगत यात्रा पर चेन्नई चले गए। वहाँ एक सरकारी अतिथिगृह में ठहरे। ऐसा हो सकता है कि उनको भनक लग गई हो कि अब शायद शीर्ष न्यायालय सख्त कदम उठाए। सर्वोच्च न्यायालय को अदालत की अवमानना पर कोलकाता उच्च न्यायालय के जज करनान को ६ माह का कड़ा दंड देना पड़ा और शीर्ष न्यायालय ने पश्चिम बंगाल पुलिस को उनको गिरफ्तार कर जेल भेजने का आदेश दिया। तब तक देर हो चुकी थी। प्रातः पुलिस ने तो हवाई अड्डे तक उनको सुरक्षा प्रदान की थी। चेन्नई पहुँचने के बाद वे प्रेस से भी मिले, जैसा कि वे प्रचार की दृष्टि से पिछले दिनों में बराबर कर रहे हैं। चेन्नई में उनके बारे में खबर उड़ाई गई कि वे आंध्र प्रदेश के तीर्थस्थल कलाहस्ती जा रहे हैं, पर वहाँ वे नहीं पहुँचे। उनके एक सहयोगी ने कहा कि उनका मोबाइल ही शायद वहाँ पहुँचा हो। उसके अनुसार वह उत्तर दिशा में प्रस्थान कर गए, शायद नेपाल चले गए हों या हो सकता है कि वे बँगलादेश पहुँच गए हों। उसके बाद एक खबर आई कि वे श्रीलंका चले गए हैं। सजा से बचने के लिए एक उच्च न्यायालय का जज भगोड़ा हो गया। स्थिति हास्यास्पद होती जा रही है। उनके वकील को शीर्ष न्यायालय के चीफ जस्टिस को कहना पड़ा कि आप बार-बार न्यायालय के काम में बाधा पहुँचा रहे हैं, अतएव आपको अदालत से बाहर जाने के आदेश देने पड़ेंगे। रजिस्ट्री में पहले अपना मामला दर्ज कराएँ और वही संवैधानिक बेंच, जिसने सजा सुनाई है, इस पर विचार कर सकती है। वैसे जस्टिस करनान अभी भी अपनी कोई गलती मानने को तैयार नहीं हैं, उनका कहना है कि शीर्ष न्यायालय के जुरिडिक्शन से वह बाहर हैं। सर्वोच्च न्यायालय ही उनको परेशान कर रहा है। इस प्रकार न्यायालय की अवहेलना हो रही है।

पं. बंगाल पुलिस के अधिकारी चेन्नई में अपने आपको असहाय पाते हैं, क्योंकि तमिलनाडु पुलिस की सक्रिय मदद के बिना वह अपराधी को पकड़ने में सफल नहीं हो सकती है। स्थानीय पुलिस कहाँ तक और कैसी मदद कर रही है, कहा नहीं जा सकता है। विचित्र बात यह है कि करनान की लगातार फोटो आ रही हैं। पिछले एक वर्ष से काफी विवादों में हैं, फिर भी लापता हो गए। उनकी निगरानी नहीं हुई, इस विवाद के दौरान उनके साथ रहनेवाले सुरक्षाकर्मी भी बेकार साबित हुए। लगता है कि वे तमिलनाडु में ही कहीं छिपे हैं और २२ जून की अपनी औपचारिक सेवानिवृत्ति के उपरांत संवैधानिक गतिरोध पैदा करना चाहेंगे। वे अपने अनुसूचित जाति का होने के कारण मामले का राजनीतीकरण करने पर कटिबद्ध हैं। उनकी बराबर यही माँग रही है कि उनको केवल महाअभियोग द्वारा ही पद से हटाया जा सकता है। सेवा से रिटायर होने के बाद तो महाभियोग निष्फल हो जाता है। वे एक निवर्तमान उच्च न्यायालय के जज की पेंशन और अन्य सुविधाओं के हकदार हो जाते हैं। किस करवट ऊँट बैठेगा, देखना है, क्योंकि यह इस तरह का पहला मामला है। जो भी हो, न्यायालय की साख को बहुत बड़ा धक्का लगा है और शीर्ष न्यायालय की किरकिरी हो रही है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

कभी ऐसा लगता है कि कुछ लोग अपने को कानून से ऊपर मान बैठे हैं। आर्ट ऑफ लिविंग के सांस्कृतिक आयोजन के कारण जमुना का जो पुश्ता बरबाद हुआ और जिसके पुनर्जीवन के लिए एक विशेष समिति ने चालीस करोड़ की राशि का अनुमान लगाया है। ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के गुरु ने न केवल अनुमान को गलत बताया और कहा कि अगर इस प्रकार की संभावना थी तो डी.डी.ए. ने उन्हें अनुमति क्यों दी, वह जुरमाना भरे। यही नहीं उनकी ढिठाई यहाँ तक दिखी कि हरित ट्रिबूनल, जो एक न्यायालय है, उसको दोषी ठहराते हुए कहा कि जुरमाना हरित ट्रिबूनल पर होना चाहिए। उल्टा चोर कोतवाल को डाटे, ऐसा दिखाई देता है। उनकी सोच है कि जब मामला हरित ट्रिबूनल के सामने आया तो उन्होंने रोक के आदेश क्यों नहीं दिए। वास्तव में ट्रिबुनल ने उन्हें बहुत रियायत की थी, वरना पूरे आयोजन पर रोक का आदेश वह कर सकता था। यह भी एक प्रकार से न्यायालय की अवमानना ही है। आवयश्क है सुशासन स्थापित होने के लिए कि देश में कानून का शासन है और कानून सर्वोपरि है, यह प्रतीति हर एक को होनी चाहिए।

महिलाओं का उत्पीड़न और हमारा समाज

जस्टिस वर्मा कमेटी के सुझावों के अनुसार, निर्भया कांड के उपरांत महिलाओं की सुरक्षा विषयक कानूनों में परिवर्तन हुआ, किंतु परिस्थितियों में कोई खास सुधार दिखाई नहीं पड़ता। निर्भयाकांड की ही पुनरावृत्ति अभी हरियाणा में हुई, सामूहिक बलात्कार के बाद लड़की की जान ले ली। लड़की अनुसूचित जाति की थी। एक अनुसूचित जाति का ही लड़का उसको परेशान करता था। लड़की के बाप का कहना है कि स्थानीय पुलिस ने उसकी शिकायत का संज्ञान नहीं लिया। मुख्य आरोपी और उसके कुछ अन्य साथी पकडे़ गए हैं। निर्भयाकांड ने दिल्ली को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को आंदोलित कर दिया था। कुछ ही दिन पहले शीर्ष न्यायालय ने निर्भयाकांड के आरोपियों की मृत्युदंड की सजा बहाल रखी। आजीवन कारावास और मृत्युदंड का भय भी बहुत प्रभावी नहीं हो रहा है। मृत्युदंड रहना चाहिए या नहीं, इस विवाद में हम नहीं जाना चाहते। हम समझते हैं कि कुछ जघन्य अपराधों के लिए आज की परिस्थिति में अभी मृत्युदंड की सजा रहनी चाहिए। केवल दंड का भय ही काफी नहीं है। प्रतिदिन आप देखें, अखबार में आठ-दस बच्चियों और महिलाओं के उत्पीड़न के मामले दिखाई देंगे। सौतेले बाप द्वारा दस साल की लड़की को गर्भ और गर्भ की समय सीमा के कारण उसके गर्भपात के लिए कानूनी आवश्यकता। पति-पत्नी की तरह रहनेवालों में भी इसी प्रकार की वारदातें और किशोर अपराध बढ़ रहा है। बालिकाओं के पैदा होते ही अथवा दो-एक महीने के बाद उनको कूडे़ के ढेर या अन्य स्थान पर उनके भाग्य भरोसे छोड़ देते हैं। कभी समाचार आते हैं कि प्रेमी के साथ पत्नी द्वारा पति की हत्या की साजिश तो कभी पति द्वारा संदेह के कारण पत्नी की हत्या। इस प्रकार की घटनाएँ सभी राज्यों में हो रही हैं, कहीं ज्यादा तो कहीं कम। वरिष्ठ महिलाएँ, जो अकेली रहती हैं वे असुरक्षित महसूस करती हैं। यह स्थिति केवल गरीब, अनपढ़ या नीचे के तबकों की ही नहीं है। पढ़े-लिखे, संपन्न अभिजात घरों में भी ये घटनाएँ हो रही हैं। दहेज की माँग तो कुछ ही मामलों में कारण हो सकती है। यह सामाजिक विघटन क्यों? क्या सिनेमा और फिल्मों का असर है? हो सकता है मीडिया की पहुँच के कारण अधिक अपराधों की रिपोर्टिंग होती हो, पर सच यह भी है कि दूर-दराज और गाँवों के ऐसे मामले जब तक सनसनीखेज न हों, मीडिया में भी बिना रिपोर्ट के रह जाते हैं। कभी-कभी लगता है कि समाज बीमार होता रहा है। क्या इसके कुछ सोशियोलॉजिकल कारण हैं? कभी-कभी जायदाद के झगडे़ ऐसे वारदात के कारण बन जाते हैं। पुलिस इन सबकी पूरी तरह रोकथाम नहीं कर सकती है। वैसे पुलिस भी महिला उत्पीड़न में दोषी पाई जाती है। हम समझते हैं, समग्र दृष्टि से इस समस्या की कोई वैज्ञानिक पहल होनी चाहिए। आश्रमों और मठों में भी इस प्रकार की घटनाएँ होती रहती हैं। कई महंत, धर्माचार्य जेल में हैं। फिर भी सामाजिक अनुशासन में सदैव धर्म की भूमिका रही है। आजकल धर्माचार्य धन कमाने में, ऐश्वर्य से रहने और राजकीय सत्ता का अपने ढंग से दुरुपयोग करने में लगे हैं, तथाकथित उसे सांस्कृतिक आयोजन का रूप देने में ही अपने दायित्व की इतिश्री समझते हैं। उनका स्थायी प्रभाव कैसा और कितना है, यह देखना जरूरी है। हम सांस्कृतिक आयोजनों द्वारा उदात्त वृत्तियों को जाग्रत् करें। धर्माचार्यों को सामाजिक जागरण का काम करना चाहिए, ताकि व्यक्तियों की वृत्तियों में सुधार हो। भक्ति आंदोलन चाहे दक्षिण भारत के हो अथवा उत्तर भारत के, वहाँ हम संतों, महात्माओं और गुरुओं को जनता के बीच में देखते हैं। आज वे जनता से उतने दूर दिखाई पड़ते हैं, जितने कि नेता और राजपुरुष। दूसरा पक्ष है शिक्षा का। नैतिक मूल्यों और महिलाओं के प्रति आदर-दृष्टि महत्त्वपूर्ण है, यह प्रयास प्रारंभिक शिक्षा से होना चाहिए। तीसरी बात जिस पर हम जोर देना चाहेंगे, वह प्रशासन को मजबूत करना, पुलिस को सक्षम बनाना, अधिक संवेदनशील और नागरिक केंद्रित तथा जनता का विश्वास प्राप्त करने में सफल हो सके, इस योग्य बनाना है। ये सब पुलिस सुधारों के अंतर्गत आते हैं। आज हालात ऐसे हैं कि आतंकवादी इलाकों में ही नहीं, साधारण क्षेत्रों में भी अकसर पुलिस पिट जाती है और उसके हथियार छीन लिये जाते हैं। पुलिस अधिकारियों का घेराव हो जाता है। खनन माफिया, भू माफिया, शराब माफिया, टिंबर माफिया पुलिस पर भारी पड़ते हैं। आज पुलिस का इस्तकबाल खत्म हो गया है। एक तरफ पुलिस आत्मविश्वास खो बैठी है, दूसरी तरफ जनता का विश्वास भी, अतएव पुलिस को जातिवादी राजनीति से मुक्त कराना आवश्यक है। यह एक बड़ा एजेंडा है। अंत में हम कहना चाहेंगे कि हमारे समाज की विकृत स्थिति इस कारण है, चूँकि सामाजिक पुनर्जागरण की जो प्रकिया राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, वीर शीलगंझ, गांधी आदि महारथियों की प्रेरणा से प्रारंभ हुई थी, वह १९४७ के बाद अधूरी रह गई। यह मान लिया गया कि स्वराज के बाद सब स्वतः ठीक हो जाएगा। प्रबुद्ध नागरिकता और जन सहभागिता को सब लोग भूल गए तथा समझने लगे कि अब सरकार अपनी है, वही सब करेगी, और ठीक ही करेगी। क्या अब इस सामाजिक पुनर्जागरण की अधूरी प्रक्रिया को पूरी करने के लिए कोई मार्गदर्शक मिलेगा? प्रधानमंत्री की ‘नए भारत’ की अवधारणा एक महती चुनौती है। सामाजिक आंदोलन व मानसिक बदलाव उसके अभिन्न अंग हैं।

पुस्तकों की दुनिया में शशि थरूर की एक पुस्तक पिछले दिनों प्रकाशित हुई ‘An Era of Darkness’ अथवा ‘अंधा युग या अँधेरे का जमाना’। पुस्तक का उपनाम है ‘The British Empore in India’, इसका विषय भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का आकलन है। इसका प्रारंभ ऑक्सफोर्ड यूनियन की एक वाक् प्रतियोगिता से हुआ। ऑक्सफोर्ड यूनियन ने शशि थरूर को एक प्रस्ताव पर बोलने को कहा। वह ‘Britain Owes reparations to Her Former Colonies’ यानी ब्रिटेन देनदार है अपनी पूर्व उपनिवेशों को, भारत भी उनमें से एक है। अतएव पुस्तक में डिबेट की शैली कहीं-कहीं दिखाई पड़ती है। शशि थरूर अच्छे लेखक हैं। यह डिबेट बहुत चर्चा में रही। लोकसभा की स्पीकर ने डिबेट पर थरूर को बधाई दी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी थरूर को सभी बातें उचित स्थान पर और उचित समय कहने पर बधाई दी। ब्रिटिश शासन के इतिहास में काफी शोध के उपरांत इस वाद-प्रतिवाद के भाषण को पुस्तक का रूप मिला। पुस्तक के लिए शशी थरूर बधाई के पात्र हैं। पुस्तक ब्रिटिश साम्राज्य के भारतीय शासन की पोल खोलती है। उदाहरण और दृष्टांत देकर अपने फैसलों को, जिन्हें ब्रिटिश साम्राज्य अपनी उपलब्धियाँ बताता है तथा अंग्रेजी सलतनत को भारत के लिए वरदान कहता है, जैसे रेलवे, अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली आदि, थरूर ने विश्लेषण कर यह दिखाया है कि ये सब कार्य अंग्रेजी सरकार ने अपने स्वार्थ व हित के लिए किए और उससे किस प्रकार भारत का आर्थिक शोषण हुआ। लेखक ने इतिहास के कुछ बंद पन्ने खोलकर रख दिए हैं। डॉ. बी.डी. बसु ने करीब ८६-९० साल पहले अपने ग्रंथ ‘Rise of Christion Power in India’ तथा अन्य कृतियों में यह कोशिश की थी। वह जमाना दूसरा था। पं. सुंदरलाल ने भी अपने ग्रंथ ‘भारत में अंग्रेजी राज’ में कच्चा चिट्ठा खोलने की कोशिश की तो विदेशी सरकार ने उसे तत्काल जब्त कर लिया। शशि थरूर ने आज के संदर्भ, नई खोज और वैश्विक वातावरण में ब्रिटिश शासन की भूमिका का प्रस्तुतीकरण किया है। भारत के नागरिकों और विशेषतया विद्यार्थियों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। हिंदी तथा अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद होना आवश्यक है। प्रकाशक रूपा (एलेफ) ने पुस्तक को काफी आकर्षक और साज-सज्जा से छापा है, जो तुलना में वैश्विक स्तर का माना जाएगा। वैसे यह पुस्तक ब्रिटेन के निवासियों तथा अन्य साम्राज्यवादी देशों में वहाँ के विद्यार्थियों को भी पढ़नी चाहिए, ताकि उनके पूर्वजों की उपनिवेशों, विशेषतया भारत को, तथाकथित देन की सही तसवीर उनके सामने आ सके। हाँ, यह कहना भी उचित होगा कि कुछ फैसले ब्रिटिश सरकार के ऐसे हुए, जिनका लाभ दीर्घकालीन दृष्टि से देश को हुआ, जैसे डलहौजी द्वारा डिपार्टमेंट ऑफ आरकेलॉजी, जिससे देश की बहुत प्राचीन धरोहर का पता लगा और संरक्षण हो सका।

शाह का आवाहयामि

रमेशचंद्र शाह हिंदी जगत् की जानी-पहचाने हस्ती हैं, जो बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। वे कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और समालोचक हैं। अन्य विधाओं में भी उनकी देन है। अनेक सम्मान और पुरस्कार उन्हें प्राप्त हो चुके हैं। पिछले दिनों उनके संस्मरणों का एक संकलन ‘आवाहयामि’ प्रकाशित (किताब घर प्रकाशन, दिल्ली) हुआ है। उसमें करीब २६ संस्मरण हैं। उनका अंतिम लेख ‘राग भोपाली’ है, जो उन्होंने भोपाल के संबंध में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जहाँ वे सेवा से निवृत्त होकर साहित्य सेवा में संलग्न हैं। रमेशजी की ऐसी शैली और शब्दों का चयन ऐसा प्रभावी है कि वह पाठक को बाँध लेता है। रमेशचंद्र शाह के पास पत्रों की भी कमी नहीं है, संस्मरण लिखने में आवश्यकतानुसार उनका उपयोग करते हैं। रमेशचंद्र शाह जिनके संस्मरण लिख रहे हैं, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को उकेरते उनकी स्वयं की शंकाए हैं, या किसी अन्य विद्वान् के विचारों के बारे में उनको कुछ संकोच है तो वह भी सामने आते हैं, और वे आगे विचार-विमर्श का संदर्भ प्रस्तुत करते हैं। हमने तो शाह की इस पुस्तक को अपने इस संग्रह में शामिल किया है, जिसके पन्ने कभी-कभी अनायास खोलने की इच्छा होती है। साहित्य के विद्यार्थियों के लिए तो ‘आवाहयामि, अत्यंत मूल्यवान है, वह उनकी उत्सुकता और अधिक जानने की इच्छा को प्रेरित करेगी।

डॉ. गोयनका की प्रेमचंद साहित्य को और देन

प्रेमचंद उर्दू और हिंदी दोनों में लिखते थे। वास्तव में उनका लेखन पहले उर्दू से शुरू हुआ, धीरे-धीरे हिंदी में आए। किंतु दोनों भाषाओं में वे जीवनपर्यंत लिखते रहे। डॉ. कमल किशोर गोयनका का प्रेमचंद साहित्य विषयक कार्य अद्वितीय है। उन्होंने प्रेमचंद के साहित्य और कृतित्व को बहुआयामी दृष्टि से देखा है, अध्ययन एवं शोध किया है। डॉ. गोयनका की पुस्तक प्रेमचंद की हिंदी-उर्दू कहानियों का एक नया संस्करण प्रकाशित हुआ है (प्रभात प्रकाश, दिल्ली)। पहले संस्करण की भूमिका अत्यंत विद्वत्तापूर्ण और नई जानकारी देती है। इस नए संस्करण की भूमिका में उन्होंने अपने गहन शोध और अध्ययन के उपरांत नई सामग्री दी है, जो प्रेमचंद के विषय में कई अन्य भ्रांतियों का स्पष्टीकरण करती है। उनकी पैनी लेखनी को दाद देनी पड़ती है। दो भाषाओं में लिखकर कैसे वे पूरे देश से जुड़ना चाहते थे और किस प्रकार एक संवेदना को दो भाषाओं में प्रस्तुत करते हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है। डॉ. गोयनका ने प्रथम बार प्रेमचंद को उर्दू से हिंदी तथा हिंदी से उर्दू में आई कहानियों को देवनागरी लिपि में एक साथ प्रस्तुत किया है। इस प्रकार संबंधित प्रश्नों पर विचार-विमर्श करने में सहायता मिलेगी। प्रेमचंद के शोधकर्ताओं को यह डॉ. गोयनका की विशेष देन है।

‘लूर’ नामक एक साहित्यिक, सांस्कृतिक अर्धवार्षिक पत्रिका ‘लूर’, गोपालबाड़ी, चौपासनी, जोधपुर-३४२००८ (राज.) से प्रकाशित हो रही है। संपादक और प्रकाशक डॉ. जयपाल सिंह राठौड़ हैं। यह जानकर प्रसन्नता हुई कि राजस्थान फोकलोर स्टडी ऐंड रिसर्च सोसाइटी की स्थापना हुई है और उसी के अंतर्गत जन साहित्य और संस्कृति में शोधकार्य होगा। ‘लूर’ का कालबेलिया विशेषांक देखने को मिला। सपेरा, जोगी, नाथ, कालबेलिया नाम सब एक ही जगह के विभिन्न विशेषताओं को रेखांकित करते हैं। संपादमीय के अनुसार साँपों के बीच रहने से सपेरा, वैराग्य की भावना को लेकर चलने के कारण जागी है, नाथ परंपरा, जिसमें गुरु गौरखनाथ की परंपरा व संदेश को मानने के कारण नाथ कहलाए और संभवतः काल से खेलनेवाले, भयंकर विष-नागों के साथ खेलने के कारण कालबेलिया कहलाए। इनके पास जंगल और खेतों में अस्थायी डेरों में रहने के कारण जड़ीबूटी व झाड़फूँक से रोग निदान के अचूक नुस्खे हैं। संपादक के अनुसार आज भी इनमें परंपरागत बातें जीवंत मिलती हैं। जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है। जनजातियों पर खोज करने के लिए विशेषांक में कालबेलिया समाज और संस्कृति पर एक लेख है तथा एक लेख कालबेलिया लोकगीतों में जीवन संदर्भ, जो उपयोगी है। कलबेलिया गीत संकलित किए गए हैं। कलबेलिया नृत्य तो अकसर शहरों के बडे़ आयोजनों में भी देखने को मिलता है, जो काफी लोकप्रिय है; हालाँकि कम ही लोग होंगे जो इस समाज के बारे में जानते हों। राजस्थान फोकलोर स्टडी एवं रिसर्च सोसाइटी के कार्यक्षेत्र को विस्तारित करने के लिए राजस्थान सरकार और भारत सरकार के अनुसूचित जनजाति और सूचित जाति मंत्रालय से सहयोग व सहायता की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों के सोशियोलॉजी और एंथ्रोपालॉजी विभागों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए। कालबेलिया विशेषांक की छपाई और प्रस्तुति अति सुंदर है। करीब २०० पृष्ठ के विशेषांक का मूल्य दो सौ रुपया उचित है। गीतों को ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि उनमें भी वही उल्लास और पीड़ाएँ हैं, जो तथाकथित समाज में पाई जाती हैं। हम उन्हें अछूत मानते हैं और वे इसी में संतुष्ट हैं। यह एक विडंबना ही है। ‘लूर’ के कुछ पिछले विशेषांक हैं, जो उल्लेखनीय हैं। मीरा विशेषांक, लोकदेवता तेजाजी विशेषांक, बंजारा लोकगीत विशेषांक, लोरी विशेषांक, बन्ना लोकगीत विशेषांक आदि जो उपलब्ध हैं। ‘लूर’ पत्रिका के संचालक को बधाई देते हैं और आशा करते हैं कि जिस सहयोग, समर्थन तथा मान की वह पात्र है, उसे प्राप्त होगा। प्रवासी राजस्थानी भाइयों से इस दिशा में पहल अपेक्षित है।

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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