एक तीर्थयात्रा सुवर्णपुर (पर्सा) व जनकपुर

एक तीर्थयात्रा सुवर्णपुर (पर्सा) व जनकपुर

अपने देश व दुनिया को देखने की उत्कट अभिलाषा सदा ही मुझमें हिलोरें लेती रहती है। यह अवश्य है कि समय अथवा परिस्थिति की अनुमति के बिना उसका क्रियान्वयन होना कठिन ही होता है, लेकिन ज्यों ही कोई अवसर मिले तो उसे गँवाना गवारा नहीं। यों भी जीवन एक पहेली है, एक रहस्य है, जिसकी गुत्थी सुलझती नहीं जान पड़ती। जीवन एक संघर्ष है, जीवन एक कहानी है, जीवन एक यात्रा है, जीवन एक पर्व है। यात्रा भी किसी पर्व से कम नहीं, तो क्यों न उस यात्रा में एक और यात्रा-पर्व मनाया जाए। जैसा कि मैंने अभी कहा कि अवसर की कोई किरण दीख जाए तो उसका लाभ उठा लेना चाहिए। उसी कड़ी में अपनी एक धार्मिक (मासिक) पत्रिका में एक आमंत्रण-संदेश प्राप्त हुआ कि सुवर्णपुर में नवनिर्मित प्राणनाथ मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा हेतु पाँच दिवसीय कार्यक्रम में आप सभी सुंदर साथ सपरिवार उपस्थित हों, श्री राजन स्वामीजी बाल ब्रह्मचारी, वेदोपनिषदों के प्रकांड पंडित, उस परब्रह्म के साधक भी वहाँ पहुँच रहे हैं।

उक्त समाचार आयोजन से दो माह पूर्व ही प्राप्त हो गया था, फलतः आरक्षण में भी कोई कठिनाई नहीं थी और सौभाग्य से पतिरूप में मुझे एक ऐसे विद्वान् संत व यात्रा-प्रेमी इनसान मिले हैं, जो हमेशा मेरा साथ देने को तत्पर रहते हैं। धन्यवाद उस विराट् का, उस असीम का, उस सच्चिदानंद परब्रह्म प्रभु का। मैं कृतार्थ हुई। निश्चित तिथि आठ अक्तूबर, ०९ को हमारी यह यात्रा प्रारंभ हुई और अनेक छोटे-बडे़ स्टेशनों को पार करते हुए नौ की सायंकाल बिहार के अंतिम स्टेशन ‘रक्सौल’ पर संपन्न हुई, क्योंकि गाड़ी का यह अंतिम पड़ाव था।

इधर बिहार समाप्त, उधर नेपाल प्रारंभ। दोनों के बीच एक पुल जिसे रिक्शा व ताँगे से आसानी से पार कर लिया जाता है। ताँगे से पुल पार करते हुए हमारे मन के घोडे़ भी कल्पना की उड़ान भर रहे थे। एक ओर सुवर्णपुर की जिज्ञासा, दूसरी ओर दूसरी बार दूसरे देश में जाने की उमंग भी। बीच में पुल व एक छोटी सी पुलिस चौकी। दोनों ओर बहता मंद-मादक समीर, कहीं कोई विभाजन नहीं, सभी को प्राण बाँटता चल रहा था। न कोई छोटे-बडे़ का भेद, न काले-गोरे का, न स्त्री-पुरुष, न बाल-वृद्ध का और न ही भारतीय-नेपाली, का फिर भी हम इनसान कोई न कोई रेखा अपने ही स्वार्थ कारणों से खींच लेते हैं, यही सब सोचते हुए न जाने कब हम वीरगंज के बस-ठहराव पर पहुँच गए। ताँगा छोड़ा और ज्ञात किया कि सुवर्णपुर की कोई बस? उत्तर नकारात्मक था। कारण, रात्रि बस सेवा ग्रामों में नहीं होती। इसलिए रात्रि विश्राम वीरगंज के एक राजस्थानी रेस्तराँ में हुआ। यहीं भोजनादि से तृप्त हो शयन किया।

अगली प्रातः अर्थात् दस अक्तूबर को शीघ्र ही प्रातःकालीन नित्य-क्रियाओं की निवृत्ति के बाद बस-ठहराव पर पहुँच गए। वहाँ तो हमें सिक्किम व नेपाल के अन्य शहरों से आए अनेक साथी मिल गए। सभी को सुवर्णपुर के कार्यक्रम में जाना था। बस भी आ गई और ८० प्रतिशत बस हम सुंदर साथ से भर गई, सबके मन भी आनंद से भर गए। यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि प्राणनाथ अर्थात् प्राणों के नाथ, स्वामी, जो संपूर्ण संसार के चराचर का स्वामी है, जिसे सच्चिदानंद या पूर्ण ब्रह्म भी कहते हैं, इनके अनुयायी ही ‘सुंदर साथ’ के रूप में जाने जाते हैं। परस्पर ‘प्रणाम’ से संबोधन करते हैं, इसलिए प्रणामी भी कहलाते हैं। महात्मा गांधी भी प्रणामी थे, क्योंकि उन्होंने अपनी माताजी को बाल्यकाल से ही प्रणामी मंदिर में जाते देखा था। यों हम सभी उस अजर-अमर, अविनाशी, दिव्यशक्ति पर किसी-न-किसी रूप में विश्वास करते हैं।

हाँ तो मैं बात कर रही थी सुवर्णपुर जाने की, हम बस में बैठ गए और उसने चलना आरंभ किया। कहाँ शहर की कंक्रीट, कोलतार की सड़कें, काहाँ वह कच्चा मार्ग, वह भी दो दिन पूर्व ही अत्यधिक वर्षा हो जोने से घायल सा, इसलिए दो घंटे की इस यात्रा ने साढे़ चार घंटे का समय लिया। झूला झुलाती यह बस सबको परमानंद देती अपने साथ एक नहर को भी लिये चल रही थी या यों कहूँ कि उस नहर का साथ दे रही थी। ‘नहर’ के दूसरी ओर झूमती, इठलाती, लहलहाती फसलों से युक्त खेत, इस ओर बस। बस के दूसरी ओर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बसे रात्रि भोजन व विश्राम स्थल, इनमें आ शयन किया।

अगली प्रातः अर्थात् १४ अक्तूबर को जब प्रातःकालीन स्नान-ध्यानोपरांत ‘धनु का धाम’ जाने के लिए नीचे उतरे तो धर्मशाला परिसर में ही आकर्षक सी दुकानें सजी दिखाई दीं, जिन पर वहाँ के विशेष छोटे-से-छोटे आकार से लेकर बडे़ आकार के पर्स, बैग आदि थे, जो मखमली से कपडे़ से तैयार किए जाने के कारण हलके भी थे, हमने भी दो-चार खरीद लिये।

बस-स्टैंड पहुँचकर बस में बैठ गए, कुछ यात्री पहले से विराजे थे, काफी देर प्रतीक्षा करने के बाद भी चालक नहीं आया, ज्ञात हुआ कि पहले आधा घंटा बाद चलनी थी, लेकिन अब डेढ़ घंटे बाद जाएगी। इतना समय व्यर्थ करना समझदारी न थी, इसलिए बस से उतरकर कुछ और स्थानीय स्थल ही देखने का मन बना लिया, सो पहुँच गए बिहार कुंड। एक बड़ा सा जलाशय, जिसके एक तट पर स्थित राम-सीता की धातु निर्मित प्रतिमाओं से सुशोभित मंदिर था। प्रतिमाएँ श्वेत-धवल वस्त्रों में लिपटी अपनी अनुपम छटा बिखेर रही थीं, चारों ओर सात्त्विकता टपक रही थी। इस बिहार कुंड से ढाई कि.मी. दूर अंदर गाँव में सीताजी का वास्तविक विवाह-स्थल है, ऐसा ज्ञात हुआ, क्योंकि जो विवाह मंडप जानकी मंदिर के साथ है, वह तो निश्चित रूप से बाद में ही विकसित-निर्मित हुआ है। तो क्यों न उसे देखा जाए, ऐसी इच्छा प्रबल हो गई, जबकि दूसरी ओर भास्कर की भास्वरता से मौसम प्रतिकूल हो रहा था, लेकिन उत्साह, उत्सुकता, जिज्ञासा की प्रबलता के सामने सारी प्रतिकूलताएँ घुटने टेक देती हैं और हम दोनों एक ग्राम, एक स्टेडियम व एक निर्मित हो रहे अस्पताल के भवन को निहारते हुए अपने गंतव्य तक पहुँच गए।

सड़क से एक ओर हटकर एक बड़ा सा जलाशय, जिसके जल का उपयोग ग्रामवासी बरतन व वस्त्र धोने में कर रहे थे। जलाश्य से आगे दाईं ओर माता सीता का छोटा सा मंदिर, जिसमें महिला पुजारिन थी, उसने बडे़ श्रद्धाभाव से हमें प्रसाद दिया और वह चबूरतेनुमा टीला दिखाया, जिसपर सीताजी के विवाह का हवन हुआ था। राजर्षि जनक की जनकपुरी निश्चित रूप से उस समय वहाँ तक फैली होगी, किंतु आज तो रख-रखाव की दृष्टि से यह ग्राम दरिद्रता के आवरण से आच्छादित ही कहा जा सकता है। शहर में अपने संपूर्ण वैभव के साथ नवनिर्मित मंदिर व विवाह-मंडप का वापसी में मध्याह्न भोजन कर अपने विश्राम स्थल आकर दो घंटे पूर्ण विश्राम किया। बैटरी चार्ज होते ही जानकी-मंदिर व जानकी विवाह-मंडप के दर्शनार्थ चल पडे़। दोनों एक ही विशाल परिसर में स्थित हैं। हाँ, पहले मंदिर फिर विवाह-मंडप। मंदिर में सीता व राम के तीन युगल-स्वरूप विराजमान हैं, तीनों ही सुंदर व भव्य लेकिन भिन्नता लिये हुए है। लगता ही नहीं कि ये पाषाण-प्रतिमाएँ हैं, बल्कि प्राणसंपन्न जीती-जागती हँसी-मुसकराती, दर्शन देती दिखती हैं। विवाह-मंडप में प्रवेश, प्रवेश शुल्कोपरांत हुआ। यहाँ चारों ओर स्तंभों पर तीन-तीन प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। चारों ओर उपवन-वाटिका विकसित की गई हैं, जिसको यत्नपूर्वक सजाया-सँवारा गया है। सबकुछ नव-निर्मित जीवन, थोड़ा आगे राम-मंदिर उससे और आगे दूल्हा-दुलहन मंदिर है।

मार्ग में आया रामानंद चौक, एक न्यारी निराली छवि से संपन्न है। चौक के चारों कोने दो उल्टे रखे धनुषाकार स्तंभों से इस प्रकार जोडे़ गए थे कि उनके संधि-बिंदु के उस ऊँचाई पर एक सुंदर सी प्रतिमा से युक्त मंदिर है। स्थापत्य कला का ऐसा अद्भुत उदाहरण देख आँखें चकित हो गईं। रामानंद मंदिर के भी दर्शन हुए। यों कहिए, जनकपुर धाम में विचरण करते हम स्वयं सीता-राममय हो गए। वहाँ सब ओर एक ही खुशबू, एक ही पुकार, एक ही दर्शन सीता-राम था।

दुल्हा-दुलहिन मंदिर में प्रवेश करते ही बाईं ओर सीता-राम का युगल स्वरूप प्रतिष्ठित है, सामने दस सीढि़याँ चढ़कर किसी संत की प्रतिमा कुछ अन्य प्रतिमाओं के साथ बनी है। वापसी में राजर्षि जनकजी का मंदिर, सामने ही ‘धनु-सागर’, जो एक छोटी झील सा प्रतीत हो रहा था, कहते हैं कि श्रीराम द्वारा ‘धनुष’ की प्रत्यंचा चढ़ाते समय धनुष का एक टुकड़ा उसमें गिर गया था, इसलिए उसका नाम ‘धनु-सागर’ है, जो एक छोटी झील सा प्रतीत हो रहा था। जानकी-मंदिर के आस-पास की अधिकांश दुकानें चूड़ी, माला, बिंदी-सिंदूर जैसी सौभाग्यसूचक वस्तुओं से युक्त थीं। विभिन्न भोजन सामग्री से संपन्न छोटे-बडे़ ढाबे, भोजनालय भी थे। हमने भी रिक्शा से सीतामढ़ी स्थित ‘पिनौरा’ देखने चल पडे़। यह वह स्थल था, जहाँ हल चलाते हुए जनकजी ने पुत्री रत्न को प्राप्त किया था। अब वह स्थल एक जलाशय में परिवर्तित हो चुका है, साथ में एक मंदिर भी है। थोड़ी ही दूरी पर सीताजी का सुंदर मंदिर देखकर अपने विश्राम-स्थल सुविधा होटल वापस आ गए, रिक्शा और रिक्शावाले को अलविदा कहा। हमारा यह विश्राम-स्थल मुख्य बाजार में ही था। अन्य सामान्य बाजारों की भाँति ही यह भी रात्रि में विद्युत्-प्रकाश से प्रकाशमान विभिन्न आवश्यक वस्तुओं के विक्रय-केंद्रों से संपन्न, मार्ग के दोनों ओर जहाँ-तहाँ फल-सब्जी आदि की रेहडि़याँ भी लगी थीं, इसलिए क्यों न थोड़ी चहलकदमी कर ली जाए, सो चल पडे़ और घूमते-फिरते एक अच्छा सा शुद्ध-शाकाहारी भोजनालय देखकर रात्रि भोजन किया और वापस विश्राम स्थल पहुँचकर विश्राम किया।

अगली प्रातः शीघ्र ही जनकपुर पहुँचने के विचार से कक्ष से निकल पडे़ ‘भिट्ठा मोड़’ की बस लेने, क्योंकि वहीं से जनकपुर जाया जाएगा। कुछ छोटे-छोटे ग्रामों को पार करते हुए प्रातः ८.३० पर ‘भिट्ठा मोड़’ पहुँच गए। एक ग्राम था ‘सुरसंड’ तथा दूसरा था जवाहरनगर, जो संभवता ‘नेहरूजी’ के नाम पर होगा, क्योंकि यहाँ एक केंद्रीय विद्यालय भी था, पर मार्ग दयनीय व असहाय सा ही दिखा, जैसे अपने पुनरुद्धार के लिए याचना कर रहा हो। ग्राम थे तो खेत भी थे।

‘भिट्ठा मोड़’ बिहार प्रदेश का सीमांत कस्बा, जहाँ से नेपाल की सीमा में वैसे ही प्रवेश हुआ जैसे रक्सौल से हुआ था, बस यहाँ कोई सेतु न था, रिक्शावाले ने नेपाल के जनकपुर जाने के बस-स्थल तक पहुँचा दिया। मध्याह्न के ग्यारह बजते-बजते हम ‘जनक-धाम’ पहुँच गए। उतरे तो समीप ही था जानकी मंदिर। इसलिए पहले जानकी मांदिर ही गए, क्योंकि यहाँ यात्री-निवास भी है, लेकिन सभी कक्ष भरे होने से हमें कलकत्तावासी गोपाल-धर्मशाला में प्रथम तल पर कक्ष उपलब्ध हो गया। सामान रख, कक्ष को बंद कर हम निकल पडे़ और पहुँच गए नेपाल के एक मात्र स्टेशन, जहाँ से प्रतिदिन लौहपथगामिनी २९ कि.मी. दूरी पार कर बिहार के जयनगर आती-जाती है।

क्यारियाँ देख मन गद्गद हो गया। सारी थकान दूर हो गई। तुलसी, अदरक, कालीमिर्च की काली चाय से स्वागत हुआ। हमने पहली बार काली चाय पी, पर वह बड़ी उपयोगी रही। संयोग से गोरखपुर के एक सुंदर साथ रेलवे अधिकारी छांग प्रसादजी भी तभी वहाँ पहुँचे थे। दो महिला सुंदर साथ, जिनको शारदा बहन ने पुत्रीवत् स्नेह से पाला-पोसा था, आश्रम में थीं। सबके बीच थोड़ी देर धार्मिक चर्चा, सत्संग हुआ, उन्हीं के स्नेहपूर्ण आग्रह से रात्रि-विश्राम भी वहीं हुआ।

पर्वतीय क्षेत्रों की तर्ज पर सीढ़ीनुमा क्यारियों में गेहूँ की उपज भी की गई थी। तत्काल तोड़कर ताजी बनी सब्जी व चूल्हे पर बने गरमागरम भोजन से हम सबका स्वागत हुआ। सौर ऊर्जा से कक्ष प्रकाशित थे। मार्ग में की गई शाकाहार की अनुपलब्धता की कल्पना धूमिल हो गई। रात्रि-विश्राम मचान टाइप के कक्ष में हुआ, सबकुछ नया, अद्भुत जीवन जीने का एक अनुभव। आश्रम में दो गऊमाताजी, जिनका दाना-चारा वहीं उपलब्ध हो जाता है, साथ ही उसका सदुपयोग भी। फिर भी जीवन वहाँ कठिन व दुर्गम रास्तों को पार करता हुआ चलता है।

अगली प्रातः छांग प्रसादजी के साथ ही छुटकन को पुनः पार किया। रातभर में छुटकन के प्रवाह की तेजी मंद पड़ गई थी। हम ठौरी स्टेशन पहुँच गए, जहाँ से सीतामढ़ी का टिकट लेकर गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी छोटे-छोटे कई स्टेशनों को पार करती गौना हा होते हुए नरकटियागंज पहुँच गई। यहाँ गाड़ी बदलनी पड़ी, बदली हुई गाड़ी रक्सौल होते हुए सीतामढ़ी पहुँची। सीतामढ़ी तक आने में जंगल खूब आए, जो स्टेशन आए, वह भी ऐसा लगता था कि थोड़ा सा जंगल साफ करके बना दिया गया है। इसलिए सारे रास्ते में प्रायः जो स्थानीय यात्री उतरे-चढे़, सभी लकडि़यों के गट्ठर के साथ। मजे की बात यह थी कि उन गट्ठरों को डिब्बों के बाहर लटकाया गया था, जिससे अंदर यात्रियों को बैठने में असुविधा न हो। वह दृश्य भी अद्भुत था। संभवतः उन लोगों के लिए यह रेलवे की विशेष सुविधा-व्यवस्था है, अच्छा लगा। संभवतः यही यहाँ के लोगों का व्यवसाय भी है।

सायं चार बजे के लगभग सीतामढ़ी पहुँच गए। जनकपुर जाने की जल्दी थी, इसलिए उसी दिन वहाँ जाने की सोच रहे थे, लेकिन समय की ओर से अनुमति नहीं थी। हमने आनन-फानन में अपना विचार बदला, क्यों न सीताजी की सीतामढ़ी को पहले देखा जाए, बस सुविधा-विश्राम नामक होटल के पास रुकी एक कक्ष में सामान रख हम ‘भिखना ठौरी’ की शारदा बहन से उनके आश्रम दर्शन की अनुमति ले चल पडे़, क्योंकि वे स्वयं अपने कुछ साथियों के साथ कार्यक्रम में आई हुई थीं। बाहर आए, बस ठहराव तक पहुँचे। बस आ गई, हम सब बस में बैठ गए, वह रामनगर तक गई, मार्ग के ठीक न होने के कारण इससे आगे बढ़ने से चालक ने मना कर दिया, सभी सवारी वहीं उतरी, कुछ आस-पास के गाँव के थे, चले गए। हमारी मंजिल अभी पाँच कि.मी. दूर, जिसे पार करने के लिए ग्यारह नंबरी साइकिल के अतिरिक्त कोई साधन न था, सो चल पडे़। वर्षा व बादलों के कारण मार्गों की दशा दयनीय थी, पर पैदल गामियों के लिए अनुकूल मार्ग में आते-जाते कुछ ग्रामवासी, स्कूली बच्चे, दो-चार पुलिया आदि ने थकान न होने दी। अब हम बिहार के अंतिम छोर पर पहुँच चुके थे। यहीं ठौरी स्टेशन भी है, लेकिन आश्रम दूसरी ओर। दोनों के मध्य बहती है छुटकन नदी, यही दोनों की सीमा रेखा है।

किंतु आज अपने नाम के विपरीत लगभग एक फर्लांग विस्तृत (चौड़ा) आकार ग्रहण कर तीव्रगति से प्रवहमान थी। आश्रम में भी हमें चंद घंटे ही ठहरना था, क्योंकि पुनः छुटकन को पार कर स्टेशन आना था। क्या किया जाए? लक्ष्य के इतने समीप आकर भी आश्रम के दर्शन किए बिना जाना भी मुझे स्वीकार न था। छुटकन का प्रवाह इतना तीव्र था कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी वाली उक्ति कभी भी चरितार्थ हो सकती थी। हम अपलक नेत्रों से उसे निहारे जा रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे कोई छोटे बच्चों की तरह नटखट अटखेलियाँ करती, आनंद के झोंकों से झंकृत अपनी ही धुन में अपने किसी प्रियजन से मिलने की आस में बेतहाशा भागी जा रही है। हमने भी ज्यादा समय गँवाना उचित नहीं समझा और उसकी शरारतों में सम्मिलित होने को कदम बढ़ा दिए। अब हम दोनों को दो स्थानीय लोग सावधान करते आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहे थे, लगभग उन दोनों का अनुसरण करते हुए हमने विजय पा ही ली। किनारा आ गया, आगे बढे़ तो छोटा सा बाजार मछली की गंध से गंधित लगा, जैसे शाकाहार तो यहाँ दुर्लभ ही होगा। आश्रम थोड़ा चढ़ाई पर, फिर भी एक फर्लांग की दूरी रही होगी, जिसे कठिनाई से पार किया जा सका। लगा कि सीमांत पर बसे लोग शाकाहार की अनुपलब्धता के कारण ही जीव-भक्षण से अपनी उदरपूर्ति करते हैं।

आश्रम में प्रवेश करते ही चारों ओर हरियाली, सब्जियों के छोटे-छोटे ग्राम, जो अपने छोटे-छोटे विक्रय-केंद्रों से ग्रामों के अस्तित्व का बोध करा रहे थे। एक था जानकी टोला ग्राम, जो जनक सुता सीता की याद दिला रहा था। यहीं से बस ने नहर का साथ छोड़ दिया और चल दी गाँव के बीच से। अब तो थोड़ी देर बाद ही पहुँच गए सुवर्णपुर चौक, यहीं बस पहली बार रुकी, हम लोगों को उतारा और आगे अपनी मंजिल की ओर बढ़ गई।

हम सबने भी अपना-अपना बैग सँभाल अपने निर्दिष्ट गंतव्य की ओर कदम बढ़ाए। मंदिर से लगभग एक किलोमीटर पहले ही गाँव के सरपंच या मुखिया के विशाल घर में पहुँचकर कुछ विश्राम, आवश्यक कार्यों की निवृत्ति व जलपान के बाद मंदिर की ओर प्रस्थान किया। स्वामीजी व उनके साथ उत्तर भारत के अन्य सुंदर साथ, जो पहले ही वहाँ पहुँचे हुए थे, दर्शन, प्रणाम, आशीर्वाद आदि के बाद निजमंदिर में भी गद्दे बिछे थे, सो हमने वहीं अपना सामान टिकाया और स्वयं भी थोड़ा विश्राम किया। रात्रि-भोज हुआ, तत्पश्चात् स्वामीजी की चर्चा सत्संग का लाभ लिया। अगली प्रातः भी जलपानोपरांत चर्चा हुई और अब हम दोनों वहाँ से खिसकने की तैयारी में जुट गए।

यद्यपि अभी तीन दिन का कार्यक्रम शेष था, उसके आनंद से वंचित होने का भी मन नहीं था, दूसरी ओर हमारी यायावरी वृत्ति अन्य स्थलों के दर्शन के लिए विवश कर रही थी। समय की सीमा में बँधा तन-मन भी रुकने में असमर्थ हो रहा था। फलतः हम चल पडे़। जैसे ही हमें आश्रम के द्वार से निकलते देखा, अनेक सुदर साथ विशेषतः स्थानीय रुकने का तथा दूसरे स्थलों के दर्शन का भी आग्रह करने लगे। पर हमने मिखना ठौरी आश्रम देखने की अपनी इच्छा व्यक्ति की और उनके आत्मीय आग्रह को ठुकराने के लिए क्षमा-प्रार्थना की।

सुवर्णपुर वीरगंज से ६० कि.मी. दूर नितांत एकांत सा मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित, न जल के साधन, न विद्युत् के तार और न ही आवागमन के आधुनिक मार्ग व साधन, किंतु ग्रामवासी जिस निष्ठा व श्रद्धा से अपनी सेवा दे रहे थे, वह प्रशंसनीय ही नहीं वंदनीय भी था। अपने कर्तव्य के प्रति सजग उषाकाल में न जाने कहाँ से जल ला-लाकर बडे़-बडे़ ड्रमों को भर दिया गया था। पेयजल की भी पूर्ण व्यवस्था, विद्युत् व माइक आदि की संपूर्ण व्यवस्था देखते ही बनती थी। भोजन की तैयारी पूर्ण मनोयोग से हो रही थी। सुंदर साथ की हर सुख-सुविधा का ध्यान रखते ये ग्रामवासी भारतीय संस्कृति के आतिथ्य सत्कार का जीवंत रूप प्रस्तुत कर रहे थे, जो हमारी चेतना में कहीं गहरे पैठ गया। उनकी इस सेवा-भावना से भव्य-भवन जो खड़ा हो गया है, जिसकी चर्चा मैं पहले ही कर चुकी हूँ।

पर उस दरिद्रता में सहजता, सरलता व सादगी से संपन्न आस्था की पराकाष्ठा निहित है। जलाशय से आगे आपको नंगे पाँव ही मंदिर व उसके आसपास जाना पडे़गा। कहते हैं कि वहाँ की महारानी भी जब माता सीता के मंदिर आती हैं तो जलाशय में चरण पखारकर नंगे पाँव ही आती हैं। बिहार में छठ पूजा महोत्सव की तैयारियाँ चल रही थीं। इसी संदर्भ में मार्ग में कई स्थलों पर काष्ठ व फूस आदि के घोड़े बनाए जा रहे थे। सूर्य भगवान् को अर्घ्य प्रदान करनेवालों व दर्शकों के लिए बाँस व रस्सी के प्रयोग से विशेष दर्शक दीर्घाएँ निर्मित की जा रही थीं।

वापसी में हम रत्न सागर पर आए। सागर है तो विस्तृत जलाशय तो होगा ही। इस जलाशय का नाम रत्न सागर होने का कारण था इसमें राजर्षि जनक का रत्न भंडार। वहाँ उपस्थित पुजारी-पंडित से थोड़ी बातचीत की। एक-दो कैमरे के बटन दबाए और अब समय की माँग थी विश्राम स्थल की ओर जाने की, क्योंकि आज रात्रि किसी भी समय तक वीरगंज जो पहुँचना था। इसलिए शीघ्रता से भोजन ग्रहण कर, सामान ले वीरगंज की ओर जानेवाली बस में बैठ गए। सारा जनकपुर धाम जनक नंदिनी सीता व राम के रंग में रँगा था, कहीं भी सीताजी की अन्य भगिनियों के होने तक का अहसास उसी में समाहित होकर रह गया था।

‘वीरगंज’ तक आते-आते बस ने धूल की इतनी परतें जमा दीं कि जनकपुर धाम की पर्त कभी नीचे खो जाती, किंतु हमारी चित्तवृत्ति में तो वही समाई हुई थी, फलतः दूसरी परतें थोडे़ से जल से ही बह गईं। रात्रि विश्राम-शयन हमने रक्सौल जंक्शन के समीप के होटल में किया, क्योंकि अगली प्रातः ९ बजे वहीं से गाड़ी ने देहली के लिए प्रस्थान करना था। समय से घर पहुँचकर बच्चों के साथ, सुवर्णपुर व जनकपुर की यादों को समेटे, दीपों के पर्व दीपावली मनाने में व्यस्त हो गए। वह भी सीता-राम से ही जुड़ा है।

२८-बी, प्रेमनगर,

भादसो रोड, पटियाला-१४७००१

दूरभाष : ०९४१७०८८४६६

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