मितभाषी, गंभीर और स्पष्ट चिंतन

संघ के वरिष्ठ प्रचारक माननीय सोहन सिंहजी का अभाव बेहद खलेगा। वे कार्यकर्ताओं की बात सुनने में ज्यादा रुचि लेते थे। बैठकों में, विशेष रूप से छोटी बैठकों में, उनका आग्रह रहता था कि सभी कार्यकर्ता, यदि यह संभव न हुआ तो अधिक-से-अधिक कार्यकर्ता निस्संकोच अपना मत व्यक्त करें। बैठकों में कार्यकर्ता मौन बैठा रहे और अपना मत अभिव्यक्त न करे, उन्हें यह अच्छा नहीं लगता था। सबकी सुनने के बाद वह नपे-तुले शब्दों में अपना संबोधन प्रस्तुत करते थे और बैठक संपन्न हो जाती थी।

मैं वर्ष १९९२ के उत्तरार्द्ध में दिल्ली प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना। कुछ महीने बाद ही वर्ष १९९३ में लंबे अंतराल के बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव होने थे। चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली प्रदेश भाजपा की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। कोष बहुत कम था। वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और सहयोगियों से बातचीत कर राष्ट्रीय अध्यक्ष को १ करोड़ रुपए की थैली भेंट करने का निर्णय लिया गया। निर्णय पर प्रदेश कार्यकारिणी ने भी मुहर लगा दी। मुझे ऐसी कल्पना थी कि दिल्ली प्रदेश भाजपा में कई वरिष्ठ नेता हैं, जिनमें धन-संग्रह का सामर्थ्य भी है और वे धन-संग्रह की कला भी जानते हैं। उन्हीं के भरोसे १ करोड़ रुपए की थैली भेंट करने का निर्णय लिया गया था। लेकिन धन-संग्रह के लिए जिन बड़े नेताओं पर मैं निर्भर था, उनका रवैया ठंडा था। परिणामतः धन-संग्रह के काम में उठान नहीं आ पा रहा था, दिन बीतते जा रहे थे। मैं भी निराश होने लगा था। तभी एक दिन मैं दोपहर को किसी कार्य के लिए संघ कार्यालय गया। सोहन सिंहजी भोजन करके भोजनालय से बाहर निकले ही थे और अपने कमरे की ओर बढ़ रहे थे। मैंने उन्हें नमस्कार किया और सम्मान तथा शिष्टाचारवश उनके साथ-साथ उनके कक्ष तक चला गया। उन्होंने भीतर आने को कहा और सहज भाव से पूछताछ शुरू की कि नया दायित्व कैसा लगता है? राजनीतिक क्षेत्र का अनुभव कैसा है? मैंने उनसे कहा कि और सब तो ठीक है, लेकिन विधानसभा के चुनाव सिर पर हैं और प्रदेश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है।

उन्होंने पूछा कि ‘फिर क्या सोचा है?’ मैंने उन्हें बताया कि ‘राष्ट्रीय अध्यक्ष को एक करोड़ रुपए की राशि की थैली भेंट करने का निर्णय किया है।’ वह बोले, ‘इस काम में कहाँ तक बढ़े?’ मैंने सकुचाते हुए कहा, ‘धन-संग्रह की इस योजना में उठान नहीं आ रहा। जो धन-संग्रह कर सकते हैं, ऐसे बड़े नेता उदासीन-से हैं।’ यह सुनकर वे क्षण भर रुके और फिर बोले, ‘गिने-चुने बड़े लोगों पर निर्भर रहने के बजाय मझले और छोटे कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास जगाना चाहिए।’ दो-चार इधर-उधर की और बातें करने के बाद मैं उनके कक्ष से बाहर आया और दिल्ली प्रदेश कार्यालय की ओर लौट पड़ा। लेकिन रास्ते में उनके वे शब्द मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते रहे कि मध्यम और छोटे कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास जगाओ। उनके शब्दों ने मुझे एक नई दिशा सुझा दी। मैंने बड़ों पर निर्भरता छोड़ी और मध्यम व छोटे कार्यकर्ताओं को धन-संग्रह के लिए प्रेरित करना प्रारंभ किया। इसके परिणाम निकलने लगे।

छोटे कार्यकर्ता बहुत बड़ी राशि एकत्र करने में चाहे समर्थ न रहे हों, पर छोटी-छोटी राशियाँ प्रदेश के कोष में उनके प्रयासों से जमा होने लगीं। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में जिस दिन राष्ट्रीय अध्यक्ष को थैली भेंट करनी थी, उस दिन तक प्रदेश के कोष में १ करोड़ १९ लाख रुपए जमा हो चुके थे। यह राशि मध्यम और छोटे कार्यकर्ताओं के प्रयास से जुटाई गई थी। इसके मूल में सोहन सिंहजी की सुझाई हुई दृष्टि ही थी।

मैं जब पहली बार उन्हें मिला तो मेरे मन पर यह छाप पड़ी कि वह दृढ इच्छा शक्तिवाले, गंभीर व्यक्ति हैं। मितभाषी, गंभीर, सुस्पष्ट चिंतन के धनी और लाग-लपेट के बिना अपनी बात कहनेवाले। सोहन सिंहजी अपने प्रति निरंतर कठोर बने रहे। बाह्य कठोरता के नीचे कार्यकर्ताओं के प्रति सहज स्नेह और आत्मीयता की निर्मल धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती थी। उनकी रुचि के प्रमुखतः दो विषय रहते थे—शाखाएँ कैसे बढ़ें, सक्षम बनें और कार्यकर्ता का पूर्ण विकास कैसे हो। जब मुझे जुलाई २०१४ में गुजरात के राज्यपाल का दायित्व दिया गया तो मैं गुजरात जाने से पूर्व उनका आशीर्वाद लेने के लिए संघ कार्यालय गया था। वह आँखें बंद कर लेटे हुए थे या सो रहे थे। कुछ देर उनके कमरे में ही बैठा रहा और उनके जागने की प्रतीक्षा करता रहा। उनकी नींद में व्यवधान न पड़े, ऐसा सोचकर मैं चला आया। बाद में मुझे पता चला कि उन दिनों स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण वे आँखें बंद कर लेटे रहते थे, जिससे आगंतुक को कभी-कभी ऐसा लगता था कि वह सोए हुए हैं। जो भी हो, मैं उनका आशीर्वाद लेने से वंचित रह गया और अब इस प्रसंग के लगभग एक वर्ष बाद मेरे ओ.एस.डी. श्री देवदत्त भारद्वाज, जो विभाग प्रचारक रहे हैं, ने सुबह-सुबह यह दुःखद सूचना दी कि सोहन सिंहजी नहीं रहे। छोटे-छोटे पर्वतों से घिरा हुआ जैसे कोई उत्रुंग पर्वत शिखर होता है, वैसा व्यक्तित्व हमसे छिन गया।

(शिक्षाविद् तथा गुजरात के राज्यपाल)

स्नेह के सागर

बजरंगलाल गुप्ता

माननीय सोहन सिंहजी का संपूर्ण जीवन संघ विचारों और तत्त्व के प्रति अत्यंत निष्ठावान रहा। उन्हें कार्य-पद्धति के नरपत्य के रूप में भी जाना व पहचाना जाता रहा है। उन्होंने अपने कार्यकाल में अनेक कार्यकर्ताओं को अपने हाथों गढ़ा और उनको काम पर लगाया। वे एक ऐसे प्रचारक थे, जो हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता के सुख-दुःख की चिंता करते थे और समय आने पर उसकी उपयुक्त व्यवस्था भी करते थे। लेकिन वे स्वयं के जीवन के प्रति अत्यंत कठोर थे, यहाँ तक कि जीवन के अंतिम क्षण तक भी उन्होंने अपना कार्य खुद ही किया। चाहे संघ शिक्षा वर्ग हो, कोई शिविर हो या अन्य छोटे-बड़े कार्यक्रम, उन सबकी व्यवस्थाओं की बहुत बारीकी से वे चिंता करते थे और कार्यकर्ताओं से कार्य भी करवाते थे। इस क्षेत्र में संघ के ऐसे कार्यकर्ताओं की बहुत बड़ी संख्या है, जो अपने जीवन में आनेवाली कठिनाइयों और उलझनों की चर्चा खुले रूप से सोहन सिंहजी के साथ करते थे और वे उन कार्यकर्ताओं का योग्य मार्गदर्शन कर उन कठिनाइयों के समाधान का मार्ग सुझाते थे। वे कार्यकर्ताओं को किस प्रकार कार्य में लगाते थे, इसका एक उदाहरण मेरा स्वयं का ही है।

मैं सोनीपत के हिंदू कॉलेज में प्राध्यापक था और सायंकाल में मेरी कक्षाएँ थीं। मेरी उम्र लगभग २५ वर्ष की थी। उस समय के हमारे संभाग प्रचारक माननीय नारायण दासजी ने यह सोचकर कि मैं सायंकाल शाखा में नहीं जा सकता, मुझे विश्व हिंदू परिषद् हरियाणा प्रांत का काम दिया था। साल-डेढ़ साल बाद सोहन सिंहजी संभाग प्रचारक बनकर हरियाणा आए। परिचय हुआ। मेरी आयु उस समय लगभग २७ वर्ष रही होगी। वे कहने लगे कि विश्व हिंदू परिषद् में क्या कर रहे हो? अरे, कॉलेज में पढ़ाते हो तो सायंकाल का काम करो न! मैंने उनको कहा कि शाम को कॉलेज जाना पड़ता है, सायंकाल शाखा जाने का समय नहीं मिलता। सोहन सिंहजी ने इतना सुना। वे बोले नहीं, कॉलेज प्रबंधन से बात की और कुछ दिनों के बाद मुझे प्रिंसिपल ने कहा कि सुबह पढ़ाने आया कीजिए। कुछ दिनों के बाद सोहन सिंहजी फिर प्रवास पर आए। कहा कि कॉलेज का समय बदल गया है। अब तुमको जिला कार्यवाह के नाते से काम करना है। सोहन सिंहजी का विराट् व्यक्तित्व ऐसा था कि वे किसी को कुछ कहें तो उसका प्रत्युत्तर देने की हिम्मत नहीं होती थी। मैंने स्वीकार कर लिया, ठीक है। परंतु बाद में मुझे ध्यान में आया कि इस दायित्व के साथ मैं न्याय नहीं कर सकूँगा। मैंने उनको पत्र लिखा, ‘मेरे वृद्ध माता-पिता दोनों राजस्थान में रहते हैं। हर छुट्टी में मुझे राजस्थान जाना पड़ता है। चाहे ग्रीष्म का अवकाश हो या सितंबर का अवकाश, दोनों समय संघ-कार्य और शिविरों के लिए संघ शिक्षा वर्गों के लिए अत्यंत उपयुक्त रहते हैं और मैं घर चला जाऊँगा तो जिला कार्यवाह के नाते कैसे दायित्व का निर्वाह करूँगा? मैं आपके सामने बोल नहीं सका, परंतु मेरी यह एक कठिनाई है। ऐसी मनःस्थिति में जिला कार्यवाह का दायित्व-निर्वाह मेरे लिए संभव नहीं होगा। मैं क्या जवाब दूँगा स्वयंसेवकों॒को!’

जैसे ही उन्हें मेरा पत्र मिला, अगले दिन प्रातःकाल वे मेरे घर पर उपस्थित थे। सोहन सिंहजी को देखकर मैं आश्चर्य में रह गया। उन्होंने कहा कि चाय-वाय पिलाओ। चाय पी। उन्होंने कहा कि तुमने यह पत्र में क्या लिख दिया? मैंने कहा कि जो सच था, वह लिख दिया। वे बोले, यही कठिनाई है न कि और कोई नहीं है! मैंने कहा कि कठिनाई तो यही है। सोहन सिंहजी ने कहा कि यह मेरा काम है। तुमको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। कार्यकर्ताओं को जवाब मैं दूँगा; परंतु तुम्हें जिला कार्यवाह के नाते काम करना है। बाद में मेरी नियुक्ति दिल्ली के कॉलेज में हो गई। दिल्ली के कॉलेज में हरियाणा छोड़कर आना, जाऊँ कि न जाऊँ। मैं सोहन सिंहजी के पास गया। सोहन सिंहजी ने ताड़ लिया। थोड़ी देर गंभीर हुए, फिर उन्होंने कहा कि तुम दिल्ली के कॉलेज में जा सकते हो। दो शर्तें हैं। सोनीपत छोड़कर दिल्ली नहीं जाओगे। दिल्ली में तो बहुत लोग हैं। सोनीपत में ही रहकर काम करना है। दूसरा, उन्होंने कहा कि तुम्हारे मन में इच्छा हो सकती है कि श्रद्धानंद कॉलेज निकट है, मोटर साइकिल से जाऊँ; लेकिन स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए मोटर साइकिल का उपयोग मत करना। मैंने उनकी दोनों आज्ञाएँ शिरोधार्य कीं। वे कनिष्ठ व्यक्ति की भी इतनी छोटी बात का ध्यान रखते थे।

(प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं समाजधर्मी)

 

(श्री गोपाल शर्मा द्वारा संपादित एवं प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘महाव्रती : कर्मयोगी प्रचारक सोहन सिंह’ से साभार)

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