लला, फिर आइयो खेलन होरी

लला, फिर आइयो खेलन होरी

होली-दहन की पूर्व-संध्या पर, यानी ४ मार्च, २०१५ को ऐसा संयोग बना कि वृंदावन धाम के दर्शनों का पुण्य लाभ मिला। हमारे मित्र भाई जीत शर्मा प्रतिवर्ष बिहारीजी के साथ होली खेलने के लिए वृंदावन जाया करते हैं। भगवत्-प्रेमी होने के कारण उन्हें अकेले जाना सुहाता नहीं है, सो एक दिन में ही एक बड़ा यात्री-दल तैयार हो गया। इस दस सदस्यी यात्री दल में मेरे मित्र आनंद शर्मा, भाई जीत शर्मा, बिजेंद्र सिंह, भाई महेशजी तो एक गाड़ी में तथा भाई धर्मेंद्र एवं उनके चार साथी, जिनमें लगभग सभी तरुण हैं, और सब-के-सब पहली बार वृंदावन यात्रा पर आए हैं। बिजेंद्र भाई युवा हैं, कुकिंग के मास्टर हैं, बड़े-बड़े शादी-समारोहों का काम उठाते हैं। धर्मेंद्र भाई महेश भाई के अनुज हैं, अपना गैराज है, बहुत दक्ष मेकैनिक हैं और बाकी के तरुण उनके साथ गैराज में काम करनेवाले प्रशिक्षु हैं। ये सब धर्मेंद्र भाई की गाड़ी में सवार हैं। चार मार्च के भोरे-भोर पाँच बजे हम सब वृंदावन की तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। इतने सवेरे दिल्ली की सड़कों पर ज्यादा ट्रैफिक नहीं है। दो दिन पूर्व ही देशभर में भारी वर्षा और कहीं-कहीं ओलावृष्टि भी हुई है, सो मौसम खासा ठंडा हो गया है। सड़कों पर दृश्यता तो पर्याप्त है, लेकिन सड़क के दोनों ओर दूर-दूर हल्की धुंध दिखाई पड़ रही है। पेड़-पौधे उनींदे, अलसाए से खड़े हैं, पक्षी अभी जागे नहीं हैं, सो वातावरण में खासी नीरवता छाई हुई है।

अब हम लोग पलवल के आसपास हैं और पूरब दिशा में पौ फट रही है, लाली छा रही है। बालरवि ने स्वर्ण-रजाई से अपना मुख बाहर निकाला भर है। दूर-दूर तक फैले खेतों के बीच और पेड़ों के पीछे ताँबई-लालवर्णी बालरवि कितना मनोहर लग रहा है! सभी का शिशु रूप मनोहारी होता है। पल-छिन-पल गोले का आकार छोटा होकर स्वर्ण-आभा बढ़ती जा रही है। सूर्यदेव रथारूढ़ हो जगत् के कल्याण के लिए अपनी दैनिक यात्रा पर निकल पड़े हैं। अहा! अब तो इनसे आँखें मिलाना भी कठिन हो रहा है, आँखें चुँधिया रही हैं। खैर, सूर्यदेव के साथ हम भी अपनी यात्रा पर आगे बढ़ रहे हैं, बढ़े चले जा रहे॒हैं। लगभग साढ़े आठ बजे हम लोग छठीकरा मोड़ आ पहुँचे और मथुरा राजमार्ग छोड़ बाईं ओर वृंदावन मार्ग पर आगे बढ़े। यहाँ से मात्र एक कि.मी. की दूरी पर गाड़ी की दिशा में दाईं ओर माँ वैष्णो देवी का धाम है। सड़क के बाईं ओर मंदिर के सामने के विशाल मैदान में गाडि़याँ खड़ी कर दी गईं। लगभग सभी मंदिरों में जूता-चप्पल, चमड़े की चीजें बेल्ट, पर्स तथा बीड़ी, सिगरेट के साथ मोबाइल ले जाना मना है। सो ये सब चीजें गाड़ी में छोड़ दी गईं। मित्र आनंद शर्मा मंदिर जाने के अनिच्छुक हैं, क्योंकि पूर्व यात्रा में वे यहाँ के दर्शन कर चुके हैं। हम सब इकट्ठे ही मंदिर के प्रवेश-द्वार से अंदर आ गए हैं। यहाँ द्वि-स्तरीय जाँच व्यवस्था है। पहले तो मुख्य प्रवेश-द्वार पर घुसते ही और आगे मुख्य मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व। यहाँ बाईं ओर अमानती घर है, यानी अपना सामान यहाँ रख सकते हैं। दाईं ओर पेयजल की प्याऊ है, इसके साथ ही कई खिड़कियाँ हैं, जहाँ से यात्रा-परची लेना अनिवार्य है, जो निःशुल्क मिलती है—बिल्कुल जम्मू-कटरा के वैष्णो-यात्रा की तर्ज पर। हम नौ जन हैं, सभी की एक परची ले ली गई।

परची लेकर ठीक ८:४८ पर हम लोग मंदिर की ओर बढ़े। यहाँ पर हमारी पुनः गहन जाँच-पड़ताल की गईर्। पुरुष तथा महिला यात्रियों की जाँच हेतु अलग-अलग सिक्यूरिटी गार्ड तैनात हैं। मंदिर परिसर में फर्श इतना ठंडा है कि नंगे पैर रखने को मन नहीं कर रहा है, सो पंजों के बल चल रहे हैं। वास्तु की दृष्टि से मंदिर का डिजाइन ऐसा है कि इसे इनडोर और आउटडोर, दोनों रखा गया है। कुछ सीढि़याँ चढ़कर हम नीचे उतरे, सीढि़याँ उतरते ही बाईं ओर गर्भगृह में माँ वैष्णो का मंदिर है। गर्भगृह के मंदिर के प्रवेश-द्वार के साथ बाईं ओर यमुनाजी सदेह विराजमान हैं और निकास-द्वार पर गंगाजी। अंदर कुछ सीढि़याँ उतरकर विशाल गोलाकार हॉल है, इसके बीचोबीच गोल चबूतरे पर सिंह पर सवार माँ वैष्णो विराजमान हैं। माँ की मूर्ति के ठीक सामने उनके पद-चिह्न अंकित हैं तथा बाईं ओर अखंड ज्योति प्रज्वलित है। हम सबने माँ को दंडवत् प्रणाम किया। पुजारीजी ने सभी के मस्तक पर सिंदूर का तिलक लगाया। गोलाई में दीवारों पर नाना संत-महात्माओं तथा कृष्णलीला के सुंदर चित्र अंकित हैं। मोटे और मध्यम आकार के विशाल खंभों के ऊपर कृत्रिम पहाड़ बनाया गया है, जो देखने में बिल्कुल प्राकृतिक लगता है। गर्भगृह के ठीक सामने खुला मैदान यानी जागरण-स्थल है, जहाँ पर चबूतरानुमा मंच बनाया गया है। इसी के बाईं ओर विशाल आम्रवृक्ष है, जिसका तना छोटे से चबूतरे पर लोहे की जालीदार रेलिंग से सुरक्षित कर दिया गया है। श्रद्धालुओं द्वारा यहाँ मनौती के लिए सैकड़ों चुनरी बाँध दी गई हैं। भारतीय लोगों की इच्छाओं का अंत नहीं, सब देवी-देवताओें के यहाँ उनकी अर्जियाँ हमेशा पेंडिंग रहती हैं। अस्तु।

यहाँ बनाई गई गुफा भी दर्शनार्थियों के आकर्षण का केंद्र है, सो हम सब ने बाईं ओर स्थित गुफा के द्वार में प्रवेश किया। गुफा को रंग-बिरंगी रोशनी के द्वारा कौतूहल पैदा करनेवाली तथा जीवंत बनाया गया है, कलाकारी ऐसी कि यह एक प्राकृतिक गुफा ही मालूम पड़ती है। गुफा के अंदर सबसे पहले विनायकजी के साथ रिद्धि-सिद्धि की बड़ी मनमोहक झाँकी है। इसके बाद कुछ-कुछ अंतराल पर माँ शेरोंवाली के नौ रूपों—वैष्णो माता, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, महागौरी, सिद्धिदात्री के साथ-साथ भैरवजी और उनके कुत्ते की इतनी सुंदर-सजीव झाँकियाँ हैं, लगता है कि अभी बोल पड़ेंगी। गुफा के निकास-द्वार पर गौ-चारण लीला की विशाल झाँकी मन मोह लेती है। अच्छा, आधी गुफा पार करने के बाद रास्ता ऊपर की ओर खुले आसमान के नीचे खुलता है, यहीं पर पहाड़नुमा धरातल पर सिंह पर सवार माँ वैष्णो तथा विनयावनत, गदा को जमीन पर टिकाए हनुमान की विशाल प्रतिमाएँ स्थापित हैं, जो इस मंदिर की लोकप्रियता का कारण हैं। ये विशाल मूर्तियाँ दूर से ही दिखाई पड़ने लगती हैं और सामने की सड़क से गुजरनेवाले हर यात्री का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। शिल्पियों ने इन्हें इतनी खूबसूरती से बनाया है कि इनमें बस जान डालना बाकी रह गया है। यहाँ मूर्तियों के चरणों में खड़े होने पर व्यक्ति बौना दिखाई पड़ता है। गुफा के ऊपर जो खुला स्थान है, इसमें रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ इस तरतीब से बनी हैं कि यह पूरा क्षेत्र रंग-बिरंगा कालीन ही मालूम पड़ता है।

इस मंदिर का निर्माण जे.के. ट्रस्ट द्वारा करवाया गया है। इसका उद्घाटन २२ मई, २०१० संवत् २०६७, वैशाख शुक्ल नवमी को जाने-माने विद्वान् डॉ. कर्णसिंह के कर-कमलों से संपन्न हुआ था। हम लोग खुले प्रांगण में हैं और यह देखकर चकित हैं कि पूरे मंदिर परिसर में फर्श इस कलाकारी के साथ बनाया गया है कि इसके काठ से बने होने का भ्रम होता है, लेकिन है एकदम कंक्रीट-सीमेंट का। यहाँ ठहरने की भी व्यवस्था है। अब हम माता को पुनः दंडवत् प्रणाम कर निकास-द्वार की ओर आ रहे हैं। मुख्यद्वार के बाहर कुछ तीर्थयात्री माता वैष्णो की विशाल प्रतिमा को पार्श्व में लेकर फोटो खिंचवा रहे हैं। जैसे ही कोई यात्री या यात्री-दल मंदिर की ओर आता है, यहाँ पर खड़े चार-छह फोटोग्राफर फोटो खिंचवाने के लिए उनसे बड़ी मनुहार करते हैं। हम लोगों ने सड़क पार की और अपने-अपने वाहन में सवार हो आगे चल पडे़।

अब हम वृंदावन की ओर बढ़ते हुए थोड़ा आगे इसी सड़क के बाईं ओर निर्माणाधीन वृंदावन चंद्रोदय मंदिर देखने आए हैं। मंदिर के परिसर में ही गाड़ी पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है। विशाल फाटक पार कर गाडि़याँ अंदर खड़ी कर दी गईं। अभी भी मौसम ठंडा है, सभी ने स्वेटर आदि पहन रखे हैं। चूँकि आज हम लोग प्रातः चार बजे उठकर पाँच चल पडे़ थे, सो पेट साफ न होने के कारण दबाव बन रहा है। मंदिर परिसर में शौचालय सुविधा है। सो हम तीन जन शौचालय जाकर निबटे। हाथ धोने के लिए यहाँ एक मग में खुला सैंपू रखा है, इसी से अच्छी तरह हाथ साफ किए, मुँह-हाथ धोए। देखते क्या हैं कि मित्र आनंद शर्मा तो मंदिर दर्शन के लिए आगे निकल गए हैं और बाकी लोग हरे-भरे लॉन में बैठे खिचड़ी का नाश्ता उड़ा रहे हैं। हम तीनों ने भी गरमागरम खिचड़ी का नाश्ता किया। खिचड़ी-प्रसाद यहाँ प्रातः से ही तैयार हो जाता है और निःशुल्क वितरित होता है। देव-दर्शन से पहले आपको यहाँ बन रहे दुनिया के सबसे ऊँचे मंदिर के बारे में बताए देते हैं।

पूज्य प्रभुपाद स्वामी की इच्छानुसार इस्कॉन द्वारा यहाँ दुनिया के सबसे ऊँचे और विशाल ७० मंजिला ‘वृंदावन चंद्रोदय मंदिर’ का निर्माण कार्य प्रगति पर है। इसकी ऊँचाई २१३ मीटर यानी ७०० फीट होगी। इसका विस्तार अर्थात् कुल क्षेत्रफल ५,४०,००० वर्ग फीट है। इसके निर्माण पर ३०० करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। मंदिर परिसर के २६ एकड़ क्षेत्र में पवित्र बारह वन विकसित किए जाएँगे, इनको ‘द्वादश कानन’ नाम दिया गया है। इनमें फलदार, शोभादायी, सुगंधि देनेवाले, सदाबहार वृक्षों के साथ-साथ, झरने, जल से भरी सुंदर झील विकसित की जाएगी, इसमें खिलनेवाले कमल और कुमुदिनी पुष्प इसकी सुंदरता में चार चाँद लगाएँगे। वैसे तो मंदिर ६२ एकड़ में फैला है, परंतु बारह एकड़ क्षेत्र में पार्किंग की व्यवस्था की जाएगी। इस मंदिर की चोटी यानी आखिरी तल पर एक उच्च शक्ति का टेलीस्कोप लगाए जाने की योजना है। इसके माध्यम से आनेवाले श्रद्धालु पूरे वृंदावन धाम का नजारा देख सकेंगे। इस विश्वविख्यात मंदिर का शिलान्यास १६ नवंबर, २०१४ को राष्ट्रपति मान. प्रणब मुखर्जी द्वारा किया गया। इस भव्य मंदिर के वर्ष २०१९ तक बनकर तैयार हो जाने का अनुमान॒है।

खिचड़ी का नाश्ता कर हम लोग अब बाईं ओर स्थित ‘राधा-माधव’ मंदिर में दर्शनार्थ आगे बढ़े। यहाँ का वातावरण सुगंधित तथा अलौकिक आभा से देदीप्यमान है। कुछ सीढि़याँ चढ़कर हम लोग ऊपर पहुँचे। यहाँ मैं राधा-कृष्ण की युगल मनोहर झाँकी अपलक देखता रह जाता हूँ। कुछ देर निहारकर दंडवत् प्रणाम करता हूँ। फिर हम सब कुछ देर यहाँ बैठे। अपूर्व शांति और अलौकिक आनंद की अनुभूति हो रही है। आखिर एक-एक कर हम सब नीचे उतर आए। यहाँ हमारे बाईं ओर इस्कॉन द्वारा संचालित ‘अक्षयपात्र रसोई’ के द्वारा दस मील के दायरे में आनेवाले सभी विद्यालयों में मिड डे मील यानी दोपहर का खाना उपलब्ध कराया जा रहा है। यहाँ खाना बनाने की आधुनिक मशीनें लगी हैं। यहाँ के पुजारीजी ने अक्षयपात्र योजना के बारे में बताया कि एक बार भक्ति वेदांत स्वामी ने अपनी यात्रा के दौरान कलकत्ता के पास मायापुर गाँव में बड़ा ही हृदयद्रावक दृश्य देखा। भूखे बच्चों का एक झुंड गली के आवारा कुत्तों के बीच जूठन पाने के लिए जद्दोजेहद कर रहा था। इस दृश्य ने स्वामीजी के हृदय को झकझोर दिया। उसी क्षण उसी दिन उन्होंने प्रण किया कि हमारे (इस्कॉन) सेंटरों के दस-दस मील के दायरे में कोई बच्चा भूखा नहीं रहेगा, और इसी प्रण के साथ ‘अक्षय पात्र फाउंडेशन’ का जन्म हुआ। पहले-पहल जून २००० में अक्षय पात्र फाउंडेशन ने ‘मिड डे मील’ का शुभारंभ कर बंगलौर के पाँच सरकारी विद्यालयों के १५०० बच्चों को दोपहर का भोजन देना शुरू किया और आज पूरे देश में इस्कॉन द्वारा लाखों बच्चों को भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।

वर्तमान में तो यह दुनिया का सबसे विशाल ‘मिड डे मील’ कार्यक्रम है, जो भारत सरकार, राज्य सरकारों एवं दानदाताओं के सहयोग से सरकारी और निजी हिस्सेदारी के तहत चल रहा है। उन्होंने हाथ के इशारे से इंगित कर बताया कि हमारी इस अक्षय रसोई के द्वारा पूरे ब्रज क्षेत्र के स्कूलों में बच्चों को दोपहर का भोजन पहुँचाया जाता है। इस कार्यक्रम में कोई भी किसी प्रकार से सहयोग कर सकता है। गरीब बच्चों को भूख की मार से बचानेवाला यह महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है। पुजारीजी को प्रणाम कर हम अपने वाहनों की ओर लौटे। मित्र आनंद शर्मा ने दर्शनों के बाद खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण किया।

अब हम इसी सड़क पर एक-डेढ़ किलोमीटर आगे बाईं ओर जगद्गुरु कृपालुजी महाराज की अनमोल विरासत ‘प्रेममंदिर’ आ पहुँचे हैं। वाहन मंदिर के बाहर खडे़ कर दिए गए। मुख्य-द्वार पर जाँच-पड़ताल के बाद मंदिर में प्रवेश किया। मंदिर-दर्शन से पहले हम आपको इसके निर्माण तथा इतिहास के बारे में बताए देते हैं। पाँचवें जगद्गुरु कृपालुजी महाराज का यहाँ पर आश्रम हुआ करता था। यहीं पर १४ जनवरी, २००१ को भव्य-दिव्य, शुभ्र-धवल ‘प्रेममंदिर’ का निर्माण कार्य शुरू हुआ। देश के कोने-कोने से चुने हुए नौ सौ से अधिक शिल्पियों, कलाकारों और वास्तु-विशेषज्ञों ने दिन-रात काम करते हुए लगभग ग्यारह वर्षों में प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर की शैली में शुद्ध श्वेत संगमरमर का यह प्रेममंदिर साकार किया। इसके निर्माण में लगभग तीस हजार टन इटालियन संगमरमर काम में आया और निर्माण पर तब एक सौ पचास करोड़ से अधिक की राशि खर्च हुई। दुनिया के सबसे बेहतर क्वालिटी के संगमरमर से बने इस मूल मंदिर की लंबाई एक सौ पचासी फीट तथा चौड़ाई एक सौ पैंतीस फीट है। पूरे मंदिर में दक्षिण की स्थापत्य शैली के दर्शन होते हैं। संगमरमर पर बारीक नक्काशी और अंकन का काम गुजरात के सुप्रसिद्ध शिल्पी सुमनराम त्रिवेदी सोमपुत्र द्वारा किया गया है। दूध-सा ध्वल यह दुमंजिला भव्य मंदिर भगवान् ‘राधा-कृष्ण’ को समर्पित है। कृष्णं वन्दे जगद्गुरुः।

यह पूरा मंदिर ५४ एकड़ में फैला है। इसका भव्य उद्घाटन १५ फरवरी, २०१२ को हुआ और १७ फरवरी, २०१२ को दर्शनार्थियों के लिए खोल दिया गया। सबसे बड़ी बात यह है कि इस मंदिर में खंभों का उपयोग नहीं किया गया है। पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण यह मंदिर तिहत्तर हजार वर्ग फुट में फैला है और एक समय में यहाँ २५००० दर्शक मंदिर-प्रांगण में समा सकते हैं। इस लिहाज से खुला क्षेत्र काफी विस्तृत है। आओ, अब हम भी देव-दर्शन करने चलते हैं। हम प्रवेश मार्ग पर आगे बढ़े ही थे कि सब लोग गु्रप में मंदिर को पार्श्व में लेकर फोटो खींचने लगे। घुसते ही यहाँ बाईं ओर रंग-बिरंगे फूलों की कलात्मक फुलवाड़ी जैसे दर्शकों का स्वागत कर रही है। प्राकृतिक वातावरण में कृष्णलीला की झाँकियाँ इतनी मनोहारी हैं कि बिल्कुल सजीव मालूम पड़ती हैं।

यहाँ एक झाँकी में बालकृष्ण वंशी टेर रहे हैं, इर्द-गिर्द गोप-ग्वाले, गाय-बछडे़, मोर और अन्य जीव बाँसुरी की रस-माधुरी में बेसुध हैं। इसके बाद नटखट कृष्ण सखाओं के साथ हैं, पानी के जीव भी बाहर निकलकर उन्हें एकटक निहार रहे हैं; गोप-गोपियों के साथ कृष्ण। अहा! यहाँ तो गोवर्धन नख पर धारे कान्हाजी इंद्र का मान-मर्दन कर रहे हैं। इस झाँकी का अनोखापन इस बात में है कि पूरा गोवर्धन पहाड़ हवा में लटका मालूम देता है। दर्शकों की आँखें आश्चर्य से फैल जाती हैं कि आखिर यह टिका कैसे है! इसके सामने से हम पहले मूल मंदिर की ओर मुडे़। यह मंदिर आयताकार चार फुट ऊँचे चबूतरे पर खड़ा है। इस चबूतरे के प्रवेश की सीढि़यों पर स्थापित दो सुसज्जित हाथी दर्शनार्थियों के स्वागत में खडे़ हैं। संगमरमर के ये सफेद हाथी बच्चों को बडे़ लुभा रहे हैं। अनेक दर्शक और बच्चे इनके साथ खडे़ होकर फोटो खिंचवा रहे हैं।

प्रेममंदिर में आने-जाने के दो रास्ते हैं, सो प्रवेश-द्वार पर दंडवत् प्रणाम कर हम आगे बढ़े। गर्भगृह में ठीक सामने श्रीराधा-कृष्ण की अत्यंत मनोहारी युगल मूर्तियाँ विराजमान हैं। इनके ठीक सामने के सभा-मंडप में कीर्तन चल रहा है, दो भजन-गायिकाएँ अपनी प्रस्तुति दे रही हैं। दोनों मूर्तियों के समक्ष हमने दंडवत् प्रणाम किया। पुजारीजी ने पंचामृत पान कराया। श्रीराधा-कृष्ण भगवान् के ठीक सामने कृपालुजी महाराज की सुंदर-सजीव प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के दोनों ओर दीवारों में कृपालुजी महाराज की कीर्तनरत नाना झाँकियाँ, साथ ही चैतन्य महाप्रभु की सुंदर झाँकी है। मंदिर की दीवारों पर दरवाजों के आसपास बारीक नक्काशी की गई है। दर्शनार्थी हाथ लगाकर इन्हें गंदा न करें, इसलिए इन्हें पारदर्शी पॉलीथीन से ढक दिया गया है। बाईं ओर स्थित सीढि़यों से अब हम ऊपर जा रहे हैं। यहाँ भी नीचे की तरह ही भगवान् राधा-कृष्ण की नयनाभिराम युगल झाँकी के ठीक सामने कृपालुजी महाराज की साधनारत सुंदर प्रतिमा लगाई गई है, जिससे कि वे अपने ईष्ट का हर पल दर्शन करते रहें। राधा-कृष्ण की मूर्तियाँ इतनी मनोहारी हैं कि दर्शनार्थी एकटक देखते रह जाते हैं, पलक झपकाना ही भूल जाते हैं, श्रद्धावश हाथ अपने आप जुड़ जाते हैं। हर कोई मनमोहन की दिव्य झाँकी को आँखों में बसा लेना चाहता है।

यहाँ भी हमने राधा-कृष्ण एवं कृपालुजी महाराज को दंडवत् प्रणाम किया और हम सीढि़याँ उतरकर मंदिर के बाहर आ गए। फिर बाईं ओर से शेष बची झाँकियाँ देखते आगे बढ़े। छोटे-छोटे उद्यानों में रंग-बिरंगे फूलों और हरी-हरी घास पर गोपियों के साथ रास रचाते कृष्ण, ग्वाल-बालों के साथ गौएँ चराते कृष्ण, सखाओं के संग नाना खेल खेलते कृष्ण। कृष्ण ही कृष्ण! एक से एक सुंदर झाँकियाँ हैं। हरी घास के बीच खडे़ धवल-श्वेत बगुले और नाचते मोर एकदम सजीव मालूम पड़ते हैं, उनकी भाव-भंगिमाएँ इतनी सहज कि शक की गुंजाइश ही नहीं। प्रेममंदिर की बाहरी दीवारों पर ऊपर से नीचे तक आद्योपांत संपूर्ण कृष्णलीला की झाँकियाँ इतनी कलात्मकता से उकेरी गई हैं कि इनके दर्शन के बाद भगवान् कृष्ण के बारे में जानने के लिए कोई ग्रंथ पढ़ने की जरूरत नहीं रह जाती है।

झाँकियों के दर्शन करते हुए अब हम बाहर की ओर आ रहे हैं, यहाँ अंतिम विशाल झाँकी में भगवान् कृष्ण कालिय नाग के फन पर नृत्य कर रहे हैं। कृत्रिम सरोवर के बीच इसे पूरी तरह प्राकृतिक बनाने की कोशिश की गई है—लता, विटप, तरु सबकुछ है इस झाँकी में। मंदिर के संपूर्ण दर्शन करने में कम-से-कम दो घंटे लगते हैं। यह मंदिर बच्चों की पहली पसंद है, बच्चे तो यहाँ से बाहर निकलना ही नहीं चाहते हैं। रात्रि को लकदक रंग-बिरंगी रोशनी में इस मंदिर के दर्शन करने पर अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। यह वृंदावन के विशाल और ख्याति प्राप्त मंदिरों में गिना जाता है। मित्र आनंद शर्मा हम सबसे अलग और आगे-आगे दर्शन करते हुए निकास-द्वार के पास हमारा इंतजार कर रहे हैं। कुछ देर में हम उनसे आ मिले और मंदिर परिसर से बाहर निकल अपने-अपने वाहन में बैठ अगले मंदिर के दर्शनार्थ निकल पडे़।

अब हम श्रीबाँके बिहारीजी के दर्शन करने जा रहे हैं। हमारी गाडि़याँ सीधी न जाकर परिक्रमा मार्ग पर बाएँ मुड़ गईं। जब तक हम और हमारे वाहन श्रीबाँकेबिहारी मंदिर के पास पहुँचें, तब तक हम आपको इस मंदिर के बारे में भी बताए देते हैं। बाँकेबिहारी मंदिर का निर्माण स्वामी हरिदास ने संवत् १८६४ में वृंदावन की पावन भूमि पर करवाया था। इसके निर्माण की कथा स्वामी हरिदास से संबद्ध है। संगीत के सम्राट् और तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास का जन्म संवत् १५३६ में वृंदावन के निकट राजापुर गाँव में हुआ था। आगे चलकर हरिदास स्वामी आशुधीर देव के शिष्य बने। हरिदास बचपन से ही श्याम-सलोने के ध्यान में मग्न रहते थे, सो गुरु आशुधीर इन्हें देखते ही पहचान गए थे कि ये राधाजी की सखि ललिताजी के अवतार हैं। गुरु से मंत्र-दीक्षा लेकर हरिदास यमुना के समीप निकुंज के एकांत स्थान में ध्यानमग्न रहने लगे। अपनी युवावस्था में हरिदासजी निकुंज विहारीजी की नित्य लीलाओं का चिंतन करने लगे, तब निकुंज वन में इनको विहारीजी ने स्वप्न में जमीन से अपनी मूर्ति निकालने की प्रेरणा दी।

प्रभु की आज्ञा से जमीन को खोदकर श्रीविग्रह को मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की पंचमी को बाहर निकाला गया। यही सुंदर मूर्ति संसार में श्री बाँके विहारी के नाम से विख्यात है। इनके प्रकट होने की तिथि को ‘विहार पंचमी’ के रूप में बडे़ उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। स्वामी हरिदासजी निधिवन में ही श्रीविहारीजी की सेवा करते रहे। जब यह मंदिर बनकर बनकर तैयार हुआ, तब विहारीजी को यहाँ लाकर विराजमान कर दिया गया। कालांतर में स्वामी हरिदासजी की उपासना पद्धति में भी परिवर्तन किया गया और निंबार्क संप्रदाय से स्वतंत्र एक ‘सखी भाव संप्रदाय’ बनाया गया। तब से वृंदावन के लगभग सभी मंदिरों में इसी पद्धति के अनुसार प्रभु की सेवा एवं महोत्सव मनाए जाते हैं। इस मंदिर में केवल शरद पूर्णिमा के दिन श्रीविहारीजी वंशी धारण करते हैं। श्रावण मास में तीज को झूले पर बैठते हैं और केवल जन्माष्टमी के दिन ही उनकी मंगला आरती होती है। अक्षय तृतीया को श्रीविहारीजी के चरण-दर्शन होते हैं।

यहाँ नित्य मंगला आरती न होने के संबंध में यह कथा प्रचलित है कि एक दिन प्रातः वृद्ध स्वामी हरिदासजी ने देखा कि उनके बिस्तर पर कोई कपड़ा ओढ़कर सो रहा है, तो उन्होंने टोका, ‘अरे! मेरे बिस्तर पर कौन सो रहा है?’ अद्भुत आश्चर्य की बात कि वहाँ तो विहारीजी सोए हुए थे, सो यह पुकार सुनते ही वहाँ से उठकर निकल भागे, किंतु हड़बड़ी में अपना चूड़ा तथा वंशी बिस्तर पर ही छोड़ गए। जर्जर काया, वयोवृद्ध तथा दृष्टि क्षीण होने की वजह से स्वामीजी को ज्यादा कुछ नजर नहीं आया। उधर प्रातः जब पुजारीजी ने मंदिर के पट खोले तो उन्हें विहारीजी का चूड़ा तथा वंशी नजर नहीं आई। हताश-परेशान पुजारीजी दौडे़-दौडे़ निधिवन में स्वामी हरिदासजी के पास आए और सारी घटना कह सुनाई। स्वामीजी बोले कि प्रातः कोई मेरे बिस्तर पर सो रहा था, मैंने उसे टोका तो वह जल्दी-जल्दी में बिस्तर पर कुछ भूल गया है। तब पुजारीजी ने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखा कि बिहारीजी का चूड़ा और वंशी पलंग पर विराजमान हैं। इससे यही प्रमाणित होता है कि रात को बिहारीजी नित्य रास रचाने निधिवन जाया करते हैं, सो प्रातःकाल तक सोए रहते हैं। प्रातः बिहारीजी की मंगला आरती करने से उनके शयन में बाधा पडे़गी, इसी कारण से यहाँ मंगला आरती नहीं की जाती है। इसके अलावा इस संबंध में और भी कहानियाँ प्रचलित हैं।

श्री बाँके बिहारी मंदिर में ‘झलक दर्शन’ अर्थात् ‘झाँकी दर्शन’ होते हैं। कुछ-कुछ अंतराल पर परदे को हटाया जाता है। इसके संबंध में भी कई कहानियाँ प्रचलित हैं। बताया जाता है कि एक बार एक भक्तिन अपने पति के साथ बिहारीजी के दर्शन करने के लिए वृंदावन आई। श्रीबिहारीजी के दर्शनों के पश्चात् पति ने घर लौटने को कहा तो भक्तिन यह सोचकर विह्वल होकर रोने लगी कि अब बिहारीजी के दर्शन-लाभ से वंचित होना पडे़गा; फिर भी घर लौटना तो था ही, सो रोते-रोते बिहारीजी से विनती करने लगी, ‘हे प्रभु! न चाहते हुए भी मुझे घर लौटना पड़ रहा है। मैं आपके दर्शन के बिना कैसे रहूँगी। मेरी बड़ी इच्छा है साँवरे, कि आप मेरे साथ ही रहें।’ भारी मन से वह पति के साथ ताँगे में बैठकर स्टेशन की ओर निकल पड़ी। उधर बिहारीजी उसकी विनती से पिघलकर एक गोप बालक बनकर ताँगे के साथ चलते हुए भक्तिन से अपने साथ ले चलने का हठ करने लगे।

इधर पुजारीजी मंदिर में बिहारीजी को गायब देखकर अनुमान करने लगे कि हो न हो, ठाकुरजी उस भक्तिन के पीछे चले गए हैं। पुजारीजी तुरंत दौडे़ और आगे जाकर ताँगे में बैठी भक्तिन से पूछताछ करने लगे कि वह गोप बालक देखते-ही-देखते गायब! पुजारीजी लौटकर मंदिर आए तो देखा कि बिहारीजी अपने स्थान पर विराजमान हैं। एक कथा यह भी बताई जाती है कि एक भक्त नित्य दर्शन कर बिहारीजी को अपलक निहारता रहता, दीन भाव से टकटकी लगाए रहता। उसके प्रेम में पड़कर एक दिन बिहारीजी उसके साथ भाग निकले। पुजारीजी ने जब मंदिर कपाट खोले तो बिहारीजी गायब। फिर उन्हीं की प्रेरणा से पता चला कि वे एक भक्त के साथ चले आए हैं। जैसे-तैसे उन्हें वापस लाया गया। प्रेम के वशीभूत हो बिहारीजी किसी के भी साथ चले जाएँगे, अतः तभी से ऐसी व्यवस्था कर ही गई कि ‘झलक दर्शन’ में भक्त बिहारीजी से नजर न मिला सकें, इसलिए परदा निरंतर खुलता और बंद होता रहता है। यहाँ ऐसी और भी कई कहानियाँ सुनने को मिलती हैं।

हमारे वाहन अब मंदिर के करीब पहुँच चुके हैं। जीत भाई ने एक चौड़ी सी गली में सुरक्षित स्थान देखकर गाड़ी खड़ी कर दी, इसके पीछे दूसरी गाड़ी भी। अपने जूता-चप्पल, जाकेट, मोबाइल आदि सब गाड़ी में छोड़ दिए गए। श्री बाँके बिहरी जी का जयकारा लगाते हुए आगे बढ़े। मैंने अपना चश्मा उताकर जेब में रख लिया। डर है कि हनुमानजी के वंशज किस ओर से झपट्टा मार चश्मा ले उड़ें। मैं नहीं जान पाया कि यहाँ के बंदर चश्मे के ज्यादा शौकीन हैं या चश्मेवालों के प्रति ईर्ष्यालु हैं? बंदर पलक झपकते ही कंधे पर आ बैठेगा और चश्मा अपने कब्जे में कर सीधा छत पर। यदि ऐसा हो जाए तो चश्मा सही सलामत पाने का बड़ा आसान उपाय है कि एक केला उसकी ओर उछालिए, वह चश्मा आपकी ओर उछाल देगा। देख रहे हैं कि वृंदावन की गलियों में होली की धूम मची है। यहाँ वसंत पंचमी से होली प्रारंभ होकर डेढ़ माह, यानी रंग पंचमी तक चलती है। वृंदावन के हुरियारे बडे़ मशहूर हैं। भीगने से बचते, गुलाल से रँगते हम मंदिर की ओर बढ़ रहे हैं। मित्र आनंद शर्मा थोड़ा आगे निकल गए हैं। बिजेंद्र भाई ने होली खेलने के लिए गुलाल का दस किलो का एक कट्टा खरीद लिया, सब लोग इसी से होली खेलेंगे। बिहारीजी को भेंट के लिए एक-एक फूलमाला लेकर सबको हिदायत दे दी गई कि एक-दूसरे का साथ न छोड़ें। कारण—मंदिर से बाहर आने पर रंग-गुलाल में सराबोर कोई एक-दूसरे को पहचान नहीं पाएगा।

लाल पत्थर से बना यह भव्य मंदिर रंग-गुलाल की बौछार से और भी रंगीन हो गया है। संगमरमर का फर्श अबीर-गुलाल और रंग की कीचड़ से चिपचिपा रहा है। भक्तों की भीड़ इतनी ज्यादा है कि एक रेले में हम लोग मंदिर के बरामदे में जा लगे। ‘श्री बाँके बिहारी लाल की जय’ के नारों और अबीर-गुलाल के उड़ते बादलों के बीच ज्यादा कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है। हालाँकि इन दिनों बिहारीजी अपने स्थान से काफी आगे आ जाते हैं। जैसे ही परदा हटता है तो भक्तों का जन-सैलाब भी उन्मत्त हो ऐसा कोलाहल करता है कि पूरा मंदिर गूँज उठता है। सुरक्षा-सेवक भक्तों को आगे बढ़ाते जाते हैं। इस बार की हिलोर में हम लोग भी बिहारीजी के सामने जा प‌हुँचे। माला यहीं से फेंककर उन्हें अर्पित कर दी गई। फिर हुई गुलाल की बौछार। दाएँ से गुलाल, बाएँ से गुलाल, पीछे से गुलाल, सामने बिहारीजी की ओर से उनके सेवक-पुजारी भक्तों पर गुलाल उछाल रहे हैं। गुलाल ही गुलाल! मंदिर के क्षितिज में खुशबूदार रंगों के बादल छा गए। होली खेलनेवाले भक्तों का कोई ओर-छोर नहीं है।

भक्तों का अंग-अंग, पोर-पोर बिहारीजी की भक्ति के रंग में सराबोर हो गया है। होली के प्रति भक्तों में ऐसा उछाह, ऐसा उन्माद न कभी देखा, न कभी सुना, पर आज इस दिव्य होली-मिलन का हिस्सा बनकर आनंदित हूँ, गौरवान्वित हूँ। अभी हम इसी तरह जमे हुए मुट्ठी भर-भरकर गुलाल उड़ा रहे थे कि आनंद शर्मा किस हिलोर में बहकर हमसे आ मिले। मैंने और जीतभाई ने उन्हें गुलाल लगाया और गले मिले। एक अपूर्व आनंद, अनोखा रोमांच, एक अलग तरह का सुख मैं अनुभव कर रहा हूँ। मेरा चश्मा गुलाल से अँट गया है। भक्तों की भीड़ का दबाव इतना ज्यादा है कि यहाँ ठहर पाना असह्य हो रहा है, अतः मैं और महेश भाई जोर लगाकर किनारे की ओर खिसक आए।

भारत के कोने-कोने से तो लाखों कृष्णभक्त होली खेलने आ ही रहे हैं, विदेशों से आए अंग्रेज और गोरे कृष्णभक्त भी बड़ी संख्या में यहाँ आए हुए हैं। वे अपने महँगे कैमरों की परवाह न कर, रंग में सराबोर हो इस अद्भुत आनंद का लुत्फ उठा रहे हैं। धीरे-धीरे और आगे-पीछे हम सब लोग मंदिर से बाहर निकल आए। वास्तव में चेहरे से एक-दूसरे को कोई पहचान नहीं पा रहा है। बिजेंद्र भाई दल से बिछुड़ गए। कुछ देर बाद वह भी बाहर आ गए। फिर सब एक साथ अपने वाहनों की ओर बढ़े। पतली-पतली गलियों में छत से, खिड़कियों से, दरवाजों से गुलाल, रंग और कहीं से पानी की बौछार हो जाती है। छज्जों पर खडे़ बच्चे भी कूद-कूदकर पिचकारियाँ चला रहे हैं। कहीं ढोल की ताल पर नाच हो रहा है। अपूर्व उल्लास का वातावरण है चारों ओर। यहाँ कोई किसी को रंग लगा सकता है। यह तो प्रेम के रसिया की रास-भूमि है। अगर रंग से परहेज है या रंग-गुलाल का बुरा मानो तो अपने घर बैठो, यहाँ मान-गुमान नहीं चलता। ब्रज में सब रंगों पर एक रंग भारी है—प्रेम का रंग।

वृंदावन की गलियों से निकलते, भीगते अपने वाहनों के पास आ गए हैं। आनंद शर्माजी ने ठाकुरजी को गुझिया का भोग लगवाया था, सो हम सभी ने बाँटकर गुझिया का प्रसाद खाया और फिर वाहनों में बैठ आगे चल पडे़। कालीदह पर वाहन खडे़ कर दर्शन करने निकले। पहले यहाँ तक यमुना का बहाव था, पर आज यहाँ पक्की सड़क बनकर इसके दोनों ओर बसावट है। यमुनाजी काफी दूर चली गई हैं। यहाँ लाल पत्थर के दो छोटे-छोटे मंदिर बने हैं, जिनका जीर्णोद्धार इंदौर रियासत ने करवाया था। यहीं स्थित कदंब के वृक्ष को कृष्ण-काल का बताया जाता है। भगवान् कृष्ण यमुना के जल से गेंद लाने के लिए इस कदंब पेड़ पर चढ़कर ही यमुना जल में कूदे थे, उनके पद-चिह्न आज भी इस पर अंकित हैं। कुल मिलाकर भगवान् कृष्ण का यह लीला-स्थल अपनी दुरवस्था पर आँसू बहा रहा है। यहाँ भी हनुमान बंदर बड़ी संख्या में हैं।

इससे थोड़ा आगे चलकर इसी सड़क पर हम सिद्धपीठ इमलीतला के दर्शन करने आए हैं। सन् १५१६ में कार्तिक पूर्णिमा के दिन चैतन्य महाप्रभु सर्वप्रथम यहाँ पधारे थे। यहीं पर महाप्रभु की बैठक रही। इसी स्थान पर श्रीबिहारीजी इमली वृक्ष के नीचे श्रीराधाजी से मिला करते थे। ऐसा बताया जाता है कि यहीं महारास के समय इमली से श्रीराधाजी का आलता धुल गया था, सो श्रीराधाजी के शापवशात् आज भी ब्रज चौरासी कोस में इमली का वृक्ष फलता नहीं है। इमली के उस वृक्ष के तने पर बडे़ जतन से सीमेंट जैसा लेप लगा दिया गया है, जिससे तना समय की मार तथा हानिकर कीड़ों से बचा रहे। इस मंदिर की दीवारों पर दोनों ओर हरि-कीर्तन में निमग्न चैतन्य की नाना झाँकियाँ चित्रित हैं। मंदिर के पट बंद हो गए हैं, सो हमने वहीं कुछ देर इंतजार किया। पट खुलने पर बिहारीजी की सुंदर झाँकी तथा निमाई और निताई की मूर्तियों के दर्शन कर आरती में शामिल हुए। यहीं से अंदर की ओर निकलकर सेवाकुंज में ललिताकुंड के दर्शन किए। यहाँ पर बड़ी सुरक्षा के बीच संरक्षित रखी गई लता-पताएँ हैं, जो कृष्ण-काल की बताई जाती हैं। यात्री या यहाँ आनेवाले दर्शक इनको हानि न पहुँचाएँ, इसलिए जालीदार दर्शक-दीर्घा बनाई गई है। इसी में घूमकर तीर्थयात्री इन लताओं के दर्शन करते हैं। यहाँ बंदरों का बड़ा आतंक है, इस जाली-पथ में तीर्थयात्री भी इन बंदरों से सुरक्षित रहते हैं।

श्रीराधाजी की परम सखी ललिताजी के पुण्य स्मरण को बनाए रखनेवाला ‘ललिता कुंड’ यहीं पर है। यहाँ के पुजारी एक बंगाली बाबू हैं। देखने में आ रहा है कि यहाँ अधिकतर मंदिरों में, तीर्थस्थलों में बंगाली पुजारी तथा तीर्थपुरोहित काफी संख्या में हैं। बंगाल से तीर्थयात्री भी यहाँ बड़ी संख्या में आते हैं। हमारे इर्द-गिर्द बंगाल से आए स्त्री-पुरुष तीर्थयात्रियों के झुंड-के-झुंड दर्शन कर रहे हैं। पुजारीजी सभी को ललिता-कुंड के जल का आचमन करा रहे हैं। यहाँ अच्छी तरह दर्शन कर हम सब लोग अपने वाहनों पर आ गए। अब लगभग डेढ़ बज रहा है, भूख लग रही है, सो परिक्रमा-मार्ग पर स्थित अग्रवाल धर्मशाला के साथ वाहन खडे़ कर दिए गए और इसके परिसर में स्थित भोजनालय में भोजन करने बैठे। यहाँ पर शुद्ध शाकाहारी ताजा भोजन मिलता है। भोजन में दो सब्जी, दाल, रायता, रोटी, चावल, अचार, पापड़ आदि हैं, यानी ७५ रुपए में भरपेट भोजन। सभी ने रुचिकर भोजन किया।

धर्मेंद्र भाई तथा उनके साथियों को दिल्ली लौटना है, सो उनकी टीम के पाँचों सदस्य गाड़ी में बैठ दिल्ली के लिए रवाना हो गए। शेष पाँच जन हम गोकुल के लिए निकल पडे़। अचानक कार्यक्रम बदल गया। आनंदजी को जरूरी कार्य से आगरा जाना पड़ा, हम तीन जन गोकुल के रास्ते पर उतर गए, ये दोनों आगरा चले गए। हम पैदल चलकर गोकुल में घूमे, इन्हें आने में विलंब हुआ और रात साढे़ सात बजे ही लौट सके। रात्रि को रमण रेती में विश्राम किया। प्रातः वहाँ से निकलकर ब्रह्मांडघाट, रसखान समाधि, गोकुल आदि देख वृंदावन लौट आए। यहाँ की गलियाँ ज्यादा चौड़ी नहीं हैं। गलियाँ-सड़कें छोटी-छोटी हैं तो चौराहे भी छाटे-छोटे हैं। हर चौराहे पर उपलों तथा लकडि़यों से होली सजाई गई है और उसके ऊपर बड़ी सज-धज के साथ होलिका की गोद में बैठे भक्त प्रह्लाद की मूर्तियाँ विराजमान हैं। ऐसा दृश्य लगभग हर चौराहे पर देखने को मिलता है। गाड़ी रंगजी के मंदिर की पार्किंग में खड़ी कर दी गई।

पाँचों जन अब यहाँ से पैदल ही बिहारीजी के दर्शन के लिए चल पडे़। गलियों में बाएँ से दाएँ और दाएँ से बाएँ चलते हुए, भीगते, गुलाल-अबीर की बौछार सहते बाँकेविहारी मंदिर के प्रवेशद्वार पर पहुँचे। सभी ने साथ-साथ मंदिर में प्रवेश किया। कल की अपेक्षा आज भक्तों की भीड़ ज्यादा है। मंदिर प्रांगण में अबीर-गुलाल के बादल छा गए हैं। आगे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा है। नीचे फर्श पर रंग-गुलाल का एक फुट कीचड़-पानी खड़ा हो गया है। पर भक्तों का जोश-जुनून तनिक भी ढीला नहीं पड़ा है। भक्तों की रेलपेल है, सब एक रंग के हो गए हैं। बिहारीजी का परदा जैसे ही हटता है, ‘बाँके बिहारीलाल की जय’ के नारों से मंदिर गूँज उठता है। भीड़ के दबाव के चलते हम सब बिहारीजी की जय-जयकार करते हुए मंदिर के बाहर निकल आए। भली प्रकार दर्शन के बाद कुछ खरीदारी कर हम लोग अपराह्न एक बजे दिल्ली के लिए रवाना हुए। छठीकरा मोड़ पर पेडे़ का प्रसाद खरीदा। ट्रैफिक की मार सहते, चलते-रुकते पाँच बजे दिल्ली में प्रवेश किया और फिर साढे़ सात बजे घर आ लगे।

बड़ी अद्भुत और आनंददायी रही यह तीर्थयात्रा। जब-जब होली आएगी, तब इस यात्रा की याद आए बिना न रहेगी। होली तो हर वर्ष खेली जाती है, खेली जाएगी, पर होली में वह आनंद कहाँ, जो मित्र आनंद और आनंदकंद बिहारीजी के साथ खेली—अद्भुत! अलौकिक!! अविस्मरणीय!!!

जी-३२६, अध्यापक नगर, नांगलोई, दिल्ली-११००४१

दूरभाष : ९८६८५२५७४१

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