मँझले

मँझले

‘‘इस कपूत ने तो मेरा जीना हराम कर दिया। मरै न माचौ लेय। जब देखों तब कोई-न-कोई इसकी शिकायत लिए खड़ा है दरवाजे पर।’’ मँझले की मताई आगन में खड़े होकर जोर-जोर से उसे भली-बुरी सुना रही थी तो पड़ोसन रामरती ने पूछ धरा, ‘‘लुड़को काकी, आज का भओ?’’

‘‘अरी बाई, आज अबई राम दुलारे की बहू खेत से लौटत मँझले की कारस्तानी सुना गई। कह रही थी—काकी, नाशमिटे कौ ब्याऔ करा दो, रोजई रोज किसी-न-किसी की बहन-बेटियों को छेड़ता है खेत में। खूब गरिया दओ, जुतया दओ, मनो लतर कुटैला है, मानतई नइयाँ।’’

बूढ़ी लुड़को काकी एक हाथ कमर पर धरे और दूसरा हाथ हवा में लहरा-लहराकर कभी रुआँसी होती, कभी उदास और कभी पूछती, ‘‘तुमई बताऔ, अगर हाथ-पाँव सही-सटाक होते, दिमाग को थोड़ो-बहुत तेज होतो, चार दरजा पढ़ लओ होतो तो काहे बैठो रहतो अबलो कँवारो? भला बताओ, मैं का पागल थी जो छोटे को ब्याह कर देती और जौ कुँवारो बैठो रहतो? बड़ौ और छोटो दोई गबरू जवान हते सों देख लो, उनके घर बस गए, उनकी लच्छमियाँ घर-द्वार, खेत-खलियान ढोर-डंगर सँभाल रही हैं। रामजी की किरपा से ‘दूधों नहा रईं पूतों फल रही’, मेरी सेवा कर रही हैं। मनो करमजलो मँझलो ‘न काम कौ न काज को, ढाई सेर अनाज को’ और ऊपर से रोज-रोज के उलाहने।’’

रमरतिया कब की घर के भीतर घुस गई थी, मगर लुड़को कलप रही थी खड़े-खड़े। माथे पर हाथ रखकर पत्थर की अथाई पर बैठ गई। बोली, ‘‘आ जाने दे बड़े-छोटे को, ससुरे के हड्डा तुड़वा दे हों, रोज-रोज के उरान्हे सुन-सुन के तो मेरे कान पक गए। मोतीझरा में ही मर जातो तो चार दिन रो-रा कै रह जाती। रोज-रोज कौ रोना तो न होतो।’’ सब जानते हैं, लुड़को का क्षणिक गुस्सा शाम तक उतर जाएगा और वह उसे लाड़-प्यार से समझाने-पुचकारने लगेगी।

लुड़को भर जवानी में विधवा हो गई थी। उसका पति रामदीन दस बीधा का किसान, चार भैंस, आठ गायों और पाँच बैलों का मालिक था। लुड़को राजा के राज कर रही थी। बड़ा बेटा पाँचवीं जमात में पढ़ रहा था कि तभी आठ साल के मँझले को मोतीझरा निकल आया। कस्बे के बैद, झडि़या-गुनिया से लेकर शहर के अस्पताल तक के पापड़ बेले, तब जाकर मँझला बचा था। पाँच महीने बाद ठीक हुआ तो पता चला, उसका दिमाग ठस हो गया है। एक पाँव से लँगड़ाने भी लगा। उसके दद्दा रामदीन ने कहा, ‘‘चलो, बेटा बच तो गया। हाथ-पैरों का क्या, एक गाय का दूध इसी के नाम।’’ जिसने जो बताया, वह उसे खिलाया—बादाम, खसखस का हलुआ, दिनभर में सेर भर दूध, खुली छुट्टी, पढ़ना-लिखना बाद में। इस खिलाई-पिलाई का असर यह हुआ कि मँझला गबरू ज्वान निकल आया साल भर में। हट्टा-कट्टा, मगर पैर से लँगड़ाना और दिमाग का ठसपना नहीं गया। स्कूल भी भेजा, मगर पहले दरजे से आगे ही नहीं बढ़ा तीन साल में। निराश होकर दद्दा ने खेती-बाड़ी में लगाना चाहा। अपने साथ खेत ले जाते, खेती का काम, जोतना, बोना, खाद, बीज, कुएँ में रहट चलाकर सिंचाई करना, मगर उसकी समझ में कुछ आता ही नहीं। दद्दा कहे, खेत की, वह सुने खलिहान की। दद्दा काम में जुटा तो वह किसी पेड़ पर किसी तरह चढ़ जाता। घंटों दद्दा ढूँढ़ते और साँझ ढलते घर लौटने लगते तो ये भी पेड़ से उतरकर पीछे-पीछे हँसता, मुसकराता चला आता।

कहते हैं, माँ-बाप को कमजोर बेटा सबसे ज्यादा प्यारा होता है। क्योंकि वे उसके भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। चाहते मन से हैं कि वह भी औरों की तरह काबिल बने, पुश्तैनी धंधा करे, नहीं तो और काम-धंधा करे। उसका भी घर बसे, बाल-बच्चे हों। मगर हर कुछ हमारे चाहने से नहीं होता। होता वही है, जो होना होता है।

बड़ा और छोटा इतना पढ़ गए कि खेती-बाड़ी लगाना, खाद-पानी का हिसाब-किताब समझ लेते, पटवारी पटेल साहब के फंदों-फाँसों को समझने लगे तो माँ-बाप ने एक-एक करके दोनों को एक साल खेती-बाड़ी में लगाया। कहते हैं, चलता घोड़ा दाना खुद ही माँगता है। शादी-ब्याह वाले रिश्ता लेकर आने लगे और लुड़को और रामदीन ने अच्छा घर-द्वार देखकर बड़े की शादी कर लक्ष्मी सी बहू घर में ला दी। मगर छोटे के ब्याह में मँझले मचल गए। मचल क्या गए, लोगों ने उचका दिया। पूरा मोहल्ला सिर पर उठा लिया, मेरा भी ब्याह कराओ, नहीं तो छोटे का भी ब्याह नहीं होने दूँगा। मुझमें क्या कमी है, बड़े-छोटे दोनों से ज्यादा गबरू जवान हूँ, बोलो? सब पड़ोसी हँसते, सब उसकी बातों का मजा लेते। उससे कम उम्र के संगी-साथी, जिनके साथ वह गिल्ली-डंडा, कबड्डी, छुपन-छुपइया खेलता, वे उसे और उकसाते, मँझले यही मौका है, अड़ जा ब्याह पर, और वह अड़ गया।

लुड़को ने बहुत समझाया—‘‘देख बेटा, जब तक तू काम-धंधा नहीं करेगा, तो अपना और बहू का पेट कैसे पालेगा? जब कुछ करेगा तभी तो कोई रिश्ता लेकर आएगा? महीना भर तू रोज ढोर लेकर जंगल जाया कर, ढोर-बैलों को चरा, फिर तुझे खेती में लगा देंगे, जब तेरे दद्दाजी समझ जाएँगे कि तू कमाने-खाने लायक हो गया तो तेरा ब्याह मैं करूँगी।’’

उसने माँ से कहा, ‘‘सच्ची कह रही है मताई, मेरी सौगंध खा।’’ माँ ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा, ‘‘बेटा सौगंध खाती हूँ, जब तू खेती-बाड़ी, ढोर-बैल सम्हाल लेगा, तेरा ब्याह कराऊँगी।’’ पकड़कर खींचता हुआ ले आया, बोला, ‘‘भौजी, तुम गवाह रहना, मताई ने मेरे सिर पै हाथ रखकर सौगंध खाई है कि मैं कल से खेती-बाड़ी, खेत-खलिहान का काम करूँगा और फिर ये मेरा ब्याह करा देगी, तुम्हारे जैसी प्यारी-प्यारी गोरी सी तुम्हारी देवरानी ला देगी।’’

भौजी मँझले देवर के रोज-रोज के खेल-तमाशे देखती चली आ रही थी, होंठों में हँसी और आँखों में शरारत छुपाकर बोली, ‘‘हाँ लल्ला, मैं गवाह हूँ, पक्की गवाही दूँगी।’’ खुशी से मँझले भाभी से लिपट गए। तुम कितनी प्यारी भाभी हो मेरी और भावुक होकर वहीं जमीन पर धम्म से बैठकर रोने लगा। बड़ी बहू पास आकर बोली, ‘‘अब काहे को रोते हो, अब तो सब बात पक्की हो गई न। उठो रोटी खाओ।’’

माँ ने अपनी मैली धोती से उसके आँसू पोंछे और उसे छाती से लगा खुद भी रोने लगी।

मँझले रोटी खाकर घर से निकल गए और अपने साथियों को अपने ब्याह की खुशखबरी सुना-सुनाकर खूब उछलने-कूदने लगा। मोहल्ले की औरतें चुहल करते हुए पूछतीं, ‘‘अरे, क्या हुआ मँझले, किस बात की खुशिहाली मना रहे हो। हमें भी तो बताओ?’’ मँझले दोस्तों के साथ कूदते-फाँदते आकर पूरी कहानी मजा ले-लेकर सुनाते—‘‘मताई ने सौगंध खाई है कि मेरा ब्याह कराएगी, मुझे सजाएगी, मैं घोड़े पर बैठ बरात लेकर जाऊँगा और भौजी की माफिक प्यारी-प्यारी दुल्हनिया डोली में बिठाकर लाऊँगा।’’ फिर लाज से खुद ही सिमट जाते और उठकर भाग जाते। मँझले न हुए, मोहल्ले भर के खिलौना हो गए थे।

पंद्रह दिन मँझले सुबह उठकर बड़े के साथ हँसी-खुशी ढोर-डंगर, हल-बैल लेकर खेत पर जाते। रास्ते भर मँझले बड़े से अपने ब्याह की बातें पूछते, ‘‘अच्छा बड़े, तुम्हें तो मताई की सौगंध पर भरोसा है न? मैं तुम्हारे साथ रोज खेत-खलिहान पर काम करने जाऊँगा, मेहनत करके कमा के लाऊँगा तो वह मेरा भी ब्याह करा देगी न?’’ बड़े भी उन्हें भरोसा दिलाते, ‘‘बिल्कुल, तू मन लगाकर काम कर, मैं खुद मताई से कहूँगा कि हाँ अब तेरा ब्याह कर देना चाहिए। बस तेरा ब्याह होगा, फिकर मत कर, मगर मन लगा के काम कर। तेरे सिर पर मोहर बँधवाऊँगा, बाजे बजेंगे, गीत होंगे, बराती सजेंगे, तू घोड़े पर बैठकर दुलहिन को लेने जाएगा, बहू मताई के पाँव छुएगी, भौजाई के पाँव छुएगी।’’ ‘‘और छोटे की बहू के?’’ बड़े ने कहा, ‘‘छोटे की बहू के पाँव नहीं पडे़गी, वह तो उससे छोटी हुई। उल्टी छोटे की बहू तेरी बहू के पाँव छुएगी, समझा।’’ मँझले उचककर ताली बजाने लगे तो गिर पड़े। बड़े ने बढ़कर उठाया और कहा, ‘‘तेरे पाँव कमजोर हैं, कम उछला कर।’’ बस इसी तरह बतियाते-बतियाते दोनों भाइयों का रास्ता कट जाता। ढोर-डंगर पास की चरोखर में छोड़ देते और दोनों भाई खेत में काम पर जुट जाते।

मताई और दद्दा छोटे के ब्याह की खरीद-फरोख्त, नाते-रिश्तेदारों को पीली चिट्ठी भेजने, नाऊ-बामन का इंतजाम करने में लग जाते। दोपहर में बड़े की बहू भोजन-पानी लेकर आ जाती। दोनों भाई मिलकर भोजन करते। भोजन करते मँझले भाभी से यह कहना कभी नहीं भूलते, भौजी, ‘‘याद रखना, तुमने भी गवाही दी है मेरे ब्याह की। भैया ने भी वचन दिया है कि मेरा ब्याह जरूर कराएँगे।’’ भाभी हँसी दबा कनखियों से बड़े की ओर देखकर कहती, ‘‘बेफिकिर रहो लल्लाजी, ऐसेई मन लगा के काम करते रओ, बस तुमरो ब्याओ पक्को। बल्कि मैंने तो लड़की तलाश भी ली है।’’ मँझले रोटी छोड़कर भाभी के पास खिसक आए, ‘‘सच्ची कह रही, तमने देख ली न, तो बस मैं बेफिकर हुआ। मताई-दद्दा तो अब जोजरे हो गए, वे कां ढूँढ़ते फिरते। मनों तुमरी नाई गोरी-चिट्टी तो है न? पुरा परौसिन खों जरा जलानो भी तो है। बहुत कहत रहे, मँझले तेरा ब्याह हो चुका, बैठा रह जिंदगीभर कुँआरा। मैं अब छाती ठोक के कहूँगा, मेरी नैया मेरी प्यारी भौजी ने पार लगा दी। धन्य भौजाई, तुम जैसी भौजाई भगवान् सबको दे।’’ कहकर मँझले ने भौजी के पैरों में सिर रख दिया और आँखों में आँसू भर लाए। भौजाई ने उनके आँसू पोंछे और उन्हें रोटी खाने को कहा। वे फिर हँसी-खुशी रोटी खाने बैठ गए। रोटी खा-पीकर बड़े बोले, ‘‘मँझले लठिया उठाऔ और अपने ढोर देखो, काऊ के खेत में न पिल गए हों। फिर उन्हें कुएँ पर लाकर नाद में भरा पानी पिलाना और जब वे सब सुस्ताने लगें तो तुम भी किसी पेड़ की छाह में आराम करना। अब मैं भी कमर सीधी करूँगा और तुम्हारी भौजाई भी रोटी खाएगी।’’ वे बोले, ‘‘अच्छा भैया-भौजी, हम जाते हैं।’’

दिन ढलते दोनों भाई ढोर-डंगर घेरकर घर की तरफ चल देते, पीछे-पीछे बड़े की बहू और बड़े सिर पर चारे का गट्ठा रखे चलते। मँझले लँगड़ाते-लँगड़ाते साथ चलनेवाले चरवाहों से बतियाते चले आते। मँझले सबको हँस-हँसकर अपने ब्याह की बातें सुनाते। मताई की सौगंध भौजाई की गवाही, बड़े का वचन सब बताते। हलवाहे-चरवाहे उनकी बातों का मजा लेते, अपने-अपने पशुओं को हाँकते, टिटकारते, पुचकारते, गरियाते चले आते और अपने-अपने घर का रास्ता पकड़ लेते।

छोटे घर पर तैयार बैठे उन्हीं की राह देखते—कब आवें, कब ढोर-डंगों को खूँटे से बाँधें, दुधारुओं को सानी तैयार करें। ढोर आते ही छोटी बहू आकर दूध दुहने में छोटे की मदद करती। मताई-दद्दा बाजार करके लौट आते, ब्याह का सामान जमाते, बड़ी बहू को समझाते, हिसाब बताते, थोड़ी देर सुस्ताते। छोटी-बड़ी मिलकर फिर रसोई में घुसतीं तो घंटा-डेढ़ घंटा में सबको ब्यारी करातीं। मताई छोटे बच्चों को दूध-रोटी, दाल-रोटी जो जैसा खाए, प्यार से खिलाती। खा-पीकर दद्दा अलाव या चौपाल पर आ डटते, बड़े और छोटे आराम से खा-पीकर अपने हमउम्रों में दूसरी जगह डट जाते, मँझले नियम से मंदिर में पहुँचकर आरती, गम्मत वगैरह में रम जाते।

धूमधाम के साथ छोटे की बरात सजी, बाजे-गाजे के साथ, हँसी-खुशी सात फेरे हुए और बड़ी के गाँव पासवाले गाँव की ही सुशील-सुंदर बहू बैठाकर ले आए। मँझले सज-धजकर बराती बनकर गए, खुशी में नाचे-गाए, हँसी-ठिठोली करते रहे, इसी आशा में कि उनका भी ब्याह होगा और जल्दी होगा, क्योंकि मताई और बड़े ने वचन दिया है तथा इसकी गवाह भौजाई है। अभी छोटे के ब्याह को तीन महीने भी नहीं हुए थे कि भरी बरसात में एक रात दद्दा के पेट में अचानक ऐसा दर्द उठा कि पूछो मत, रात काटना मुश्किल हो गई। बड़े भरी बरसात में घुट्टन-घुट्टन पानी में बरसाती ओढ़कर भागे वैद्यजी के घर। वैद्यजी का दरवाजा बड़ी देर में खुला, शायद गहरी नींद में थे वैद्यराज। भीतर से ही आवाज दी, कौन? बड़े ने उत्तर दिया, वैद्यजी मैं रामदीन अहीर का बेटा बड़े। वैद्यजी ने झटपट दरवाजा खोला और बड़े को भीतर बुलाकर पूरी बात पूछी। पानी ऐसा बरस रहा था कि लगता, आज प्रलय हो जाएगी। बूढ़े वैद्यजी ने आसमान की तरफ हाथ उठाकर देखा और कहा, ‘‘प्रभु, मेरी लाज रखना।’’ उन्होंने अपनी बरसाती ओढ़ी, बड़ी टॉर्च हाथ में उठाई और लबालब पानी भरे रास्ते को पार करते, राम-राम जपते रामदीन के घर पहुँचे। लुड़को वैद्यजी के पैरों में गिर पड़ी—‘‘महाराज, आपई के हाथ है मेरी लाज, सुहाग जो कुछ भी है।’’ वैद्यजी ने रामदीन की नब्ज पकड़ी, वह दर्द से तड़प रहा था। वैद्यजी बोले, ‘‘घबराओ मत रामदीन, भगवान् पर भरोसा रखो। देखो बड़े, एक गोली देता हूँ, उसे तुरंत गाय के गरम दूध के साथ इन्हें पिला दो। रात आराम से कट जाएगी, मगर सबेरे इन्हें शहर के बड़े अस्पताल जरूर ले जाना।’’ लुड़को ने फिर वैद्यजी के चरण पकड़ लिये, ‘‘महाराज किरपा करके रातभर आपकी निगरानी रहे तो जनमभर अहसान न भूलूँगी।’’ वैद्यजी पीढि़यों से गाँव के सुख-दुःख के साथी थे। भला मरीज को ऐसा छोड़कर कैसे चले जाते। उन्हें पास ही साफ-सुथरी दरी, रजाई का बिस्तर लगवा दिया और पूरा घर रातभर रतजगा करता रहा। रामदीन की रात आराम से कट गई। सुबह वैद्यजी ने फिर नब्ज पकड़ी और कहा, ‘‘बड़े, इन्हें शहर के बड़े अस्पताल ले जाओ, भगवान् सब ठीक ही करेंगे।’’ पानी थम गया था, पड़ोसियों को पता चला, सब सहायता को दौड़ पड़े। आनन-फानन में पटेल ने अपनी घुड़बग्गी बुलवा ली और पूछा, ‘‘बड़े, लुड़को भौजाई, रुपया टका की जरूरत हो तो बताओ, संकोच मत करो।’’ बड़े ने कहा, ‘‘पटेल साहब, सब आपकी किरपा है, जरूरत पड़ेगी तो माँग लूँगा।’’

चार दिन रामदीन अस्पताल में रहे, तीनों बेटे, लुड़को और पुरा-पड़ोस के पाँच-छह लोग भी सहायता में रहे, मगर रामदीन को बचाया न जा सका। डॉक्टरों ने भी खूब दौड़-भाग की, मगर सब बेकार। गाँव में खबर पहुँची तो हाहाकार मच गया। अच्छा-खासा हट्टा-कट्टा आदमी ऐसे चला गया, जैसे हवा का झोंका। मँझले का बहुत बुरा हाल था। वह कभी मताई से लिपटता, कभी पुरा-पड़ोसियों से पूछता, ‘‘कहाँ गए हमारे दद्दा।’’ रात को ही तो कहकर सोये थे, मँझले, तू बहुत सुधर गया, मुझे खुशी है, मन लगाकर लगा रह भाइयों के साथ, तेरा बेड़ा पार हो जाएगा।’’ मँझले हृदय विदारक चीत्कार करते, धरती पर लोटते, सिर पटकते, लोग उसे ढाढ़स बँधाते, मगर मँझले मँझले थे। उन्होंने अरथी उठाना मुश्किल कर दी। जैसे-तैसे उन्हें चार लोगों ने पकड़ा, तब जाकर अरथी उठी। पूरा गाँव रामनाम सत्य बोलता अरथी के पीछे और लुड़को के आँगन में गाँवभर की औरतों का हाड़फोड़ रुदन और कंदन।

अंतिम संस्कार तीजा, तेरहवीं, मासिक कढ़ाई बरसी। पूरा साल लुड़किया के घर में शोक। न तीज-त्योहार मने, न कभी किसी के मुँह पर किसी ने हँसी देखी। यहाँ तक कि सबकी हँसी-ठिठोली का केंद्र बना मँझले भी सुन्न-शांत, न किसी से बोलना, न बतियाना, मशीन की तरह लँगडाता-लँगड़ाता भाइयों के साथ काम में जुटा रहता। खेत-खलिहान ढोर-डंगर, घर-परिवार और वह बस। न कोई दोस्त, न साथी, न मंदिर, न चौपाल, न आँगन, न अलाव। काम निबटाकर हारा-थका मताई की गोदी में सिर रखकर समझाता—‘‘मताई, तू फिकर मत कर, बड़े हैं, मैं, छोटे हैं, भौजाई, छोटी बहू चुन्नू-मुन्नू हूँ ललता सब तो है। तू दुःखी मत हो, तुझे राई-रत्तीभर तकलीफ नहीं होने देंगे, बस अकेले में तू रोया मत कर। नाती-नातिन के सिर पर हाथ फेर, आशीष दे, बहुओं पर हुकुम चला, पाँव दबवा, भगवान् को भजन कर।’’ माँ उसे कलेजे से लगाकर आँसू ढरकाती—हाँ बेटा, दो दिन में ही तू कितना सयाना-समझदार हो गया रे! बस अब फिकर मत कर, अनरये का साल बीता और मैंने तेरा घर बसाया। इतना सबर किया, कुछ दिन और कर बेटा। तेरा घर बसाकर ही तेरे दद्दा के पास जाऊँगी।’’

मँझले उठकर बैठ गए और मताई के मुँह पर हाथ रख दिया, ‘‘न मताई, जाने की बात मत कर। एक तो दद्दा हवा के झोंका की तरह चल दिए, अब तू जाने की बातें कर रही है। न, न मुझे नहीं करना ब्याह। अब क्या करना। दद्दा होते तो बड़े हौंस से मेरी बहू को गहने-गुरिया खरीदते, तुझे लेकर सराफ के यहाँ जाते, बजार से बहू के कपड़े लाते, जगह-जगह रिश्तेदारों को पीली चिट्ठी भिजवाते, मुझे लाड़-प्यार से सजवाते, खुद सजते और ठसक से कहते, आज मेरे मँझले की बारात सजेगी, पुरा-पड़ोसी सब चलना बरात में। तू सजती, ढोलक ठमकती, मंजीरा बजते और बन्ना होते, सात दिन घर-द्वार खुशी से नाचते मेरे संगी-संगाती, बराती सजते, ससुराल में होड़ा हरसी, गारी गीत, बिदाई, हँसी ठिठोली होते। अब न दद्दा, न वे संगी-संगाती, न मेरे मन में ब्याह की हौंस ललक, अब काहे के ब्याह। उमर भी तो हो गई। छोटे के दो मोड़ा-मोड़ी हो गए, बड़े को मोड़ा और मोड़ी दोई हाईस्कूल जाने लगे, अब अच्छा नहीं लगेगा। लोग कहेंगे, बूढ़ा घोड़ा लाल लगाम। न मताई, अब नहीं करूँगा ब्याह। अब तो तेरे चरणों की सेवा करके गंगा नहाऊँगा और भगवान् से प्रार्थना करूँगा कि हे भगवान्, अगले जन्म में मुझे लगड़ा, लूला, कम अकल मत बनाना और मेरी मताई भी इसे ही बनाना।’’

लुड़को ने उसे उठाकर छाती से लगा लिया, ‘‘नहीं बेटा ऐसी बातें मत कर। अभी तेरी उमर ही क्या है, तूने दुनिया का मौज-मजा देखा कहाँ है, यों बूढ़ों जैसी बातें मत कर।’’ कहकर दोनों माँ-बेटे एक-दूसरे के गले लगकर देर तक रोते-रोते सो गए। सबेरे उठकर मँझले ढोरों की सार में घुस गए और उनकी सेवा में लग गए। बड़े, छोटे, भाभी, बहू, बच्चे, मताई सब जाग गए। सूर्य देवता भी अपने नित्य नियम से आसमान में चहलकदमी करते-करते छप्परों से ताक-झाँक करने लगे।

मँझले कलेवा करके गाय भैंस, बैल-बछड़े सब को घेरकर चराने निकल पड़े। बड़े ने कहा, ‘‘मँझले एक चक्कर खेतों पर भी लगा लेना, मुझे जरा देर होगी। आकर गेहँू में पानी फेरूँगा, छोटे पटवारी साहब के घर काम से जाऊँगा। फिकर मत करना मैं दोपहर तक पहुँच जाऊँगा।’’ मँझले ‘हओ भैया’ कहकर मवेशियों को टिकारते, पुकारते लट्ठ हाथ में ले लँगड़ाते घटे भर में चरोखर पहँुच गए। चरो बेटा मन माफिक चरो। दो-चार चरवाहे और आ गए। राम-राम, श्याम-श्याम हुई। मँझले अपने खेत का दक्षिण से पश्चिम तक चक्कर लगाकर थक गए तो बूढ़े बरगद के नीचे सुस्ताने लगे। थोड़ी दूर पर पहाड़ी क्वारन नदिया उनके पीछे अरकिर बहती। इस गाँव के लोग उस गाँव कम ही जाते थे। दोनों गाँव की सीमा बनाती थी क्वारन। अभी मँझले ने दम लिया ही था कि उनके पीछे क्वारन के किनारे से एक औरत की चीख-पुकार सुनाई दी—‘‘अरे, कोई बचाओ, मेरा मोड़ा बह गया बचाओ।’’

मँझले बिजली की तेजी से उठे और पूरा जोर लगाकर पलक झपकते ही नदी कनारे पहुँच गए। ‘‘कहाँ गया लड़का, कहाँ?’’ उसकी माँ ने लड़के की काली खोपड़ी डूबते-उतराते दिखा दी। मँझले ने आव देखा न ताव और छलाँग लगा दी उफनती नदिया में। कई चरवाहे किनारे खड़े देखते रहे, मगर क्वारन की तेज धार में कूदने की किसी की हिम्मत नहीं हुई। आगे बर्री घाट के पहले एक गहरा कुंड था, जिसमें तेज भँवर पड़ती थी। बच्चा उसमें फँस गया था। सब आशा छोड़ चुके थे। मगर मँझले तेज धार में बहते-बहते कुंड में गिरने ही वाले थे कि बच्चे की टाँग उनके हाथ में आ गई। और उन्होंने एक हाथ से तेज धार को काटकर बच्चे को किनारे पर ठेल दिया। बर्री घाट पर लोगों की भीड़ थी। दो-चार नौजवानों ने हिम्मत कर नदी में कूद बच्चे को किनारे पर खींच लिया। मगर मँझले भँवर में ऐसे फँसे, ऐसे फँसे कि पता ही न चला कि कहाँ बिला गए।

लुड़को के घर-मोहल्ला, गाँव, पड़ोस में हाहाकार मच गया। सब दौड़े क्वारन की तरफ, खूब ढँूढ़ा मगर मँझले को न मिलना था, न मिले। जिस माँ का बच्चा डूबने से मँझले ने बचाया था, वह लुड़को के चरणों में गिरकर मँझले को देवता बताकर आशीष रही थी।

क्वारन नदी के किनारे दस-बीस गाँवों में लोग दौड़े, खबर कर दी कि उनके गाँव का लड़का मँझले क्वारन में बहा है, अगर इस गाँव में पार लगे या दिखे तो पठारी गाँव खबर करें। आठ दिन हो गए, मँझले का कहीं कोई पता न चला। लुड़किया के घर का तो पानी ही उतर गया। लोगों ने जैसे-तैसे समझा-बुझाकर लुड़को की बहुओं को तो काम-धंधे से लगा दिया, मगर बूढ़ी मताई पत्थर की अथाई पर सुबह से शाम तक बैठी मँझले की बाट देखती और छाती ठोंककर कहती, ‘‘देख लेना, एक दिन मेरा मँझले जरूर सिर से ऊँचा लट्ठ उठाए, लँगड़ाता-लँगड़ाता दूर से मुझे पुकारता आएगा—मताई, ओ मताई, ले मैं आ गया।’’ और वह मैली धोती के छोर से आँसू पोंछने लगती। सब कहते, ‘‘सबर कर लुड़को काकी? सबर कर। मँझले का तो जीवन सफल हो गया, उसने एक घर का चिराग गुल होने से बचाया, एक माँ की गोद उजड़ने नहीं दी। तेरे दूध को नहीं लजाया। उसके साथ तू भी धन्य हो गई।’’

१४/८, परी बाजार, शाहजहांनाबाद

भोपाल-४६२००१

दूरभाष : ९४२४४७६२८८

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