सूरा सो पहचानिए

सूरा सो पहचानिए

पर्वत से अनेक छोटे-बड़े जलस्रोत निकलते हैं। पर्वत प्रत्येक को एक संदेश देते हुए कहता है कि इसे तुम समुद्र तक पहुँचा देना। जब पहुँचा दोगे तो तुम फिर वाष्प बनकर बादलों के कंधों पर सवार होकर मेरे पास एक विजेता की भाँति लौटोगे। तब तुम्हें मैं अपने सिर-माथे पर बिठाऊँगा। जो स्रोत इस संदेश को गंभीरता से लेता है, उसके जीवन को एक अर्थ मिल जाता है। एक उद्देश्य प्राप्त हो जाता है और लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है। उसे नई जिजीविषा से भरपूर एक गति मिल जाती है। फिर वह चट्टानों से टकराता हुआ, मरुस्थलों में झुलसता हुआ, छोटे-बड़े नालों के कीचड़, कल-कारखानों से निकलते विष को भी आत्मसात् करता हुआ गतिमान रहता है। तभी वह गंगा, यमुना, गोदावरी, सिंधु तथा ब्रह्मपुत्र सरीखा महादानी बन पाता है। जीव-जग और धरा की प्यास बुझाता है। हरियाली को लहलहाता है। धन-धान्य से परिपूर्ण करता है।

 

इसी प्रकार प्रत्येक फलदार वृक्ष अपने प्रत्येक बीज से कहता है कि तुम धरती पर गिरकर किसी भी तरह अंकुरित होना। बड़े होकर मेरी ही तरह फलदार, छायादार वृक्ष बनना, ताकि पीढि़याँ तुम्हारी छाया का सुख प्राप्त कर सकें। तुम्हारे फलों का रसपान कर सकें। परंतु कितने ऐसा कर पाते हैं? वही जिनके जीवन में कोई अर्थ है, जिंदगी का कोई मकसद है और जिनका गंतव्य भी स्पष्ट है। तभी वह विश्वासपूर्वक कह सकेगा, ‘जब से चला हूँ, मंजिल पर नजर है। मैंने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।’ यही जज्बा रखनेवाला भीड़ में अकेला सिर उठाए हुए खड़ा दिखता है। वही मनुष्य होता है। आदमियों के हुजूम से अलग एक इनसान; परंतु एक संपूर्ण मनुष्य अथवा एक मुकम्मिल इनसान होना बहुत कठिन है, बल्कि दूभर है। मिर्जा गालिब के हवाले से कहा भी गया है, ‘फरिश्तों को भी मयस्सर नहीं इंसां होना।’

फरिश्ते अथवा देवता तो दूर, हिंदूदर्शन के अनुसार ईश्वर को भी दुष्टों के विनाश और साधुजनों के परित्राण के लिए हर युग में मनुष्य के रूप में अवतरित होना पड़ता है। प्रत्येक महाभारत में अनाचार को पराभूत करने के लिए किसी अर्जुन को माध्यम बनाना पड़ता है। उसे सुख-दुःख, जय-पराजय और लाभ-हानि में सम्यक् और अविचल रहते हुए अपने दायित्व के निर्वाह के लिए तत्पर करना होता है। यह भी समझाना पड़ता है, ‘मन की स्थिरता से भी अधिक श्रेष्ठ है बुद्धि की स्थिरता, क्योंकि मन की स्थिरता से तो लौकिक सिद्धियाँ ही प्राप्त होती हैं, परंतु बुद्धि की स्थिरता से कल्याण का पथ प्रशस्त होता है।’ (भगवद्गीता, अध्याय-२)

जब किसी आदर्श और पूर्ण मनुष्य की कल्पना की जाती है तो गुरु गोविंद सिंह की छवि मानस में कौंध जाती है। देश और शेष विश्व के भी अनेक देशों में उनका ३५०वाँ प्रकाश वर्ष मनाया जा रहा है, तो उनका स्मरण और भी प्रासंगिक हो जाता है। जितना भी विश्व इतिहास पढ़ पाया हूँ, मुझे गुरु गोविंद सिंह जैसा त्यागी, पराक्रमी और मानवतावादी अन्य कोई चरित्र नहीं मिलता। उनके पिता गुरु तेग बहादुर ने सभी की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए सत्याग्रह करते हुए बलिदान दिया। दिल्ली के चाँदनी चौक में उनका सिर कलम कर दिया गया। उनकी माताजी ने परहित और धर्म की रक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित किया। उनके चारों पुत्रों ने मानवधर्म की रक्षा के लिए जूझते हुए जो शौर्य गाथाएँ लिखीं, उनका चिरकाल तक श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता रहेगा। उनमें से दो राजकुमार अजीत सिंह और जुझार सिंह समर क्षेत्र में असहिष्णु शासक की सेना का प्रतिरोध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। शेष दो सुपुत्रों जोरावर सिंह और फतह सिंह को पंजाब के सरहिंद में जीते-जी दीवार में चुनवा दिया गया। तब से सदियों को फलाँगते हुए उस बेमिसाल शहादत के साक्षियों के हवाले से आज तक कहा और सुना जाता है कि अपनी अंतिम साँस तक उन दोनों के चेहरे गर्व से दीप्त थे। होते भी क्यों न! अपने पिता से सदा सुनते जो आए थे, ‘‘सूरा सो पहचानिए, जो लड़े दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरे, तब हूँ ना छाँड़े खेत।’’

‘कृपा’ और ‘आन’ की रक्षा की प्रतीक ‘कृपाण’ सदैव गुरु गोविंद सिंह के अंग-संग रहती थी। शुभकर्मों में सदैव सक्रिय रहते हुए, रंगक्षेत्र में निर्भय-निर्भीक रहने का संकल्प करते हुए ‘चंडी चरित’ में उन्होंने लिखा—

देहि शिवा बर मोय इहे

शुभ करमन से कभौं न टरों,

जूझ पड़ौं रण में अरि सौं तो

निश्चय कर अपनी जीत करों।

अपने पिता और चारों पुत्रों की शहादत से मर्माहत गुरु गोविंद सिंहजी ने मुगल सम्राट् औरंगजेब की उन्मादी राजसत्ता से सशस्त्र संग्राम किया और अपने जीवनकाल में ही औरंगजेब का अवसान भी देखा। फिर भी संत-सिपाही गुरु गोविंद ने कभी रत्ती भर द्वेष की कोई भावना न उपजने दी। उन्होंने उदात्त मानवता का संदेश दिया, ‘मानुष की जात सब एकै पहचानबो।’

मनुजता की इस कामना को अपने आचरण में सबसे पहले उतारा भी। उनके निर्देश पर भाई कन्हैया समर क्षेत्र में आहत सैनिकों के बीच जाते और सबको अपनी मशक से पानी पिलाते। स्पष्ट है, हिंदू-सिख सैनिकों के साथ ही जख्मी मुगल सिपाहियों की प्राणांतक पिपासा को भी शांत करते।

ऐसा बहुत दूभर होता है कि कोई शूरवीर महानायक लेखनी का भी धनी हो। साहित्य सृजन के साथ ही साहित्यकारों का संरक्षक भी हो। पांवटा साहब में गुरु गोविंद सिंह के राजदरबार में साहित्यकारों को सम्मानपूर्ण संरक्षण प्राप्त था। भक्तों में ‘दशमेश’ के नाम से श्रद्धापूर्वक स्मरण किए जाते गुरु गोविंद सिंह के दो महाकाव्य पढ़ने का सौभाग्य मिला। वे हैं ‘रामावतार’ और ‘कृष्णावतार।’ उनके राम तुलसी के ‘रामचरितमानस’ के मर्यादा पुरुषोत्तम ईश्वर तुल्य श्रीराम से अलग एक ऐसे मानव हैं, जिनके चरित्र में संवेदनाओं की झंकार सुनाई देती है। विस्तार में न जाते हुए राम और सीता के स्वयंवर की एक संक्षिप्त झलक ‘रामावतार’ की इन पंक्तियों में प्रस्तुत है—

किधौं देवकन्या, किधौं वासवी है,

किधौं यक्षिणी किन्नरी नागनी है,

किधौं राग पूरे भरी रागमाला

बरी राम तैसी सिया आज बाला।

विश्व-इतिहास में गुरु गोविंद सिंह को अद्वितीय बनाता है उनके द्वारा किया गया अप्रतिम त्याग। नवम गुरु तेग बहादुर के पुत्र होने के कारण सिख पंथ का दसवाँ गुरु होने का अधिकार उन्हें वंशानुगत परंपरा से प्राप्त हुआ था। न उनका कोई प्रतिद्वंद्वी था, न गुरु की आसंदी पर आसीन होने की परंपरा पर प्रश्न उठानेवाला कोई सिख गुरु। फिर भी उन्होंने शुद्ध लोकतांत्रिक ढंग से मृत्यु से किंचित् मात्र भी भयभीत न होकर आत्मबलिदान को तत्पर, पंथ के पाँच व्यक्तियों का चयन किया। यह चयन उनमें आत्मोत्सर्ग की तत्परता की परीक्षा लेकर किया गया। उन्होंने सामने उपस्थित अपने अनुगामियों का आह्वान करते हुए ललकारा कि चंडी बलिदान में शीष चाहती है। जो अपना सिर दे सकें, वे सामने आएँ। एक आत्मबलिदानी भीड़ में से निकलकर उपस्थित हो गया। गुरु गोविंद उसे बगल में बने तंबू में ले गए और रक्तस्नात तलवार लेकर लौटे। उन्होंने कहा, ‘चंडी और शीष चाहती है।’ मृत्यु का वरण करने को तत्पर दूसरा सामने आ गया। इस प्रकार गुरु के निर्देश पर मृत्यु के आलिंगन को तत्पर एक के बाद एक पाँच व्यक्ति शीष देने के लिए प्रस्तुत हो गए। गुरु आत्मोत्सर्ग को तत्पर पाँचवें व्यक्ति को लेकर तंबू में गए और फिर पाँचों को सही-सलामत लेकर संगत के सामने आ गए। वे भारत के विभिन्न भागों से आए पराक्रमी सिख थे, जो गुरु के आदेश पर पंथ के लिए शीष देने को तत्पर थे। उनके नाम थे—भाई दयाराम, धर्मचंद, हिम्मतराय, मोहकाम चंद और साहिबचंद। वस्तुतः तंबू में एक कटा हुआ बकरा रखा था। हर बार गुरु गोविंद उसी के रक्त में तलवार डुबोकर यह जताने के लिए लाते थे कि उसका शीष चंडी को चढ़ा दिया गया। इस कठोर परीक्षा में खरे उतरे सिखों को पंज प्यारे की संज्ञा दी गई। निर्णय किया गया कि ये पंज प्यारे ही पंथ का प्रत्येक महत्त्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति से करेंगे। गुरु गोविंद ने स्वयं पंज प्यारों के समक्ष घुटनों के बल बैठकर उनसे प्रार्थना की, ‘अब आप ही इस गोविंद राय को गोविंद सिंह बनाइए?’ तब से उन्हे ‘दशमेश गुरु गोविंद सिंह’ जाना जाने लगा। इसके साथ ही उन्होंने वहाँ एकत्र खालसा संगत पंथ के अनुयायी समूह के समक्ष एक और ऐतिहासिक निर्णय की घोषणा कर दी कि आज ही से वंशानुगत गुरु-गद्दी की परंपरा समाप्त की जा रही है। पंथ का गुरु होगा ‘गुरु ग्रंथ साहेब’। उनके शब्द थे ‘गुरु मानियो ग्रंथ’। विश्व के अध्यात्म के इतिहास में इतना लोकतांत्रिक निर्णय अन्यत्र नहीं मिलता।

पंथ के प्रत्येक अनुगामी को उन्होंने साधारण मानव से सिंह बनाया। पंथ के एक-एक सिंह को केश, कृपाण, कच्छा, कंघा और कड़ा धारण करने का संकल्प कराते हुए अपने आत्मविश्वास की घोषणा इन शब्दों में की—

चिडि़यन से मैं बाज तुड़ाऊँ

सवा लाख से एक लड़ाऊँ

तभै गोविंद सिंह नाम कहाऊँ।

इतिहास साक्षी है कि तभी से मुगल साम्राज्य की चूलें हिलने लगी थीं। उसके खिलाफ भारत के विभिन्न हिस्सों में सशस्त्र संघर्ष की लहर हुँकारने लगी थी। उत्तर-पश्चिम में सिख तो दक्षिणांचल में छत्रपति शिवाजी के मराठे सक्रिय हो गए थे। गुरु गोविंद सिंह ने एक जोखिम भरा निर्णय लिया। सम्राट् औरंगजेब को निर्दोषों की हत्याओं से विरत करने के ध्येय से फारसी में लिखित ‘जफरनामा’ (विजय-पत्र) की एक प्रति १७०६ ईसवी में खिदराना के युद्ध के पश्चात् भाई दया सिंह के हाथों औरंगजेब तक भेजी। बहुत समय तक गुरु गोविंद सिंह को पता नहीं चल पाया कि ‘जफरनामा’ की वह प्रति औरंगजेब तक पहुँची या नहीं। इसलिए वे स्वयं उसकी एक प्रति लेकर दक्षिण भारत के अहमदनगर की ओर चल पड़े। उन दिनों औरंगजेब गंभीर रूप से रुग्ण था। तब तक औरंगजेब को पता चल चुका था कि उसे पंजाब के मुगल सूबेदार ने गुरु गोविंद सिंह के बारे में भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण जानकारी दी थी। उसने जबरयार और मुहम्मद यार मनसबदार को संदेश भिजवाकर गोविंद सिंह को सम्मानपूर्वक और सुरक्षित उनके पास लेकर आने का निर्देश दिया। परंतु जब तक गुरु गोविंद सिंह अहमदनगर पहुँचते, तब तक सम्राट् औरंगजेब दम तोड़ चुका था। ‘जफरनामा’ फारसी साहित्य की महत्त्वपूर्ण कृति है। अध्यात्म, साहित्य और कूटनीति के अध्येता इसका मनोयोग से अध्ययन करते हैं। विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में ‘जफरनामा’ पर शोध ग्रंथ लिखे गए हैं।

सामाजिक समरसता के क्षेत्र में गुरु गोविंदसिंह का योगदान महत्त्वपूर्ण है, जिन्हें समाज में दलित माना जाता है, उनके प्रति उनके हृदय में विशेष सम्मान की भावना थी। उसके पीछे भी एक बड़ा कारण था। हुआ यह था कि जब चाँदनी चौक में गुरु तेग बहादुर शहीद हो गए तो उनके पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि की चुनौती खड़ी हो गई। हिंदू-सिख परंपरा के अनुसार अंत्येष्टि दाह-संस्कार द्वारा की जाती है। मुगल सैनिकों ने गुरु तेगबहादुर के शरीर को चारों ओर से कड़े पहरे में घेर लिया था। उस पहरे को भेद पाना दुष्कर था। तब गुरु के दलित अनुयाइयों ने ऐसी व्यूह रचना की, जिसमें तीन तरफ  से मुगल पहरेदारों पर सशस्त्र धावा बोलकर उन्हें उलझाकर रखा गया और रंगरेटों की एक टोली ने छापामारों की भाँति झपटकर गुरु तेगबहादुरजी की पार्थिव काया को उठा लिया। पास ही एक झोंपड़ी में उन्होंने बड़ी चतुराई से अग्नि संस्कार की व्यवस्था कर रखी थी। मुगल प्रहरियों की कड़ी घेरेबंदी को धत्ता बताते हुए पराक्रमी आत्मबलिदानी रंगरेटों ने गुरु तेगबहादुर की अंत्येष्टि विधिवत् संपन्न की। उनकी सरफरोशी की प्रशंसा करते हुए गुरु गोविंद सिंह ने कहा था, ‘रंगरेटा गुरु का बेटा।’

गुरु गोविंद सिंह को विश्व इतिहास का इतना महान् नायक इसलिए माना गया कि उन्होंने अपने सामने एक बड़ा लक्ष्य रखा, जिसे प्राप्त करने के लिए संपूर्ण समर्पण की भावना से जुट गए। उन्होंने अपने प्रत्येक ‘खालसा’ अनुयायी में अन्याय के प्रतिकार का जज्बा पैदा किया। संपूर्ण जगत् को मनुष्य होने का महत्त्व बताया।

१५२-ए, समता कॉलोनी

रायपुर-४९२००१ (छ.ग.)

दूरभाष : ९४२५२०२३३६

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