पिंजर

उस दिन अमरीका में ‘राष्ट्रपति दिवस’ मनाया जा रहा था। जगह-जगह जश्न हो रहे थे। राष्ट्रीय झंडा फहराया जा रहा था। राष्ट्रपति अपने भाषण में अमेरिका के गणतंत्र का गुनगान कर रहे थे। उस अवसर पर देश-प्रदेश से आई पीडि़त माएँ अमेरिका के साथ लगती मैक्सिको की सीमा पर ‘सेक्स सलेवरी’ के खिलाफ प्रदर्शन कर रही थीं। अगवा हो चुकी बेटियों के चित्र उनके गले में लटक रहे थे।

स्वेतलाना, जो सेक्स सलेवरी को निज पर भोग चुकी थी, राष्ट्रपति से मुखातिब होकर कह रही थी, ‘हे शहंशाहे-आलम! आपके आँगन में ये क्या गुल खिल रहे हैं। दूसरे देशों की चिंता भूल जाओ। पहले अपने देश के कचरे की सफाई करो।

‘लिंकन ने कभी इस धरती पर गुलामी की जंजीरें तोड़ी थीं। आज उसी धरती पर गुडियापटोले खेलने वाली उम्र की लाखों बेटियाँ गुलामी की जंजीरों में जकड़ी वेश्या का जीवन जी रही हैं। वेश्या की फिर भी अपनी इच्छा होती है, इन गुलामों की तो इच्छा भी कोई नहीं। हर समय लुट रही हैं। दिन-रात रूई (कपास) की तरह धुनी जा रही हैं। कमाई कोई और ले जाता है। चार-पाँच डालर में पंद्रह-पंद्रह मिनट की शिफ्ट लगाने के लिए सुबह से बिठा दी जाती हैं। और रात के उस समय तक बहती हैं, जब तक डालर बरसते हैं। दिन-रात, चौबीसों घंटे, हफ्ते के सातों दिन, वर्षों तक आधी भूखी, मुरदार की तरह कोंची जाती रहती हैं। दो-तीन साल में पिंजर भर रह जाती हैं। फिर उस पिंजर की ‘शक्ति’ न जाने कहाँ खपा देती हैं।

‘गरीब देश में चकले में बैठकर एक दिन के दो हजार रुपए लेती हैं। अमरीका पहुँचकर वही तीस हजार डालर मौसी की हथेली पर टिकाती हैं। जितनी सुंदर और कमसिन होती है, उतनी अधिक कमाई देती है। इसीलिए मासूम, छोटी उम्र की लड़कियाँ ही अगवा की जाती हैं।

‘वे मर्द के बराबर की इनसानी जिंदगी नहीं जी रहीं। सच्ची बात तो यह है कि उनके साथ व्यवहार पशु से अच्छा नहीं हो रहा। पशु-सी, बेची और खरीदी जाती हैं। सौदागर गरीब देशों से उन्हें कौडि़यों के मोल लाते हैं। उन्हें अमरीका में बेचकर, डॉलर इकट्ठे कर ले जाते हैं।

‘लता से कली की तरह तोड़कर चकले पर बिठा दी जाती हैं। इस देश में ऐसे अपराध की सजा तीस साल है, लेकिन मिलती किसी को नहीं। यह कानून फाइलों की कब्र में दबा हुआ है। इस धरती पर लाखों अपराध होते हैं। अमरीका में इनकी संख्या हजारों में है।

‘बादशाह सलामत! आप दो बेटियों के पिता हैं। और चकले में बैठनेवाली भी किन्हीं विवश माँ-बाप की संतान हैं। आप मैक्सिको के बॉर्डर तक कई बार हो आए हैं। इनमें से कई गरीबों, गायों के शव लावारिस देखे होंगे। उन्हें देख पत्थर भी रो पड़े। क्या उनकी हालत पर आपको रोना नहीं आया?

‘किस्मत की शिकार माँओं के पिंजर पृथ्वी के दूसरे छोर से देख लिए। आपके कोर्ट में इनसाफ की भीख माँगने आई हैं। जीते जी इनका मिलाप नहीं करवा सके। रब के वास्ते, उनकी झोली में अस्थियाँ ही डाल दो।’

स्वतंत्रता प्रदर्शनी के बाद पत्रकारों से मुखातिब थी—‘मेरे पिता को, जो पहली सरकार के स्तंभ थे, मारकर मुझे और मेरी छोटी बहिन को राजनीतिक गुंडे ले गए। रह गए दोनों माँ और बीरा, नरक भोगने के लिए। पिता से क्या बदला लिया? बदला तो हमसे लिया, जिन्हें पढ़ने की उम्र में  ‘सेक्स स्लेब’ बना दिया।’

रूस के गिर जाने पर कानून कहीं नहीं रहा। गुंडाराज आ गया। अर्थतंत्र धड़ाम आ गिरा। बेकारी बढ़ गई। पहले औरतें काम पर थीं, बेकार हो गईं। रोजगार की तलाश में लोग बाहर जाने की कोशिश करने लगे। अमरीका सबके लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ था। अमरीका के नाम पर माफिया लाभ उठा गया। वैसे नर्स, बेबी सिटर आदि के नाम पर ले जाते और कच्चे मांस के सौदागरों को बेच देते हैं।

रूस के साथ ही पूर्वी यूरोप के देशों का आर्थिक ढाँचा बिखर गया। वहाँ भी पूर्वी यूरोप के लोग ट्रैवल एजेंटों के गलत प्रचार का शिकार हो रहे थे। उन्हें समीप की पश्चिमी यूरोपीय मंडी में लाकर बेच देते। लेकिन पैसे कम मिलते। पहले बड़े शहरों की माँग पूरी होती। बाकी को अमरीका के लिए जहाज भरकर मैक्सिको सिटी में एकत्र करते रहते हैं।

मुझे व तीन और लड़कियों को बॉर्डर के पास मैक्सिको के एक शहर में ले गए। पेशे की ट्रैनिंग के लिए एक मैडम को सौंप दिया। छोटी मुझसे ही बिछुड़ गई। हमारे चलने के समय वह आँखें भरे खड़ी थी। लेकिन पत्थर दिल लोगों से डरती चूँ-चाँ नहीं कर पाई। माँ-बाप से दूर किया था, बहिन का सहारा भी न रहने दिया।

वहाँ संदेह की तलवार हर समय सिर पर लटकती रहती। दिन-रात धंधा कर उनके लिए नोट छापती। हमें दो वक्त की भरपेट रोटी नसीब नहीं होती थी। काम के समय मात्र चॉकलेट के एक-दो पीस खा लेते। साथ कोक पी लेतीं। अमरीकियों जैसी दिखने के लिए मेमोंवाला, गोरियों का पहनावा डाल लेती। मैकअप का सामान खत्म नहीं होने देते थे। मुँह से निकालते ही आ जाता।’

‘दिनभर तितली बनी रहतीं। ठीक से निजी ध्यान देने पर ग्राहक बढ़ जाते। कभी कोई सौदागर भी आ जाता। उससे अच्छे हाथ रँग लेती।

मेरे साथ की चार लड़कियों को दूसरे सेंटर में ले गए। माह भर वहाँ उन्हें आरंभिक ट्रेनिंग दी। फिर सभी सिखलाई केंद्रों की लड़कियों को बड़े पैमाने पर पंद्रह-बीस के टोलों में बाँटकर अगली ट्रेनिंग के लिए नई जगह भेज देते थे।

वह कोर्स पूरा कर लेने पर मुझे और रोजी को एक अन्य लड़की के साथ एक नए शहर भेज दिया। न जाने हममें क्या कमी रह गई थी। हो सकता है, हमसे उन्हें बगावत की बू आई हो, और किसी खास कोशिश के लिए भेजा हो। वहाँ मासियों का डंडा चलता था। छोटी-छोटी बात के लिए सर्कस के जानवरों की तरह हरेक पर पटा चलता। छाँटे से पीटते। पीटने के कारण शरीर पर नीले निशान पड़ जाते। यूनीफार्म में रहना पड़ता। सिर पर बेसवाल की टोपी। ऊपर जींस की कमीज, नीचे जींस की पैंट। देखने वाले को छात्राएँ या खिलाड़ी लड़कियाँ नजर आतीं। हमारे धंधे के बारे में पता नहीं चलता था। असल शिक्षा प्रैक्टिकल के लिए मर्दों के सामने हाजिर रहतीं। उन्होंने विश्व प्रसिद्ध खजुराहो-सी मूर्तियों के आसन सिखाए। वे पशुओं जैसे लोग थे। नशा करते और अपना स्टेमिना बनाते। साँस पक्का करते, जैसे लंबी दौड़ के लिए तैयारी कर रहे हों। शुरू में कोई-कोई बेहोश भी हो जाती थी। हम पानी की फुहार मारकर उसे होश में कर लेते। नए सिरे से फिर शुरू करते। मेरा रोना निकल आता। दया तो क्या करनी थी। तरह-तरह के दुःख देते। जागते रहना पड़ता, भूखी रहतीं। जब तक उनके अनुसार ‘सीधी न हो जाती’ बुरी तरह से पेश आते। कभी अपने दुःख के साथ छोटी बहन याद आ जाती। उसकी चिंता करती। वह छोटी उम्र की थी, उस पर न जाने क्या बीतती होगी? बड़े दुख की बात है कि संशोधन करनेवाली महिलाएँ थीं। महिलाएँ भी वे, जो हमारी तरह कष्ट झेल चुकी थीं। मेडल खलनायक के तलवे चाटने के कारण मिला होता। यदि कहीं माँ जैसी मोह दिखातीं, उसके पीछे भी एक रहस्य होता। कोर्स के अंत में खलनायक को इनमें से किसी के बारे में बुरी रिपोर्ट मिलने पर उसका अंत मौत था। न कोई दाद न फरियाद। हमें सेंटर में भेजा ही इसके वास्ते था, सीधी करने के लिए। कई महीने इस तरह मैक्सिको में लग गए।

कोर्स पूरा हो गया। न जाने हम दोनों को एक अन्य कसबे में, जिसका नाम ‘टी’ से शुरू होता है, क्यों भेज दिया? वे शहर में टॉप का माल चुनकर रखते। वहाँ से आगे अमरीका भेजते थे। उनमें मैं भी थी। हम अमरीका पहुँचकर चकले का काम सफलतापूर्वक चला सकती थीं। शहर किले-सा था। पहरा लगा रहता। किले की तरफ से चिडि़या नहीं फटक सकती थी। अंदर जाने का एक दरवाजा था, बाहर के लिए दूसरा। गेट पर हर समय पहरा लगता। यदि कोई बाहर से भूलकर भी जा घुसता, उसकी जान की खैर नहीं थी। हमारा बाहर जाना-आना बंद। जाना गाडि़यों में ही हो पाता, वह भी धंधे के लिए। पुलिस पूरा सहयोग देती, मानो सरकारी अदारा हो।

रोजी की माँ बहुगुणी थी। बेटी की तलाश में उसने सारी दुनिया छान दी। खोजते-खोजते वह हमारे शहर आ पहुँची, जहाँ उसकी रोजी थी। पूरे यत्न करके भी वह शहर में दाखिल नहीं हो पाई। पुलिस तक पहुँची, फिर भी किसी ने नहीं जाने दिया। इतना पता चल सका कि रोजी ठीकठाक है। वहीं से अमरीका भेज दी गई है। रोजी की माँ पीछे-पीछे जाना चाहती थी, मगर बीजा नहीं मिला। सिर्फ फोन पर माँ-बेटी की बात हो सकी थी। रोजी रो रही थी। उसका मन भर आया, बोल नहीं पाई। हिचकी लग गई थी। इधर माँ की रुलाई निकल गई। जोर-जोर से फूटकर रो रही थी। पास बैठे पिता का बुरा हाल था। आँसू बहाने पर मन हल्का हुआ। फिर कहीं कुछ बात हो॒सकी।

रोजी ने कहा, ‘माँ, मुझ पर कठोर पहरा लगा है, सुबह-सवेरे कार में अड्डे पर छोड़ आते हैं। आधी रात तक...घंटे-दो घंटे में ही शरीर मुरदा हो जाता है। फिर पता नहीं मेरी लाश के साथ क्या होता रहता है!’

‘हिम्मत कर, बेटी! उड़ारी मार आ। शेरनी बन जा। हर रोज मरने से एक दिन मरना कहीं अच्छा है।’ माँ बेटी को लड़ने-मरने के लिए तैयार कर रही थी।

‘मुओं ने मेरे पंख नोंच लिये हैं। उड़ारी कैसे लगाऊँ? आप लोग सब्र का घूँट भरो।’ रोजी ने जीने की आस छोड़ दी थी। हर समय मौत की प्रतीक्षा रहती।

रोजी की माँ ने कबीले में बता दिया। अगवा होते ही तुरंत पुलिस को या घर में ही फोन कर देते। अपराधी दबोच लिये जाते। उन सबके आँखों के सामने लड़की को उठाया और कार में ढूस लिया। किसी ने आवाज नहीं निकाली। मुँह भी सी दिए गए मानो। एक माह ऐसा ही तीन लड़कियों के साथ हुआ।

मैंने उन्हें कहा, ‘बीती बात पर ही पछता रहे हो। पहले हिम्मत नहीं कर सके तो अब पुलिस को रिपोर्ट कर दें। जब आपको पता है, रोजी मैक्सिको के इस शहर में माफिया के नियंत्रण में बँधुआ बनी है, तो दोनों देशों की पुलिस को फोन करो।’

 ‘पुलिस तो खुद धंधे में भाईवाल है। उन्हीं के प्रश्रय में तो जगह-जगह कारोबार चलता है। जहाँ भाईवाली नहीं होती, वहाँ महीना बँधा होता है। सरकार को पता होता है कि क्या हो रहा है। माफिया के हाथ बहुत लंबे हैं। सरकार में सैल होते हैं। शिकायत करके जान गँवानी है क्या?’ श्वेतलाना ने स्पष्ट कर दिया।

तुम अमरीका कैसे पहुँच गई? मैं जानना चाहती थी। माफिया मैक्सिको से सीमा कैसे पार करवाता है। सिखलाने के बाद लड़कियों के व्यापारी आने लगे। कभी हमें ‘बीच पर’ मंडी दिखाने ले जाते। शनि व रविवार को वहाँ अच्छा मेला लगता था। अमरीका से बहुत लोग मनोरंजन के लिए आते थे। छोटे व्यापारी एक-दो लड़कियों का सौदा करते। बड़े सौदागर थोक में सौदा कर लेते। सीमा पार करके आगे जहाँ-जहाँ माल  ‘डिलीवर’ करना होता, बात कर लेते।

पाँच लड़कियों को अमरीका जाने के लिए चुना गया। उनमें मैं और रोजी शामिल थीं। रोजी माहभर पहले चली गई। चार हम थीं, पाँचवीं मौसी और एक मालिक का आदमी, जो इनचार्ज बनाया गया। हमें बॉर्डर तक वे खुद छोड़ गए। सचेत भी कर गए। किसी ने खिसकने की या पुलिस को सूचना देने की हरकत की, उसका परिवार...। मैक्सिको से लगता अमरीका का बॉर्डर पार करना आसान है। तीन सौ मील लंबा है। अमरीका से कंट्रोल मुश्किल है। मैक्सिको सरकार सीमा पर रोकना नहीं चाहती। सीमा पार करके लोगों को रोजगार मिलता है। बेरोजगारी की समस्या हल होती है। वहाँ की पुलिस पहले ही बिकी हुई थी। पाँच सौ डालर प्रति व्यक्ति रखवा लिया। उससे अलग दो-ढाई हजार बॉर्डर पार करवाने के लिए, स्मगलरों का पक्का बँधा हुआ था। स्मगलरों की सियासी लोगों से साँठगाँठ थी। आगे रोकना, न रोकना अमरीका की सिरदर्दी समझी जाती है। मन से हम चाहती थीं कि पकड़ी जाएँ। डिपोर्ट हो जाएँ। सरकारी खर्च पर घर पहुँच जाएँगी। माफिया का डर नहीं रहेगा। लेकिन कुछ कर नहीं सकती थीं, असमर्थ थीं। मालिकों की नजर में थीं। सोने के बिसकुटों की तरह बचा-सँभालकर ले गए।

बॉर्डर पर हमें बारह-तेरह फुट ऊँची, काँटेदार तार फाँदनी पड़ी। आगे तपता मरुस्थल था। मरुस्थल क्या पार करना था, हमारी पहाड़ से टक्कर थी। एक को साँप ने डस लिया। हमें एक तरफ अमरीका पुलिस का डर, दूसरी तरफ माफिया का। उन्हें गोली चलाते हुए कुत्ते को मारने जैसा तरस भी नहीं करना था। एक बात सोचती। मरनेवाली खुशकिस्मत है। उनकी ‘सेक्स-स्लेवरी’ की जून कट गई। हम जीवित सिरे लग गईं। हमारा भाग्य ही बुरा था। हमें गंदगी के कीड़े की जून जीने पर विवश होना पड़ा। मौत के साथ दो-दो हाथ करते मरुस्थल से पार हो गया। दूसरी टोलियों की लड़कियाँ वहाँ पहुँच गईं। मेरी छोटी बहन भी वहाँ मिली।

आगे गैंग के लोग ट्रक लगाए खड़े थे। उन्होंने अपना-अपना माल सँभाल लिया। एक ट्रक ‘लॉस एंजेल्स’ को चल दिया। हमारी ट्रक पूर्व की तरफ न्यूयॉर्क जानेवाली थी। जिसका माल बुक किया था, वह आगे रेस्ट एरिया में बाथरूम के आगे खड़ा था। संकेत करके वह बाथरूम में चला जाता तथा पीछे-पीछे उस गिरोह का मुखिया भी। दो-एक मिनट में बात हो जाती। एक तरफ होकर संबंधित लड़की को सौंपकर चल पड़ते। पशु की तरह लड़की को पता ही न होता कि उसका रस्सा किस खसम को पकड़ा दिया गया है। अच्छे भविष्य के लिए अमरीका जाने की आस टूटती नहीं थी। रास्ते में तीन-चार रातें निश्चित होटलों में काटनी पड़तीं। पाँच तारा होटल में ठहरते। इन जगहों पर रहते तो संदेह नहीं होता था। हमें न्यूयॉर्क से पचास मील पहले एक कस्बे में उतार दिया। ट्रक आगे निकल गई।

एक दिन अनधिकृत रहनेवाले प्रवासियों के संदेह में पुलिस ने छापा मार दिया। प्रवासी तो नहीं मिला कोई। हम फँस गईं छह लड़कियाँ।

हम तीन लड़कियाँ दो-तीन दिन पहले पहुँची थीं। तीनों कमसिन, सुंदर। अन्य वहीं दो-तीन साल से नर्क भोग रही थीं। उनके चेहरे उतरे हुए थे। रंग पीला, शरीर हड्डियों की मूठ बना हुआ था। दिन-रात बहती हुई मरी पड़ी थीं। उन्हें देखकर लगता, सेक्स स्लेव लड़कियाँ दो-तीन साल ही काटती हैं, फिर उनकी हालत पुरानी मुरगियों-सी हो जाती है। कमाकर नहीं देतीं। किसी मरुस्थल में ले जाकर खपा देते हैं। वे डरती हुई मुँह से कुछ नहीं कहतीं। पुलिसवालों ने हमारे ठिकानों की तलाशी ली। तकियों के नीचे गर्भ निरोध और गर्भपात की गोलियाँ निकलीं। काले परदे तानकर हमारे लिए रहने को छोटे-छोटे कैबिन बनवाए थे। कैबिनों पर रात के लिबड़े सने अंडरवियर सूख रहे थे। पुलिस को धंधे के सबूत मिल गए।

अंग्रेजी किसी को नहीं आती थी। मेरी मैडम मैक्सिकों की होने के कारण स्पेनिश जानती थी। पुलिस का काम चल गया। मैक्सिको साथ लगने के कारण पुलिस ने भी स्पेनिश सीखी हुई थी। अपनी काररवाई पूरी करके सरकार ने सेक्स स्लेव होने के आधार पर हमें आजाद कर दिया। दोषियों पर केस फाइल करने के लिए हमारी गवाही ले ली।

तीसरी दुनिया के गरीब और पिछड़े हुए देशों में सेक्स-स्लेवरी की दशा इससे बदतर है। उन्हें हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बँगलादेश, नेपाल, भूटान, फिलीपाइन, थाईलैंड आदि से खरीदकर मिडल ईस्ट की मंडी में बेच दिया जाता है। पत्रकारों ने बहुत से प्रश्न पश्चिमी देशों के बारे में॒पूछे।

‘सैम! तुम कैसे फँसे?’ न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार ने स्वेतलाना के साथवाली बरिडा से पूछा। ‘मैं पाँच-सात साल की माँ की गोद में खेल रही थी। पापियों ने ऐसा छल खेला, मेरे माँ-बाप इनकार नहीं कर पाए। बस सोच लिया कि कोई गोद ले ले और अमरीका पहुँच जाऊँ। जी भरकर खाऊँगी। यहाँ की गरीबी से निकलूँगी। हमारे दरवाजे पर बँधी बकरी देखकर एजेंट ने हमारी गरीबी भाँप ली। निर्धन माँ-बाप का मनोविज्ञान समझ गए। इतने सुंदर बच्चे को गोद लेने के लिए अमरीकन युगल तरसते हैं। घर में भूख से क्यों इसे मार रहे हो। हमें ‘गोद’ दे दो। सुनकर माँ का चेहरा खिल उठा। उन्होंने पाँच सौ मैक्सिकन रुपए मेरी माँ की हथेली पर दिए और मुझे लेकर चले आए। बाद में पता चला, वे ट्रैवल एजेंट नहीं, लॉसतीनो कबीले के ‘कंजर’ कहलाने वाले ठग थे। साल-दो साल घर में काम लेते रहे। मैं छोटे बच्चों को सँभाल लेती थी। बरतन धो देती। कभी सफाई कर देती। जब देखा, मैं रोती-धोती नहीं, घरवालों को भूल गई हूँ। मेरे साथ बारह-चौदह साल के लड़कों को लिटा दिया। दर्द होता तो रोती, चिल्लाती-चीखती। मुँह में कपड़ा ठूँस देते। उनका मकसद अपने नए-नए लड़कों को कंजर का काम सिखाना था। धीरे-धीरे मुझे भी ताँगेवाली घोड़ी की तरह इन्होंने सीधा कर लिया। दो-चार साल में मुझ पर निखार आ गया। देखनेवाले के मन को भाने लगी।

‘लालनीनो का सरदार बेचने के लिए मुझे बीच पर पड़ते होटल में ले गया। एक तविन्स्की नाम का अमरीकी सौदागर उसे मिल गया। दस हजार डालर में उसे मेरी बाँह पकड़ा दी। मुझे कहा गया, ‘बरिडा! यह तेरे नए डैड हैं। तुम्हें गोद ले लेंगे। मौज करोगी। ऐश लूटना। तेरी तो किस्मत खुल गई।’

बीच के होटलों में अमरीका और अन्य देशों के व्यापारी हफ्ते के आखिरी दिनों में आकर ठहरते और माल बेचते-खरीदते थे। ऐश करनेवाले भी आ जाते, उनसे कमाई हो जाती। लविन्स्की ने थोड़ी ही दूर एक गाँव में दस-पंद्रह लड़कियों से अच्छा धंधा खोल रखा था। मेरा ‘नया डैड’ कोई पचास-साठ साल का था। एक रात शराब में धुत्त मेरी कैबिन में आ गया। मुझे वस्त्रहीन कर लिया। रो रही थी किस्मत को, बिलखती रही। कल तक तुम्हारी बेटी थी। फिर आज...? यों ही लॉलनीनो वाले सरदार के घर भी हुआ। एक बार रात को उनका छोटा बेटा आ गया। मुझे लगा, मेरा वीर, मेरा भाई, मेरे साथ आ लेटा हो। हैं...!

‘मैं धंधा करती। कभी भाई आता। कभी बाप। सबने शर्म उतार रखी थी। न किसी को मुझमें बहन का रूप दिखा, न बेटी का। पूँजीवादी बाजार में फर्क नहीं पड़ता। मानवीय संबंध टूट जाते हैं। सिर्फ डालर का रिश्ता रह जाता है।’

मुझमें संवेग मर रहे थे। न खुशी महसूस होती, न गम। कोई आए, कोई जाए। सब जंगली जानवर दिखते थे। मेरे अंदर ‘जगज्जननी’ मर चुकी थी। बाकी थी तो एक प्लास्टिक की गुडि़या। मर्द की वासना-तृप्ति के लिए।

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