मोदी की दिग्विजय : पाँच राज्यों के चुनाव

हाल ही में पाँच राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर की विधानसभाओं के चुनाव संपन्न हो गए। एक राज्य के चुनाव-नतीजे दूसरे राज्यों के चुनावों को प्रभावित न करें, इसलिए एक साथ ही ११ मार्च को सभी राज्यों के नतीजे घोषित हुए। ९ मार्च को चुनाव का रुझान बतानेवाली एजेंसियों को इजाजत मिल गई थी कि वे अपने चुनावी आकलन प्रकाशित कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश क्षेत्रफल और आबादी की दृष्टि से एक बड़ा राज्य है। सात चरणों में चुनाव कराने की कुछ लोगों ने आलोचना की, क्योंकि उत्तराखंड, पंजाब और गोवा के नतीजों के लिए वहाँ की जनता को करीब एक महीने इंतजार करना पड़ा। चुनाव आयुक्त ने उसके उत्तर में स्पष्ट किया कि चूँकि केंद्रीय पुलिस बलों के ऊपर ही राजनीतिक पार्टियों का विश्वास है, अतएव यदि उनके द्वारा बंदोबस्त कराना है तो ऐसी व्यवस्था अनिवार्य है। चुनावी मैदान में आए राजनीतिक दलों को राज्य की पुलिस पर विश्वास नहीं रह गया है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करा सकती है। वह किसी-न-किसी प्रकार से सत्तारूढ़ दल के दबाव में रहती है। हमारी राजनीतिक, शासकीय व्यवस्था और उसकी नैतिकता तथा विश्वसनीयता पर यह एक कलंक है। चुनाव आयोग बधाई का पात्र है। कुछ छुटपुट घटनाओं को छोड़कर पाँचों राज्यों में चुनाव शांतिपूर्ण रहा। कुल मिलाकर जनता की भागीदारी भी अच्छी रही।

उत्तर प्रदेश के नतीजों ने, विशेषतया भाजपा की अभूतपूर्व सफलता ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। विधानसभा की ४०३ सीटों में से भाजपा के ३२४ प्रत्याशी सफल रहे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों और सर्वे करनेवाली एजेंसियों के पूर्व अनुमान कुछ हद तक सही रहे, पर भाजपा की उत्तर प्रदेश में इतनी बड़ी जीत होगी, यह अनुमान एक-दो टी.वी. चैनल ही कर सके। सपा-कांग्रेस गठबंधन को ५९, बसपा को १८ और अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोक दल को एक सीट प्राप्त हुई। विरोधी दल हतप्रभ रह गए। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि यह कैसे हो गया! चुनाव के पहले कांग्रेस और सपा अलग-अलग चुनाव लड़नेवाले थे, पर दोनों को समझ आई कि यदि गठबंधन हो जाए तो शायद गठबंधन आगे रहेगा। कांग्रेस ने लड़-झगड़कर अपने लिए १०३ सीटें अखिलेश से ले लीं। पर जीत केवल सात सीटों पर हुई। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जमीनी संगठन लुप्तप्राय है। केवल नेता-ही-नेता हैं, जो एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं देख सकते। राहुल गांधी का नेतृत्व न उच्च वर्गों को और न तथाकथित नीचे तबकों को ही प्रभावित कर सका। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया, ताकि ब्राह्मण और अन्य उच्च जातियों के मत मिल सकें। गठबंधन होते ही कांग्रेस उन्हें भूल गई। वे भी दिल्ली आकर बैठ गईं।

सपा और कांग्रेस गठबंधन की जनसभाओं में एक बात अच्छी हुई कि कन्नौज की सांसद और अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव के व्यक्तित्व को कुछ खुलने का अवसर मिला। उनके क्षेत्र के लोग उन्हें गूँगी गुडि़या ही समझते थे। कुछ सभाओं में चाहे सहमते-झिझकते हुए ही सही, मुँह खोला और गठबंधन के लिए वोट माँगते हुए कुछ कहा भी। पिछले कुछ समय से अखिलेश सपा की यादववादी छवि से अपने को अलग करने की कोशिश कर रहे थे। विकास के मुद्दे को उठाकर उन्होंने कुछ अच्छे काम शुरू भी किए, हालाँकि फाउंडेशन स्टोन और अपूर्ण कार्यों के उद्घाटन ही अधिक रहे, क्योंकि चुनाव का समय नजदीक आ रहा था। अखिलेश को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में पिता की विरासत जब मिल गई तो उन्होंने कोशिश करनी चाही कि वे परिवारवाद और यादवों एवं मुसलिम वोट बैंक से ऊपर उठकर राज्य के सभी वर्गों के नेता के रूप में अपने को पेश करें। आजम खाँ और शिवपाल के रहते यह संभव हो ही नहीं सकता था, और फिर जनसभाओं में मुलायम सिंह की प्रताड़ना ने उनके पद और व्यक्तित्व को उभरने नहीं दिया। उनमें कुछ खूबियाँ हैं, संभावनाएँ हैं। मुद्दों को सामने रखकर और केवल यादवी राज्य के रक्षक व मुसलिम मतों के हकदार न होकर सभी के हित को ध्यान में रखकर सपा को पुनर्गठित और विकसित करने का प्रयास करें तो संभवतया भविष्य में उत्तर प्रदेश के एक सुविचारित जननेता के रूप में उनकी मान्यता स्वयमेव हो सकती है।

उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासन में जनता का विश्वास डाँवाँडोल था। आततायी कोई भी हो, गुंडागीरी किसी भी समुदाय की हो, चाहे वह अपना समर्थक ही क्यों न हो, प्रशासन उसका संरक्षण नहीं कर सकता। दबाव में प्रजापति जैसे भ्रष्ट मंत्री को पुनः मंत्री बना देना, इसका संदेश जनता में अच्छा नहीं गया। जिस प्रजापति के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय के कहने पर बलात्कार की प्राथमिकी पुलिस द्वारा दर्ज हो और उसके बाद भी वह मंत्री बना रहे, सरकारी सुविधाएँ लेता रहे, यह कहाँ तक उचित है? इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश की पुलिस जहाँ आजम खाँ की भैंसों की पहचान कर दो दिनों में वापस ला सकती है, वही पुलिस प्रजापति को जब अमेठी में प्रत्याशी के तौर पर वोट डालने गया, फोटो छपी, तो भी उसको पकड़ नहीं सकी। सत्ता-परिवर्तन के डर से प्रजापति इतने समय बाद लखनऊ में ही पकड़ा गया। सपा और कांग्रेस का गठबंधन होते हुए भी अमेठी में दोनों का दोस्ताना युद्ध हो रहा था। मुख्यमंत्री अखिलेश चुनाव प्रचार के लिए अमेठी गए, पर प्रजापति का नाम नहीं लिया, क्योंकि वे जनता का रुझान जान गए थे। आखिर किस मुँह से प्रजापति का नाम लेकर वोट माँगते, जब कुछ महीने पहले उसको मंत्रिमंडल से हटा दिया था, पर उसके संरक्षक मुलायम सिंह के कहने-सुनने पर फिर मंत्री बना दिया था। २०१४ के लोकसभा चुनाव में सपा केवल सैफई यादव परिवार के अपने पाँच प्रत्याशियों को जिता सकी, पर विधानसभा में छोटी बहू अपर्णा के साथ-साथ लालू यादव के दामाद और मुलायम सिंह के भतीजे सिकंदराबाद से हार गए—लालू यादव के प्रचार के बावजूद। अखिलेश ने चुनाव नहीं लड़ा, वह विधान परिषद् के सदस्य हैं। वहाँ कार्यकाल समाप्त होने तक बने रहेंगे। २०१९ में सपा की स्थिति क्या होगी, यह भविष्य के गर्भ में है। चाहे प्रत्यक्ष चाहे परोक्ष रूप में असामाजिक तत्त्वों को संरक्षण मिलने से सत्ताधिकारियों की नीयत और चरित्र से जनता आश्वस्त नहीं हो सकती है। ऐसी ही बातों का खामियाजा अखिलेश को भुगतना पड़ा। अपनी नई छवि बनाने की कोशिश में भी साधारण जनता को यही लगा कि इनके अनुयायी अभी तक वही हैं, जो कल तक असामाजिक कार्यों में लिप्त थे। एक नेता का कर्तव्य है कि वह अपने सहयोगियों और अनुयायियों को अनुशासित करने की क्षमता रखता हो।

सपा और कांग्रेस का प्यारा सपना तो टूटा ही, बहुजन समाज पार्टी की भी दुर्गति हुई। वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। कहा जा रहा था कि बसपा की अध्यक्ष मायावती ने, जिन्हें उनके अनुयायी ‘बहनजी’ पुकारते हैं, उसके तुरंत बाद विधानसभा-२०१७ के चुनावों के लिए तैयारी शुरू कर दी थी—बहुत ही सुविचारित और वैज्ञानिक ढंग से। पूरी पार्टी में भारी रद्दो-बदल की गई। मुसलिम मतदाताओं को साधने के लिए अनेक योजनाएँ बनीं। सतीशचंद्र मिश्र तो निरंतर जगह-जगह ब्राह्मण मतदाताओं से संपर्क बनाए हुए थे। मायावती भी एक पूर्व निश्चित योजना के अनुसार कहीं-कहीं उनको संबोधित करने भी जाती थीं। उन्होंने साल भर पहले से ही सभी चुनाव क्षेत्रों के लिए उपयुक्त प्रत्याशी भी निश्चित कर दिए थे, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्र में जनसंपर्क प्रारंभ कर दें और अपनी रणनीति बना लें कि किस प्रकार से मतदाताओं का वोट डालने आना आसान हो सके। प्रत्याशियों का परिवर्तन समय-समय पर मायावती ने किया। बसपा के कुछ शीर्ष नेताओं से उनका विरोध हुआ और कई पुराने, विश्वासपात्र एवं कद्दावर नेता अन्य दलों में चले गए, खासकर भाजपा में। उन्हें शायद जमीनी हकीकत की भनक लग रही थी। बसपा छोड़नेवाले नेताओं ने जनसभाओं में यह आरोप लगाया कि मायावती करोड़ों रुपए इकट्ठा कर रही हैं, टिकट देने के पहले रुपए की माँग होती है। मायावती ने इसे नकारा और कहा कि वे पार्टी को नुकसान पहुँचा रहे थे या अपने रिश्तेदारों के लिए टिकट माँग रहे थे, इसलिए निकाला, पर उनके समर्थकों को भी इस पर विश्वास नहीं हो सका। जो भी हो, इससे कुछ-न-कुछ भ्रम उनके समर्थकों में अवश्य पैदा हुआ।

भाजपा के प्रत्याशी बनकर कई पूर्व बसपा नेता विजयी हुए हैं। मायावती को पूरी उम्मीद थी कि जाटव तो उनकी सहजाति के होने के कारण एकमुश्त वोट देंगे ही। इसके साथ-साथ उन्हें आशा थी कि मुसलिम वोट भी इसी प्रकार उनके साथ ही आएगा। इसकी एक वजह थी कि मुलायम सिंह ने स्वयं एक बार कहा था कि अखिलेश ने मुसलिमों की अनदेखी की है। दूसरा कदम उन्होंने यह उठाया कि बसपा ने करीब सौ मुसलमानों को पार्टी का प्रत्याशी बनाया और इसका खूब प्रचार भी किया मुसलिम मतदाताओं को रिझाने के लिए। उनका तथाकथित सेकुलरिज्म (अल्पसंख्यकवाद) मुसलिम तुष्टीकरण में परिवर्तित हो गया। जनता यह देख और समझ रही थी। मीडिया में भी यह भ्रम था कि उत्तर प्रदेश में टक्कर इस बार बसपा और भाजपा में होगी। इसलिए चुनावी नतीजे आने पर मायावती भी सपा और कांग्रेस के साथ हतप्रभ हो गई। बसपा के केवल १९ प्रत्याशी ही विजयी हुए। २०१२ की हार के बाद मायावती उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्य विरोधी दल के रूप में न बैठकर राज्यसभा में दिल्ली आ गईं। अब एक कठिनाई यह भी है कि २०१८ में राज्यसभा में उनका कार्यकाल समाप्त हो रहा है। १९ वोटों के आधार पर वे राज्यसभा में भी पुनः नहीं जा सकतीं। उसके लिए करीब ४० मतों की आवश्यकता होगी। पंजाब में जहाँ सबसे अधिक संख्या दलितों की है, वहाँ भी बसपा को कुछ सफलता नहीं मिली। चुनावी नतीजों के दौरान जब भाजपा की बढ़त दिखाई देने लगी, तब अखिलेश ने बी.बी.सी. से एक साक्षात्कार में कह दिया कि भाजपा को रोकने के लिए वह बसपा से गठबंधन करने को तैयार हैं और उनके दिल में ‘बुआजी’ यानी मायावती के लिए बहुत आदर है। मायावती ने भी कहा कि समय आने पर इस पर विचार करेंगी। हालाँकि जिस प्रकार मायावती को लखनऊ में सपावालों ने प्रताडि़त किया था, उनके लिए इसे भूलना आसान नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय में मुलायम सिंह आदि के खिलाफ इस विषय में एक मामला लंबित है।

बहरहाल इस समय भाजपा की अप्रत्याशित जीत से किसी प्रकार का गठबंधन बेमानी है। आशा और आकांक्षाओं के विपरीत उन्होंने अपनी इतनी बड़ी हार की जिम्मेदारी ईवीएम मशीनों पर डाल दी है। २००७ में इन्ही ईवीएम के द्वारा वे चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनी थीं, तब उनको कोई शिकायत नहीं थी। मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनकी बात का जोरदार खंडन किया और कहा कि मशीनों में कोई खराबी नहीं है और नतीजे बिल्कुल सही हैं। मायावती ने भाजपा को चैलेंज किया है कि वह बैलटपेपर के द्वारा पुनः चुनाव कराए। चुनाव बच्चों का खेल नहीं है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में जाने की धमकी दी है कि उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे निरस्त किए जाएँ। आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष केजरीवाल भी उनके सुर में सुर मिलाकर कह रहे हैं कि पंजाब में उनके करीब २५ प्रतिशत वोट ईवीएम के कारण शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के गठबंधन को चले गए। जब दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल तीन सीटें मिलीं, सत्तादल कांग्रेस का सफाया हो गया और आम आदमी पार्टी ने ६७ सीटें जीतीं तो उन्हें ईवीएम में कोई खराबी नहीं दिखाई दी। उन्होंने राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त से कहा है कि दिल्ली के नगर निगम के चुनाव मतपत्र द्वारा कराए जाएँ। इसके लिए उपराज्यपाल को नियमों में बदलाव करना होगा। उनके अनुसार अब समय नहीं है। ईवीएम के द्वारा चुनाव की सभी तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। मजे की बात यह है कि दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष माकन ने भी यही माँग रखी है। जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया तो भी उन्होंने यह प्रश्न नहीं उठाया था कि बैलटपेपर द्वारा चुनाव होना चाहिए। पंजाब विधानसभा के चुनाव में, जहाँ कांग्रेस जीती है, कैप्टेन अमरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री बने हैं, आम आदमी पार्टी हारी, क्या वहाँ ईवीएम सही थे। अमरेंद्र सिंह ने स्वयं कहा है कि ईवीएम मशीनों में कोई खराबी नहीं है। मायावती का रोना लालू यादव का भी रोना हो गया है। वह भी बाँग लगा रहे हैं चुनावी मशीनें खराब हैं, मतपत्र द्वारा चुनाव होना चाहिए। जब बिहार में नीतीश से गठबंधन कर वे जीते तब उन्हें ईवीएम मशीनों से कोई शिकायत नहीं थी। जहाँ अपनी जीत, वहाँ मशीन द्वारा चुनाव ठीक, जहाँ हार हो तो मशीनें दोषी। यह बौखलाहट की निशानी है। बसपा, सपा और कांग्रेस को कुछ समझ ही नहीं आ रहा है कि क्या करें, तो यह नया शगूफा छोड़ दिया। इसे कहते हैं खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के अंदर तलवारें खिंच गई हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चिदंबरम ने यह माना है कि मोदी भारत के एक ‘प्रभावी व्यक्तित्व’ हैं और उनकी मान्यता पूरे भारत में है। बहत्तर घंटे की चुप्पी के बाद राहुल गांधी ने कहा कि चुनाव में थोड़ा नुकसान हुआ है, यह होता रहता है, पर हार की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। यह पार्टी की सामूहिक जिम्मेदारी है। कमलनाथ, जो लोकसभा में कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं, उन्होंने पार्टी की सर्जरी की आवश्यकता बताई। कांग्रेस के राज्यसभा के वरिष्ठ सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी ने कहा कि कार्डियक सर्जरी की आवश्यकता है। मणि शंकर कहते हैं, २०१९ में कांग्रेस अकेले मोदी का मुकाबला नहीं कर सकती है। कांग्रेस में आंतरिक असंतोष है। सोनिया और राहुल के नेतृत्व से विश्वास उठ गया है, पर उपाय और है क्या! बहुत से टिप्पणीकारों ने लिखा है कि नेहरू-गांधी परिवार के बाहर ही कांग्रेस को सक्रिय करने के लिए विकल्प खोजना पड़ेगा। दिक्कत यह है कि कांग्रेस में सभी अपने को श्रेष्ठ नेता मानते हैं। गांधी-नेहरू परिवार का नाम उनको जोड़े हुए है। राहुल गांधी का एक अपना गुट है। वरिष्ठ सलाहकार तो राहुल की निर्णयात्मक क्षमता के अभाव को हार का कारण ठहराते हैं। २०१४ के लोकसभा चुनाव के बाद आशा थी, बात भी चली थी कि कांग्रेस में एक बड़े स्तर पर ढाँचा एवं कार्यप्रणाली में मौलिक सुधार होंगे। पर इसमें आत्ममंथन की प्रक्रिया न कभी पूरी हुई, और न होगी। सोनिया अपने स्वास्थ्य के कारण सक्रिय नहीं हैं, वह अमेरिका में हैं। राहुल पर पूरा दायित्व छोड़ दिया है। पंजाब में शपथ ग्रहण समारोह के बाद राहुल गांधी अमेरिका चले गए। कांग्रेसी नेता बयानबाजी में लगे हैं या गुपचुप एक-दूसरे के खिलाफ संवाददाताओं को कहते रहते हैं। गांधी परिवार सर्वोपरि है, म्याऊँ के गले में घंटी बाँधने की हिम्मत किसमें हैं?

पंजाब के मंत्रिमंडल के गठन में अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिंह सिद्धू को उनकी हैसियत बता दी। वे चुनाव के समय बहुत फिरकते थे, सोनिया और राहुल की बात-बात में दुहाई देते थे और आश्वस्त थे कि कम-से-कम उपमुख्यमंत्री अवश्य बनाए जाएँगे। मंत्रियों की वरिष्ठता की सूची में क्रमानुसार वे तीसरे नंबर पर हैं। उपमुख्यमंत्री का पद तो आकाश के तारे सा हो गया। सिद्धू कहते हैं कि वे अपना कॉमेडी शो टी.वी. पर जारी रखेंगे। मंत्री का दायित्व पूर्णकालिक होता है। कई विभाग उनके पास हैं। दिन में मंत्री और रात में मसखरे की भूमिका, क्या यह उचित है? केजरीवाल और कांग्रेस में सम्मिलित होने की उनकी सौदाबाजी अपने में ही एक कॉमेडी थी। मंत्री बनकर क्या लोकतंत्र का मखौल उड़ाना चाहते हैं।

पंजाब के चुनाव में कांग्रेस विजयी रही। वास्तव में पंजाब के चुनाव का श्रेय अमरिंदर सिंह को ही है। लोकसभा से इस्तीफा देकर वे पंजाब में जम गए। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बहुत बाद में कहा कि वही मुख्यमंत्री के पद के दावेदार हैं। पंजाब का चुनाव अमरिंदर सिंह के बल पर जीते हैं। शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के हारने के आसार काफी समय से दिखाई पड़ रहे थे। पंजाब में भाजपा छुटभैया की हैसियत रखती थी। भ्रष्टाचार, ड्रग स्मगलिंग, प्रशासन पर व्यापारीकरण व निष्क्रियता के आरोप बहुत पहले से लग रहे थे, पर मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके पुत्र उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह ने उनकी तीव्रता और गहराई को नहीं समझा। वे नकारते रहे। इसके साथ १० वर्ष सत्ता में रहने का असंतोष का वातावरण तो था ही। बेरोजगारी की समस्या सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती जा रही थी। आँकड़ों के द्वारा या कुछ बड़े-बड़े आयोजन करके जनता को अब भरमाया नहीं जा सकता है। प्रश्न है अनुभूति का, जनता को क्या जँच गया है। उसको समझने और उसको बदलने के कोई प्रभावी प्रयास किए ही नहीं गए। अकाली दल-भाजपा गठबंधन को १८ सीटें मिल गईं, यही एक बड़ी उपलब्धि है, टीवी के आकलन तो ५-७ से ऊपर जा ही नहीं रहे थे।

यदि वे पुरानी सार्थकता को पाना चाहते हैं तो शिरोमणि अकाली दल को अपने को पूरी तरह से नवीनीकरण से गुजारना होगा। भाजपा को भी पंजाब में अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना होगा। उसकी अस्मिता स्वतंत्र रूप में भी प्रदर्शित होनी चाहिए। विरोध पक्ष में रहकर शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का गठबंधन कितना सक्रिय और मुखर रहता है, यह देखना है। दूसरे नंबर पर आम आदमी पार्टी है, उसका व्यवहार कैसा होगा, यह कहा नहीं जा सकता। केजरीवाल और उनके सहयोगियों ने ऐसा वातावरण बना दिया था कि उन्हीं की पार्टी सरकार बनाएगी। जबकि उनका जमीनी संगठन कोई था ही नहीं। आपसी मतभेद भी चुनाव के पहले से ही उभरने लगे थे। कनाडा से उनके समर्थक आने से आम आदमी पार्टी की हवा और भी बन गई। पंजाब और गोवा में उनका सरकार बनाने का दावा था। पंजाब में अमरिंदर सिंह ने उनकी उम्मीदें चकनाचूर कर दीं। जब दिल्ली बीमारियों से ग्रस्त थी, आम आदमी पार्टी के मंत्री गोवा में प्रचार में व्यस्त थे। वहाँ तो केजरीवाल को अड्डा मिला। उनके मुख्यमंत्री के प्रत्याशी के साथ-साथ ३९ प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। चुनावी घोषणा के दिन तक केजरीवाल दोनों राज्यों में जीत के प्रति आश्वस्त थे। ११ मार्च के दिन जब नतीजे आने थे, मुख्यमंत्री केजरीवाल के आवास पर जश्न का माहौल था। गुब्बारों, पटाखों और मिठाइयों का पूरा इंतजाम था, नतीजे आने के बाद बाजे-गाजे सब बंद होने लगे। शामियाना और गुब्बारे उतार लिये गए। वहाँ उपस्थित नेताओं के चेहरे भी उतर गए। आजकल अनाप-शनाप बातें करने, अराजकता फैलाने और अभद्र शब्दों के प्रयोग तथा नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिन-रात गाली देने से वोट नहीं मिलते। आम आदमी के नाम का दोहन करनेवाले नेताओं को अपनी हैसियत का एहसास हो गया। काठ की हाँड़ी दुबारा आग पर नहीं चढ़ती है। दिल्ली में अपने को सीमित न रखकर वह अभी कुछ अन्य राज्यों में चुनाव लड़ने के ख्वाब सँजोए हुए हैं। केजरीवाल २०१९ में प्रधानमंत्री की अपनी दावेदारी नहीं छोड़ना चाहते हैं। हम तो भगवान् से उनकी सद्बुद्धि की ही कामना कर सकते हैं।

उत्तराखंड

उत्तराखंड के नतीजे संकेत देते हैं कि उत्तराखंड में भी कांग्रेस का अस्तित्व केवल नाममात्र का रह गया है। पिछले साल हरीश रावत की सरकार बजट सत्र के समय जब उनके दल के सदस्यों ने, जिनमें कुछ मंत्री शामिल थे, सरकार के विरोध में मत दिया, तब सरकार के बहुमत पर प्रश्नचिह्न लग गया, किंतु विधानसभा अध्यक्ष की कृपा से वे बच गए। जल्दबाजी में राष्ट्रपति शासन से उनको निजात मिली। उत्तराखंड उच्च न्यायालय और उसके उपरांत सर्वोच्च न्यायालय से, उसी समय वे एक स्टिंग ऑपरेशन में फँस गए, जिसकी सी.बी.आई. जाँच चल रही है। अंटी इनकंबेंसी और हरीश रावत सरकार से असंतुष्ट स्वरों की भनक आ रही थी। हरीश रावत विरले मुख्यमंत्री हैं, जो दो सीटों से चुनाव लडे़ और हार गए। अब की बार बसपा कहीं पिक्चर में नहीं थी। चुनावी युद्ध कांग्रेस और भाजपा के बीच था। भाजपा के ५७ प्रत्याशी विजयी हुए, कांग्रेस के केवल ११ और अन्य दो। जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का भाग था, तब भी वहाँ विकास और समस्याओं पर उत्तर प्रदेश सरकार का पूरा ध्यान नहीं गया, यद्यपि उस समय संयुक्त प्रांत के पहले प्रधानमंत्री (जो अब मुख्यमंत्री कहलाते हैं) पं. गोविंद वल्लभ पंत अल्मोड़ा से मुख्यमंत्री रहे, पर इस क्षेत्र की समस्याओं का निदान नहीं निकाला। तिवारीजी अब भाजपा में हैं और उनका पुत्र भाजपा का प्रत्याशी होकर विजयी हुआ है। उत्तराखंड बनने के बाद भी जो सरकारें बनीं, चाहे भाजपा की और चाहे कांग्रेस की, दोनों में मुख्यमंत्रियों की जल्दी-जल्दी अदल-बदल होती रही। फल यही रहा—वहाँ की मूल समस्याओं की अनदेखी और योजनाओं का असंतोषजनक कार्यान्वयन। अब त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है। आशा है कि उनकी सरकार स्थिर होगी। उत्तराखंड कूटनीतिक दृष्टि से बहुत संवेदनशील है, क्योंकि उसकी सीमा तिब्बत से मिलती है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व राजनैतिक दृष्टि से, सुशासन और विकास की दृष्टि से निगरानी भी रखे और मार्गदर्शन भी प्रदान करे, ताकि नरेंद्र मोदी और भाजपा को जो जनादेश मिला है, वह पूरा हो सके।

मणिपुर

मणिपुर में भाजपा को २१ सीटें मिलीं। यह आश्चर्यजनक था, क्योंकि अभी तक भाजपा का एक भी सदस्य विधानसभा में नहीं था। कांग्रेस के २८ प्रत्याशी जीते और पूर्व मंत्री इबोबी सिंह उम्मीद कर रहे थे कि दो-तीन और सदस्यों को लेकर वे चौथी बार कांग्रेस की सरकार बनाएँगे। नागा पीपुल्स फ्रंट से तो भाजपा के साथ पहले से अनौपचारिक समझौता था। नेशनल पीपुल्स पार्टी, जिसे स्व. पी.ए. संगमा ने स्थापित किया था, पहले से ही नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस भी भाजपा को समर्थन देने को तैयार था। तृणमूल के एक लजेपी के एक और एक निर्दलीय को अपनी ओर कर लिया। यही नहीं, कांग्रेस के एक सदस्य श्याम कुमार भी भाजपा का साथ देने को तैयार हो गए। अब ३३ का स्पष्ट बहुमत भाजपा के पक्ष में था और राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला ने भाजपा संसदीय दल के नवनिर्वाचित नेता एन. विरेन सिंह को सरकार बनाने को आमंत्रित किया और उन्होंने शपथ ग्रहण कर विश्वास मत भी प्राप्त कर लिया। विवाद कांग्रेस ने उठाया कि उनके ज्यादा सदस्य थे, उनको पहले बुलाया जाना चाहिए था। इस पर बाद को विचार करेंगे कि गवर्नर को अपने विवेक का किस प्रकार उपयोग करना चाहिए। हमारी यह मान्यता है कि मणिपुर के राज्यपाल ने इन परिस्थितियों में सही कदम उठाया। मणिपुर और उत्तरी-पूर्वी राज्यों की जातीय या ethnic समस्याएँ बहुत हैं। मेती और नागाओं में मतभेद है। भ्रष्टाचार बहुत है। सीमा के राज्य होने से आतंकवादी और उग्रवादी दल सक्रिय हैं; क्योंकि वे म्याँमार, चीन और कभी भूटान में छिपते हैं; विकास बाधित होता है। भजपा को यहाँ भी राजनैतिक और विकास की दृष्टि से विशेष देखभाल करनी होगी, ताकि स्थिर होकर भाजपा सरकार कार्य कर सके। कम-से-कम चार महीने का मणिपुर बंद तो अब हट ही रहा है, जैसा प्रधानमंत्री ने कहा था।

गोवा

गोवा में २०१२ में पर्रिकर के नेतृत्व में विधानसभा की ४० सीटों में से २१ पर विजय प्राप्त कर सरकार बना ली थी। पर्रिकर के केंद्र में रक्षा मंत्री के पद पर जाने के कारण भाजपा सरकार में शिथिलता आ गई। उनके बाद बने मुख्यमंत्री जनता से वांछनीय संबंध नहीं बना सके, विकास के कार्यों में सुस्ती आई, गोवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक इकाई सरकार की कुछ नीतियों के कारण अलग हो गई और उसने अपने प्रत्याशी खडे़ किए। इससे भाजपा को नुकसान हुआ। कुछ मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप थे और कुछ को अहंकार ने ग्रस्त कर लिया था। चुनाव के पहले पर्रिकर ने अच्छी कन्वेंसिंग की, पर वे जनता का पुराना विश्वास प्राप्त न कर सके। कांग्रेस को १७ और भाजपा को तेरह सीटों पर विजय प्राप्त हुई। पर्रिकर ने मुख्यमंत्री की शपथ ले ली। नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी, गोवा फॉरवर्ड और तीन निर्दलियों से सफल संपर्क साधा। वे समर्थन देने को तैयार तभी हुए जब भाजपा हाई कमांड ने स्वीकार किया कि रक्षामंत्री पद से इस्तीफा देकर पर्रिकर गोवा के मुख्यमंत्री बनेंगे। कांग्रेस में दिग्विजय सिंह के खिलाफ असंतोष हुआ कि उनकी ढील की वजह से कांग्रेस समय से दावेदारी पेश न कर सकी। कांग्रेस के नेता सर्वोच्च न्यायालय गए, पर न्यायालय ने कहा कि उनको अपना बहुमत समय से राज्यपाल के सामने प्रस्तुत करना था। सर्वोच्च न्यायालय ने १५ दिन में बहुमत सिद्ध करने की जगह केवल दो दिन का समय दिया और पर्रिकर ने बहुमत सिद्ध कर हारी बाजी जीत ली।

भाजपा की उत्तर प्रदेश की विजय को कुछ पत्रकारों ने मोदी या भगवा की सुनामी की संज्ञा दी है। इसमें शक नहीं कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उनके सहयोगियों ने अथक परिश्रम किया और उनकी रणनीति सफल रही। यह भी सिद्ध हुआ कि नरेंद्र मोदी का करिश्मा बरकरार है। वे जनता का विश्वास प्राप्त करने में सफल रहे हैं। नोटबंदी की कुछ कठिनाइयों को झेलते हुए मीडिया के प्रचार के बावजूद भी जनता ने उसे उचित माना। राहुल की तथाकथित आक्रोश रैली अनर्थक रही। ममता और मायावती का अपना आक्रोश भी धीरे-धीरे छूमंतर हो गया। खोदा पहाड़, निकली चुहिया। अब प्रचार किया जा रहा कि भाजपा ने एक भी मुसलिम को प्रत्याशी नहीं बनाया, उनकी बात कौन कहेगा। भाजपा का उत्तर है—‘सबका विकास, सबके साथ’। हाँ, एक सकारात्मक बात भी हुई है, जहाँ तथाकथित उदारवादी, बुद्धिवादी अल्पमत के हितों का झंडा उठानेवाले बनते हैं—कांग्रेस, सपा और बसपा, वहाँ मुसलिम बुद्धिवादियों में विचार आलोड़न हुआ है। उनका और युवाओं का कहना है—आपने बहुत दिनों हमें अपना वोट बैंक बनाया, अब आप रहम कीजिए और हमें अपने भाग्य पर छोड़ दीजिए। हमारे लिए क्या भला और बुरा है, हम स्वयं देख लेंगे। यह विजय मोदी की है या भाजपा की? ऐसे प्रश्न उठा रहे हैं। किसी दल की विजय पार्टी कार्यकर्ताओं के आपसी विश्वास और समन्वय पर निर्भर करती है। २०१४ में मोदी सरकार के आने पर डराया जा रहा था। इन तीन सालों में आकाश टूट नहीं पड़ा। उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी की सरकार बनने पर फिर भ्रम पैदा करने की कोशिश हो रही है कि सैफ्रॉन फायर ब्रांड (भगवा अग्निपुंज) आ गया है। न जाने क्या होगा। ये लोग भूल जाते हैं कि भाजपा का कोई भी मुख्यमंत्री संविधान के अंतर्गत, अपने दल के घोषणा-पत्र और सर्वोपरि नीति सबका साथ, सबका विकास के आदर्श के अनुसार ही नीतियाँ और कार्यक्रम बनाएगा। आदित्यनाथ योगी ने मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद अपनी प्राथमिकता में उनकी कार्यप्रणाली क्या ठहरेगी, इसको प्रमुखता से प्रस्तुत कर दिया है। अनगिनत समस्या ग्रस्त उत्तर प्रदेश के लिए आदित्यनाथ योगी जैसा मुख्यमंत्री ही प्रभावी हो सकता है। उत्तर प्रदेश के नतीजों ने नरेंद्र मोदी के विरोधियों में एक हताशा का माहौल पैदा किया है, जिसकी वजह से भाँति-भाँति के दिमागी भूत सामने आ रहे हैं। प्रधानमंत्री ने एक सभा में कहा है कि वे एक ‘नया भारत’ उदय होते देख रहे हैं, ऐसा भारत, जो प्रोत्साहित कर गरीब युवाओं को अवसर दे, ताकि वे देश पर गर्व कर सकें। यह उनकी आगे की कल्पना है। यह ध्यातव्य है कि प्रधानमंत्री मोदी का पूरा जोर युवाओं, महिलाओं, गाँवों और गरीबों पर रहा। भाजपा के संसद् सदस्यों की बैठक में मोदी ने कहा कि न वे स्वयं चैन से नहीं बैठेंगे और न दूसरों को बैठने देंगे। वे स्वामी विवेकानंद के चरैवेति, चरैवेति के उद्बोधन में विश्वास करते हैं। प्रधानमंत्री की यह एक महान् कल्पना और संकल्प॒है।

सुषमा स्वराज

हम सुषमा स्वराज के संसद् में उपस्थिति होने का स्वागत करते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से पिछले कई महीनों से वे एक गंभीर संघर्ष से गुजरी हैं। अपने आत्मिक बल और परमात्मा में अटूट विश्वास के सहारे ही उन्होंने कंटाकाकीर्ण मार्ग को पार किया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भरती होने पर उन्होंने सोशल मीडिया द्वारा जनसाधारण को सूचित कर दिया कि उनका डायलेसिस चल रहा है, उनको गुरदे की निष्क्रियता की शिकायत है, चिकित्सक दल गुरदा प्रत्यारोपण की आवश्कयता महसूस कर रहा है। उससे संबंधित प्रक्रियाओं की जाँच-पड़ताल में चिकित्सक दल व्यस्त है। उन्होंने अंत में कहा कि भगवान् कृष्ण सब ठीक करेंगे। यह उनके आत्मबल और परमशक्ति में श्रद्धा और विश्वास का परिचायक है। यह उनके व्यक्तित्व का एक पक्ष है। कितने राजनेताओं में इतना साहस है कि वे स्वयं अपने रोग की जानकारी दूसरों को इस प्रकार दें। सबका प्रयास तो अपनी बीमारी छिपाने का रहता है। एक महत्त्वपूर्ण पद पर रहने के कारण उन्होंने यह उचित समझा कि जनता को विश्वास में लें। यह उल्लेखनीय है कि बहुत से व्यक्तियों, जिनसे वे परिचित भी न थीं, ने अपनी किडनी देने को कहा, उन सबके प्रति अपना धन्यवाद प्रकट किया। सुषमाजी की किडनी का प्रत्यारोपण सफल हुआ, जिसके लिए चिकित्सक धन्यवाद के पात्र हैं। इस परिस्थिति में भी वे अपने मंत्रालय एवं पद के महती दायित्व के प्रति सजग थीं। विदेश मंत्रालय संबंधित किसी को कोई भी कठिनाई हुई और उनसे संपर्क किया तो उन्होंने उसके समाधान के लिए तुरंत आवश्यक कदम उठाए तथा परिवार के व्यक्ति विशेष को सूचित भी कर दिया। स्वस्थ होने के बाद जब वे संसद् में पहुँची, सब पक्ष के सदस्यों ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया और बधाई दी। इसी प्रकार का स्वागत राज्यसभा में भी हुआ, विरोधी पक्ष के नेता खड़गे ने प्रश्न उठाया कि अमेरिका में भारतीयों पर होनेवाले हमलों में विदेश मंत्रालय क्या कर रहा है? इसका उन्होंने सिलसिलेवार और विस्तार से उत्तर दिया। आगे पूछने को कुछ रहा ही नहीं। वे न केवल अच्छी वक्ता हैं, बल्कि पूरी तैयारी से अपनी बात रखती हैं। सुषमाजी ने आपातकाल में जॉर्ज फर्नाडीज का मुकदमा बड़ी शिद्दत से लड़ा। वे हरियाणा में आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सबसे कम उम्र की मंत्री बनीं। उनकी सदाशयता, ईमानदारी, संवेदनशीलता और कार्यकुशता को लेकर लोग सराहना करते थे। हमें उन्हें नजदीक से जानने का अवसर कुछ समय के बाद राज्यसभा में मिला। हम सुषमा स्वराज के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन की कामना करते हैं, ताकि वे इसी प्रकार देश और समाज की सेवा करती रहें।

२०१७ का वर्ष

२०१७ का वर्ष कई दृष्टियों से उल्लेखनीय है। बिहार में चंपारन सत्याग्रह का यह शती वर्ष है। गांधीजी का यहीं से सीधा और सक्रिय संपर्क भारत की जनता से हुआ। आचार्य कृपलानी, बाबू राजेंद्र प्रसाद आदि से इसी समय गांधीजी का मिलना हुआ। वहीं से गांधीजी के सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन के बीज पड़े। मई के मास में अमरीकी प्रेसीडेंट जॉन एफ केनेडी की सौवीं वर्षगाँठ है, उनके ये शब्द कि ‘‘आशा न करो कि देश हमारे लिए करेगा, हमें सोचना है कि हम देश के लिए क्या कर सकते हैं!’’ वास्तव में प्रबुद्ध और जाग्रत् नागरिकता के मूलमंत्र हैं। साम्यवाद के पितामह ५ मई को कार्लमार्क्स का जन्म २०० वर्ष पहले हुआ था। उनकी विचारधारा और व्यक्तित्व ने पूरे विश्व को किसी-न-किसी रूप में प्रभावित किया। सोवियत यूनियन समाप्त हो गया, पर कई देश हैं, जो उनके नाम की दुहाई देते हैं। संयोग था कि जब उनको दफनाया गया, उस समय गांधीजी वहाँ उपस्थित थे। मार्क्स के दर्शन से सहमत होते हुए भी हम यह मानते हैं कि उनके व्यक्तित्व और उनकी विचारसरणी को समझना आज के विश्व में अपेक्षित है। इन सब विषयों पर कुछ-न-कुछ उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करने का हमारा प्रयास रहेगा।

(त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी)

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