ठीकरे का मोल

ठीकरे का मोल

आज सुबह से ही घर में गहमा-गहमी है।

मणिका को देखने के लिए कुछ लोग आ रहे हैं।

पूरे घर के लिए कौतुकपूर्ण सूचना है यह। किसी को विश्वास नहीं हो रहा कि नन्ही सी मणि इतनी बड़ी कब हो गई कि उसकी शादी की चर्चा शुरू हो गई! विवाह प्रस्ताव खुद लड़केवालों की तरफ से आया है और उन्होंने लड़की देखने की पेशकश की है। घर-वर को लेकर यहाँ किसी के मन में कोई संशय नहीं है। बिरादरी का प्रतिष्ठित परिवार है और हाल ही में लड़के का डिप्टी कलक्टर के पद पर चयन हुआ है। उसके ट्रेनिंग पर जाने से पहले ही वे लोग रिश्ता तय कर देना चाहते हैं।

सच तो यह है कि हीरे जैसे वर पर लुब्ध होने की इस घर की औकात ही नहीं थी। उस पर दान-दहेज की कोई चर्चा न करके उन लोगों ने पूरा रहस्य-लोक ही सिरज दिया है। यदि संबंध जुड़ गया तो यही माना जाएगा कि कन्या के नसीब में ही राजरानी बनने का योग था।

तैयारियों की व्यस्तता के बीच मणि के पिता विश्वंभर को अपने बाप दीपचंद की याद आई। एकदम हिटलरी मुद्रा में उसने पिता को चबूतरे पर धर दबोचा, ‘‘बुढ़ऊ, तुम्हारे कान मतलब की बात सुनने में बहुत चौकस रहते हैं। अब तक जरूर सुन चुके होगे कि मणि को देखने के लिए कुछ लोग आ रहे हैं।’’

दीपचंद मौन रहे। अपने इस उद्दंड बेटे से बहुत डरते हैं वह। आज से नहीं, वर्षों से। कुछ बोलने का मतलब खुद को बेइज्जत कराना है, वह जानते हैं। इसलिए इस वक्त भी बेटे की बात का जवाब देना उन्होंने मुनासिब न समझा। पर उनकी इस हुक्मउदूली पर विश्वंभर की आँखें लाल हो उठीं, ‘‘इस तरह गूँगे बनकर क्या जतलाना चाहते हो तुम? जल्लाद हूँ मैं, फाँसी चढ़ा दूँगा तुम्हें?’’

दीपचंद को मुँह खोलना पड़ा, ‘‘सचमुच हमारे लिए बहुत खुशी और फख्र की बात है कि बिरादरी की नाक समझे जाने वाले परिवार ने खुद हमारी मणि में दिलचस्पी दिखाई है।’’

‘‘गनीमत है, जुबान तो खुली!’’ विश्वंभर ने मुँह बिचकाया, ‘‘अब कान खोलकर सुन लो, जब तक वे लोग यहाँ रहें, तुम्हें पार्क या मंदिर के चौतरे पर बैठना है। भूलकर भी घर में पाँव धरा तो मुझसे बुरा कोई न होगा!’’

‘‘ठीक है।’’ दीपचंद ने हामी भर दी। विरोध करने की व्यर्थता जानते थे। बेटे ने खुद ही वजह बता दी, ‘‘दरअसल तुम पागल ठहरे! कब, किसके सामने क्या बकवास करने लगोगे, इसका मुझे भरोसा नहीं है। बेहतर है, अपनी परछाईं भी उस दरमियान यहाँ न पड़ने दो। तुम्हारी किसी बेहूदी हरकत से उन लोगों के सामने मैं शरमिंदा नहीं होना चाहता।’’

दीपचंद के चेहरे पर कलौंछ उतर आई।

‘‘अब खड़े-खड़े मेरा मुँह क्या देख रहे हो?’’ विश्वंभर खीझ उठा, ‘‘दफा हो जाओ यहाँ से!’’

एक पिटे कुत्ते की तरह दीपचंद वहाँ से चल दिए। इतना कहने की भी हिम्मत नहीं जुटा सके कि पेट में कुछ बासी-तिबासी तो डाल लेने दो! भूखे पेट बैठकर तपस्या करने की इस जागर में कूवत नहीं है। आँखों की कोर अवश्य भीग गई थीं। उसे वह हर संभव कोशिश करके बेटे की निगाह से छिपाना चाहते थे। देख लेने पर फिर चाबुक सा मारता, ‘‘तुम इनसान हो या हैवान? घर में मंगलकारज की शुरुआत हुई नहीं कि तुम आँसू बहाकर अपसगुन करने लगे!’’

दीपचंद चले जरूर गए, पर उनका मन घर में ही धरा रहा। मणि उनकी लाड़ली पोती ही नहीं, आँखों की पुतली है। उसकी शादी के प्रसंग से खुद को अछूता रखना उनके हृदय को कैसे गवारा हो सकता था? इसीलिए मंदिर की सीढि़यों पर बैठने के बाद भी अनमने रहे। जान तक नहीं सके कि उनकी अनुपस्थिति में कब डिप्टी कलक्टर लड़का अपने माता-पिता के साथ आया है। कब जलपान के दौरान लड़के के पिता ने विश्वंभर से पूछा है, ‘‘आपके पिताजी कहाँ हैं? दिखाई नहीं दिए।’’

‘‘वह शहर से बाहर हैं।’’ उन्हें जवाब मिला है।

‘‘कब तक लौटेंगे? यदि आस-पास ही गए हों, तो फोन करके बुला लीजिए। उनसे मिलने का मेरा विशेष रूप से मन है।’’

‘‘गाँव गए हैं। तीन-चार दिन में लौटेंगे। वहाँ बीहड़ में सिगनल न होने से फोन की सुविधा का लाभ नहीं उठाया जा सकता।’’

‘‘ऐं, गाँव?’’ मेहमान का चेहरा यह सुनकर गंभीर हो उठा है।

जो भी हो, इस संवाद से अनजान रहने पर भी दीपचंद अपने पेट की भूख से अनजान न थे। शायद किसी काम में व्यस्त होते तो बार-बार इधर ध्यान न जाता। पर खाली बैठे रहने पर मन लौट-फिरकर उसी एक बिंदु पर पहुँच जाता था, विश्वंभर ने नाश्ता तक नहीं करने दिया!

पूजा की थाली और जल से भरा लोटा लिये मंदिर आनेवाली कॉलोनी की महिलाओं को जब अपनी वजह से असुविधा होते देखी तो दीपचंद सीढि़यों से उठ खड़े हुए। उनके कदम पार्क की ओर बढ़ गए। सुबह का समय होता तो वहाँ प्रातः भ्रमण करनेवालों की भीड़ मिलती। दो-चार संगी-साथी भी घड़ी भर बोलने-बतियाने को मिल सकते थे। नियमित योग करनेवालों की गतिविधियाँ ही कुछ देर निहारी जा सकती थीं। पर इस वक्त माली खुरपी से क्यारियों की गुड़ाई कर रहा था और चटक धूप चारों ओर फैली हुई थी।

दीपचंद को देखकर माली ने अपने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा, ‘‘बाबू, यह समय पार्क में घूमने का नहीं है। पाँच मिनट में ही आप पसीने से नहा जाओगे।’’ ‘‘जानता हूँ भाई।’’ दीपचंद एक मलिन हँसी हँसे, ‘‘खोटे सिक्के से सभी ऐसे ही बेरुखी से मुँह फेर लेते हैं। देखो न, तुम्हें मेरा यहाँ घड़ी भर खड़ा रहना अखर गया।’’ माली ने दाँतों तले जीभ दबाई और दोनों हाथ जोड़ लिये, ‘‘आपने कैसी बात कह दी बाबू! मुझे भला आपके यहाँ ठहरने से क्यों एतराज होगा? वह तो धूप की तलखी देखकर मुँह से निकल पड़ा था। मैं भी अब उठकर घर चलूँ। बुढि़या राह देख रही होगी। थोड़ी और देर कर दी तो आँखें तरेरती यहीं आ धमकेगी। ऊपर से चार खरी-खोटी सुनाएगी।’’

दीपचंद को पता था कि माली की छोटी सी कोठरी पार्क के पिछवाड़े ही बनी हुई है। उसे उठकर जाते देखा, तो खुद भी साथ लग गए, ‘‘सोचता हूँ कि जब यहाँ तक आया हूँ तो तुम्हारे यहाँ चलकर मिट्टी के घड़े का एक लोटा पानी पीता चलूँ। अब तो घर-घर में फ्रिज आ गए हैं न! हमारे जैसे गँवई-गाँव के बाशिंदे घड़े के सोंधे पानी तक को तरस जाते हैं।’’

‘‘आइए बाबू! खुशी से पानी पीजिए। पर गरीब आदमी के घर आपको जल के साथ गुड़ की डली ही मिलेगी। मिठाई के दो टुकड़े तक न खिला सकूँगा।’’ ‘‘मेरे लिए वह गुड़ की डली किसी मेवे-मिठाई से कम नहीं होगी, भाई।’’ कहते हुए दीपचंद की आवाज लरज गई। आँखों में एक बार फिर आँसू उमड़ने को हुए, पर इस दफा भी अपने दर्द को घुटक गए।

मोहनभोग से भी मीठा गुड़ की डली का स्वाद। उसके साथ लोटा भर ठंडा पानी। दीपचंद को तनिक सुकून मिला। माली की कोठरी के सामने नीम का एक घना पेड़ था। उसकी छाया में एक चारपाई पड़ी थी। हवा के झोंकों से हिलती पत्तियाँ और वह चारपाई दीपचंद को घंटा, आध घंटा वहीं लेटकर आराम करने का निमंत्रण देने लगीं। पर यह तो उँगली पकड़कर पहुँचा पकड़ने जैसी बात हो जाती। सुबह का थका-हारा माली कुछ कलेवा करके खुद इस चारपाई पर लेटकर विश्राम करना चाहेगा, इतनी समझ उनमें थी।

पानी पीकर तनिक कसकती आवाज में बोले, ‘‘तो चलूँ अब?’’

‘‘हाँ बाबू, सीधे घर जाइए। अब हमारी आपकी लड़कपन की वह उमर नहीं रही है जो बारिश की झड़ी, सर्दी की मार और धूप का कहर झेल सके।’’

‘‘सच कहते हो भाई!’’ दीपचंद बोझिल कंठ से बोले और आगे बढ़ गए।

माली ने उन्हें सीधे घर जाने की नसीहत दी थी, पर वह जानते थे कि इस वक्त घर का दरवाजा उनके लिए बंद है। ठीक है, विश्वंभर की इच्छानुसार वह मेहमानों के सामने न पड़ते। पर कबाड़ भरने की कोठरी में तो बैठ ही सकते थे। किंतु दबंग बेटे को बूढ़े बाप का घर में ठहरना तक गवारा न हुआ। गवारा तो उस औरंगजेब को बाप की साँसों का चलना भी नहीं है, लेकिन अपने हाथों गला न घोंट सकने की बेबसी के चलते इस शाहजहाँ को झेल रहा है। उन्होंने उद्विग्न होते हुए सोचा। मन-मन भर के पाँव एक बार फिर मंदिर के चौतरे की तरफ उनकी बूढ़ी-लाचार देह को ठेलते हुए ले जाने लगे। वहाँ भी निष्प्रयोजन बैठे रहना खलेगा, वह जानते थे किंतु निरुपाय थे।

दोपहर बारह बजे मध्याह्न की आरती के बाद पुजारीजी मंदिर के पट बंद करके अपने घर चले गए। अब शाम को पाँच बजे ही लौटेंगे, दीपचंद को मालूम था। इस अवधि में सिर्फ लू के झकोरे ही टहोका मारकर उनके संगी-साथी बनेंगे, यह भी जगजाहिर था। सिर्फ अज्ञात थी उनके लिए अपने गृह-निर्वासन की अवधि और यह टीस छोटी न थी।

अचानक दीपचंद चिहुँक उठे। उन्हें लगा, लड़की देखकर मेहमान अब तक लौट गए होंगे। इसलिए उन्हें भी घर पहुँच जाना चाहिए। यहीं बैठे रहने पर विश्वंभर गरियाए बिना न रहेगा, ‘टमटम-बग्घी भेजे जाने का इंतजार कर रहे थे क्या? बहू-बेटी रसोई लिये तुम्हें जिमाने को साँझ तक बैठी रहेंगी, ऐसे लाटसाहब हो?’

अपनी गलती का अहसास होते ही दीपचंद हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए। हालाँकि तेज धूप की वजह से पैदल चलना कष्टकारी था, पर घर पहुँचने की ललक से पैरों में पंख लग गए थे। उत्साह के अतिरेक में बेटे की आलीशान कोठी तक तो पहुँच गए, पर फाटक पर खड़े होकर पाँव फिर मन-मन भर के हो गए।

सोचने लगे, सिरफिरे इनसान का क्या भरोसा? विश्वंभर कहीं उनका चेहरा देखते ही गुस्से से तमतमा तो न उठेगा? पर जब द्वार तक आ ही गए थे तो सोचा, ओखली में सिर देने के बाद मूसल से कैसा डर? जो हालात सामने आएँगे, भुगतने पड़ेंगे, भुगत लूँगा।

दीपचंद ने कोठी का फाटक इतने धीरे से खोला, ताकि भीतर आवाज न पहुँचे। गलियारा पार किया, बरामदे में जा खड़े हुए। ड्राइंग-रूम का दरवाजा खुला था, परदा लहरा रहा था। मन में आशंका जागी, कहीं मेहमान अभी यहीं तो नहीं हैं? यदि कमरे में मौजूद हुए तो बवाल खड़ा हो जाएगा।

पर दो-तीन मिनट आहट लेने की कोशिश के बाद भी निःस्तब्धता छाई रही। बातचीत का कोई स्वर कानों में न पड़ा। वैसे भी सुबह आठ बजे के आए मेहमानों का अब तक रुकना कठिन ही था। सिर्फ लड़की देखने में समय ही कितना लगा होगा? उसके बाद नाश्ते-पानी में यदि घंटा-डेढ़ घंटा भी लग गया हो, तो ग्यारह बजे तक उनको वापस लौट जाना चाहिए था। और अब तो दोपहर बारह बजे मंदिर के पट बंद हो जाने के बाद भी घंटे भर से ज्यादा समय निकल चुका है। एक-डेढ़ बजे तक उन लोगों का ठहरे रहना संभव ही नहीं है। इसीलिए ड्राइंग-रूम में सन्नाटा था। कोई आवाज नहीं आ रही है।...और हाँ, कोठी के सामने कोई गाड़ी विश्वंभर की गाड़ी गैरेज में बंद है। निश्चय ही अपनी गाड़ी में आए वे लोग लौट चुके हैं।

दीपचंद ने स्वयं को सुस्थिर किया। माथे पर झिलमिलाती पसीने की बूँदों को पोंछा और दिल कड़ा करके ड्राइंग-रूम का परदा हटाकर भीतर पाँव रखा। पर यह क्या? सामने किसी गरजते सिंह को खड़ा देखकर भी वह इतना खौफ न खाते, जितना सामने सोफे पर बैठे किसी संभ्रांत सज्जन को देखकर भयभीत हो गए। कमरे में कुछ अन्य मानव-मूर्तियों की उपस्थिति का भी आभास हुआ, पर वे कहाँ हैं और क्या कर रही हैं, देखने-जानने का दीपचंद को होश न रहा। हाँ, सोफे पर बैठे संभ्रांत सज्जन के निकट बैठा हुआ विश्वंभर जरूर दिखाई दे गया।

दीपचंद ने सोचा कि बिना कोई आहट किए वह वापस मुड़े और कमरे से बाहर निकल जाएँ? परदा पहले की तरह लहराने लगे, तो शायद कोई उनका यहाँ आना न जान सकेगा। पर उनके कदम पीछे हटने से पहले ही संभ्रांत व्यक्ति के मुँह से सुनाई दिया, ‘‘विश्वंभर बाबू, देखिए कौन आए हैं?’’

इन शब्दों के कानों में पड़ते ही दीपचंद एक अचल पाषाण प्रतिमा में तब्दील हो गए। उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। अब बाहर निकलना फिजूल था। उनका आगमन जान लिया गया था। उनके ऊपर गाज गिरेगी, यह तय था। किस रूप में गिरेगी, यह नहीं जानते थे।

विश्वंभर शायद सिर झुकाए कोई पत्र पढ़ रहा था। नजदीक बैठे संभ्रांत सज्जन की आवाज सुनकर चौंका और सिर उठाया। द्वार पर खड़े दीपचंद को देख उसके सिर पर भूत सवार हो गया। खुद को रोकते-रोकते भी हिम-शीतल कंठ से निकल ही पड़ा, ‘‘तुमसे आने को मना किया था न? वापस लौटो।’’

दीपचंद अपना चक्कर खाता मस्तिष्क और लड़खड़ाते कदम लिए पीछे मुड़े और बाहर निकलकर खुले दरवाजे से तनिक हटकर खड़े हो गए। साँसों को सँभालने के बाद ही उनमें वहाँ से हटने की ताकत आ सकती थी। वर्तमान शारीरिक-मानसिक स्थिति में उनके लिए दो कदम चलना भी दूभर था। सिर्फ यही नंगी तलवार उनकी गरदन पर लटक रही थी, कमरे में पाँव धर देने के अपराध का अंजाम क्या होगा? जिस हुलिया में वह विश्वंभर के इतने खास मेहमान के सामने जा पहुँचे थे, क्या उनका गुस्सैल बेटा इसे बरदाश्त कर सकेगा?

दीपचंद की निगाह अपनी वेशभूषा पर गई—पाँव में बेटे द्वारा फेंक दी गई पुरानी चप्पलें, देह पर मैली-कुचैली धोती और घटियापन में उससे होड़ लेती हुई आधी आस्तीन की बंडी। सिर पर बेतरतीब बाल। चेहरे पर बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी। सर्वांग में किसी भिखारी की झलक। यह स्थिति तब थी, जब सारे घर के कपड़े वाशिंग मशीन में धुलते थे। उनके लिए साबुन की एक बट्टी तक पच्चीसों दफे फरियाद के बाद मुहैया होती थी।

पर बेटे की अदालत में उन्हें सफाई पेश करने का मौका ही कब मिलेगा? अहंकार में चूर उनके बेटे ने इनसानियत का पाठ पढ़ा ही कब है? जिस तरह नमूना बने वह ड्राइंग-रूम के दरवाजे पर खड़े हो गए थे, उसे नई रिश्तेदारी जुड़ते समय सहन नहीं किया जाएगा। विश्वंभर इस गलती के लिए उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।

तभी उनके कानों में कमरे से आता संभ्रांत सज्जन का कंठ-स्वर पड़ा—‘‘कौन थे यह सज्जन? यदि मिलना जरूरी हो तो आप उन्हें बुला सकते हैं। अभी फाटक पर ही होंगे।’’

‘‘अरे भाई साहब, आप अभी तक उस फटेहाल आदमी के बारे में ही सोच रहे हैं।’’ विश्वंभर की खुशामदाना आवाज गूँजी, ‘‘यह तो हमारा माली है। थोड़ा सिरफिरा और पागल किस्म का बूढ़ा है। पर मैंने तरस खाकर काम पर लगा रखा है। बेचारा दुनिया में अकेला है। किसी और बँगले में तो इसे काम मिलेगा नहीं। हमारे यहाँ लगा रहने पर कम-से-कम भूखों तो नहीं मरेगा!’’

‘‘ठीक कहते हैं आप।’’ कहकर संभ्रांत सज्जन ने बात खत्म कर दी।

‘‘आपने देखा, दिमागी तौर पर कितना कमजोर है? यह वक्त पेड़-पौधों की सार-सँभाल का है? कई बार समझाया है मैंने कि इस विकट गरमी में सिर्फ सवेरे-शाम ही बगीचे की देखभाल किया करो। पर पागल है न, कुछ समझता ही नहीं। इसलिए वापस लौटाना पड़ा।’’

सिर्फ एक गंभीर ‘‘हूँ’’ संभ्रांत सज्जन के कंठ से निकली।

दीवार की आड़ में खड़े दीपचंद ने यह सारा संवाद सुना। उन्हें लगा, किसी ने पिघला सीसा कानों में उड़ेल दिया हो। क्या कोई बेटा अपने बाप के लिए...।

अगले ही पल उन्हें लगा कि वह यहाँ खड़े रहकर अपने गुनाह में और बढ़ोतरी कर रहे हैं। यदि किसी वजह से कोई व्यक्ति ड्राइंग-रूम से निकल आया, तो होनेवाले अनर्थ की कल्पना से वह काँप उठे। जैसे-तैसे ताकत सँजोकर वहाँ से हट गए। एक बार फिर सावधानी से, बिना आहट कोठी का फाटक खोला और बाहर निकलकर उसे बंद करने के बाद आग बरसती सड़क पर खड़े हो गए।

बाएँ पाँव की हवाई चप्पल को भी इसी वक्त टूटना था। इस लायक न रही थी कि उसे पहनकर दो कदम चला जा सके। नंगे पाँव इस धूप में मंदिर तक पहुँचने की कल्पना से दीपचंद का सिर घूम गया।

पर आसमान से बरसती आग से पेट में उमड़ती आग क्या कम भयंकर थी? धूप एक बार सहन की जा सकती थी, भूख को सहना नामुमकिन था।

दीपचंद ने हताशा से हाथ मले।

तभी एक केलेवाला समीप से अपनी ठेली लिये हुए निकला। भूख से बेहाल दीपचंद के मन में आया, गिड़गिड़ाकर इससे एक केला माँग लें। पर इस भिखमंगेपन को उनके स्वाभिमानी हृदय ने गवारा न किया। लेकिन आँखों में व्याप्त भूख को शायद एक निगाह में ही उस मामूली फल विक्रेता ने पढ़ लिया था। ठेली रोक, करुणार्द्र्र कंठ से बोला, ‘‘भूखे हो बाबा? केला खाओगे?’’

‘‘नहीं बेटा! भगवान् तुम्हारा भला करे।’’ दीपचंद लड़खड़ाती जुबान से बोले। बुभुक्षा जतला देने की अपनी आँखों की चुगलखोरी पर उन्हें क्रोध आया, पर निरुपाय थे। दरअसल, कल शाम भी उन्हें निराहार रहना पड़ा था। विश्वंभर अपने परिवार सहित कहीं बाहर निकल गया था और वहाँ से वे लोग खा-पीकर लौटे थे। बूढ़े बाप के पेट की पहले भी कब किसी ने चिंता की थी, जो कल करते! कटोरदान में सुबह की दो बासी रोटियाँ पड़ी भी होंगी तो उन्हें बुड्ढे को देने के बजाय कुत्ते के आगे फेंकना बेहतर समझा होगा। वह भी यह सोचकर सब्र कर गए थे कि एक वक्त न खाने से पेट को आराम ही मिलेगा। कहाँ पता था कि अगले दिन फिर उपवास की नौबत आ जाएगी। विश्वंभर के हिटलरी आदेश पर अमल करने से पहले जेब में दस-बीस रुपए डाल लेने का ही अगर खयाल आ गया होता, तो इस तरह भूख से कुश्ती नहीं लड़नी पड़ती। पर अब तो...।

केले वाले के विपरीत दिशा में चले जाने पर वह नंगे पाँव तपती सड़क पर बढ़ गए। गंतव्य था वही दुर्गा मंदिर। पर उनकी क्षणिक उपस्थिति मात्र से कोठी के ड्राइंग-रूम का खुशनुमा माहौल भी जैसे किसी अप्रिय गंध से भर गया था। संभ्रांत सज्जन ने उबासी लेते हुए अपनी जेब से मोबाइल निकाला और एक नंबर मिलाने के बाद पूछा, ‘‘दिवाकर, गाड़ी ठीक हुई?’’

‘‘जी सर। सर्विस सेंटर काफी दूर था, इसलिए समय लग गया। लेकिन अब मेकैनिक ने एक पुरजा बदल दिया है। वापसी में गाड़ी हमें परेशान नहीं करेगी। मैं दस मिनट में पहुँच रहा हूँ।’’ उधर से बताया गया।

सज्जन ने मोबाइल का स्विच बंद करके कहा, ‘‘विश्वंभर बाबू हमारी गाड़ी ठीक हो गई है। ड्राइवर उसे लेकर दस-पंद्रह मिनट में आ रहा है। हमें चलने की इजाजत दीजिए।’’

‘‘दरअसल, मैं चाहता था कि जब आप लोगों को हमारी मणिका पसंद है, तो क्यों न आज ही बात पक्की कर ली जाए।’’ विश्वंभर ने याचना की।

‘‘देखिए, हमें आपकी बेटी पसंद जरूर है, पर हम शादी तभी पक्की करेंगे, जब आपके पिताजी भी मौजूद होंगे।’’

‘‘उनकी अनुपस्थिति में भी बात तय की जा सकती है। पोती की शादी पक्की हो जाने की खबर सुनकर वह निश्चय ही प्रसन्न होंगे।’’

‘‘मैं मानता हूँ, पर हमारे परिवार की खुशी तो अधूरी रहेगी।’’ वह गंभीर होकर बोले।

‘‘ऐसा क्यों?’’ विश्वंभर ने अबूझ भाव से मेहमान का चेहरा देखा।

उन्होंने बात स्पष्ट की, ‘‘यह तो आप भी मानते होंगे कि आपके यहाँ अपनी ओर से पहल करके हमारा शादी का प्रस्ताव भेजना यह जाहिर करता है कि हम आपके यहाँ अपने बेटे का संबंध करने के इच्छुक हैं।’’

‘‘जी हाँ।’’ विश्वंभर तनिक सकपकाया।

‘‘यह कोई छोटी बात नहीं है। कोई वजह तो इसके मूल में होनी ही चाहिए।’’

‘‘जी हाँ।’’ विश्वंभर को फिर स्वीकारना पड़ा।

‘‘तो आप सुन लीजिए, इसकी वजह आपके पिताजी हैं। सिर्फ इसीलिए हम आपके घर की बेटी को अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं, क्योंकि वह बाबू दीपचंदजी की सुपौत्री है। इसके अलावा आपके परिवार में हमारी दिलचस्पी की कोई अन्य वजह नहीं है।’’

विश्वंभर भौचक्का रह गया।

शब्द नहीं, जैसे कोई तिलिस्म उसके सामने सिरज गया था। उसे लगा, इस तिलिस्म का टूटना जरूरी है, अन्यथा वह पागल हो जाएगा। जिस बूढ़े बाप को उसने हमेशा ठीकरा समझा, उस ठीकरे का मोल इतना अधिक कैसे हो सकता है? आखिर उस बूढे़ में ऐसा क्या है, जिसके सामने नतमस्तक होकर यह प्रतिष्ठित परिवार दौड़ा चला आया है?

‘‘मेहमान ने मेजबान के चेहरे के भाव पढे़ और रहस्य से परदा हटाते हुए बोले, ‘‘दरअसल, बाबूजी मेरे पिता के बचपन के मित्र हैं। दोनों ने एक साथ गाँव की प्राइमरी पाठशाला में अपनी आरंभिक पढ़ाई की थी। उस वक्त मेरे पिता की जिंदगी तकलीफों से भरी थी। माता-पिता थे नहीं। चाचा-चाची की क्रूरताओं के चलते भविष्य अंधकारमय था। तब आपके पिता ने ही उन्हें न सिर्फ आगे बढ़ने का हौसला दिया, बल्कि अपने माता-पिता की निरंतर मनुहार करके पैसों से भी भरपूर मदद की। अपने अजीज दोस्त दीपचंद की वजह से ही मेरे पिता का मनोबल नहीं टूटा और वे सरकारी नौकरी पाने के लिए प्रयासरत हुए। सौभाग्य से उनका मनोरथ सफल हुआ और उन्हें केंद्र सरकार की डाक सेवा में ऊँचा पद मिल गया। पर तबादले की नौकरी थी, नौकरी की व्यस्तताएँ थीं, चाहते हुए भी गाँव आकर अपने बालमित्र से वह मिल न सके। दोनों में काफी दिनों तक पत्र-व्यवहार चला, बाद में अपने-अपने पारिवारिक दायित्वों की वजह से वह भी बंद हो गया। लेकिन अपने बचपन के प्रिय मित्र के उपकारों को मेरे पिता अंतिम समय तक नहीं भूल सके। मृत्युशय्या पर उन्होंने मुझे अपने गाँव का पूरा अता-पता देते हुए कहा था कि मैं उनके बालमित्र की खोज करूँ और किसी-न-किसी रूप में उस अहसान का यत्किंचित् ही सही, भार उतारूँ।’’

कमरे का माहौल भारी हो उठा था।

विश्वंभर के मुँह से कोई बोल न फूटा।

मेहमान ने अपनी लंबी बात के बीच थोड़ा विराम लेने के लिए मेज पर रखा पानी का गिलास उठाकर दो घूँट भरे और फिर बात का सूत्र जोड़ा, ‘‘तो इस कोशिश में मैंने सबसे पहले गाँव में ही बाबूजी को तलाशा। मुझे मालूम पड़ा कि वह अपनी सारी संपत्ति बेचकर किसी शहर में बस गए हैं। चूँकि शहर का नाम और निश्चित पता-ठिकाना कोई नहीं बता सका, इसलिए अँधेरे में मेरी तलाश बराबर चलती रही। अभी हाल में मुझे उनके घर-परिवार के बारे में पूरी जानकारी मिली। ईश्वर की कृपा से अपने प्रतिभाशाली बच्चों की वजह से मुझे भी बिरादरी में पहचाना जाने लगा है, इसलिए मैंने एक पुरानी दोस्ती को चिरस्थायी बनाने के लिए दोनों परिवारों में वैवाहिक संबंध जोड़ने का मंसूबा बनाया। इसी का नतीजा है, जो मेरा परिवार आज आपके यहाँ मौजूद है। लेकिन आप खुद ही बताइए, क्या बाबूजी की गैरहाजिरी में हमारे लिए यह शादी तय करना मुनासिब होगा?’’

एक सकता-सा छा गया। उस निस्तब्धता में विश्वंभर के हृदय की बढ़ी हुई धड़कन साफ सुनी जा सकती थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि अपनी मूढ़ता पर कितना पछताए। जिस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता जतलाने के लिए यह परिवार उसकी चौखट पर आया, उसी का उसने ‘माली’ कहकर परिचय दिया है। यह सच है कि बुढ़ऊ...न न, पिताजी का हुलिया उस समय ऐसा नहीं था कि किसी प्रतिष्ठित परिवार से परिचय कराया जा सकता, पर उनकी इस फटेहाली का जिम्मेदार कौन है? उन आकस्मिक पलों में सिर्फ अपनी साख बचाने का खयाल उसके जेहन में आया था। सोचा था, किसी इनसान की क्षणिक, और वह भी मूक छवि लोगों को कहाँ याद रहती है? शादी के समय कन्या के बाबा को इतनी ठसक से पेश कर देगा कि आसमान के फरिश्ते भी फटेहाल माली से उसका साम्य नहीं मिला सकेंगे। पर इस नए रहस्योद्घाटन के बाद...

‘‘तो ठीक है, फिर हम लोग चलते हैं।’’ कहते हुए आगत सज्जन उठ खड़े हुए, उनके परिवारीजनों ने भी उठने की चेष्टा दिखाई।

तभी द्वार पर दस्तक हुई।

‘‘कौन?’’ विश्वंभर ने पूछा।

कॉलोनी के एक परिचित युवक ने परदा हटाकर भीतर झाँका। गंभीर कंठ से सूचना दी, ‘‘जल्दी चलिए, आपके पिताजी का मंदिर की सीढि़यों पर बैठे-बैठे देहांत हो गया है। विश्वंभर को लगा, वह चेतना-शून्य हो जाएगा।’’ आगत सज्जन की जैसे सैकड़ों मील दूर से आती आवाज उसके कानों में पड़ रही थी, ‘‘बाबूजी के इस रूप में दर्शन करने का मेरा दुर्भाग्य है, कब जानता था?’’

जानता तो वह भी नहीं था कि किस आसेबी ताकत से खुद को गायब करके इस परिवार में मुँह दिखाने से बच सके। उसने दोनों हाथों से अपना माथा थाम लिया और एक अस्फुट आर्तनाद कंठ से निकल पड़ा।

७३, नॉर्थ ईदगाह कॉलोनी, आगरा-२८२०१०

दूरभाष : ०९७१९४६००८५

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