उस होली से इस होली तक

उस होली से इस होली तक

होली का त्योहार रंग-बिरंगी बौछार न जाने कितने रंग रहे सवार, गुजरी होली से आज तक बेशुमार रंगों से हमारा पाला पड़ा है। जब किसी पर किसी का रंग सवार हो जाता है तो वह उसी रंग की रंगीनियों में खो जाता है। पिछले दिनों हमारे प्रधानजी को नोटबंदी का रंग हो गया सवार। पूरा देश उनकी इस रंग-रँगीली अदा में गीत गा उठा मल्हार। गृहणियों ने रंगबाजी दिखाकर अपने घरवाले को पटाकर जो धन छिपा लिया था, उसे काले धन की ब्रादरी में खपा लिया था, वह भी उछलकर सामने आ गया था। उन्होंने सब्र के आँसू पोंछते हुए तसल्ली कर ली, आशा धर ली कि मौका फिर मिलेगा। हमारा चुनाव समर भी किसी होली के सीजन से कम नहीं। इसमें भी नाना प्रकार के रंगों का मिश्रण है। चुनाव का रंग चढ़ता है तब चुन-चुनकर रंगों के फव्वारे उड़ाता है। इसमें पिता, पुत्र, चाचा, भतीजा, भैया सभी अपनी-अपनी पिचकारियाँ सँभाल लेते हैं और रंगों की बौछार कर बैठते हैं, परंतु पिचकारी में भरा रंग एक ही निकलता है और वे एक ही रंग में रँगे दिखाई देते हैं। यह माजरा देख वे फिर कह उठते हैं, बुरा न मानो होली है, गले लग जाते हैं और गा उठते हैं—

‘‘लग जा गले कि फिर ये हँसीं रात हो न हो,

होशियार रहेंगे हम कि अब ऐसी भितरघात न हो।’’

अब होली की ऋतु होती ही कुछ ऐसी है कि मनुष्य हुड़दंगी बन बैठता है और होली की टोली में दौड़ पड़ता है लेकर रूप हुड़दंगी। सुना तो यों गया है कि यह राजा और रंक के मिलन का त्योहार है। इसके रंग-गुलाल से द्वेष, गिले-शिकवे हो जाते हैं समाप्त तथा प्रेम और मोहब्बत की दौड़ पड़ती है सौगात।

दौड़-पदौड़ की बात चली है तो हमारा नवयुवक भी तीव्र गति से दौड़ने में पीछे थोड़े ही रहेगा। आ गई होली, दौड़ पड़ी नौजवानों की टोली। रंग बहाया, गुलाल उड़ाया, छोकरों की सड़कों पर डोलती टोली को देख भाँग के रंग में एक युवक यों चिल्लाया, गीत भरा गुलाल यों उड़ाया—

‘‘चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो,

खुदा की कसम तुम लाजवाब हो।’’

छोकरियों ने इस हुरियारी टोली को निहारा। एक ने उनमें से आगे बढ़ एक हुरियारे के कान पर जोर से एक फटाका उड़ाया, जिससे उसके गाल पर टमाटरी रंग बिखर आया, तभी सब सहेलियों ने खिल-खिलाकर ताली बजाते नारा लगाया, ‘बुरा न मानो, होली है, भैया होली है’; तभी नवयुवकों में से एक चिल्लाया, ‘भाग लो भौयहरो, कहीं १०० नंबर को कॉल न घल जाए। नवयुवकों की टोली से निकल पड़ी यह बोली—

‘‘ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता।’’

अब होली का मौसम है तो जाहिर है कि इजलास, प्रोग्राम और जलसे तो होंगे ही। सांस्कृतिक कार्यक्रम तो होते ही रहते हैं, परंतु इस ठंड और गरम हवा के मिश्रित मौसम में नृत्य, ढोल, नगाड़े पर थाप हो या गीत गायन की बात या हो कवि सम्मेलन की बरसात, इन सब का रंग ही अलग खिलता है, परंतु विडंबना और मुश्किल तब आती है जब इन कार्यक्रमों की भरमार पर अध्यक्षों और चीफ गेस्टों का शॉर्टेज होने लगता है। मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि इन महान् हस्तियों का परिवार नियोजन हो गया है बल्कि यह है कि नामचीन बुद्धिमस्त, आचार्य, प्राचार्य को पहले से ही होशयार आयोजक उन्हें किडनेप कर लेते हैं। चंदामामा कार्यक्रमों के लिए तो नगर और नगर निगम में बहुतेरे टहलते फिरते मिल ही जाते हैं।

हुड़दंग लीला के कार्यक्रम का आयोजन बड़ी ही धूमधाम से आयोजित होने जा रहा था, जिसमें नाना प्रकार के गुलदस्तों के फूल के महकने की आशा थी। परंतु गाड़ी किसी नामवर मुख्य अतिथि पर आकर अटक रही थी, जिससे आयोजक की प्रस्टेज की घंटी बज रही थी। आयोजक महोदय शहर की सड़कों पर चहलकदमी कर रहे थे कि अचानक उनकी नजर एक महाविद्यालय के महागुरु पर पड़ी। चौराहे के रेड सिग्नल पर उनकी कार थी खड़ी। आयोजक महोदय ने उस ओर दौड़ लगा दी और अपनी बाड़ी कार से मिला दी। ड्राइवर बहुत चीखा-चिल्लाया, परंतु आयोजक कार से नीचे न आया, तब महागुरु ने कहा, ‘‘क्या बात है क्यों कार के बोनट पर लोट-पोट मचाए हो, मेरी खोपड़ी को पिचकाए हो?’’ इतने में ग्रीन सिग्नल हो गया। हॉर्न बजाते हुए ड्राइवर गाड़ी को आगे ले गया। हाथ जोड़ आयोजक चिल्लाया, ‘‘महाशय, मेरी बिनती सुनिए, मेरी प्रस्टेज को सिक्योर करिए! हुजूर, होली मिलन का एक भव्य आयोजन हो रहा है, जिसमें शहर भर के गण्यमान्य व्यक्तियों का सम्मेलन हो रहा है। बस एक चीफ गेस्ट की सीट खाली है, उसके लिए आपकी छवि निराली है। श्रीमान आप इस पद को ग्रहण कर लीजिए और इस कार्यक्रम को शोभायमान कर दीजिए। महागुरु ने गाड़ी रोकने का संकेत दिया। गाड़ी रुकते ही महागुरु कार से बाहर आए, तब आयोजक ने कार के बोनट से छलाँग लगाई और स्नेह भरी दृष्टि से महागुरु के चरणों में सिंगल बॉडी को अर्पित कर फिर अपनी गुहार लगाई।

महागुरु बोले, ‘‘महोदय, उस तारीख में मेरे चार बाहरी प्रोग्राम लगे हैं, जो मेरे हृदय में पड़े हैं और पाँचवाँ घर का है, अगर घरवाली ने परमीशन दे दी तो अवश्य ही अंतिम समय में उपस्थित होकर आपके पांडाल की शोभा बढ़ाऊँगा। आपकी निराशा को आशा में बदल जाऊँगा।

सिक्योरिटी गार्ड ने आयोजक महोदय को दूर धकेला, फिर कार का दरवाजा खोला। महागुरु कार में प्रवेश कर गए। कार आगे बढ़ गई। आयोजक भी बन गया उनके पीछे घोड़ा। यह देखकर सड़क पर खड़ा कुत्ता उनके पीछे दौड़ा। आयोजक टाँग फैला गए और रोड पर ही गुलाट खा गए। अपनी गीत-फुहार यों फरमा गए—

‘‘तेरा जाना दिल के अरमानों का मिट जाना।

कोई देखे तकदीरों का मिट जाना।’’

इस समय पर एक खुशी के बंदों की टोली वहाँ आ गई। आयोजक महोदय के हाल पर तरस खा गई। उन्होंने उनको सँभाला और पूरा माजरा भी जाना, तब उनमें से एक ने ताली फटकारते हुए कहा, ‘‘अयहय! अल्ला की कसम, बड़ा जुलुम मचा गया जे कारवाला।’’

उनमें से एक फ्लाइंग किस लेते हुए बोला, ‘‘अरे जुग्गू! तुम्हारी निराशा को आशा में बदल देंगे हमारे उस्ताद।’’ तब उस्ताद आगे आए और चार ताली फटकारकर यों फरमाए, ‘‘अयहय बन्नो! क्या पटर-पटर बातें करे जा रही हो जा लौंडे से।’’

बन्नो ने तालियाँ फटकारते हुए कहा, ‘‘परेशानी में पड़ा है, एक चीप गेस्ट के लिए अड़ा है। मैं तो कहती हूँ, हमारे उस्ताद को बिठा दो चीप गेट की कुरसी पर, तेरे होली के जलसे में चार चाँद लग जाएँगे।’’

आयोजक ने सड़क पर बैठे-बैठे अपनी आँखों को खोला और दया-दृष्टि से उनकी ओर देखा। तब उनका उस्ताद यों बोला, ‘‘अल्ला कसम, हमारी बन्नो सही कह रही है। खेल में, जेल में, रेल में और हर घर की पोल में सभी जगह तो हमारा बोलबाला है। जितने मशहूर हम हैं, क्या कोई और हो सकता है। तेरे मजमे में हम ताली फटकार ठुमका लगाएँगे तो वहाँ बैठे सबके सब खुशी में लोट-पोट हो जाएँगे और न्योछावरों का ढेर लगाएँगे।

आयोजकजी ने एक फुरती मारी, अपनी पैंट-शर्ट झाड़ी और दौड़ लगा दी। यह देख टोली ने ढोलक पर थाप मारी और गीत के बोलों की झड़ी यों मारी—

‘‘रुक जा ओ जानेवाले रुक जा,

मैं तो राही तेरी मंजिल का।’’

अब होली है तो जरूरतमंद भी इस अवसर का इंतजार कर रहे हैं, मौका मिलते ही इसे कैश करते हैं। हुआ यों कि जग्गा राम एक मोटर मिस्त्री बड़ी मेहनत-मशक्कत से काम करके नई-पुरानी मॉडल की मोटरकारों की मरम्मत कर उनका उद्धार करते। मजदूरी भी मुँहमाँगी लेते, परंतु नई करेंसी में भी उन्हें बड़े नोट प्राप्त न होते, छोटे-मोटे नोट उछल-कूद मचाकर बाजार में खर्च हो जाते। लाख कोशिश करके भी वे बचत-जमा न कर पाते। एक दिन किस्मत से उन्हें सौ-सौ के २१ नोट प्राप्त हो गए। फिर क्या था, मिस्त्री साहब खुशी केहिंडोले में डोल गए। नकदी हाथ लगते ही होली के जश्न में शिरकत करने का प्रोग्राम बनाया। दारू के ठेके पर जाकर एक पउआ चढ़ाया और चले झूमते-झामते घर की ओर। रास्ते में उन्हें अपने नोटों की याद ने सताया। उन्होंने जेब से नोट निकालकर फख्र से काउंटिंग प्रारंभ कर दी।

ताड़नेवाले भी कयामत की नजर रखते हैं। एक जरूरतमंद मिस्त्रीजी के पास आ गया। दो हजार का नोट देकर सौ-सौ के बीस नोट छुट्टा लेने का बहाना पा गया। मिस्त्रीजी प्रसन्न हो गए कि नई करेंसी में दो हजार के नोट पहली बार दर्शन पा गए। अब घर जाएँगे, होली के मौसम की शाम घरवाली को दो हजार का पूरा गुलाबी नोट थमाएँगे और प्रेम की दो पींगें बढ़ाएँगे। लड़खड़ाते गाते—

‘‘मुझे दुनियावालो शराबी न समझो

मैं पीता नहीं हूँ, पिलाई गई है।’’

गीत की पंक्तियों के साथ प्रसन्नतापूर्ण दो हजार का नोट अपनी श्रीमतीजी को थमाया और यों फरमाया, ‘‘सुनती हो, ये पूरे दो हजार का नोट है सुंदर-सुंदर सा, अब इसे खर्च में नहीं लाना, जमा में रखेंगे।’’ उनकी श्रीमतीजी ने नोट को थामा, फिर अपनी गहरी नजर को उस पर डाला और चीखीं, ‘‘हाय राम! दारू के झोंक में तुम क्या कर बैठे, ये दो हजार का चूरन का नोट ले बैठे। मिस्त्रीजी ने एक दहाड़ लगाते हुए कहा, ‘‘देख, तू अनपढ़-गँवार घर की है, जिंदगी में पहली बार नया नोट देख रही है और हमारी सरकार को चूरन मेड कह रही है। उसको चूरन का कह रही है।’’ इतना कहकर मिस्त्रीजी ने नोट झटक लिया और चार बार देखकर उनकी दारू फुर्र हो गई और वे चिल्लाते हुए भागे, ‘‘अरे! कोई नटवरलाल मुझे झटका दे गया और असली की जगह नकली दे गया!

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