सिंहस्थपुरी के अविस्मरणीय क्षण

सिंहस्थपुरी के अविस्मरणीय क्षण

भारत लोगों की धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय भावनाओं का संगम है। यहाँ पुनः द्वादश वर्षों की प्रतीक्षा उपरांत स्कंध पुराणोल्लेखित सूक्त की पुनरावृत्ति हो रही है। यथा, ‘मेष राशि गते सूर्ये, सिंह राशौ बृहस्पतौ। उज्जयनिया भवेत कुम्भः सदा मुक्ति प्रदायकः॥ ‘क्षिप्रा तट’ पर दस महायोगों के संयोग से सिंहस्थ होता है। शास्त्रोक्त है, जब सिंह राशि में बृहस्पति, मेष राशि में सूर्य, तुला राशि में चंद्रमा, स्वाति नक्षत्र, वैशाख माह, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा तिथि, व्यतिपति योग, सोमवार तथा अवंतिका पुरी हो, तभी ‘सिंहस्थोदय’ की स्थिति बनती है। २२ अपै्रल से २१ मई सिंहस्थ अपनी विशाल धार्मिक भुजाओं को करोड़ों श्रद्धालुओं के आलिंगन के लिए फैला रहा है। यही वह नगरी है, जिसे शिव के सपरिवार निवास के लिए देवताओं ने चुना था।

सिंहस्थ के प्रारंभ दिवस पूर्व, मानो विभावरी आई ही नहीं। रंग-बिरंगी जगमगाहटों से और पूर्णिमा के श्वेत प्रकाश ने उज्जैन की वीथियों से लेकर पुरवासियों के हृदय में नभोमणि के प्रकाश का भान बनाए रखा। यत्र-तत्र चित्रित धार्मिक चित्रचर्या इस आभा मंडल को अलौकिक रूप दे रही है। मध्य चौराहे में निर्मित समुद्र मंथन झाँकी, मानो सिंहस्थ आख्यान का प्रतिनिधित्व कर रही है। नव निर्मित चौड़े, सपाट रास्ते, मृत्युंजय द्वार जैसे सुंदर विशाल प्रवेश द्वार, बडे़ फ्लाई ओवर्स, स्नानघाटों में लगी लाइट, फाउंटेंस तथा पानी शुद्धीकरण यंत्र, भव्य चौराहे, फूलों से भरी मार्ग-मध्य क्यारियाँ, बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स, उज्जैन का रूपसी शृंगार, किसी महानगर से कम नहीं लग रहा है। मध्य रात्रि में लंबी पद यात्रा से थककर मैंने यहीं इस चौराहे में चाय पी। चाय की चुस्की के साथ शीतल पवन की झप्पियों ने मुझे पुनः स्फूर्तिवान बना दिया। अब यामिनी भ्रमण के लिए मुझमें नई ऊर्जा का संचार हो गया है। थोड़ी ही देर में मैं रामघाट पहुँच गया, जहाँ दस किलोमीटर से कठिनाइयाँ सहते आए हजारों पद-यात्री श्रद्धालुओं का मेला सा लगा है। आश्चर्य! श्रद्धा की यह कैसी निश्छलता है, जिसमें कोई कष्ट, श्रद्धा-भाव के मध्य गति अवरोधक नहीं बने। इनके आनंदित मुख कह रहे हैं, ‘‘यही सच्चा आनंद है।’’

भोर अभी शेष है, पवित्र नर्मदा अलिंगित क्षिप्रा जल की लहरीय तान, मंदिरों से आती केसरिया सुगंध, लहराते भगवा ध्वज; मन-कर्ण आह्लादित कर रहे हैं। वनाच्छादित उज्जयिनी, अवंतिका कनक शृंगा, कुशस्थली, पद्मावती, कुमुदवती, प्रतिकल्पा अर्थात् सिंहस्थपुरी उज्जैन में सर्वस्व सतरंगी ध्वज शृंगार देखने योग्य हैं। अचानक सुबह के इस शांत माहौल में हलचल के साथ दूर से कुछ शोर सुनाई दे रहा है। शनैः-शनैः जिसकी तीव्रता बढ़ रही है। जय महाकाल, हर-हर क्षिप्रे के अभ्रभेदी जयकारों के साथ ये साधुओं की टोलियाँ हैं। यहाँ नागा बाबाओं का विशेष जनाकर्षण है। इनकी जीवन-शैली व कार्यप्रणाली लोगों में खासा कौतूहल पैदा करती है। तीव्र गति से दौड़ते आते ये बाबा एक-दूसरे के कंधों का सहारा लेकर इतना ऊँचा उछल रहे हैं मानो स्प्रिंग बोर्ड लगे हों। भारी-भरकम बाबा तो ऐसे पैर भूमि पर पटक रहे हैं; जैसे पाताल लोक का मार्ग ही बना देंगे। जलामग्न के ये द्वादश वर्षीय प्यासे, सीढि़यों से ही छलाँग लगा रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो लंबे अंतराल के पश्चात्, ऊधम मचाते बच्चे अपनी माँ की गोद में घुस रहे हों। यहाँ क्षिप्राजी भी अपने इन भक्त पुत्रों का ‘छई छपा छई’ बड़े शांत भाव से स्वीकार कर रही॒हैं।

इन क्षणों को देखने के लिए प्रतीक्षारत सहस्रों चक्षुओं को आज शांति मिल रही है, वही शांत तृप्ति-भाव, जो कई दिनों से जागे पथिक को निर्विघ्न निद्रा से मिलता है। क्षिप्रा तट पर प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था भी चौकस है। आज प्रथम स्नान के प्रकाशित आँकडे़ बता रहे हैं; लगभग सवा लाख साधु-संतों ने तथा भक्तों ने अमृत के मेले से धर्म लाभ प्राप्त किया। ऐसे ही उत्साह और हर्ष की स्थिति तब भी थी, जब सिंहस्थ प्रारंभ का प्रथम पट खुला, अर्थात् मान्यता प्राप्त तेरह अखाड़ों की पेशवाई निकली थी। पेशवाई सिंहस्थ की पूर्ण पीठिका है। शिव का शृंगार किए साधु-संत शिव के बाराती लग रहे थे। यहाँ उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि श्रीआदिशंकराचार्य द्वारा वैदिक ज्ञान के उत्थान हेतु सभी साधु-संतों को संगठित किया गया था और इसके दस वर्ग स्थापित किए; जैसे—तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरी, पर्वत, सागर, सरस्वती भारती एवं पुरी। कालांतर में मुगलिया अत्याचार के विरोध में यही संत संगठन, शास्त्र के साथ-साथ शस्त्रधारी भी हो गए और अखाड़ों के रूप में विकसित हुए।

मेला परिक्षेत्र में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है। नागा बाबाओं की हठ साधना सभी के मुख मंडल में आश्चर्य भाव सुनिश्चित कर रही है; जैसे—पेड़ पर वैताल जैसे उल्टे लटकना, लंबी-लंबी जटाओं को बिखराकर बरगद की जड़ों जैसा रूप देना, सिर पर काँटों का तार रखकर अग्नि रखना और अग्नि पर बैठकर साधना करना, एक के ऊपर एक उल्टी-सीधी पालथी लगाना, काँटों की शैया पर लेटना, अपने अंगों में तलवार डालना, झूले पर लटके रहना या सदैव एक हाथ उठाए रहना इत्यादि। सभी बाबा भभूत लपेटे दूसरी दुनिया के निवासी लग रहे हैं। यहाँ पधारे संतों के नाम भी बडे़ आधुनिक हैं; जैसे—कंप्यूटर बाबा, पायलट बाबा, गोल्डन बाबा, साइलेंट बाबा, म्यूजिक बाबा आदि। निश्चित ही इन साधु-संतों, बाबाओं का देखना, अविस्मरणीय, अकल्पनीय, अप्रतिम है। ये अद्भुत दृश्य चिर स्मृति बिंब अंकित कर रहे हैं। मैं भ्रमण पथ पर एक कोने में खड़ा निर्निमेष, अनिमिष इस सनातनी वातावरण में खोया-सा हूँ।

लगभग तीन हजार बयानबे करोड़ से विश्व के सर्वश्रेष्ठ लोक आयोजन का प्रारंभ अच्छा रहा। समाचार-पत्रों से पता चला कि कहीं अव्यवस्थाओं से अथवा पुलिसिया उद्दंडता से कुछ अखाड़ों में नाराजगी रही। मेरा मानना है, इसके लिए ‘आचरण कुंभ’ की आवश्यकता है। व्यवस्थाओं की सघनता के बीच अव्यवस्थाओं की विरलता भी दिखी। पुलिस जवानों ने बताया, ‘‘बीस-बीस घंटों की ड्यूटी करने के बाद भी शिफ्ट समाप्त ही नहीं होती।’’ मूल सुविधाओं के विषय में पालिका के कई बस चालकों ने बताया, ‘‘वेतन तो छोडि़ए, भोजन तक समय पर नहीं मिल रहा है।’’ व्यवस्थाओं में लगे पर्यवेक्षकों की खामोशी व्यथित मन को स्पष्ट करती दिखी। थाना एवं खोया-पाया विभाग के एक कनिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘‘हम तो समाज सेवा कर रहे हैं, हमारे परिवार मेला नहीं देख पा रहे, क्योंकि उच्चादेश है, कोई भी अपने परिवार को विशेष सुविधा से नहीं घुमाएगा। जबकि वरिष्ठ अधिकारियों के सरकारी वाहनों में उनके सगे-संबंधी निस्संकोच भ्रमण कर रहे हैं।’’ पेयजल व्यवस्था कई स्थानों पर निर्मित शौचालयों के समीप है, जिससे अस्वच्छता के साथ कीचड़ भी हो रहा है। इस समस्या को यथासमय सुननेवाले अधिकारी मुझे न मिल सके! सभी ऊपर की ओर दायित्व सरकाते दिखे! फिर भी इन सबसे परे, इस तपती धूप में सूर्य प्रदत्त ताप से सिद्ध योद्धा की तरह संघर्ष करते तथा अव्यवस्थाओं के मध्य आनंदित होते, श्रद्धा लिये ये असंख्य श्रद्धालु मेरी दृष्टि में ‘निर्धात अवधूत’ हैं। यही हैं सात्त्विक आनंद के प्रेरणास्रोत एवं सिंहस्थ के प्राण। सच है, ‘यह सुविधाओं से परे विश्वास और आस्था का पर्व है।’

चलिए, पुनः यात्रा की ओर रुख करते हैं। मेला इतने बड़े क्षेत्र में फैला है कि इसे एक दिन में देखना कठिन है। यहाँ भ्रमणानंद के लिए इ-रिक्शा तथा पैदल चलना ही उचित है। मैंने इमरान भाई के इ-रिक्शे का प्राथमिक सहारा लिया। किसानों से किराए पर लिये खेतों में निर्मित संतों के पंडाल वर्तमान टाउनशिप का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। प्रत्येक पंडाल अद्भुत जगमगाहट और किसी बडे़ मंदिर तथा प्रसिद्ध शैली के देवालय बिबों के प्रतिरूप दिखे। जगह-जगह जलपान की छोटी-बड़ी दुकानें सजी हैं। खेल, खिलौने, धार्मिक पुस्तकें, गंडा, ताबीज, ज्योतिष केंद्र, बच्चों के लिए झूले इत्यादि, विभिन्न मनोरंजक साधन यहाँ दिखे। परंतु मूल में छिपी एक बात प्रमुख है और वह यह कि नवसप्त शृंगारिका हों या एकल जीवन यापनी अ-पति, तुंदल नरपति हों या दरिद्र नारायण; किशोर हों या वृद्ध, सभी पुण्य लाभ की सुअभिलाषा के साथ यहाँ आए; क्षिप्रा स्नान किया। अन्हान का सिंहस्थ में विशेष महत्त्व है, इसलिए इसे ‘अन्हान पर्व’ अर्थात् ‘स्नान पर्व’ कहा जाता है।

विशालता, भव्यता, स्वच्छता इन त्रयी का नयनाभिराम स्थल है, ‘सिंहस्थपुरी का सिंहस्थ’ बड़े-छोटे मंदिर, मलयज चीर, धूप-हवन सुगंध से सारा वातावरण ‘स्वर्गादपि गरयसी-सा’ प्रतीत हो रहा है। यहाँ पधारे संतों ने इसे ‘वैश्विक अध्यात्म का पवित्र दर्शन’ माना है और ‘जल महात्म’ को विशेष स्थान दिया है। स्वामी सत्यमित्रानंद एवं स्वामी अवधेशानंदजी महाराज ने आदिवासियों-वनवासियों के उत्थानार्थ ‘वनवासी कुंभ’ की अवधारणा अवधारित की। मुझे लगा, संतवाणी में संविधान वाणी का संगम हो गया और इस महाकुंभ में समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक अवधारणा के दर्शन हुए। यहाँ का वातावरण इतना आध्यात्मिक है कि नास्तिक भी आस्तिक हो जाए। सर्वधर्म समानता और सहयोग सिंहस्थ को विश्व मानचित्र में भारत की शान सिद्ध कर रहा है। सहसा विचार कौंधा कि यदि संतों के प्रवचनों में राष्ट्रवादी मुद्दे तथा संवैधानिक जागरूकता भी शामिल हो जाती तो और सशक्त परिचय सामने आता। वोल्गा वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन संस्थान को यहाँ संवैधानिक जागरूकता के ‘कैपहर्ड’ प्रोजेक्ट का आयोजन करना चाहिए था। आखिर व्यावहारिक तौर पर यह संविधान प्रदत्त उपबंधों के अंतर्गत ही वह संभव हो पा रहा है। क्षिप्रा स्नान के साथ यहाँ काल भैरव, हरसिद्धि देवी, गढ़कालिका, चिंतामन गणेश, मंगलनाथ, इस्कॉन मंदिर, वेधशाला भरतरी गुफा, नवग्रह मंदिर, कर्क रेखा मंदिर आदि भी दर्शनीय स्थल हैं। उज्जैन से आगे आगरे के पास नलखेड़ा में माँ बगलामुखी का पांडवयुगीन मूल सिद्धपीठ है, इनके दर्शन का सौभाग्य मुझे मेरे बहनोई साहब श्री शैलेंद्र निगमजी के सहयोग से प्राप्त हुआ। ये सब स्थल भी अवश्य देखने चाहिए।

सिंहस्थ के सुंदर सौभाग्यजनक क्षणों को अचानक आए प्राकृतिक कोप का सामना करना पड़ा। सर्वस्व जल त्राही का दृश्य निर्मित हो गया। बड़े-बडे़ पंडाल, दुकानें धराशायी हो गईं। पर दो दिनों में ही जीवन सामान्य सा हो चला है। लोगों का आगमन भी पूर्ववत् हो गया। शासन के साथ संतों की जन सेवाएँ अनुताप पूरित मनों में पुनः विश्वास ज्योति जला रही हैं। मैं कुछ लोगों से मिला। जबलपुर से पधारीं प्रभा श्रीवास्तव, इंदौर की निवेदिता निगम, कल्पना आनंद, रागनी चक्रधर तथा डॉ. ए.बी. चक्रधर, सिवनी से आए दादू निवेंद्र नाथ सिंह, सुमन सिंह, खंडवा के रमेश पटेल, लोचन सिंह, छिद्दू, पूरनलाल, छिंदवाड़ा की किरण श्रीवास्तव, दिल्ली से आए सार्थक निगम, भोपाल के सुरेश ब्यौहार, वीणा ब्यौहार, चेन्नई के एम. पिल्लै, वेल्लूर के समर्थ निगम, सभी ने व्यवस्थाओं की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। पवित्र डुबकी के इस दस महायोगों के पुण्य संगम के अंतिम चरणों में समीपस्थ ग्राम निनौरा में विभिन्न मानव उपयोगी विषयों पर अंतरराष्ट्रीय विचार कुंभ का भव्य आयोजन किया गया। स्थापित लोगों ने अपने-अपने विचार रखे, जिससे सकारात्मक वातावरण का निर्माण हुआ। यदि यहाँ आमजनों को भी कुछ कहने का अवसर मिलता तो यह विचारों की व्यावहारिक डुबकी होती। ऐसा मेरा अभिमत है। इस सम्मेलनोपरांत मेरी तरह संभवतः कई आलेख-लेखकों को प्रतीक्षा थी कि १५ मार्च, २०१५ तक आमंत्रित आलेखों में से चयनित दस उत्कृष्ट आलेखों की जानकारी प्राप्त होगी, पर ऐसा हो न सका!

नारी प्रथम प्रणाम योग्य है। इसकी समतुल्य शक्ति का एक सुंदर उदाहरण यहाँ दिखा, जब पूजा क्षेत्र में नारी प्रतिनिधित्व के लिए योगानंद नारी शक्तिपीठ द्वारा महिलाओं को योग शिक्षा के साथ अध्यात्म का बोध कराया गया। इसी प्रकार संतों की यह घोषणा कि आतंकवाद के विरोध में ‘विश्व धर्म संसद्’ दिल्ली या हरिद्वार में आयोजित होगी। नमन है ऐसे प्रयासों को। इस अग्निवर्षा जैसे ताप में, श्रद्धालुओं के तदनुसार से सराभूत तनु, श्रद्धा की शीतलता लिये महाकाल की नगरी और क्षिप्रा की पवित्र जलधारा में पुण्य अर्जन की डुबकी को अपना ध्येय बनाए, सब कष्टों को बिसराकर सरकार के इस प्रशंसनीय प्रयास को सफल बना रहे हैं। यह सबसे महत्त्वपूर्ण विषय बिंदु है। इधर सरकार ने भी अंतिम चरण में पृथ्वी पर सम्यक् और संतुलित जीवन के लिए हर समुदाय हेतु उपयोगी सार्वभौम अमृत संदेश जारी किया, जिससे भारतीयता का पल्लव पूरे विश्व में आच्छादित हुआ।

भारत का यह महा आयोजन आत्मशुद्धि के लिए विदेशियों को भी यहाँ खींच लाया और वे सामूहिक रूप से हवन वेदी में यज्ञ करने बैठे। इससे यह स्पष्ट होता है, ‘जापर विपदा परत है सो आवत यही देस’। विदाई की वेला आ गई है; पुलकित यामिनी, नव-विहान का आलिंगन कर रही है। सर्वत्र प्रस्थान के लिए हवन-पूजन हो रहे हैं। मौसम के मिजाज में भी आर्द्र शीतलता है, मानो दुःखी होकर कह रहा हो, ‘विदा मित्रं सिंहस्थ।’ कुछ दिन पूर्व तक जो व्यापारी बंधु आय की कठोर एक पक्षीय कार्यशैली अपनाए थे, वे भी अब शांत चित्त दिख रहे हैं। सुंदर यादों को सँजोए, माँ क्षिप्रा को प्रणाम कर, भारी हृदय से मैं भी वापस जा रहा हूँ।

पुनः २० अपै्रल, २०२८ को नभोमणी की राशि में अनिमिष आचार्य प्रवेश के साथ सिंहस्थ आगमन होगा। उस समय की क्या परिस्थितियाँ होंगी! मिलन-विदा जीवन का शाश्वत सत्य है, वह किस रूप में होगा! कौन कहाँ होगा! सब समय-काल के गर्भ में है। नमन है हर श्रद्धालु को, नमन है हर कार्यकर्ता को, नमन है सिंहस्थ और सिंहस्थ धरा को; और नमन है, मेरे सखा-मेरे राष्ट्र ‘भारत’ को।

दादू मोहल्ला, संजय वार्ड

सिवनी-४८०६६१ (म.प्र.)

दूरभाष : ९४२५१७५८६१

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