डॉ. रमाशंकर शुक्ल 'रसाल' हिंदी साहित्य का एक अनूठा व्यक्तित्व

डॉ. रमाशंकर शुक्ल 'रसाल' हिंदी साहित्य का एक अनूठा व्यक्तित्व

हिंदी साहित्य के इतिहास में आचार्य डॉ. रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ का स्थान अनेक रूपों में अप्रतिम है। वे अनेक विद्या शाखाओं के ज्ञाता और शास्त्रों के अधिकारी विद्वान् थे। भारतीय विश्वविद्यालयों में वे हिंदी के ऐसे प्रोफेसर थे, जिनके कंठ पर सरस्वती विराजमान थी। उन्हें ‘कंठस्थ’ विद्या पर विश्वास था। वे उसे ही विद्या मानते थे, जो मस्तिष्क में हो, उसे ही काव्य कहते थे, जो कंठ में हो। इस संदर्भ में कवि ‘ठाकुर’ को वे प्रायः उद्धृत करते थे—

‘पूछे कहि आवै, औ कहे पै गहि आवै वेगि

सो कवि कहावै, छबि पावै दरबार में।’

उनकी स्मरणशक्ति अद्भुत थी और तर्कबुद्धि अप्रतिहत, चाहे काव्य का क्षेत्र हो, चाहे ज्योतिष का, चाहे वैद्यक का, चाहे शोध का; रसालजी कभी पुस्तकाश्रयी ज्ञान के कायल नहीं रहे। उनके अनेक शिष्यों ने अपने उल्लेखों में ‘रसालजी’ की अध्यापन-कला की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। किसी भी विषय पर वे अपनी विलक्षण स्मरणशक्ति के बल पर घंटों व्याख्यान दे सकते थे, जिसमें अन्य भाषाओं के प्रासंगिक उद्धरण भी होते थे।

आधुनिक हिंदी काव्यांदोलनों के विपरीत वे रीति काव्य-प्रवृत्तियों के पोषक और ब्रजभाषा-काव्य के कट्टर समर्थक थे। आधुनिक काल में वे ब्रजभाषा के एकमात्र विश्रुत आचार्य और अलंकार शास्त्र के महापंडित थे। उनसे वरिष्ठ अनेक आलंकारिकों ने उनके अलंकार-ज्ञान की अतिशय प्रशंसा की थी। आचार्य ‘रसाल’ जी अलंकार को काव्य की आत्मा मानते थे। ‘रस’ की महत्ता को स्वीकारते थे, किंतु रस को काव्य की आत्मा नहीं मानते थे, उसे ‘नाटक’ की आत्मा मानते थे। डॉ. रसाल काव्य में चमत्कार को महत्त्वपूर्ण मानते थे। जहाँ चमत्कार नहीं, वहाँ कविता नहीं, ऐसी उनकी मान्यता थी। इसीलिए वे उस कवि को विशेष महत्त्व देते थे, जो समस्या पूर्ति की कला में कुशल हो, क्योंकि समस्यापूर्ति काव्य की ऐसी रीति थी, जिसमें चमत्कार चारुता का उत्कर्ष रहता था। उन्होंने अनेक युवा कवियों की काव्य-परीक्षा में समस्यापूर्ति को दृष्टि में रखा था, क्योंकि वे जानते थे—

‘कवि की परिच्छा तो समस्या ही से की भी जात,

कैसी है उड़ान, पहुचानि किती ऊँची है।’

सुप्रसिद्ध हिंदी कवि डॉ. जगदीश गुप्त उनकी इस प्रकार की परीक्षा में उत्तीर्ण ही नहीं हुए, अपितु पुरस्कृत भी हुए थे। एक संदर्भ द्रष्टव्य है, ‘डॉ. जगदीश गुप्त जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बी.ए. प्रथम वर्ष में प्रवेश लेने गए, उस समय तक वे ब्रजभाषा कवि के रूप में चर्चा में आ चुके थे और समस्या पूर्ति धड़ल्ले से करने लगे थे। असल में वे जिस वातावरण में रहते थे, वहाँ समस्या पूर्ति खूब होती थी। डॉ. गुप्त लिखते हैं, ‘शाहाबाद, सीतापुर और कानपुर सर्वत्र समस्यापूर्ति-परक रचना-प्रणाली छाई हुई थी। इलाहाबाद पहुँचने पर पाया कि वे भी इससे सर्वथा मुक्त नहीं हैं। बी.ए. प्रथम वर्ष में ही संकट सामने आ खड़ा हुआ। प्रतिभा-परीक्षण के लिए ‘रसालजी’ ने हमारे आगे एक जंगी समस्या धर दी, ‘सेस मयंक लरैं झरैं सम्पा’ मैंने इस पर एक छंद रचा, जो सर्वोपरि पाया गया और पुरस्कार का हकदार घोषित हुआ, वह पूर्ति इस प्रकार है—

‘नाचति मीरा लिये मुरली कर, जाँचति मोहन की अनुकम्पा।

राग बिलोक बिराग हू लाजति, गात लखे सकैचित चम्पा।

आवन सौं अरुझैं-बिरुझैं लटैं, लेति जबैं झुकि झूमि कै झम्पा।

टूटि लरैं परैं हीर न की, जनु सेस मयंक लरैं, झरैं सम्पा॥’

उपर्युक्त पूर्ति सुनकर रसालजी अत्यंत प्रसन्न हुए। एक तो छंद रचना ब्रजभाषा में हुई थी, दूसरे ‘समस्या’ का भाव छंद के अभिप्रेत अर्थ के साथ समन्वित हो गया था। उस समय से डॉ. जगदीश गुप्त ‘रसाल’ जी के परम आत्मीय बन गए थे। सन् १९२७ में इलाहाबाद में ‘रसिक मंडल’ नाम की संस्था की स्थापना हुई, जिसके संस्थापक सदस्य डॉ. ‘रसाल’ जी थे। वह उसके मंत्री भी थे। डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी उसके अध्यक्ष थे। ‘रसिक मंडल’ के सदस्य कवि गण समस्या पूर्ति कविता का आनंद लेते थे। ‘रसाल’ जी भी समस्या पूर्ति करते थे। वे ‘परिमल’ की गोष्ठियों में भी यदा-कदा जाते थे और अपनी कविताएँ सुनाते थे। उन्हें इस बात का दुःख रहता था कि उनके जो शिष्य ब्रजभाषा में अच्छी कविता कर लेते थे, वे अब उसे छोड़कर नई कविता करने लगे। वे दुःख से कहते, ‘जगदीश गुप्त, गोपीकृष्ण गोपेश अच्छा-खासा कवित्त-सवैया रच लेते थे, ससुर बरबाद हुई गए, नई कविता लिखन लाग। अरे कविता कविता है, वा मैं नया-पुरान कैस?’

‘रसाल’ जी की रुचि रीतिकालीन सभी काव्य प्रवृत्तियों में रहती थी। रीतिकाव्य की अलंकारप्रियता, चमत्कार-चारुता एवं कलात्मकता तो उनके मन में बसी हुई थी। उनका संपूर्ण काव्य चाहे ब्रजभाषा में हो चाहे खड़ी बोली में; इन तीनों विशेषताओं से मंडित है। समस्यापूर्ति तो उनकी प्रिय विधा थी। उन्होंने ‘समस्या’ को शास्त्रीयता प्रदान करने के लिए ‘माधुरी’ पत्रिका में दो लेख भी लिखे थे, जिनमें ‘समस्या’ के लक्षण, प्रकार और परिभाषा आदि की मीमांसा की गई थी। एक बार उनके समक्ष एक समस्या रखी गई, समस्या कठिन थी—पूर्ति आसान नहीं थी—‘बेगि चलिबो कौ चन्द चाबुक चलावै है।’

एक दिन ‘रसाल’ जी तमाम प्रोफेसरों के साथ बैठे हुए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी स्टेडियम में स्पोर्ट्स का कार्यक्रम देख रहे थे। उनमें लड़कियाँ भी भाग ले रही थीं। लड़कियों की दौड़ शुरू हुई। उसे देखकर ‘समस्या’ की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त हो गया। वहीं बैठे-बैठे रसालजी ने एक कागज के टुकडे़ पर इस समस्या की पूर्ति की—

‘एक दिन दौरिबे की होड़ मैं कुमारिन कै,

मंजु सुकुमारिन के हौंस हिय छावै है।

दौरन लगीं सुखी मयंकमुखी केकिक ज्यौं,

मानौ धराधाम परीवृंद मंद धावै है॥

रेसम के तारन सौं बारन की बेनी बनी,

उन्नत नितंबनि पै ऐसी लहरावै है।

मंजु गजमामिनी मराल भामिनी पै मानौ,

बेगि चलिबे कौ चन्द चाबुक चलावै हैं॥

‘रसाल’ जी को खड़ी बोली कविता नहीं भाती थी। संभवतः इसीलिए वे खड़ी बोली के प्रसिद्धतम कवियों की भी तीखी आलोचना किया करते थे, किंतु विडंबना यह है कि उनकी खड़ी बोली की काव्य रचनाएँ उनकी ब्रजभाषा काव्य रचनाओं से संख्या में अधिक हैं। उनकी प्रसिद्ध काव्य रचनाओं में ‘काव्यपुरुष’ है, जिसकी रचना सन् १९५५ में खड़ी बोली में हुई थी। ‘रसाल’ जी की एक ही छंद में रची गई, यह ‘कालजयी’ काव्य कृति है, जिसमें उनका काव्य-कौशल अपने उत्कर्ष पर है, किंतु आलोचकों की दृष्टि से यह ओझल ही रही। ब्रजभाषा में रचित दूसरी प्रसिद्ध काव्यकृति ‘उद्धव व्रजांगवा’ अर्थात् उद्धव शतक, जिसकी रचना सन् १९७० में हुई थी। यह भ्रमरगीत परंपरा की एक विशिष्ट काव्य-रचना है, जिसमें ‘रसाल’ जी के भाव और विचार का सम्यक् परिस्फुरण हुआ है। ‘रसाल’ जी संस्कृत साहित्य, काव्यशास्त्र और ज्योतिष के भी विद्वान् थे। शास्त्रों के गंभीर अध्येता होने के कारण उनके विचारों में एक प्रकार की दार्शनिकता थी। दार्शनिक आधार होने के कारण उनके प्रत्येक कथन में तर्क रहता था। वे शब्दों को तोड़कर प्रत्येक अंश की अर्थवत्ता पृथक् करके चमत्कार भर देते थे। उनकी इस प्रतिमा का प्रमाण ‘उद्धव-शतक’ की गोपियों के कथनों में मिल जाता है। एक छंद द्रष्टव्य है, जिसमें गोपियों ने अपने तर्कों के आधार पर उद्धव की खूब खिल्ली उड़ाई थी—

‘एक लव लाए त्यों जगाए बस ज्योति एक,

एकै आन तेजो रूप और लहते नहीं।

राखै जो स्नेह-नेह करत उजेरो ताकौ,

रीतौ नेह पात्र लै कदापि रहते नहीं।

जगत महातम को टारिसु महातम सौं,

दोष हू महातमा तमा कौ गहते नहीं।

दीपति है दीपति हमारी हो ‘रसाल’ हम,

प्रेम के प्रदीप बात तीखी सहते नहीं॥

जैसा कि अन्यत्र कहा गया है—‘रसाल’ जी अलंकार शास्त्र के गंभीर अध्येता थे। ‘अलंकार पीयूष’ और ‘अंतकार कौमुदी’ ग्रंथ उनकी अलंकार-विषयक प्रतिभा के प्रमाण हैं। ‘भाषा शब्दकोश’, ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ आदि ३९ ग्रंथों की रचना उन्होंने की थी।

तत्कालीन हिंदी साहित्य में अपनी समान रुचि और ब्रजभाषा प्रेम के कारण ‘रसाल’ जी के परम मित्रों में सुप्रसिद्ध ब्रजभाषा कवि और उस समय के सागर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी थे, जो आधुनिक वेशभूषा में सदैव रहते थे तथा पूरी तरह आधुनिक थे, जबकि ‘रसाल’ जी न केवल मध्यकालीन प्रवृत्तियों से ओत-प्रोत थे, अपितु वे वेशभूषा और रहन-सहन में भी अति सामान्य लगते थे, लेकिन दोनों में गहरी मित्रता थी। डॉ. त्रिपाठीजी को जब भी समय मिलता, डॉ. रसालजी के घर चले जाते, उनका ‘कुलपतित्व’ इसमें आडे़ नहीं आता। उनके दूसरे मित्र सुप्रसिद्ध कवि बाबू जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ थे, जो अयोध्या राज्य के उच्चतम अधिकारी थे। वे भी अपने को राज-परिवार के सान्निध्य के अनुकूल बनाए रखते थे। वे ‘रसाल’ जी से आयु में लगभग ३०-३२ वर्ष बडे़ थे, लेकिन इनका मित्रभाव भी अप्रतिम था। उन्होंने तो डॉ. रसालजी से अपने ‘उद्धव शतक’ की भूमिका भी लिखवाई थी। डॉ. रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ समाज के विविध क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्तियों से घिरे रहते थे। यह था उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का आकर्षण!

‘रसाल’ जी जब तक रहे, अपनी विद्वत्ता, काव्य-प्रतिमा, वाक् पटुता, स्मरण शक्ति और प्रत्युत्पन्नमतित्व से अपने छात्रों, सहयोगियों और विद्वत्समाज को प्रभावित किया और उनके बीच अपनी पृथक् पहचान बनाए रखी तथा अपनी अद्वितीयता स्थापित कर दी। यहाँ हम डॉ. ‘रसाल’ जी के आत्म-परिचय की संक्षिप्त विवरणिका, साथ ही उनके द्वारा इन पंक्तियों के लेखक को लिखे कुछ पत्र तथा उनके एक-दो रोचक संस्मरण, जिनसे रसालजी के व्यक्तित्व की कुछ अन्य विशेषताएँ भी ज्ञात हो सकेंगी, प्रस्तुत कर रहे हैं।

डॉ. रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ का जन्म चैत्र शुक्ल द्वितीया बुधवार संवत् १९५५ को बाँदा जिले की मऊ तहसील के ग्राम ‘छींवा’ में हुआ था। उनके, पितामह मंडित सुखनंदन शुक्ल थे और पितामह थे—पंडित महादेव शुक्ल, जिनके पुत्र पंडित कुंज बिहारी शुक्ल ‘रसालजी’ के पूज्य पिताजी थे। रसालजी तीन भाई थे। सबसे बडे़ शिवगोपाल शुक्ल और अनुज पंडित रामचंद्र शुक्ल ‘सरस’ थे। पिता पंडित कुंजबिहारी शुक्ल स्थानीय विद्यालय में अध्यापक थे। वह संस्कृत भाषा और आयुर्वेद के ज्ञाता थे। ‘रसाल’ जी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई थी। उनके जीवन में उच्चकोटि की विद्वत्ता के रूप में प्रतिफलित हुआ। वे ज्योतिष विद्या के पारंगत और आयुर्वेदिक ज्ञान के पुंज थे।

सन् १९२७ ई. में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में एम.ए. किया और उसी वर्ष कान्यकुब्ज कॉलेज लखनऊ में हिंदी और तर्कशास्त्र विषय के अध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई। सन् १९३६ ई. में उन्होंने डॉ. धीरेंद्र वर्मा के निर्देशन में काव्य शास्त्र पर डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी-साहित्य में यह प्रथम डी.लिट्. थी। सन् १९३७ में ‘रसाल’ जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त हो गए। आगे चलकर जब रीडर पद पर चयन किए जाने का अवसर आया तो इनकी उपेक्षा हो गई, जिससे वह निश्चित रूप में आहत हुए होंगे। अंततोगत्वा अक्तूबर-नवंबर १९५१ ई. में वे गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष बन गए, जहाँ ३-४ वर्ष तक रहकर वह जोधपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष हो गए, जहाँ से अगस्त १९६५ में अध्यापकीय जीवन की क्रियाशीलता से अवकाश ग्रहण कर लिया। सन् १९७० में उनकी सुप्रसिद्ध ब्रजभाषा काव्य-रचना ‘उद्धव शतक’ प्रकाशित हुई, जिसकी भूमिका प्रोफेसर आनंद प्रकाश दीक्षित ने लिखी थी। इस रचना से उनकी कीर्ति में और वृद्धि हुई। अवकाश-ग्रहण के पश्चात् रसालजी इलाहाबाद आ गए और अपने द्वारा बनवाए मम्फोर्डगंज के मकान में रहे, जहाँ १९ मई, १९८० को देहावसान हो गया। हिंदी साहित्य का एक अनूठा विद्वान् भौतिक देह छोड़कर सदा के लिए चला॒गया।

‘रसाल’ जी बडे़ ही छात्र वत्सल अध्यापक थे। उनके प्रिय शिष्यों में डॉ. जानकीनाथ सिंह ‘मनोज’ थे, जिन्होंने उनके निर्देशन में छंदशास्त्र पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डी. फिल. किया था। कालांतर में लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक पद पर उनकी नियुक्ति हो गई थी। अचानक उनका देहावसान हो गया और उनका शोध-प्रबंध अप्रकाशित रह गया।

‘रसालजी’ चाहते थे कि शोध प्रबंध प्रकाशित हो जाए, इस संबंध में उन्होंने ‘मनोजजी’ के अग्रज चौधरी त्रिभुवन नाथ सिंह ‘सरोज’ को पत्र भी लिखा, लेकिन वह शोध-प्रबंध उस समय तक प्रकाशित न हो सका। हालाँकि कालांतर में वह छप गया था।

अपने शोधकार्य के संबंध में मैं डॉ. ‘रसालजी’ से मिलना चाहता था, इस हेतु सन् १९५९ में अक्तूबर-नवंबर में किसी समय मैंने उन्हें पत्र लिखा था, मेरे पत्र के उत्तर में उनहोंने मुझे जो पत्र लिखा था, वह अविकल यहाँ प्रस्तुत है—

श्री गोरखपुर विश्वविद्यालयात्

२/१२/५९

प्रियवर शुक्लजी

पत्र मिला, बहुत सराहनीय बात है कि आपने ‘समस्या पूर्ति काव्य’ को अपने शोधाध्ययन का विषय लिया है। ठीक है, मेरे दो लेख ‘माधुरी’ में इस विषय पर छपे थे। आपने उन्हें देखा, अच्छा किया। इस विषय पर मेरे पास पर्याप्त सामग्री थी। मैंने बहुत श्रम के साथ उसे एकत्र किया था, अब इधर बहुत समय से मैंने देखा नहीं, अब आपके कारण स्मरण हुआ, अब मैं प्रयाग जाने पर घर में देखूँगा, उस सामग्री का क्या हाल है—यही है कि आप देखकर यहाँ आने का कष्ट करें या प्रयाग पहुँचें। दिसंबर २३ के बाद मैं अवकाश में दिनांक २/१/६० तक वहीं रहूँगा, तब आपसे इस विषय पर विशेष बात हो सकेगी, आप हो सके तो अपने साथ अपने विषय की विषयानुक्रमणिका भी लेते आएँ, तब अच्छा होगा।

मैं आपकी बड़ी प्रसन्नता से यथासंभव सहायता करूँगा। कार्य सुंदर है। हाँ, श्रमसाध्य है—खोज की वस्तुतः यही आवश्यकता है। आप यदि बिसवाँ जाएँ तो ‘सरोज’ जी को शुभाशीष कहें, प्रिय जानकी के निबंध प्रकाशन में क्या हो रहा है? लिखिए। शेष ठीक है।

तवैव—रा.श.शु.कृ ‘रसाल’

दयाशंकर शुक्ल

१५, बुलंद बाग, सिटी स्टेशन

लखनऊ

इस पत्र के उत्तर में मैंने उन्हें पत्र लिखा, जिसका उत्तर भी उन्होंने तुरंत दे दिया।

श्री गोरखपुर वि. विद्यालयात्

भौमे ८/१२/५९

प्रियवर शुक्लजी,

सस्नेह शुभाशीष! कृपा कार्ड मिला, मुझे खेद है कि इधर मेरा समय बँट चुका है। मैं दिनांक १६ को एक कॉलेज को देखने जा रहा हूँ—उसे बी.ए. कक्षाओं के लिए स्वीकृति देने का प्रश्न है। इसी के लिए उस कॉलेज को मुझे देखना पडे़गा, १७ को भी वहाँ रहना पडे़गा। उसके पश्चात् फिर १८ को यहाँ से चल दूँगा और प्रयाग में एक कार्य कर २१ को प्रतापगढ़ के एक कॉलेज को देखूँगा, उसे भी बी.ए. के लिए स्वीकृति देते का प्रश्न विश्वविद्यालय में है। २१, २३ और स्यात्...को मैं वहाँ रह प्रयाग जाऊँगा, फिर २ जनवरी को यहाँ आ सकूँगा। अतएव आप अपनी सुविधा देखें, यदि आप १६ से पूर्व आवें तो १२ के बाद इधर मैं फिर व्यस्त हूँ, मुझे अन्यत्र भी कदाचित् जाना पडे़गा। मैं यहाँ विश्वविद्यालय के पास दीवानी कचहरी के निकट कैंटूनमेंट पुलिस स्टेशन के समीप रहता हूँ। स्टेशन से रिक्शे पर १५ मिनट का मार्ग है। यदि आप प्रयाग में आएँ तो प्रयाग स्टेशन से मम्फोर्ड गंज में आकर मेरे मकान पर आएँ, रास्ता सीधा है, रिक्शे से चार आने में आप सीधे आ सकेंगे। आप अपने साथ अपना पूर्व प्रबंध भी लेते आएँ तो अच्छा है, अवश्य कार्य करें, अच्छा कार्य है, विषयानुक्रमणिका भी आवश्यक है, मैं यथासाध्य आपकी सहायता करूँगा, इसके लिए आप चिंता न करें।

हाँ, प्रियवर सरोज को पत्र लिखिए और प्रिय जानकी के निबंध के छपाने में शीघ्रता करने के लिए कहें, यह कार्य भी आवश्यक है। इसमें विलंब कर रहे हैं। मेरा विचार लखनऊ आने का था, किंतु कार्य कुछ आ रहे हैं, ऐसे कि कदाचित् अवकाश न मिल सकेगा। शेष सब ठीक है, प्रभु आपको सफलता दे।

तवैव

रा.श. शुक्ल ‘रसाल’

दयाशंकर शुक्ल

प्राध्यापक, क्वींस कॉलेज

लखनऊ

उपर्युक्त दोनों पत्रों को पाने के बाद मैंने गोरखपुर जाकर डॉ. ‘रसाल’ जी से मिलने का निश्चय किया। दिसंबर १९५९ में मैं गोरखपुर गया। स्टेशन से उतरकर मैं उनके निर्देशानुसार रिक्शा से उनके निवास स्थान की ओर चल पड़ा। उनके घर के आस-पास पहुँचकर किसी व्यक्ति से डॉ. ‘रसाल’ जी का घर पूछा तो उसने सड़क की दाहिने ओर एक मकान में सामने लॉन में डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित से बात करते हुए सज्जन की ओर संकेत किया कि वे बैठे हैं। मैंने कभी डॉ. ‘रसाल’ जी का न फोटो देखा था और न कभी उनसे मिला ही था और फिर एक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तथा अध्यक्ष की मन में जो छवि बनी थी, उससे बिल्कुल भिन्न एक अत्यंत सामान्य सी छवि देखकर थोड़ा विस्मय हुआ। डॉ. दीक्षितजी ने डॉ. ‘रसाल’ जी से हमें परिचित कराया। जिस सहजता से ‘रसाल’ जी हमसे मिले, वह हमारे सोच के परे था। मैंने उनके चरण छुए, उन्होंने प्रसन्न मन से हमें आशीर्वाद दिया।

उनकी सादगी देखकर मैं अत्यधिक प्रभावित था। स्मरण हो आई उन ऋषियों-मुनियों और मनस्वियों की जीवन कथा, जिन्होंने ज्ञानार्जन और महान् ग्रंथ-लेखन में अपने को इतना लीन रखा कि अपनी देह को मनोरम बनाने में कोई महत्त्व नहीं दिया। ‘रसाल’ जी हमें एक साधारण किसान से देखने में लगे, विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जैसे बिल्कुल नहीं। उनके व्यवहार में तनिक भी औपचारिकता नहीं लगी। क्षणभर में हमारा संकोच चला गया। उन्होंने अपने ज्योतिषज्ञान की कुछ फुलझडि़याँ छोड़कर हमें हँसाने और आश्वस्त करने की पूरी कोशिश की। शोधकार्य की चर्चा हुई और वहीं प्रयाग में जाकर डॉ. साहब से पुनः मिलने का कार्यक्रम बन गया।

श्रद्धेय डॉ. ‘रसाल’ जी के उक्त दोनों पत्र, उनके हृदय की उदारता, छात्रवत्सलता, पत्रोत्तर देने की तत्परता, शोधार्थी को उत्साहित करने के लिए उसके शोध विषय की प्रशंसा करना आदि आदर्श अध्यापक के द्योतक हैं। अंततः जनवरी १९६० में मैं प्रयाग गया और उनके द्वारा निर्देशित मार्ग से मैं उनके निवास स्थान मम्फोर्ड गंज पहुँच गया। डॉ. साहब ने स्नेहपूर्वक अपने घर में मुझे रखा। परिवार के सभी सदस्यों के व्यवहार से मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी अपरिचित घर में रह रहा हूँ। एक परिवार के सदस्य के रूप में रहते हुए पता ही नहीं चला कि २-३ दिन कैसे व्यतीत हो गए। डॉ. साहब के साथ खूब साहित्यिक चर्चा हुई। उन्होंने अपने कुछ संस्मरण सुनाए। अपने नाम को औरों द्वारा गलत लिखे जाने की चर्चा की, खड़ी बोली के प्रसिद्ध कवि मैथिलीशरण गुप्त की खूब आलोचना की। एक बार बाहर गए थे, तब उन्होंने कविवर पंतजी को हमें दूर से दिखलाया, कहा, वो देखो पंत को, वह लेडीज कोट पहने हुए हैं’, मैंने मन-ही-मन पंतजी को प्रणाम किया।

मैं आदरणीय ‘रसाल’ जी के साथ साहित्यिक चर्चा में ऐसा डूबा कि उनसे ‘समस्यापूर्ति’ संबंधी सामग्री की बात करूँ, यह विषय मैं स्वयं नहीं उठा पाया, सोचा था डॉ. साहब स्वयं अपनी ‘पूर्तियाँ’ तथा अन्य लेखादि देंगे। इस संबंध में मैंने उनसे कोई प्रश्न नहीं किया। उनके सान्निध्य से जिस साहित्यिक सुख की प्राप्ति हुई तथा ‘बतरस’ का जो आनंद उनके साथ मिला, वह हमारे शोधकार्य के महत्त्व से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण था। सत्संग का ऐसा अवसर दुर्लभ था। मैं अपने को बड़ा भाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे ऐसे महान् विद्वानों के साथ रहने का सुअवसर मिला।

उपर्युक्त पत्रों और संस्मरणों के द्वारा श्रद्धेय ‘रसाल’ जी के व्यक्तित्व के अनेक अनुद्घाटित पक्ष हमारे समक्ष आ गए हैं। समग्रतः हम कह सकते हैं कि अपने समकालीन विश्वविद्यालय के आचार्यों एवं अध्यक्षों से वे सर्वथा भिन्न थे, अनूठे थे। उनमें उच्चकोटि की विद्वत्ता के साथ-साथ विनम्रता और उदारता थी, वे छात्र-वत्सल थे, बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी स्मृति को कोटिशः नमन!

१-बी, ८०६, ट्रिनिटी टावर्स, खराड़ी

पुणे-४११०१४ (महाराष्ट्र)

दूरभाष : ०९८२५६०४७१०

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