जियबो मीत पुनीत बिनु

जियबो मीत पुनीत बिनु

व्यापक अर्थ में देखें तो परिवारजनों और संबंधियों को छोड़कर अन्य सभी परिचित जन मित्र ही कहे जाएँगे। पड़ोसी भी मित्रों की ही कोटि में आएँगे। यह और बात है कि उनमें से अनेक ‘अमित्र’ हों, क्योंकि ‘अमित्र’ होने के पूर्व वे भी मित्र ही रहे होंगे। मित्रता अनायास हो जाती है। रघुवंशकार तो इसे भी पूर्वजन्म से जोड़ते हैं और ‘मनो हि जन्मांतर संगतिज्ञ’ कहकर मन को जन्मांतर संगतियों का ज्ञाता बताकर किसी के प्रति अनायास उमड़ आए प्यास और किसी सर्वथा अपरिचित के प्रति देखते ही मन में उठे उपेक्षा-भाव का कारण सिद्ध करते हैं। मित्रता के विपरीत अभिन्नता एक अनुभवजन्य नकारात्मक प्रतिक्रिया है। मित्रता उभयपक्षीय होती है। अमित्रता एकपक्षीय भी हो सकती है।

मित्रता मनुष्यों तक ही सीमित न रहकर पशु-पक्षियों तक भी विस्तृत हो सकती है। कोटिबद्ध करें तो वे भी मित्र, शत्रु अथवा तटस्थ हो सकते हैं, हमारे अपने स्वार्थों एवं विचारों से मेल खाने या न खाने के अनुसार। मित्रों को घर में भी बसाया गया और उनको सब प्रकार की सुरक्षा दी गई। शत्रुओं को नष्ट करने का उद्योग चला। शत्रु-मित्र की विभाजक रेखा कभी-कभी इतनी क्षीण रही कि बडे़-बडे़ भ्रमित हो गए। इस भ्रम का सबसे बड़ा शिकार साँप हुआ। अपनी विषैली प्रजातियों के कारण प्रायः सभी साँप मनुष्य की घृणा और हिंसा के शिकार होते रहे तथा अब भी हो रहे हैं। जबकि चूहे जैसे हानिकारक जीवों का शिकार करके वे मनुष्य का भला ही करते रहे और विषम परिस्थितियों में ही मनुष्य पर आक्रमण करने को बाध्य हुए। इसके विपरीत बिल्ली चूहों का शिकार करने से अधिक मनुष्य की अनेक महत्त्वपूर्ण वस्तुओं की हानि करती रही, दूध-घी के छीके, अलमारियों की जालियाँ बिल्लियों की ही देन है। इतना ही अच्छा है कि शास्त्रकारों ने बिल्ली के जूठे को जूठा नहीं माना। कुत्ता मनुष्य का संभवतः सबसे पुराना मित्र है।

वैज्ञानिकों की मानें तो यह मित्रता सत्ताईस हजार से लेकर चालीस हजार वर्ष तक पुरानी है। कुत्ते ने मनुष्य को सुरक्षा प्रदान की, उसे सुख की नींद सोने का अवसर प्रदान किया। अपनी श्रवण एवं घ्राण-शक्ति की सूक्ष्मता के कारण वह इतना सजग रहा कि ‘श्वान निद्रा’ सजगता का पर्याय बन गई। उसकी ये शक्तियाँ कालांतर में और भी अधिक उपयोगी सिद्ध हुईं। अपने स्वामी के लिए लड़ते-लड़ते वीरगति तक को प्राप्त हो जानेवाले इस जीव की छोटी-बड़ी अनेक प्रजातियाँ विकसित हुईं और उन सबका उपयोग किया गया। घोड़ा मनुष्य का दूसरा अत्यंत पुराना मित्र है। उसने मनुष्य को अधिक वेगवान बनाया, जिससे युद्ध और शांति दोनों में अत्यंत उपयोगी बना रहा। चेतक, बुसीफेलस और हीन-फिनीन जैसे अनेक घोडे़ इतिहास के पृष्ठों में अपनी वीरता, स्वामिभक्ति, त्याग तथा बलिदान के कारण स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गए। स्थल का सबसे बड़ा पशु हाथी भी मनुष्य का मित्र बना और अपनी शक्ति, धैर्य एवं स्मरणशक्ति के कारण तथा बुद्धि के देवता गजाननजी के प्रतीक के रूप में समाज में पूजा जाता रहा।

अपनी ही समस्याओं में  उलझे मनुष्य ने इन पशुओं से जैसे किनारा कर लिया है। घोड़ों की जगह यांत्रिक कारों आदि ने ले ली तो हाथियों को टैंकों ने निष्कासित कर दिया। जंगल कटते चले गए तो उनके भोजन की व्यवस्था इतनी कठिन हो गई है कि बडे़-बडे़ जागीरदार भी उन्हें देवालयों को दान कर देना ही अधिक अच्छा समझने लगे हैं। अपने दिखावटी दाँतों के कारण वह तो ऐसी विभीषिका में फँस गया है कि अस्तित्व-रक्षा के लिए एक प्रकार से अंतिम संघर्ष कर रहा है। यही स्थिति बैल, भैंसे, गधे, खच्चर और ऊँट आदि की भी हुई। ट्रक, टै्रक्टर, लोडर आदि ने इनकी उपयोगिता को निरस्त कर दिया तो ये समाज के लिए भार बनकर नामशेष होने लगे।

शुक-सारिका तो अनादिकाल से ही घरों एवं आश्रमों की शोभा बढ़ाते रहे हैं। जगज्जनी जानकी की विदा के समय उनके द्वारा पाले हुए ये पक्षी इतने दुःखी हुए कि इन्होंने परिजनों को भी अधीर कर दिया—

सुक सारिका जानकी ज्याये। कनक पिंजरन्ह राखि पढ़ाये॥

व्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुवि धीरजु परिहरह न केही॥

बेटी की विदा सदैव अत्यंत कष्टकारी रही है। कल्पना करें शकुंतला के हाथ से दूब चरनेवाले मृग-शिशु की, उसकी विदा के समय क्या दशा हुई होगी। कालांतर में तो ये इतने प्रबुद्ध हो गए कि शास्त्रार्थ तक करने लगे। शास्त्रार्थ-दिग्विजय के लिए निकले आचार्य शंकर ने पनिहारिनों से मंडन मिश्र का घर पूछा तो उन्होंने यही तो कहा था—

स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं कीरांगना यत्र गिरो गिरन्ति।

द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धः जानाहितं मण्डन मिश्र धामम्॥

अनेक ऐसी घटनाएँ अब भी होती रहती हैं, जिनमें आग लगी, आग लगी...की रट लगाकर इन पिंजडे़ में बंद पंछियों ने मोहल्ले भर को जगाकर सुरक्षा के लिए दौड़-धूप करने के लिए सचेष्ट कर दिया, पर अपनी रक्षा में लगे लोग इनके पिंजड़ों को हटाना भूल गए या आग ने ऐसा घेर लिया कि बचा पाना संभव ही न रहा और ये कर्तव्य-पालन करते हुए लपटों के ग्रास बन गए। फिर भी इनका निधन व्यर्थ नहीं गया, सारा मुहल्ला इनके लिए न जाने कब तक आँसू बहाता रहा।

अब जीवन की कृत्रिमता, आबादी का बढ़ता हुआ दबाव, जनसंख्या-विस्फोट, भू एवं वन-माफियाओं की दुर्दम लोभ-वृत्ति, तस्करों की उद्दाम लालसा इनके प्रति भी असहिष्णु हो रही है। वन-क्षेत्र के तेजी से सिमटने के चलते वन्य जीव शायद ही अस्तित्व में बच पाएँ। बंदरों को पकड़ने की मुहिम चली तो उन्हें पकड़ तो लिया गया, पर उन्हें खिला पाना शासन-प्रशासन के वश का भी नहीं रहा। जीव-दया और पशु-अधिकार के नाम पर पालतू जीवों को मुक्त कराने के लिए अति उत्साही महापुरुष आगे आए तो सपेरे मदारी, सर्कसवालों आदि की जीविका तो संकट में पड़ी ही, उनके द्वारा पालित-पोषित जंतु भी असहाय हो गए। पुनर्वास की किसी ठोस योजना के अभाव में उनकी स्थिति मुक्त कराए गए बँधुवा मजदूरों से भी बदतर हो गई। वे अब कहाँ जाएँ? उन्हें कोई पाले भी तो किसलिए? अपने ही स्वार्थ के चश्मे से सबको देखनेवाला मानव-समाज यह सुविधापूर्वक भूल जाता है कि यह पृथ्वी केवल उसके लिए न होकर उन सभी जीव-जंतुओं के लिए है, जिन्हें प्रकृति ने यहाँ बसाकर जीने का अधिकार दिया है। धरती उनको भी उत्तराधिकार में मिली है। उन्हें उससे बेदखल करना मानव-निर्मित कानून में भले न आए, पर है तो घोर नैतिक अपराध और पाप ही।

मानव-मित्रों की बात चलती है तो स्वार्थ की छाया से ग्रस्त वे ‘मित्र’ भी स्मृति को घेर लेते हैं, जो एक-न-एक बहाने पैसा लेकर अंतर्धान हो जाते हैं। कभी कोई दुबारा दिखे भी तो पैसे वापस करने के लिए तो शायद ही हो, यह सूँघने के लिए कि आपको पैसों का स्मरण है कि नहीं। स्मरण हुआ तो बड़ी ‘ईमानदारी’ का प्रदर्शन करते हुए यह कहकर आपको असमंजस में डाल देंगे कि ‘भाई साहब, आपका पैसा अब तक वापस न कर पाने का बहुत दुःख है। आपके सात सौ देने हैं, अब ऐसा कीजिए कि तीन सौ और दे दीजिए तो एक साथ पूरे एक हजार आपको देकर मोक्ष पाऊँ। अब देर नहीं होगी, बस अधिक-से-अधिक एक मास।’ अब आप पर है कि आप अनुभव का विश्वास करें या उनके आश्वासन का, पैसा वापस पा जाने के व्यामोह में या तो तीन सौ और सौंप दें या सात सौ को ‘गया’ मानकर मौन धारण कर लें। गेंद आपके पाले में है। अतीत का लेखा-जोखा चले तो उन ‘मित्रों’ को भुला पाना भी अत्यंत कठिन होता है, जो अपने छोटे-से-छोटे काम के लिए भी आपका सहर्ष बलिदान कर देने में शायद ही हिचकें और उसके बाद भी ‘मित्रता’ का उपदेश देते रहें। अपना गला छुड़ाकर आपको फाँसी के फंदे तक पहुँचा देनेवाले, अपने अधीनस्थों को अनेक अवैध कार्य करने के लिए बाध्य करनेवाले और मौके पर बिना हिचक स्वयं को निर्दोष सिद्ध करके बच निकलनेवाले अधिकारी मित्रों से प्रायः सभी प्रकार के अधीनस्थों का पाला पड़ा रहता है। अनेक तो ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण प्रपत्र आपके हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत कर देंगे, जब आप इतने व्यस्त हों कि उन्हें पढ़ना तो दूर रहा, ठीक से देख पाने का समय भी आपके पास न हो। लेकिन उनकी प्रवृत्ति से अनभिज्ञ न होने के कारण उनके तत्काल हस्ताक्षर कर देने के लाख दबावों को नकारते हुए या तो आपने उनसे बाद में आने को कहकर पिंड छुड़ाया होगा या फिर सब काम छोड़कर उनके ही प्रपत्र निबटाने में लग गए होंगे। किसी पर हस्ताक्षर करने में आपने असहमति जताई होगी तो वे तत्काल बहुमत की दुहाई देने लगे होंगे कि और सब तो हस्ताक्षर कर रहे हैं, आपको ही क्यों आपत्ति है? कहकर आपको निरुत्तर करने की कोशिश की होगी और शायद हिम्मत बटोरते हुए आप, ‘आपत्ति यह है कि जिस दिन मामला पकड़ में आ जाएगा, उस दिन आप सब एक हो जाएँगे और फँसूँगा मैं अकेला’ कहकर उनके धिक्कार के पात्र बने होंगे। परंतु जब मामला (जिसे पकड़ में आना ही था) पकड़ा गया होगा और आपको समझाने वाले कारागार के ‘सम्मानित’ अतिथि बन गए होंगे, तब आपको लगा होगा कि इस सार्वजनिक भर्त्सना से तो उनका दुर्भावप्रेरित धिक्कार ही श्रेयकर था। ऐसे कटु अनुभवों से सज्जनता और उदारता का भाव तिरोहित होता जाता है तथा अविश्वास का ऐसा वातावरण बन जाता है कि व्यक्ति अंतर्मुखी होकर जैसे समाज से विरत ही हो जाता है।

ऐसे परितापग्रस्त निदाघ में शुद्ध मित्रता शीतल समीर की ऐसी बयार प्रतीत होती है कि व्यक्ति अंतर्मन से आनंदित और पुलकित हो उठता है। उभयपक्षीय मन की निर्मलता की प्रतीक ऐसे मित्रता ही वास्तविक मित्रता है, जो मानवमात्र का अभीष्ट है और मानवता की कसौटी है। हृदयों का ऐसा सम्मिलन वाणी को आनंद-सरोवर में ऐसा सराबोर कर देता है कि सामान्य से सामान्य शब्द भी मधुरससंपन्न हो जाता है। एक-सा रहना, एक-सा सोचना, समाज के प्रति एक-सा सकारात्मक भाव रखना, सबके प्रति सेवाभाव एवं कल्याण-कामना रखना यही तो मानव-जीवन है, जिसके लिए देवता भी मनुष्य होकर धराधाम पर आने को लालायित रहते हैं। आचार्यों, नीतिकारों, व्यवहारियों, सहृदय रचनाकारों, प्रबुद्धजनों, महात्माओं सभी ने एक स्वर से ऐसे मित्रों के लक्षण बतलाकर उन्हें मानवता के लिए काम्य बतलाया है और उन्हें धरा का आभूषण स्वीकार किया है। ‘अमियस्य कुतो सुखम्’ कहकर जिस सुखद मित्रता की संस्तुति की जाती है, वह ऐसी ही अंतरंग मित्रता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास ऐसा बहुत सा होता है, जिसे वह दूसरे के साथ साझा करके हल्का हो जाना चाहता है, पर सबसे कह नहीं सकता। केवल उससे ही कह सकता है, जो उसके रहस्य को उसकी इच्छा के बिना किसी पर प्रकट न करे और न उसका दुरुपयोग ही करे। ऐसे दुर्लभ मित्र की सबको तलाश रहती है, पर कोई अत्यंत भाग्यशाली ही इस तलाश में सफल हो पाता है। आज के इस स्वार्थपरक, गलाकाटू युग में ऐसे काम्य मित्र कितने विरल हैं!

मित्रों का एक वर्ग अदृश्यता वाला भी है। यह वर्ग उन पत्र मित्रों का है, जो दूर देशों के बीच पत्र सेतु बना लेते हैं। इससे भाव तो आर-पार आ-जा सकते हैं, पर व्यक्ति शायद ही कभी मिल पाए। पत्र मित्र देश में भी होते हैं। उनसे भी मिल पाना प्रायः कठिन होते हुए भी परिस्थितियोंवश संभव भी हो जाता है। इन मित्रताओं से विचारों का आदान-प्रदान होता है, जीवनदर्शन का अनुशीलन-परिशीलन होता है और मानवता के प्रति एक विराट् फलक का निर्माण होता है। यह मित्रता स्थूल से अधिक सूक्ष्म और दीर्घजीवी होती है। महान् व्यक्तियों के पत्रों के संग्रह इसीलिए पठनीय होते हैं कि वे अंतरंग क्षणों के साक्षी होते हैं और अंतर्मन प्रतिबिंब होने के कारण अत्यंत प्रेरणादायी होते हैं।

‘यानि कानि च मित्राणि कर्तव्यानि शतानि च’ कहकर और अनेक उदाहरणों तथा कथाओं-बोधकथाओं के माध्यम से समझाकर तंत्रकारों ने मित्रता को जीवन की सुगंध निरूपित की है। इस कार्य में लोकभाषाएँ भी सक्रिय रही हैं—

‘मित्र तो ऐसे चाहिए जैसे लोटा-डोर।

अपनो गला फँसाय के लावे पानी बोर॥

कुओं की अत्यंत विरलता और अन्य सुविधाओं की प्रचुरता के कारण इन पंक्तियों का साधारणीकरण कठिन है। लोटा और डोर तो लोग जानते हैं, पर उनका परस्पर संबंध कितने लोग जानते हैं?

अंतरंग मित्र की पुनीत मित्रता उसे जीवन का अभिन्न अंग बना देती है, इतना अभिन्न कि उसके बिछोह की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कालचक्र इन मित्रताओं को भी खंडित करता है, जोडे़ को बिछुड़ाकर एक को परलोकगामी कर देता है और दूसरे को हतप्रभ तथा अपूर्ण बनाकर छोड़ देता है। जानेवाला सारे मायामोह से मुक्त हो जाता है, पर जीनेवाले के लिए गलियाँ बंद हो जाती हैं। उसे अपना बहुत कुछ छूट गया, सूख गया लगने लगता है। इतना कि प्राकृत नर काव्य न लिखने की प्रतिज्ञा किए बैठे कविता-कामिनि कंत गोस्वामी तुलसीदास भी इतने विचलित हो गए कि उन्होंने अपने दिवंगत मित्र टोडरमल पर चार दोहे लिख ही दिए—

चार गाँव को ठाकुरो, मन को महा महीप।

तुलसी या संसार में, अथयो टोडर दीप॥

तुलसी मन थाला बिमल, टोडर गुनगन बाग॥

इन दोउ नैनन सीं चिहौं, उमगि-उमगि अनुराग॥

तुलसी राम स्नेह को, सिर पर भारी भारु।

टोडर काँधा ना दियो, सब कहि रहे उतारु॥

राम-धाम टोडर गए, तुलसी भए असोच।

जियबो मीत पुनीत बिनु, यहै जानि संकोच॥

फिर हम जैसे सामान्य जन कहाँ ठहर सकते हैं। बस यही लगता रहता है—‘तुम इतनी जल्दी क्यों चले गए?’

द्वीपांतर, ला.ब. शास्त्री मार्ग, फतेहपुर-२१२६०१ (उ.प्र.)

दूरभाष : ०५१८०-२२२८२८

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