प्रायश्चित्त

नर्मदा नदी के किनारे पर बसे रामपुर नामक गाँव में रामदास नाम का एक संपन्न कृषक अपने दो पुत्रों के साथ रहता था। उसकी पत्नी का देहांत कई वर्ष पूर्व हो गया था, परंतु बच्चों की परवरिश में कोई बाधा न आए, इसलिए उसने दूसरा विवाह नहीं किया था। उसके दोनों पुत्रों के स्वभाव एक-दूसरे के विपरीत थे। उसका बड़ा बेटा लखन लालची प्रवृत्ति रखते हुए धन का बहुत लोभी था, परंतु उसका छोटा पुत्र विवेक बहुत ही दातार, प्रसन्नचित्त एवं दूसरों के कष्ट के निवारण में मददगार रहता था। वह कुशल तैराक भी था एवं तैराकी के शौक में काफी समय देता था। वह अपने पिता के कामों में बहुत कम रुचि रखता था। वह सीधा, सरल एवं नेकदिल इनसान था। उसे अपने बड़े भाई पर गहन श्रद्धा एवं विश्वास था।

रामदास ने अपनी वृद्धावस्था को देखते हुए अपनी वसीयत बनाकर अपने सहयोगी मित्र के पास रखवा दी थी और उसे रजिस्टर्ड करने का निर्देश भी दिया था, परंतु ऐसा होने के पूर्व ही दुर्भाग्यवश हृदयाघात के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उसके बड़े बेटे लखन ने हालात का फायदा उठाकर अपने पिता के मित्र को येन-केन अपनी ओर मिलाकर वसीयत हथिया ली एवं अपने पिता की हस्ताक्षर युक्त कोरे कागज पर नई वसीयत बनाकर खेती की पूरी जमीन व अन्य संपत्तियाँ—गहने, नकदी आदि अपने नाम लिखकर उन्हें हथिया लिया और अपने छोटे भाई विवेक को संपत्ति में उसके वाजिब हक से बेदखल कर दिया। विवेक के हितैषियों ने उसे न्यायालय जाने की सलाह दी, परंतु उसे ईश्वर पर गहरी श्रद्धा एवं विश्वास था और वह प्रभु से न्याय करने की प्रार्थना करके चुपचाप रह गया।

विवेक अपने सीमित साधनों में ही अपनी गुजर-बसर करके अपना जीवन-यापन कर रहा था। इस घटना के बाद दोनों भाइयों में पूर्णतः संबंध विच्छेद हो गए और लखन के विवाह में विवेक को नहीं बुलाया गया। कुछ वर्षों बाद लखन को पुत्र की प्राप्ति हुई, परंतु समारोह में विवेक की उपेक्षा की गई। वक्त बीत रहा था और लखन का बेटा दो वर्ष का हो गया था।

एक दिन वह अपनी माँ के साथ नाव से नदी पार कर रहा था। तभी न जाने कैसे हादसा हुआ और बच्चा छिटककर नदी में गिर गया। विवेक इस घटना को पास के ही टापू से देख रहा था। उसका मन अपने अपमान को याद करके सहायता करने से रोक रहा था। विवेक ने देखा कि वह अबोध बालक डूबने की स्थिति में आ गया है और उसके दोनों हाथ पानी के ऊपर दिख रहे हैं। यह हृदय-विदारक दृश्य देखकर वह अपने आप को रोक नहीं सका और तुरंत बिजली की गति से पानी में तैरकर उस बालक के पास पहुँच गया। अपनी तैराकी के अनुभवों से उसे बचाकर किनारे की ओर ले आया। इस दुर्घटना की खबर आग की तरह सारे गाँव में फैल गई और लखन बदहवास सा नंगे पैर दौड़ता हुआ नदी के पास आया।

वहाँ पर उसने देखा। काफी लोग विवेक को घेरकर उसके साहस, त्वरित निर्णय एवं भावुकता की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। लखन को देखकर विवेक बच्चे को हाथ में उठाकर उसे देने हेतु उसके पास आया। यह दृश्य देखकर लखन स्तब्ध रह गया और उसके मुख से शब्द निकल पड़े कि, ‘आज मैं याचक हूँ और तुम दाता हो।’ उसकी आँखें सजल हो गईं और वह फूट-फूटकर रो पड़ा, मानो पश्चात्ताप आँसुओं से झर रहा था। वह रुँधे गले से कह रहा था, ‘‘मैंने तेरे साथ हमेशा अन्याय किया। मेरी धन-लोलुपता एवं लोभी स्वभाव ने मुझे अधर्म के पथ पर ले जाकर भ्रष्ट कर दिया था। तुमने अपने अपमान को पीकर, अपनी जान जोखिम में डालकर मेरे बच्चे की रक्षा की है। मुझे मेरी गलतियों के लिए माफ कर दो और मेरे साथ घर चलो।’’

विवेक चुपचाप खड़ा सोच रहा था। तभी वह बालक ‘चाचा-चाचा’ कहकर उसकी गोद में आने के लिए मचलने लगा। ऐसे भावपूर्ण दृश्य ने लखन और विवेक के दिलों को एक कर दिया। लखन ने विवेक को घर ले जाकर उसे उसकी संपत्ति का हिस्सा देने के कागजात तुरंत बनवाए। इसके साथ ही गहने, नकदी तथा अन्य चल-संपत्तियों में जो भी वाजिब हिस्सा विवेक का था, वह सब उसे दे दिया। लखन ने कहा, ‘तुम्हारा अधिकार तुम्हें देकर भी मैं अपने पापों से मुक्त नहीं हो सकता।’ यह सुनकर विवेक ने अपने बडे़ भ्राता के कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘मेरे मन में अब किसी भी प्रकार का दुराभाव नहीं है। आप भी अपने नकारात्मक विचारों को हृदय से निकालकर सकारात्मक शुरुआत करें। यही आपके लिए जीवन का सच्चा प्रायश्चित्त होगा।’

१०६, नया गाँव, रामपुर

जबलपुर (म.प्र.)

हमारे संकलन