बालमुकुंद गुप्त

अपने पहले लेख में मैंने कालाकांकर नरेश राजा रामपाल सिंह के संस्मरणों को लिखा था, इस लेख में अपने परम मित्र बाबू बालमुकुंद गुप्तजी के संस्मरण जितने याद हैं, लिख रहा हूँ।

बाबू बालमुकुंद गुप्त रोहतक जिला के गुरियानी के रहनेवाले अग्रवाल वैश्य थे। आप हिंदी-फारसी के अच्छे जानकार आस्तिक हिंदू थे। नए रोशनीवालों की धाँधली पर बहुत चिढ़ते थे। पहले लाहौर से निकलनेवाले ‘कोहेनूर’ के संपादक थे। पीछे से उसको उन्होंने दैनिक भी कर दिया था। लेकिन हिंदी लिखने की रुचि उनको बहुत थी। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि हिंदी साहित्य में जब उतर आए, तब उन्होंने उर्दू में लेख लिखना ही छोड़ दिया था। उर्दू में ‘कोहेनूर’ का संपादन करते समय भी लखनऊ के ‘अवध पंच’ में ‘मिस्टर हिंदी’ के नाम से बड़े चुटीले लेख लिखा करते थे।

गुप्तजी हिंदी की दुनिया में जब आए, तब पहले-पहल कालाकाँकर के दैनिक ‘हिंदोस्थान’ के ही संपादक हुए। उससे पहले उन्होंने ‘रत्नावली’ नाटिका लिखी थी। कालाकाँकर में आने पर उनकी ओजस्विनी लेखनी का जौहर हिंदी के पाठकों को देखने का अच्छा अवसर मिला।

जिस समय वे ‘हिंदोस्थान’ के संपादक होकर आए, संपादन विभाग से पंडित मदनमोहन मालवीय विदा हो रहे थे। राजा साहब से स्नेह होने के कारण मालवीयजी कभी-कभी कालाकाँकर पधारते थे, लेकिन ‘हिंदोस्थान’ के संपादन का कार्य बाबू बालमुकुंद के हाथ में आ चुका॒था।

गुप्तजी के संपादकत्व में ‘हिंदोस्थान’ अच्छा चमका। राजा रामपाल सिंह उनके प्रभावशाली लेखों से बहुत प्रसन्न रहते थे।

बालमुकुंद गुप्तजी संपादकीय सिद्धांतों में बड़े पक्के थे। किसी की सिफारिश से किसी की प्रशंसा करना या किसी की द्वेष-बुद्धि में आकर किसी की निंदा छापना उनके स्वभाव में नहीं था, लेकिन वे कहा करते थे कि जिसको सरसों भर बुद्धि है, उसका सरसों भर तक अभिमान क्षन्तव्य है, लेकिन जो सरसों भर बुद्धि लेकर मटर भर घमंड रखता है, वह जब तक सर्वसाधारण में अपना घमंड प्रकट न करे, तभी तक क्षमा योग्य है। अगर उसने ऐसा सर्वसाधारण में जाहिर किया तो अपना परिचित होने पर जरूर उसका प्रतिवाद करके मुखमर्दन करना चाहिए। गुप्तजी अच्छे अखबारनवीस थे। संपादक के कर्तव्य-पालन में उनमें हमने कभी कच्चाई नहीं देखी। जब वे ‘हिंदोस्थान’ के संपादक थे, उस समय वहाँ पंडित प्रतापनारायण मिश्र, चोबे राधारमण बी.ए. (दपवा), चौबे गुलाबचंद, और मैं भी सहायकों में था। मिश्रजी अच्छे प्रभावशाली कवि थे। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र के समकक्ष कडि़यों में उनकी गणना थी। ‘हिंदोस्थान’ में अकसर कविता लिखा करते थे। ‘तृप्यंता’ नाम की एक कविता उन्होंने एक साल पितृपक्ष में वहीं लिखी थी। फसल पर गुप्तजी उनके लेख भी लिया करते थे।

गुप्तजी को एक बार हमने व्यक्तिगत आक्षेपों का लेख ‘हिंदोस्थान’ में लिखते देखा था। बात यह हुई कि साहित्याचार्य पंडित अंबिकादत्त व्यास उन दिनों भागलपुर हाई स्कूल में हेड पंडित थे। वहीं से उन्होंने ‘पीयूष प्रवाह’ नाम का एक मासिक पत्र हिंदी में निकाला था। राजा रामपाल सिंह सुधारकों में अग्रगण्य थे। हिंदी का प्रचार, विधवा विवाह और गोरक्षा के विषयों के लेख ‘हिंदोस्थान’ में बहुत छपा करते थे। गुप्तजी में यह गुण था कि सुधारकों की उचित बात का विरोध कभी नहीं करते थे। ‘पीयूष प्रवाह’ में पंडित अंबिकादत्त व्यास ने ‘काजीजी दुबले क्यों’ नाम का लेख छापा, जिसमें राजा रामपाल सिंह पर यह आक्षेप था कि अत्रभवान तो चाहते हैं कि सारा भारत इंग्लैंड हो जाए, लेकिन जो मर्दुमशुमारी दस-दस साल पर पाँच-पाँच करोड़ बढ़ रही है, उसी से यहाँ के लोगों को दोनों जून भरपेट खाने को नहीं मिलता और अब यदि अत्रभवान के सिद्धांत पर विधवा विवाह का भंडा फूटेगा तो भारत की मेदिनी और भूखों मरने लगेगी।

वह लेख राजा साहब के सामने आया। उन्होंने कहा कि कोई इसका मुँहतोड़ उत्तर नहीं दे सकता। गुप्तजी ने उसी समय कहा, ‘‘कल मैं इसका उत्तर ‘हिंदोस्थान’ में निकाल दूँगा।’’

उसी अवसर पर गुप्तजी ने ‘हिंदोस्थान’ में एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था ‘मैं सुकवि हूँ।’ पंडित अंबिकादत्तजी व्यास अपनी कविता में अपना उपनाम ‘सुकवि’ लिखा करते थे। उस लेख में सुकविजी की खूब खबर ली गई। व्यक्तिगत आक्षेप का वही एक लेख उनको हमने लिखते देखा था और वो भी ‘डिफेमेशन’ में नहीं आता था।

कालाकाँकर से अपने स्वतंत्र स्वभाव के कारण गुप्तजी नौकरी छोड़कर घर चले गए।

राजा साहब से उनका साधारण व्यवहार था। उनका मन वहाँ नहीं लगता था। वे वैष्णव थे। रोज स्नान करके माथे पर श्री लगाते थे। आचरण के बड़े शुद्ध और सात्त्विक थे। लेकिन जो आदमी खान-पान में अखाद्य भोजी होता, उससे उनकी नहीं पटती थी। नहीं पटने का केवल इतना ही मतलब कि हृदय का मिलान नहीं होता था। राजा साहब खान-पान में बड़े स्वतंत्र थे। वे अपने खाने-पीने के मामले में स्वास्थ्य या भारतीय रिवाज की कुछ भी परवा नहीं करते थे। इस कारण राजा साहब के यहाँ बिन बुलाए वे कभी नहीं जाते थे। जब बुलाने पर जाते, तब जितना समय वहाँ बारादरी में उनका बीतता, उसको वे भार समझते थे। बल्कि कहा करते थे कि वह समय किसी अर्थ में नहीं लगा। लेख स्वयं लिखने के बजाय डिक्टेट कराना अधिक पसंद करते थे। अंग्रेजी अखबारों को देखकर उनका स्वाद लेने की योग्यता उनमें काफी थी। किसी दूसरी भाषा से लेकर हिंदी में कुछ बातें लिखते थे तो केवल फैक्ट लेकर अपनी ओर से मौलिक की तरह लिखा करते थे। किसी की लकुटिया लेकर टेकते चलना अर्थात् शब्दानुवाद करना उनको नहीं भाता था। बिलायती रहन-सहन और सभ्यता को बिल्कुल नापसंद करते थे, लेकिन उसमें जो गुण पाते, उनसे कभी घृणा नहीं करते थे। आर्य समाज में घास पार्टी और मांस पार्टी उस समय हुई थी, जब महाराज जोधपुर ने विज्ञापन देकर वेदों से मांसाहार सिद्ध करने का प्रयास किया था। पंडित भीमसेन शर्मा ने बड़े निःशंक भाव से उस कार्य का विरोध किया और पंडित भास्करानंद सरस्वती (काशी के प्रसिद्ध महात्मा भास्करानंद नहीं) ने वेदों से मांसाहार विधेय बतलाने का बीड़ा उठाया था। उस समय उन्होंने कहा कि आर्य समाज अब पतनोन्मुख हुआ है।

आर्य-सिद्धांत का युग समाप्त करके जब पंडित भीमसेन शर्मा ने ‘ब्राह्मण सर्वस्व’ का मार्गावलंबन किया, तब गुप्तजी ने कहा कि सवेरे के भूले हुए संध्या को घर आ गए। लेकिन इस तरह उजरत पर सिद्धांत बदलना वजह नहीं रखता।

अंग्रेजी-बँगला दोनों के अखबार पढ़ा करते थे, लेकन उर्दू के अखबारों को बड़े चाव से पढ़ते थे। ‘कोहेनूर’, ‘शमशुल अखबार’ अमृतसर का ‘सद्धर्म-प्रचारक’ केवल उनकी लंतरानियों का जवाब देने के लिए पढ़ा करते थे।

‘पायनियर’, ‘मॉर्निंगपोस्ट’ और ‘सिविल मिलिटरी गजट’ में खबरें न पढ़कर अग्रलेख और स्फुट सम्मतियों को बड़े चाव से पढ़कर उनका उत्तर ‘हिंदोस्थान’ में तथा कलकत्ते के प्रवासकाल में ‘भारतमित्र’ में दिया करते थे। लखनऊ के बाबू गंगाप्रसाद वर्मा द्वारा संपादित उर्दू का साप्ताहिक ‘हिंदुस्तानी’ बड़ी श्रद्धा-भक्ति से पढ़ा करते थे।

बंगवासी के मालिक श्रीयुत योगेंद्रचंद्र बसु ने बंगभाषा में ‘मडेलभागिनी’ नाम का एक बड़ा उपन्यास लिखा। उसमें सुधारकों की बड़ी खिल्ली उड़ाई गई है। गुप्तजी को वह पुस्तक हिंदी में लिखने के लिए दी गई। गुप्तजी ने अपने धार गुरियानी से ही उसको पढ़कर ‘शिक्षिता हिंदूबाला’ के नाम से ‘हिंदी बंगवासी’ में छपने को भेजना शुरू किया था, जो ‘हिंदी बंगवासी’ में धूमधाम से बहुत दिनों तक छपता रहा। उस समय ‘हिंदी बंगवासी’ के संपादक पंडित अमृतलाल चक्रवर्ती थे। गुप्तजी उसी समय ‘हिंदी बंगवासी’ के संपादन कार्य के सिलसिले में कलकत्ते बुलाए गए। लेकिन वहाँ अंधपरंपरा का राज था। इस कारण उस कार्यालय में गुप्तजी नहीं ठहर सके। बात यह हुई कि उन दिनों व्याख्यान-वाचस्पति पंडित दीनदयाल शर्मा हिंदी के अद्वितीय वक्ता थे। जब वे कलकत्ते पधारे तब गुप्तजी ‘हिंदी बंगवासी’ के संपादक थे। पंडित दीनदयाल शर्मा के व्याख्यानों से कलकत्ते के धनीमानी मारवाड़ी सज्जनों का आसन डोला और सनातन धर्म की उन्नति में जी खोलकर तन, मन, धन से बड़े-बड़े धनी मारवाड़ी उतारू हो गए। ‘बंगवासी’ के मालिक उन दिनों कलकत्ते में ‘धर्मभवन’ बनवाने पर तुले हुए थे। व्याख्यान-वाचस्पति में धर्म भवनवालों की पटरी नहीं बैठी। गुप्तजी ने पंडित दीनदयालजी का विरोध करने से इनकार कर दिया, इसी से उनको बंगवासी कार्यालय छोड़ देना पड़ा।

जब गुप्तजी वहाँ से अलग हुए, कलकत्ते के सदुद्योगी बाबू जगन्नाथदास ने उसी समय ‘भारतमित्र’ का संपादन भार गुप्तजी को सौंपना चाहा, लेकिन गुप्तजी ने इस तरह एक साप्ताहिक हिंदी को छोड़कर दूसरे को हाथ में लेना अपनी मर्यादा के बाहर समझकर अनुचित बतलाया और कहा कि घर जाते हैं, वहाँ से आपकी बुलाहट होगी तो मैं आ जाऊँगा।

वही बात हुई। घर पहुँचते ही गुप्तजी को ‘भारत मित्र’ के मालिकों की बुलाहट गई। गुप्तजी ‘भारत मित्र’ का संपादन-भार लेकर फिर कलकत्ते लौटे।

गुप्तजी ने ‘भारत मित्र’ को ऐसा उन्नत किया, जैसा वह अपनी चालीस वर्ष की जिंदगी में कभी लोकप्रिय नहीं हुआ था। ‘भारत मित्र’ एक सुधारक पत्र था, लेकिन सनातनी सिद्धांत का शत्रु नहीं था। गुप्तजी ने उसकी नीति किसी पक्ष पर नहीं, सत्य पर रखी और दो टूक न्याय की बात कहना उन्होंने अपना सिद्धांत रखा। इस कारण सब पक्ष के लोगों से ‘भारत मित्र’ की बड़ी मर्यादा बढ़ी। गुप्तजी व्यंग्यभरी कविता भी ‘भारत मित्र’ में समय-समय पर लिखते थे। उनकी बहुत सी कविताओं का संग्रह ‘स्फुट कविता’ के नाम से भारत मित्र प्रेस में निकला था। उनके भारत मित्र में आने से पहले पंडित रुद्रदत्त शर्मा ‘भारत मित्र’ के संपादक थे। उनके लेखों से ‘भारत मित्र’ के सनातनधर्मी पाठक बहुत हट गए थे। गुप्तजी की निर्भीक और निष्पक्ष लेखनी से सब प्रसन्न हो गए और ‘भारत मित्र’ का प्रचार खूब बढ़ा। गुप्तजी हमारे ऊपर बड़ी कृपा रखते थे। वे अपने लड़के बाबू नवल किशोर की शादी में जब घर गए, तब ‘भारत मित्र’ का संपादन भार कुछ महीनों के लिए हमको ही देकर गए थे। हमारे ऊपर जैसा उनका स्नेह था, वैसा ही हमारा विश्वास भी वे करते थे।

गुप्तजी हँसोड़ इतने थे कि बात-बात में दिल्लगी किया करते थे। उर्दू लिखावट की बड़ी खिल्ली उड़ाया करते थे। जब ‘अभ्युदय’ निकला, तब उन्होंने कहा था कि उर्दू वह लिखा जाए तो ‘ओबेहूदे’ पढ़ा जाएगा। उन दिनों ‘भारत मित्र’ ऑफिस में अच्छे-अच्छे सुलेखकों का जमाव था। ‘उचित वक्ता’ के संपादक पंडित दुर्गा प्रसाद मित्र सारस्वत हिंदी लेखकों के सिरताज तथा सबके श्रद्धाभाजन थे। वे भी वहाँ पधारकर दो घड़ी की मौज दे देते थे। गुप्तजी और पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदीजी में बड़ी आवाजकशी होती थी। चतुर्वेदीजी हास-परिहास के प्रेमी थे, गुप्तजी भी उसी तरह के परिहास-प्रिय थे।

गुप्तजी कभी-कभी ऐसी गहरी दिल्लगी करते थे कि उसका मतलब समझ में नहीं आता था। तब उनको स्पष्ट कहकर समझाना भी पड़ता था। हमसे ऐसा कई बार हुआ था। गुप्तजी होली में दिल खोलकर अखबारों से दिल्लगी करते थे और दशहरे के अवसर पर भी ‘टेसू आए’ लिखकर हिंदी पत्रों में टेसू की दिल्लगी किया करते थे। उनके पहले किसी ने कभी हिंदी में टेसू पर दिल्लगी नहीं की थी। समालोचना भी दशहरा और होली के समय गुप्तजी बड़ी बेढ़ब लिखते थे।

गुप्तजी की दिल्लगी व्यक्तिगत होकर भी एक श्लेष भरी होती थी कि व्यक्तिगत नहीं होने पाती थी। जिसके ऊपर बोली बोलते और दिल्लगी बनाते थे, वह भी हँसने लगता था। वस्तुतः दिल्लगी का अर्थ यही है कि जिससे दिल्लगी की जाए, उसको भी हँसी आवे। ऐसी दिल्लगी जिससे हँसने के स्थान पर रुलाई आवे या अदालत में मानहानि की नौबत हो, वह दिल्लगी काहे की, वह तो राह चलते भले मानस की पगड़ी उतारने के समान होती है।

गुप्तजी की लेखनी में बड़ा बल था। जिस विषय को लेते थे, उसको जिस तेजी से आरंभ करते थे, अंत तक उसी ओज से ले आते थे। कलकत्ते के ठाकुर घराने की धनी, शिक्षित और शिष्टजनों में बडी मान-मर्यादा है। एक माननीय ठाकुर ने ‘अश्रुमती’ नाम का एक नाटक लिखा था, जिसमें राजपूत महिलाओं पर गर्हित आक्षेप था। उसका अनुवाद भारत जीवन के बाबू रामकृष्ण वर्मा ने छापा। उसको देखकर गुप्तजी बहुत बिगडे़ और उसकी बहुत कड़ी आलोचना की। अंत में बाबू रामकृष्ण वर्मा को उस पुस्तक को गंगा प्रवाह करके प्रायश्चित्त करना पड़ा। एक घटना हिंदी साहित्य में उसके सिवा और कोई सुनने को नहीं आई। भूल सबसे होती है, लेकिन भूल कबूल करके प्रायश्चित्त करना बहुत बड़े हृदय का काम है। और वस्तुतः भूल का दंड भी यही है कि भूल कबूल कर ली जाए। बाबू रामकृष्ण वर्मा ने उस भूल को कबूल करके उचित सफाई दी थी।

जो नेता लोग दिखोआ ठाठ रखते और नाम पैदा करने के लोभ में ही देशहित के कार्यों की ओर मन नहीं देते थे, उनपर अपने पत्र में समय-समय पर आक्षेप किया करते थे। वे धर्म के ढकोसले कुछ नहीं करते थे। धर्म के नाम पर ढोंग करनेवालों की चालें वे खूब समझते और उनपर दशहरे एवं होली के अवसर पर गद्य तथा पद्य में व्यंग्य लिखकर मन का गुबार निकाला करते थे। यह भी कहा करते थे कि मनु ने जो मेंड़ें तैयार की हैं, उनको तोड़नेवाली बाढ़ कभी आवेगी?

गुप्तजी हरियाणे के रहनेवाले थे। इस देश की गायों को देखकर बहुत दुखी हुआ करते थे। इसका बड़ा पश्चात्ताप करते थे कि जहाँ से यह रत्न दुहा करते हैं, उस भंडार के कल्याण का कुछ ध्यान रखते तो यह मैयारूपिणी गैया इस तरह दीन-दशा में जीवन न बिताती।

अफसोस! गुप्तजी बहुत जल्दी अकाल में ही संसार से उठ गए। उनको प्रमेह रोग था, जो सन् १९०८ में इतना प्रबल हुआ कि बहुत उपचार करने पर भी शांत नहीं हुआ। उसी पीड़ा में गुप्तजी को लाचार होकर घर जाना पड़ा और घर पहुँचने के बाद उनका देहावसान हो गया।

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