नवदुर्गा

हिंदू धर्मावलंबियों में माँ भगवती दुर्गा की पूजा-आराधना का विशेष महत्त्व है। माँ दुर्गा के अनंत रूप हैं। शद्धालु इनके सभी रूपों की स्तुति कर इनकी कृपा के पात्र बनते हैं। वर्ष में दो बार माँ दुर्गा के नौ रूपों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। नौ दिन चलनेवाले इस धार्मिक अनुष्ठान को नवदुर्गा-पूजन और नवरात्र-पूजन आदि कहा जाता है। देश भर में नवदुर्गा-पूजन उल्लास और भक्ति-भाव से मनाया जाता है।

इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के विभिन्न नौ शक्तिरूपों की अर्चना की जाती है। ये नौ विभिन्न रूप माँ दुर्गा के साक्षात् शक्ति अवतार हैं, जो भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण कर उन्हें लोक-परलोक में मान-सम्मान दिलवाते हैं। माता दुर्गा के नौ शक्ति रूप इस प्रकार हैं-

शैलपुत्री

नवदुर्गाओं में माता शैलपुत्री प्रथम दुर्गा मानी जाती हैं। माता दुर्गा के इस रूप में उनके हाथों में त्रिशूल और कमल-पुष्प सुशोभित है। माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ है। धार्मिक ग्रंथों में इनकी उत्पत्ति की निम्न कथा वर्णित है-

माता शैलपुत्री अपने पूर्वजन्म में दक्ष प्रजापति की कन्या के रूप में उत्पन्न हुइऔ। तब इनका नाम ‘सती’ रखा गया। देवी सती बचपन से ही अनन्य शिव-भक्त थीं। युवा अवस्था में उन्होंने अपनी शिव-भक्ति व तपस्या के बल से शिवजी को प्रसन्न किया और उन्हें पति-रूप में पाने की कामना की। शिवजी ने मनोवांछित वर देते हुए उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

एक बार दक्ष प्रजापति ने एक महायज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में उसने ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र सहित सभी देवताओं एवं ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया, किंतु भगवान् शिव को आमंत्रित नहीं किया। देवी सती ने जब यह सुना तो वे अपने पति का यह अपमान सहन न कर सकीं और उनका मन वहाँ जाने के लिए अत्यंत व्याकुल हो उठा।

वे क्रोधित होते हुए भगवान् शिव से बोलीं, ‘‘हे नाथ! मेरे पिता दक्ष प्रजापति एक महायज्ञ का आयोजन कर रहे हैं। सभी देवताओं और ऋषि-मुनियों को वहाँ आमंत्रित किया गया है, किंतु उन्होंने आपको इस यज्ञ में आमंत्रित न करके आपका अपमान किया है। इसे मेरा मन कदापि स्वीकार नहीं कर सकता। अतः हे नाथ! आप मुझे वहाँ जाने की आज्ञा दें।’’

देवी सती के क्रोध को देखकर शिवजी बोले, ‘‘हे देवी! आपको इस प्रकार क्रोधित नहीं होना चाहिए। दक्ष प्रजापति महायज्ञ के कर्ता हैं। यह उनकी इच्छा पर निर्भर करता है कि वे किसे आमंत्रित करें और किसे नहीं। हमें इन व्यर्थ की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इस प्रकार की बातें मन की कटुता को बढ़ाती हैं।’’

भगवान् शिव के इस प्रकार समझाने पर भी देवी सती का क्रोध कम न हुआ। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान् शिव ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।

जब देवी सती यज्ञस्थली पर पहुँचीं तो वहाँ उन्हें चारों ओर शिव-निंदा सुनाई पड़ी। दक्ष प्रजापति भी अपने सेवकों से घिरे हुए शिव-निंदा में लीन थे। देवी सती की सभी बहनें उनका उपहास और व्यंग्य कर रही थीं। इस स्थिति को देखकर उनका क्रोध बढ़ गया। वे अपने पति का अपमान सहन न कर सकीं और वहीं यज्ञ की अग्नि में उन्होंने स्वयं को भस्म कर लिया। जब भगवान् शिव को इस बात का ज्ञान हुआ तो उन्होंने अपने गणों को भेजकर उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया।

देवी सती ने अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर जन्म लिया। वहाँ उनका नाम ‘पार्वती’ रखा गया; किंतु शैलराज हिमालय के घर उत्पन्न होने के कारण ही उन्हें ‘शैलपुत्री’ भी कहा गया। इस जन्म में भी माता शैलपुत्री ने अपनी तपस्या के बल से भगवान् शिवजी को प्रसन्न करके उन्हें पति-रूप में प्राप्त किया। नव दुर्गाओं में माता शैलपुत्री का महत्त्व और शक्तियाँ अनंत हैं। नवरात्रों में प्रथम दिवस पर माता शैलपुत्री की ही पूजा-अर्चना की जातीहै।

ब्रह्मचारिणी

नवदुर्गा का दूसरा स्वरूप माता ब्रह्मचारिणी के रूप में विख्यात है। श्वेत वत्र धारण करनेवाली माता ब्रह्मचारिणी के एक हाथ में जपमाला और दूसरे हाथ में कमंडलु सुशोभित होता है। पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है-

दक्ष प्रजापति की यज्ञ वेदी पर प्राण त्यागने के बाद देवी सती ने पर्वतराज हिमालय की पत्नी मैना के गर्भ से पुनः जन्म लिया। कन्या के शुभ लक्षणों को देखते हुए उसका नाम ‘पार्वती’ रखा गया। जब पार्वती ने युवा अवस्था में प्रवेश किया तो एक दिन देवर्षि नारद घूमते-घूमते पर्वतराज हिमालय के यहाँ आ पहुँचे।

पर्वतराज हिमालय ने देवर्षि नारद का अतिथि-सत्कार किया और पार्वती का हाथ देखकर उसका भविष्य बताने का आग्रह किया।

देवी पार्वती को देखते ही देवर्षि नारद ने आसन से उठकर उन्हें प्रणाम किया। नारद के इस आचरण को देखकर पर्वतराज हिमालय और मैना आश्चर्यचकित रह गए।

उन्होंने नारदजी से इस आचरण का कारण जानना चाहा। तब वे हँसते हुए बोले, ‘‘हे पर्वतराज! आपकी यह कन्या पूर्व जन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री और भगवान् शिव की पत्नी माता सती थीं। अपने पिता दक्ष प्रजापति द्वारा पति का अपमान किए जाने पर उन्होंने यज्ञ वेदी पर ही प्राणों का त्याग कर दिया था। अब उन्होंने देवी पार्वती के रूप में पुनः आपके घर में पुनर्जन्म लिया है। इसलिए मैंने इन्हें प्रणाम किया। अपने सुकर्मों के कारण यह इस जन्म में भी भगवान् शिव की पत्नी बनने का गौरव प्राप्त करेंगी।’’

देवर्षि नारद की बात सुनकर देवी पार्वती ने उनसे भगवान् शिव की प्राप्ति का उपाय पूछा। नारदजी ने उन्हें कठोर तप द्वारा शिवजी को प्राप्त करने का उपदेश दिया।

नारदजी के उपदेशानुसार देवी पार्वती ने भगवान् शिवजी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए सभी राजसी सुखों का त्याग कर कठोर तपस्या आरंभ कर दी।

देवी पार्वती ने तपस्या के आरंभिक १,००० वर्ष कंद-मूल खाकर व्यतीत किए। तत्पश्चात् ३,००० वर्षों तक केवल जमीन पर टूटकर गिरे हुए बेलपत्रों को खाकर वे तपस्या में लीन रहीं। इसके बाद अनेक वर्षों तक उन्हेंने निर्जल और निराहार तपस्या करते हुए वर्षा, आँधी व धूप में भयानक कष्टसहे।

देवी पार्वती ने भगवान् शिव की हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की। इस तपस्या के फलस्वरूप उनकी काया एकदम क्षीण हो गई। उनकी कठिन तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। इंद्र सहित सभी देवगण और ऋषि-मुनि देवी पार्वती की कठोर तपस्या से भयभीत हो गए। वे सभी ब्रह्माजी के समक्ष उपस्थित हुए और उनसे देवी पार्वती को मनचाहा वर प्रदान करने की प्रार्थना की।

अंत में परमपिता ब्रह्माजी ने देवी पार्वती को दर्शन दिए और बोले, ‘‘हे देवी! तुम्हारी कठिन तपस्या के समक्ष सभी देवगण नतमस्तक हैं। इस प्रकार का कठोर तप केवल तुम्हारे द्वारा ही संभव था। तुम्हारी मनोकामना शीघ पूरी होगी। भगवान् शिव तुम्हें पति-रूप में अवश्य प्राप्त होंगे। कठोर तपस्या के कारण सृष्टि में तुम्हें ब्रह्मचारिणी अर्थात् तप का आचरण करनेवाली कहा जाएगा।’’

इसके बाद ब्रह्माजी ने देवी पार्वती का सौंदर्य उन्हें पुनः प्रदान कर दिया।

इस प्रकार देवी पार्वती को अपने तप के बल से भगवान् शिव पति रूप में प्राप्त हुए और वे संसार में ब्रह्मचारिणी नाम से विख्यातहुइऔ।

माता ब्रह्मचारिणी की उपासना से भक्तों में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम आदि की वृद्धि होती है और उन्हें सर्वत्र सिद्धि एवं विजय की प्राप्ति होती है। नवरात्रों के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है।

 

चंद्रघंटा

नवरात्रों के तीसरे दिन माता दुर्गा के शरीर से प्रकट हुई तीसरी शक्ति चंद्रघंटा की स्तुति की जाती है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का आधा चंद्रमा शोभायमान है। यही कारण है कि भक्तजन इन्हें ‘चंद्रघंटा देवी’ कहते हैं।

माता चंद्रघंटा की कृपा से भक्तों के सभी पाप, बाधाएँ, शारीरिक कष्ट, मानसिक च्ांिताएँ और भूत-प्रेत बाधाएँ दूर होती हैं। स्हां पर सवार ये माता भक्तों में निर्भयता के साथ-साथ सौम्यता के गुणों का समावेश करती हैं। जो भक्त शुद्ध मन, कर्म और वचन से माँ चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना करते हैं, उनके शरीर दिव्य प्रकाश से आभायुक्त हो जाते हैं। उनके शरीर से प्रकाशयुक्त अदृश्य शक्ति का विकिरण होता रहता है, जिससे उनके संपर्क में आनेवाले प्रत्येक व्यक्ति प्रभावित होता है और उसका काम सरलता से बनता चला जाता है। माँ चंद्रघंटा दुष्टों का संहार करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं, किंतु इनके दर्शक और आराधक को ये माता अपने सौम्य और शांति से परिपूर्ण रूप के दर्शन करवाती हैं।

माता चंद्रघंटा का शरीर स्वर्ण वर्ण का है। इनके दस हाथ बताए गए हैं, जिनमें खड्ग, अत्र-शत्र, बाण आदि विभूषित हैं। देवासुर संग्राम में उनके घंटे की भयानक ध्वनि मात्र से सैकड़ों अत्याचारी दानव, दैत्य और राक्षस मृत्यु को प्राप्त हो गए थे।

इनकी मुद्रा सदैव युद्ध के लिए तैयार रहनेवाली होती है, जिसका तात्पर्य यह है कि अपने भक्तों के शत्रुओं के विनाश के लिए तैयार रहकर ये सदा उनका भला करने को आतुर रहती हैं। जिस भक्त पर माता चंद्रघंटा की कृपा होती है, उसे दैवी वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुंधियों और विविध प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई देने लगें तो भक्त को यह समझ लेना चाहिए कि उस पर देवी की कृपा-दृष्टि बनी हुईहै।

माता चंद्रघंटा की स्तुति विधि-विधान के अनुसार पूर्णतः पवित्रता के साथ करनी चाहिए। माता की कृपा प्राप्त कर हम समस्त सांसारिक कष्टों से मुक्त होकर परम पद के अधिकारी बन जाते हैं। साधना के दौरान भक्तों को सदैव माता के सौम्य रूप को अपने मस्तिष्क में केंद्रित रखना चाहिए।

 

कूष्मांडा

माता दुर्गा के चौथे स्वरूप को कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है। नवरात्रों के चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। माता कूष्मांडा का निवास-स्थान सूर्यलोक में है। इसी कारण उनके शरीर की कांति और आभा सूर्य के समान प्रकाशमान है। सृष्टि के संपूर्ण प्राणियों में इसी देवी का प्रकाश प्रदीप्त है। माता कूष्मांडा के दिव्य तेज से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं।

जब ब्रह्मांड का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अंधकार-ही-अंधकार था, तब माता कूष्मांडा ने अपनी मंद मुसकान द्वारा अंड अर्थात् ब्रह्मांड की उत्पत्ति की। इस प्रकार अपनी हलकी सी हँसी द्वारा ब्रह्मांड की रचना करने के कारण इन्हें माता ‘कूष्मांडा’ कहागया।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय सूर्य एवं अन्य नक्षत्रों को माता कूष्मांडा ने अपने तेज से ही प्रकाश प्रदान किया था। तब से ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज माता कूष्मांडा की छाया है।

स्हां पर सवार माता कूष्मांडा को आठ भुजाओं के कारण अष्ट भुजाधारी देवी भी कहा जाता है। इनके हाथों में क्रमशः कमंडलु, धनुष-बाण, कमल-पुष्प, अमृत-कलश, चक्र, गदा और सभी प्रकार की सिद्धियों व निधियों को प्रदान करनेवाली जप की माला सुशोभित होती है।

माता कूष्मांडा भक्तों को हर प्रकार की सिद्धियाँ, धन, ऐश्वर्य और मोक्ष प्रदान करनेवाली देवी हैं। इनकी सच्ची उपासना और आराधना से भक्तों के सभी रोग, दुख, कष्ट-क्लेश और बाधाएँ समाप्त हो जातीहैं।

सभी प्रकार के सुखों को प्रदान करनेवाली माता कूष्मांडा भक्तों की केवल भक्ति और सेवा से ही प्रसन्न होकर उन्हें मनोवांछित वर प्रदान करती हैं। इनकी नियमित साधना से साधकों को धन-संपत्ति और ऐश्वर्य के साथ-साथ मोक्ष की भी प्राप्ति हो जाती है। माता कूष्मांडा की पूजा-अर्चना मनुष्य को विभिन्न प्रकार की व्याधियों से विमुक्त कर, सुख-समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाती है। भक्तों को शुद्ध और पवित्र मन से माता कूष्मांडा के स्वरूप को ध्यान में रखकर उनकी उपासना करनी चाहिए।

 

स्दंमाता

स्दंमाता माता दुर्गा के पाँचवें रूप में अवतरित हुइऔ। दुर्गा-पूजन में पाँचवें दिन स्दंमाता की पूजा की जाती है। इनके पुत्र कुमार कार्तिकेय को स्दं कहा जाता है, इसीलिए उनकी माता होने के कारण दुर्गा का यह स्वरूप ‘स्दंमाता’ के नाम से प्रसिद्धहै।

स्दंमाता की गोद में भगवान् स्दं विराजमान होते हैं। स्दंमाता की चार भुजाएँ हैं, जिनमें दो हाथों में कमल-पुष्प विभूषित हैं। एक हाथ वर-मुद्रा में और दूसरा हाथ भगवान् स्दं को गोद में पकड़े हुए होता है। शुभ वर्ण की यह माता कमल के आसन पर आसीन रहती हैं, इस कारण ये पद्मासना देवी भी कहलाती हैं। स्हां भी इनका वाहन है।

सूर्य के समान तेजवाली स्दंमाता अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं को पूरी करनेवाली देवी हैं। इनकी निस्स्वार्थ भक्ति से साधक को सभी प्रकार की सिद्धियों और निधियों की प्राप्ति होती है।

स्दंमाता की उपासना करने पर भक्त का हृदय शुद्ध हो जाता है। स्दंमाता की उपासना करते समय साधक को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर मन को एकाग्र करना चाहिए। उपासना के समय साधक का ध्यान लौकिक और सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर स्दंमाता के स्वरूप में लीन होना चाहिए।

स्दंमाता की उपासना की एक विशेषता यह भी है कि साधक द्वारा स्दंमाता की पूजा-अर्चना करने से भगवान् स्दं की उपासना भी स्वतः ही हो जाती है। इससे स्दंमाता के साथ-साथ भगवान् स्दं की कृपा-दृष्टि भी साधक को सहज ही प्राप्त हो जाती है।

यदि भक्त निस्स्वार्थ भावना से स्दंमाता की पूजा-अर्चना करते हैं, तो वे उन्हें सुख-संपदा और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। स्दंमाता की उपासना करनेवाले भक्त सूर्य के समान अलौकिक तेज और कांति से संपन्न हो जाते हैं। माता की आराधना मात्र से ही उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जातीहै।

 

कात्यायनी

माता कात्यायनी दुर्गा के छठे अवतार के रूप में पूजी जाती हैं। छठे नवरात्रे को माता कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार माता कात्यायनी की उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है-

कात्य नाम के ऋषि की वंशावली में एक प्रसिद्ध ऋषि कात्यायन उत्पन्न हुए। महर्षि कात्यायन माता दुर्गा के परम भक्त थे। उन्होंने माता दुर्गा की अनेक वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता दुर्गा ने उन्हें दर्शन दिए और उनसे वर माँगने को कहा। तब महर्षि कात्यायन ने माता दुर्गा से वर माँगा कि ‘वे पुत्री रूप में उनके घर में जन्म लें।’

माता दुर्गा ने महर्षि कात्यायन को इच्छित वर प्रदान करदिया।

कुछ समय पश्चात् जब पृथ्वी पर महिषासुर नामक असुर का अत्याचार बढ़ गया, तब माता दुर्गा के तेज से महर्षि कात्यायन के घर में माता दुर्गा के छठे स्वरूप का जन्म हुआ। महर्षि कात्यायन के यहाँ जन्म लेने के कारण ये ‘माता कात्यायनी’ के नाम से प्रसिद्धहुइऔ।

माता कात्यायनी ने जन्म लेते ही विशाल रूप धारण कर लिया। उनके इस विशाल रूप को देखकर महर्षि कात्यायन ने उन्हें प्रणाम किया और तीन दिन शुक्ल सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक उनकी पूजा-अर्चना की। माता कात्यायनी ने महर्षि की पूजा ग्रहण करने के बाद महिषासुर का वध किया।

पुराणों में वर्णित एक अन्य कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव के मिश्रित तेज से माता दुर्गा के छठे स्वरूप का जन्म हुआ, तब महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम उनकी पूजा की। इस कारण उनका नाम ‘कात्यायनी’पड़ा।

माता कात्यायनी भक्तों को अमोघ फल प्रदान करनेवाली देवी हैं। ब्रज की गोपियों ने भी भगवान् कृष्ण को पति-रूप में पाने के लिए यमुना के तट पर इनकी पूजा की थी। चार भुजाधारी माता कात्यायनी का वाहन स्हां है। मनुष्य के समस्त पापों का नाश करके उसे मोक्ष प्रदान करनेवाली माता कात्यायनी सहज भक्ति से प्रसन्न हो जाती हैं। इनकी उपासना से मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मिलता है।

 

कालरात्रि

माता दुर्गा के सातवें स्वरूप को माता कालरात्रि के नाम से जाना जाता है। माता कालरात्रि की काया घने अंधकार के समान एकदम काली है। इनके मस्तक पर तीन नेत्र विद्यमान हैं, जो ब्रह्मांड के समान गोल हैं।

माता कालरात्रि के सिर के केश घने और बिखरे हुए हैं। इनके गले में विद्युत् के समान प्रकाशमान माला सुशोभित है। श्वास लेते समय इनकी नासिका से अग्नि की तीव्र और भयंकर लपटें प्रकट होती हैं। यद्यपि इनका शरीर काला है, तथापि इनमें से विद्युत् के समान तेज प्रकाश-युक्त किरणें प्रकट होती हैं।

माता कालरात्रि का वाहन गर्दभ अर्थात् गदहा है। यह माता चार भुजाओंवाली हैं। इनके दो हाथों में क्रमशः खड्ग और नुकीला अत्र विभूषित है, जबकि एक हाथ वर मुद्रा में और दूसरा अभय मुद्रा में है।

भक्तों के लिए माता कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत भयानक है, किंतु उन्हें ये देवी सदैव शुभ फल प्रदान करती हैं। अपने भक्तों को शुभ फल प्रदान करने के कारण इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाताहै।

माता कालरात्रि की पूजा-आराधना से भक्तों के समस्त पाप धुल जाते हैं और वे माता के दर्शन से मिलनेवाले पुण्य के भागी हो जाते हैं। यदि भक्त निस्स्वार्थ और भक्तिपूर्ण भावना से माता कालरात्रि की उपासना करते हैं तो उनके सभी कष्ट-क्लेशों का अंत हो जाता है और उन्हें सभी प्रकार के सुख व वैभवों की प्राप्ति होती है।

माता कालरात्रि दैत्य, दानव, राक्षस, भूत-प्रेत आदि का नाश करनेवाली देवी हैं। इनके स्मरण मात्र से ही भक्त की सभी ग्रह-बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इनकी आराधना से भक्त भय-मुक्त हो जाते हैं। नवरात्रे के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा की जाती है। शुभ फल प्राप्त करने के लिए पूजा करते समय भक्त को अपने मन को शुद्ध और पवित्र रखना चाहिए।

 

महागौरी

नारदजी से शिवजी को प्राप्त करने के लिए तपस्या का उपदेश मिलने पर देवी पार्वती ने कठोर तप करने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने सभी प्रकार के सुखों को त्याग जंगल में रहकर कठोर तप आरंभ कर दिया।

यह तप अनेक वर्षों तक चला। तपस्या के दौरान उन्होंने धूप, आँधी, वर्षा और शीत का भीषण प्रकोप सहा, जिससे उनका शरीर धूल, मिट्टी और पत्तों से ढक गया। इसके फलस्वरूप उनका शरीर काला पड़ गया। अंत में जब भगवान् शिव ने उन्हें दर्शन देकर पत्नी-रूप में स्वीकार करने का वचन दिया, तब उन्होंने अपनी जटाओं में से निकलनेवाली गंगा द्वारा उनका शरीर मल-मलकर धोया।

पवित्र और शुद्ध गंगाजल के स्पर्श से देवी पार्वती के शरीर का सारा मैल धुल गया और उनका शरीर गौर वर्ण होकर दीप्तिमान हो उठा। इस प्रकार गौर वर्ण की होने के कारण माता पार्वती का नाम ‘महागौरी’ प्रसिद्धहोगया।

दुर्गा-पूजन के आठवें दिन माता महागौरी की उपासना की जाती है। माता महागौरी की चार भुजाएँ हैं। उनका वाहन वृषभ है। उनकी यह मुद्रा अत्यंत शांत और सौम्य है।

इनकी पूजा-अर्चना से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं। इनकी शक्ति अमोघ और फल प्रदान करनेवाली है। सच्चे हृदय से आराधना करने पर भक्तों के सभी दुख, क्लेश, ग्रह-बाधाएँ एवं पाप-संतापों का अंत हो जाता है और वे सभी प्रकार के पुण्यों को प्राप्त करने के अधिकारी बन जाते हैं।

माता महागौरी का ध्यान-स्मरण, पूजन-आराधन भक्तों के लिए कल्याणकारी है। इनकी उपासना करते समय साधकों को एकाग्रचित्त होकर माता महागौरी का ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा प्राप्त होने पर साधक को विभिन्न प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। भोग, ऐश्वर्य और मोक्ष प्रदान करनेवाली माता महागौरी सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं।

सिद्धिदात्री

नवरात्रे के नौवें और अंतिम दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। माता सिद्धिदात्री सभी सिद्धियों की स्वामिनी हैं। अपने भक्तों को विभिन्न सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली माता सिद्धिदात्री की कथा इस प्रकार है-

जब माता दुर्गा के मन में सृष्टि-रचना का विचार उत्पन्न हुआ, तब उन्होंने भगवान् शिव को उत्पन्न किया। शिवजी ने उत्पन्न होने पर माता दुर्गा से सिद्धियाँ प्रदान करने की प्रार्थना की। उन्हें सिद्धियाँ प्रदान करने के लिए माता दुर्गा के एक अंश से देवी सिद्धिदात्री का जन्म हुआ, जो सभी प्रकार की सिद्धियों की ज्ञाता थीं। माता दुर्गा के आदेशानुसार माता सिद्धिदात्री ने भगवान् शिव को अठारह प्रकार की दुर्लभ, अमोघ और शक्तिशाली सिद्धियाँ प्रदान कीं। इन सिद्धियों की प्राप्ति से ही शिवजी में दैवी तेज उत्पन्न हुआ।

माता सिद्धिदात्री से सिद्धियाँ प्राप्त करके शिवजी ने विष्णु की और विष्णुजी ने ब्रह्मा की उत्पत्ति की। ब्रह्माजी को सृष्टि-रचना का, विष्णु को सृष्टि के पालन-पोषण का और शिवजी को सृष्टि के संहार का कार्य मिला।

ब्रह्माजी को नर और नारी के अभाव के कारण सृष्टि-रचना में कठिनाई आने लगी। तब उन्होंने माता सिद्धिदात्री का स्मरण किया। माता सिद्धिदात्री के प्रकट होने पर ब्रह्माजी बोले, ‘‘हे माता सिद्धिदात्री! नर-नारी के अभाव के कारण मुझे सृष्टि-रचना में कठिनाई आ रही है। आप अपनी सिद्धियों द्वारा मेरी इस समस्या का समाधान करें।’’

ब्रह्माजी की बात सुनकर माता सिद्धिदात्री ने अपनी सिद्धियों द्वारा शिवजी का आधा शरीर नारी का बना दिया। इस प्रकार शिवजी आधे नर और आधे नारी के रूप के कारण अर्द्धनारीश्वर कहलाए। इस प्रकार ब्रह्माजी की समस्या का समाधन हो गया और सृष्टि-रचना का कार्य सुचारु रूप से चलने लगा।

माता सिद्धिदात्री कमल पुष्प पर विराजमान होती हैं। इनका वाहन स्हां है। माता सिद्धिदात्री चार भुजाओंवाली देवी हैं। सिद्धिदात्री की उपासना करने से साधकों की सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों और साधकों को सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली देवी हैं।

पुराणों के अनुसार, माता सिद्धिदात्री अठारह प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। ये सिद्धियाँ हैं—अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, सर्वज्ञात्व, दूरश्रवण, परकायप्रवेशन, वाव्क्तसिद्धि, कल्पवृक्षत्व, सृष्टि, संहारकरणसामर्थ्य, अमरत्व, सर्वन्यायकत्व, भावना और सिद्धि।

माता सिद्धिदात्री की कृपा जिस पर हो जाती है, वह सारे सुखों को भोगते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है। माता सिद्धिदात्री भक्तों की सभी लौकिक और पारलौकिक मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। इनकी उपासना सभी कष्टों का अंत कर देती है।

 

(पं. के.के. त्रिपाठीकृत एवं सत्साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘हिंदी देवी देवता’ से साभार)

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