रे ना मानेगो! तो जै ले राधाजी की गुलेल!

रे ना मानेगो! तो जै ले राधाजी की गुलेल!

आज का दिन भी दौड़ा-दौड़ा, भागा-भागा सा है। कॉलेज में स्टाफ एसोसिएशन का होली मिलन है। शाम को उपराष्ट्रपतिजी के घर महिला पत्रकार प्रतिनिधि मंडल में जाना है। फिर अपनी शाम वाली क्लास है। हमने घड़ी देखी और कर दी आज की रेस शुरू।

आज क्या पहनूँ...क्या पहनूँ...इसी उधेड़बुन में थी। उपराष्ट्रपति के यहाँ जाना है तो औपचारिक पोशाक होनी चाहिए, यानी साड़ी। अब संकट यह कि कौन सी पहनूँ। अनेक साडि़यों पर से गुजरते हुए एक साड़ी पर जाकर हाथ रुक गया, जो कि तमाम साडि़यों के पीछे से झाँक रही थी। नीले रंग की हैदराबादी कॉटन साड़ी और बीच में कलमकारी का काम। इस साड़ी पर हाथ भी रुक गया और मन भी थम सा गया। यह साड़ी किसी की खास पसंद थी न! खैर, सिर झटका। देर हो गई है भागो।

शुक्र है ‘ड्राइवर साहब’ टाइम से आ गए। गाड़ी शुरुआती जाम के बाद हाइवे पर। आज रेड एफ.एम. के ‘बउआजी को सुनने का मन नहीं था। कई बार सुबह-सुबह हताश कर देते हैं। आज थोड़ा पुराने गीतों की ओर चलते हैं, यानी एक एफ.एम. स्टेशन पीछे ९२.७, जहाँ गाना बज उठा ‘आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।’ गाना पुराना है और क्लासिक भी, गीत के साथ मैं भी गुनगुनाने लगी।

तभी हमारे जानकार पंडित भानुप्रतान नारायण मिश्रजी (नाम लंबा है और यश भी) का फोन आ गया। मैंने जैसे ही फोन उठाया, उधर से आवाज आई—भाग्यलक्ष्मी! गणेशजी की कृपा से हम वृंदावन में विराज रहे हैं। पंडितजी पत्रकार हैं और ज्योतिषी भी। गणेशजी की भक्ति में सराबोर पंडितजी के राजनीति से भी गहरे संबंध रहे हैं। वे मुझे भाग्यलक्ष्मी बुलाते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि मैं जब-जब उनसे मिलती हूँ तो उनके लिए लाभदायक स्थितियाँ बनती हैं। वैसे अनेक लोग मुझसे यह कहते हैं कि मैं उनके लिए भाग्यशाली हूँ। मेरे संपर्क में आने से उन्हें सफलता मिलती है। पता नहीं यह विश्वास कहाँ तक सच है। पर मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है कि मैं लोगों की सफलता का निमित्त बनती हूँ।

पंडितजी के फोन और लगातार बजते होली के गीत से मन में खयाल आया और उस खयाल का परिणाम था कि अगले दिन सुबह ५ बजे मेरी कार वृंदावन के लिए निकल पड़ी। हर साल टेलीविजन पर ही ब्रज की होली देखकर आनंद लेती हूँ। इस बार वहीं जाकर आनंद॒लूँगी।

दिल्ली में पिछली रात जमकर बारिश हुई थी, ओले पड़े थे तो सुबह इतनी सर्दी थी कि मार्च के मौसम में भी कार में हीटर चलाना पड़ा था। रास्ते में अखबार खरीदा, जिसमें दैनिक हिंदुस्तान के पत्रकार और मेरे आत्मीय विद्यार्थियों में से एक अमित कुमार द्वारा खींची गई वृंदावन की लट्ठमार होली की बहुत आकर्षक फोटो प्रकाशित हुई थी, फोटो में एक औरत लट्ठ लेकर सड़क के बीच चल रही थी और दूसरी ओर पुरुषों की पूरी कतार खड़ी उसे देख रही थी। महिला दिवस पर सार्थक चित्र! यानी इस समय सारी सड़कें वृंदावन ही जा रही हैं।

धीरे-धीरे ब्रज क्षेत्र में होने का एहसास रँगे-पुते चेहरे देखकर होने लगा। दिल्ली से लगभग ३ घंटे में मैं वृंदावन पहुँच गई। सर्वप्रथम दर्शन करने थे बाँके बिहारी मंदिर में। पतली-पतली गलियों से गुजरते हुए भक्ति और फागुन की मस्ती में आह्लादित भक्तों के झुंड के झुंड मिलने लगे। एक ओर गुलाल, पेड़े-मिठाई, प्रसाद-सामग्री बेचनेवालों की दुकानें थीं तो दूसरी ओर साधुओं और विधवाओं की कतार थी। यानी संसार के भीतरवालों की और संसार से परेवालों की।

ज्यों-ज्यों गलियों के भीतर मैं धँसती जा रही थी, त्यों-त्यों फागुनी हवा मेरे भीतर धँसती जा रही थी और एक बेफिक्री सी आ रही थी। फिलहाल अभी तमाम देशी-विदेशी टीवी चैनलों के फोटोग्राफर ‘रँगे-पुते’ इस समय वृंदावन में छाए उल्लास को कैमरे में कैद कर रहे थे। विदेशी फोटोग्राफर के फोकस के केंद्र में साधु-विधवाएँ ज्यादा थीं। जबकि भारतीय फोटोग्राफर मस्ती के रंग में रँगे जीवन को अधिक कैप्चर कर रहे॒थे।

पिछले साल भी दोस्तों के साथ वृंदावन आना हुआ था। अब इन्हीं गलियों से दोबारा गुजरना हो रहा है। पिछले साल जब आई थी तो मैं सुबह-सुबह का वृंदावन देखने निकल पड़ी थी। एकदम शांत था शहर, ऐसे में मंदिर जाती विधवाएँ ही दिख रही थीं। टहलते-टहलते चाय पीने की इच्छा हुई। सुबह ५ बजे का समय था, सब दुकानें बंद थीं, पर सड़क के किनारे एक खोखानुमा दुकान खुल रही थी। वहीं जाकर कुरसी खींचकर बैठ गई। तभी एक छोटा सा बंदर मेरी कुरसी के साथ लगे खंभे पर चढ़कर शोर मचाने लगा। शायद कुछ खाने के लिए दुकानदार से माँग रहा था। मैं थोड़ी भयभीत सी हुई और कुरसी इधर-उधर की। चायवाले ने उससे ऐसे बात करते हुए कहा मानो इनसान से बात कर रहा हो—‘रे! न मानेगो!’ ब्रज शैली में कही गई यह बात मानो बंदर की समझ में आ गई। उसने मानो शर्मिंदा सा होते हुए मुझसे थोड़ी दूरी बना ली। पर तब तक और बंदर भी आ गए थे। तब दुकानदार ने सहज रूप से उससे कहा, ‘न मानेगो? तो जै ले राधाजी की गुलेल!’ यह कहते हुए उसने एक गुलेल निकाली और बंदरों को दिखाई। ओहो! गुलेल देखते ही बंदरों में हड़कंप मच गया। सड़क के इधर के बंदर हों या सड़क के उधर के दूसरे बंदर, सबमें भगदड़ मच गई। छोटे बंदर, बड़े बंदर, मोटे बंदर, पतले बंदर, जिसको जहाँ जगह मिली, भागने लगे। बड़े बंदर कूद-कूदकर बिल्डिंग के ऊपर चढ़ बैठे। छोटे-छोटे बचुनिया जैसे बंदर बेचारे भाग नहीं पाए तो सड़क के किनारे खड़ी रेहडि़यों के पीछे छिप गए। एकदम इनसानों जैसे व्यवहार। एक तो गुलेल फिर ‘राधाजी’ के नाम का माहात्म्य...भगदड़ तो मचनी ही थी। अरे भई! राधाजी जब कृष्ण को नहीं छोड़ती थीं तो फिर ये बेचारे बंदर किस गिनती में हैं। अब मुझे लग रहा था कि जो लोग अभी सो रहे हैं, वे कैसे अद्भुत दृश्य से वंचित रह गए।

खैर, इस बार की वृंदावन यात्रा में ‘माधवजी’ हमारे गाइड थे। १८-१९ साल का लड़का, लेकिन वाक्पटुता खूब भरी हुई। वृंदावन का निधिवन घुमाते-घुमाते कहने लगा, मैडमजी, अपना चश्मा बैग के अंदर रखिए, पाकिस्तानी आतंकवादी और वृंदावन के बंदरों का कुछ पता नहीं कि कब, कहाँ से आ जाएँ। सी.सी.टी.वी. से बच जाओगी, इनसे नहीं। मैंने झट से चश्मा बैग के अंदर रखा, पर बंदरों का चश्मे से लगाव का कारण समझ नहीं पाई।

निधिवन घुमाते हुए गाइड माधव ने बताया कि यह प्रेम का स्थान है। इसलिए ताली बजाओ और हँसो। ताली बजाना और हँसना यानी आनंद महसूस करना। अद्भुत स्थान है निधिवन भी। कृष्ण की रासलीला की भूमि, कृष्ण की जितनी गोपियाँ उतने ही वृंदा के पेड़ और वह भी जोड़े में। वृंदा यानी तुलसी। प्रेम भी विचित्र शब्द है। असली दुनिया में कितना ‘वर्ज्य’ माना जाता है, लेकिन ईश्वर से जुड़कर पूज्य बन जाता है। भक्त आते हैं और भगवान् की रासलीला के स्थान की धूल माथे पर लगाते हैं।

धर्म एक ओर जहाँ ‘अर्थ और काम’ से मोक्ष की ओर जोड़ता है वहीं धर्म के प्रतीक ये मंदिर न जाने कितनों के जीवन के आर्थिक आधार बनते हैं। तमाम भक्तों के आने से धार्मिक पर्यटन बढ़ता है। पूजा-सामग्री, प्रसाद, फूल, मूर्तियाँ, स्मृति-चिह्न, खाना-पीना, होटल, धर्मशालाएँ, गाइड, यातायात, रियल-स्टेट और न जाने कितनी-कितनी जीविकाएँ आम लोगों के लिए खुलती जाती हैं। धर्म से जहाँ एक ओर दुनिया से परे ले जाने का कार्य सधता है, वहीं इस दुनिया में जीने के लिए भी साधन धर्म जुटाता है। यानी आध्यात्मिकता और भौतिकता दोनों का कार्य धर्म से सधता है। वाह! हालाँकि यही शब्द दुनिया में तमाम उठापटक का भी कारण है। दरअसल, धर्म जीवन-पद्धति है, कर्तव्य है। इससे परे कोई तीसरा अर्थ कम से कम मुझे समझ नहीं आता है। परहित सरिस धरम नहीं भाई/पर पीड़ी सम नहिं अधमाई। तुलसीदास ने कितने सहज रूप में धर्म को व्याख्यायित कर दिया, फिर भी दुनिया धर्म को लेकर लड़े जा रही है। जो चीज जितनी सहज दिखती है, उसे अपनाना उतना ही कठिन होता है। देखा वृंदावन का प्रताप! मेरे जैसी घुमक्कड़-फक्कड़ व्यक्ति भी दार्शनिक हो गई।

अभी बाँके बिहारीजी के शाम के दर्शन में दो घंटे की प्रतीक्षा थी। तय किया कि मंदिर के प्रांगण में बैठकर ही शाम के ४:३० बजे की प्रतीक्षा की जाए। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने ही बैठकर लोगों को देखने का आनंद लेने लगी। तभी याद आया कि लोगों के फोन और एस.एम.एस. आ रहे थे, जिनका जवाब नहीं दे पा रही थी। अभी समय है, चलो स्टेटस अपडेट कर दूँ फेसबुक पर। ताकि लोगों को पता चल जाए कि मैं दिल्ली में नहीं हूँ। कुछ फोटो फेसबुक पर डाल दीं। अभी लंबा-चौड़ा लिखने का समय नहीं था, तो दो-तीन फुटकर लाइनें लिखकर कुछ फोटो डाल दीं। तब तक राधे-राधे करते भक्त मंडली मस्ती में झूमने लगी। सामूहिकता में कितना आनंद होता है। यह सुरीला और बेसुरा होने का प्रश्न नहीं था, बस सामूहिकता की लय थी। और उसी में आनंद था। ढोल, नगाड़ेवाले भी मस्त और मैं भी मस्त। सबसे खूबसूरत बात यह कि इतनी भीड इतनी मस्ती थी, पर कहीं भी बेहूदगी नहीं देखी। गुलाल ही गुलाल, मस्ती ही मस्ती। राधा-कृष्ण की नगरी जो है।

अभी एक घंटा बचा था कपाट खुलने में। बाहर भक्तों के घोष ऊँचे से ऊँचे होते जा रहे थे। ‘बोल बाँके बिहारी महाराज की जय’। ऐसा लगा, भक्तों के घोष से बाँके बिहारीजी भी स्थिर न रह सके और कपाट पहले ही खोल दिए गए। कपाट खुलते ही भक्तों का समुद्र भीतर बह चला—अंदर जैसे ही पहुँचे तो अद्भुत, अवर्णनीय दृश्य देखा। लाल-गुलाबी गुलाल आसमान पर छाए हुए। सब बाँके बिहारी के साथ होली खेलना चाह रहे थे। और बाँके बिहारीजी की काले रंग की मूर्ति गुलाबी गुलाल से सराबोर होकर गुलाबी आभा से दमक रही थी। जीवन का सार, ध्येय, लक्ष्य आदि शब्द यहीं आकर समाप्त हो जा रहे थे। मोक्ष और क्या होता है। शायद यही...यही...यही...। मैं तो आनंद से छक ली। आने से पहले तो बहुत कुछ था मन में, पर अब मन में केवल आनंद! अपनी होली तो हो ली, भई!

अब कुल्हड़ की चाय पी जाए और चाट खाई जाए। अहा! चाय पीते-पीते फोन पर फेसबुक नोटीफिकेशन आने लगे, देखा कि मेरी पोस्ट पर बहुत प्रतिक्रियाएँ आ गई हैं, कुछ ने आश्चर्य जाहिर किया था तो कुछ ने शिकायत की थी कि मैं उन्हें नहीं लेकर गई। कुछ ऐसे थे, जिन्होंने पढ़ा तो, कुछ कहना भी चाहा होगा, पर लाइक करके ही छोड़॒दिया!

दरअसल, ‘यात्रा’ करना तो सब चाहते हैं, पर यात्रा की चुनौती लेना सबके बस की बात नहीं। कुछ लोग यात्रा की इतनी प्लानिंग करते हैं कि वह यात्रा होती ही नहीं। मेरे लिए जीवन हो या यात्रा, बहुत ‘इफ’ और ‘बट’ नहीं हैं। बहुत सीधा और सहज सोचनेवाली व्यक्ति हूँ। इसलिए तमाम लोगों के ‘इफ’ और ‘बट’ की पूछताछ  से जूझने का माद्दा नहीं है मुझमें। उसमें यात्रा का आनंद ही समाप्त हो जाता है। यात्रा शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती है।

मेरे तो मन में आया, विचार बनाया, थोड़ा गूगल किया और निकल पड़े। इस उद्देश्य के साथ लेट्स एक्सप्लोर...।

आर-३८, वाणी विहार

उत्तम नगर

नई दिल्ली-११००५९

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