अगला जन्म

और बात थी एकदम सच। जसवंत राय का दूसरा नाम सफलता था। जहाँ-जहाँ उन्होंने कदम रखा, वहाँ-वहाँ सफलता मानो उनकी प्रतीक्षा कर रही हो। जसवंत राय ज्यों ही हाथ खींचते, सफलता एक आज्ञाकारी बालक की तरह उनकी उँगलियों से लिपटी रहती।

जसवंत राय ने एक ही धंधा न करके अनेक धंधे किए थे। इनके किसी भी धंधे में अपना हिस्सा रखने को अनेक उद्योगपति साझेदार के रूप में कतार में खडे़ रहते थे। इसका कारण एकदम स्पष्ट था। सबको यह पूरा विश्वास था कि जसवंत कभी निष्फल होनेवाले न थे। जो भी पूँजी लगाई, वह दुगुनी होने की संभावना था। सामाजिक सेवाओं में जसवंत राय का योगदान कम नहीं था। उन्हें स्वयं को भी यह ध्यान नहीं था कि वे कितनी संस्थाओं के ट्रस्टी हैं। सार्वजनिक चंदा एकत्र करनेवाले चंदा लेने की शुरुआत जसवंत राय से ही करते थे।

तदुपरांत वे कई सुविख्यात संस्थाओं, जातिगत संस्थाओं और राजकीय पक्ष में भी एक या दूसरे रूप में जुडे़ थे। जसवंत राय बडे़ समझदार व्यक्ति थे और अपने वर्षों के अनुभव से यह समझ चुके थे कि किसी भी राजकीय पक्ष के साथ सीधी तरह से जुड़ना समझदार व्यक्ति के लिए न्यायसंगत नहीं है। जो भी बेकार या सत्तापक्ष के नेता इनके पास आते थे, उसे चंदा आदि देकर खुश रखते थे, तदुपरांत यदि कोई उन्हें चुनाव लड़ने को कहता तो अतीव विनम्रता से हाथ खडे़ कर देते थे। ‘अरे भले आदमी, मेरे जैसे अनपढ़ व्यक्ति को अपने पक्ष में लोगे तो आपके पक्ष पर मुसीबतें आएँगी। मैं मात्र चौथी तक पढ़ा हूँ। राजकीय दाँवपेंच, पक्ष-विपक्ष से अनभिज्ञ हूँ। अतः इन कामों से मुझे दूर ही रहने दें।’

जसवंत राय की यह बात सच थी कि वे ज्यादा पढे़-लिखे नहीं थे। ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज विश्वविद्यालय की बात तो दूर, उनके पास बिहार के किसी फालतू विश्वविद्यालय की बी.ए. की डिग्री भी नहीं थी। तदुपरांत इनसे बात कर चुकने पर आदमी कहता था, ‘आदमी बड़ा घाघ है। सारी बात संकेत में समझ जाता है।’

जसवंत राय की सबसे बड़ी मुश्किल समयाभाव की थी। दिन में चौबीस घंटों में अड़तालीस घंटों का काम करना चाहते थे। कई बार मुंबई में चाय-नाश्ता लेकर दोपहर में चेन्नई के किसी उद्योगपति के साथ खाना खाते और रात में कलकत्ता के किसी क्लब में डिनर लेकर व्याख्यान देते और दूसरे दिन समय पर मुंबई के दफ्तर में आ जाते। विगत दशक में इन्होंने अनेक विदेश यात्राएँ कीं। अतः कई बार ऐसा हुआ कि रोम, जिनेवा, लंदन के सिवाय न्यूयॉर्क या एल.ए. (आजकल सफल व्यक्ति लॉस एंजिल नहीं कहते। अतः आप एल.ए. का अर्थ समझ लें) तक यात्रा करते और बंगलौर ऑफिस में बैठे-बैठे सिलीकॉन और वैली के बार में धड़ल्ले से बातें करते थे।

कई बार ऐसा होता कि जसवंत राय के नजदीक के सगे-संबंधी सुमित्रा बहन को उलाहना भी देते। किसी को कुलदेवी के प्रसादी या पितरों या सूरघन की परसादी करनी होती तो वे सुमित्रा बहन को कहते, ‘भाईसाब, जसवंत राय से कृपया भेंट करवा देने की कृपा करें।’

और हंसा बहन हँसकर उत्तर देतीं, ‘आपके लिए मैं क्या कहूँ? यहाँ तो खुद को ही बात करने के लिए एक सप्ताह पहले अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है।’

इस तरह कुलदेवी के पूजा-पाठ आदि में या पितरों के निवेद में सुमित्रा बहन अकेली ही चली जाती थीं। पर इस प्रकार के प्रसाद के व्यय का सारा खर्च जसवंत राय ही उठाया करते थे।

और सच बात तो यह थी कि जाति के लोगों को जसवंत राय की उपस्थिति की अपेक्षा खुले हाथ से पैसा देना अधिक प्रिय लगता था। कुलदेवी का कर चुकाते समय सरकारी करवेरा में से किस प्रकार छूटना था, का आयोजन जसवंत राय स्ट्रिक्ली कॉन्फिडेंशियली कॉन्फ्रेंस रूम में बैठकर चार्टर्ड एकाउंटेंट के साथ बात करते। सुमित्रा बहन की बात सच थी। बडे़ लड़के का विवाह किए पाँच साल हो गए, पर अभी बहू की गोद सूनी थी। पर जसवंत राय को इसका खयाल ही नहीं था। पर सुमित्रा बहन की मनौती से या वैसे ही संयोग से छठे बरस बहू की गोद भरी। लोकभाषा में कहें तो चाँद सा प्यारा बेटा बहू ने पैदा किया। सुमित्रा बहन ने कई बार मनौती पूरी करने को जसवंत राय को कहा, पर जसवंत राय को तो मरने तक के लिए समय नहीं था। जबकि सुमित्रा बहन ने लाख रुपए का यदि हीरा भी खरीदा तो जसवंत राय ने कोई आपत्ति नहीं की थी। तदुपरांत यही हीरा सुमित्रा बहन ने नाक की नथ में जड़ाकर पहना तो भी जसवंत राय ने नहीं देखा। अंततः थककर सुमित्रा बहन ने ही कहा, ‘आपने क्या मेरा हीरा देखा? मैंने गत सप्ताह खरीदा है। बहुत अच्छा है? कैसा चमक रहा है?’ उत्तर में जसवंत राय ने जूती के फीते बाँधते हुए कहा, ‘‘हाँ, हाँ, बहुत अच्छा है, कैसा चमक रहा है!’’

पर अब सुमित्रा ने सामाजिक व्यवस्था का आग्रह किया। सत्यनारायण की कथा से पहले साधु-व्यापारी की तरह जसवंत राय समय को आगे बढ़ाते रहते थे। यथा अगले माह, वर्षाऋतु पूरी हो या फिर यह बड़ा काम सिमट जाए, ऐसे बहाने बनाते रहे।

पर सुमित्रा बहन ने जब यह धमकी दी कि यदि उसकी मनौती पूरी नहीं हुई तो वह नई मनौती माँगेगी। तो जसवंत राय ने अपनी डायरी में नोट किया, ‘अमुक दिनांक सुमित्रा की मनौती के लिए कुलदेवी के पास जाना, राजसी भोज लगाना आदि। और वास्तव में ऐसा ही हुआ। बहुत जल्दी परिवार के सभी सदस्य निकट के सगे-संबंधी और जान-पहचानवाले तीन-चार गाडि़यों में भरकर कुल देवी के मंदिर में जा पहुँचे। प्रसाद में केवल लपसी ही चढ़ानी थी। पर मात्र लपसी का ही प्रतिभोज नहीं हो सकता है, इसीलिए तरह-तरह की बानगियाँ बनाने का आदेश पहले ही दे दिया गया था। इस आदेश के अनुसार एक स्टेशन वैगन भरकर सामग्री और नौकर-चाकर पहले ही दिन पहुँच चुके थे। तदुपरांत मुख्य मुद्दे की बात यह थी कि माताजी के भोग रखने के तुरंत पश्चात् जसवंत राय वहाँ से निकल जाएँ, क्योंकि उसी दिन शाम को एक विशेष मीटिंग रखी थी। जसवंत राय को इस मीटिंग में शिरकत करने के बाद फ्लाइट से दिल्ली पहुँचना था। मीटिंग चल रही हो, उसी समय उनका सामान हवाई अड्डे पर पहुँच जाने की भी पूर्व में व्यवस्था हो चुकी थी। उनका विशेष पी.ए. ऑफिस से आवश्यक फाइलें लेकर सीधा ही हवाई अड्डे पर आनेवाला था।

सुमित्रा बहन ने कुलदेवी पर चाँदी का छत्र चढ़ाया, चूँदड़ी रखी, नवजात पोते का सिर माताजी के पारे के सामने रखकर लपसी के नैवेद्य में से एक उँगली भरकर प्रसाद बालक की जीभ पर रखा। यह सब काम जहाँ एक ओर हो रहा था, वहीं दूसरी ओर जसवंत राय मंदिर के पुजारी से यात्रियों के इस धार्मिक स्थान पर आने और क्या-क्या सुधार किए जा सकते हैं, के बारे में विचार-विमर्श कर रहे थे। अन्य मेहमान माँ के मंदिर में सिर झुकाकर सामने के खुले मैदान में घूमने की मौज ले रहे थे। जसवंत राय का आगमन पुजारी को बड़ा भला या मीठा लग रहा था। अतः गरमी में मातेश्वरी को गरमी नहीं सताती हो, पर पुजारी को तो सताती थी। अतः उसने फ्रिज, एयर कंडीश्नर से लेकर अन्य आवश्यक सामग्री की लंबी लिस्ट जसवंतराय को सौंप दी।

सारे काम सोचे अनुसार फटाफट पूरे हो गए। अन्य अतिथि पर्यटन का आनंद लेकर शाम को लौटने को थे। पर जसवंत राय काम के बोझ से दबे थे। अतः प्रसाद लेकर तुरंत ही लौट पडे़। सुमित्रा बहन को भी अब मंदिर में रुकने की कोई जरूरत नहीं थी। अतः वे भी पति के साथ ही गाड़ी में बैठ गईं। गरमी थी, तेज धूप थी, लू के सपाटे चल रहे थे, पर ये सब बाहर के बाहर ही रहे। गाड़ी के दरवाजे एयर टाइट थे। अंदर एयर कंडीशनर था, दोपहर के समय जसवंत राय सामान्यतः हलका ही खाना खाते। इसका कारण था, दोपहर को खाना खाते समय अपार काम होते थे। खाना खाते समय में मिलनेवाले प्रतीक्षा तो करते ही हैं। यदि भारी खाना खाया जाए तो सब काम गड़बड़ा जाएँ। हल्का खाना खाने से सब काम पूरे हो जाते हैं। जसवंतराव को ऐसा खाना खाना पसंद नहीं था, जिससे सुस्ती आए।

दोपहर का समय होने से रास्ते पर यातायात का दबाव कम था। गाड़ी सरपट दौड़ रही थी। जसवंत राय को लपसी पसंद थी। अतः माताश्री के प्रसाद की लपसी खूब घी मिलाकर, बड़ा चम्मच भरकर खाई थी। अतः आँखें सहज भारी हो गईं और गाड़ी खड़ी हो गई। रेलवे फाटक आया था। फाटक के पास ही रेलवे का कोई छोटा सा स्टेशन था।

जसवंत राय की गाड़ी जब खुले फाटक के पास से गुजरी तो सुमित्रा बहन की नजर खाली स्टेशन पर पड़ी। स्टेशन के एक ओर फाटक बंद करनेवाले के घर की एक कोठरी सी थी। कोठरी के बाहर घने वृक्षों की घनी ठंडी छाया थी और इस शीतल छाया में एक आदमी बैठा था। सुमित्रा बहन ने अनुमान लगाया कि वह व्यक्ति फाटक का चौकीदार ही होगा और खटिया के पास जमीन पर एक सुंदर, पर मैले-कुचैले कपड़ों में आलथी-पालथी लगाकर एक स्त्री बैठी थी। चौकीदार के हाथ में तेल की शीशी थी। उसने दाएँ हाथ की उँगलियों में तेल लेकर जमीन पर बैठी स्त्री के सूखे बालों में रमा रहा था।

रेलवे फाटक होने से ड्राइवर ने गाड़ी धीमी कर दी थी। सुमित्रा बहन ने देखा कि चौकीदार अपनी पत्नी के सिर में तेल रमा रहा है और उसकी पत्नी पास से निकल रहे जसवंत राय और सुमित्रा बहन को दस-बीस लाख रुपयों की आयातित एयर कंडीशनर गाड़ी की परवाह किए बिना, आँख मूँदकर मस्तक पर हाथ का स्पर्श और तेल की खुमार की अनुभूति करा रही थी। उसके चेहरे पर एक अनूठी सुख की अनुभूति फैल रही थी। चौंकीदार ने पास से निकल रही गाड़ी को देखा तो अवश्य, पर मानो वह गाड़ी उसे विघ्न डालती सी हो, ऐसा भाव उसके मुखमंडल पर झलक रहा था। तदुपरांत गाड़ी को देखकर भी चौकीदार अपना काम यथावत् करता रहा।

गाड़ी फाटक लाँघकर पुनः मुख्य मार्ग पर आ गई। जसवंत राय की तंद्रा टूटने से आँख खुली। पत्नी अब तक पति को कुछ कह रही थी, परंतु जसवंतराय अपनी तंद्रा टूटने पर भी मौन थे, उनकी जुबान पर मानो ताला लग गया था। तदुपरांत गाड़ी सड़क पर तेजी से दौड़ती रही, सुमित्रा बहन की बोली भी बंद थी, वे मौन बैठी थीं, इतना ही नहीं, उनकी दृष्टि बाहर के दृश्य को सतत देखती रही, यह देखकर जसवंत राय मौन नहीं रह सके। पत्नी का यह व्यवहार उन्हें अस्वाभाविक लगा। अतः कुछ मौन रहकर उन्होंने पूछा, ‘क्यों, क्या अब नींद की झपकी लेने की तेरी बारी है? अब हम घर पहुँचने को ही हैं। तुझे घर पर छोड़कर मैं मीटिंग के लिए आगे बढ़ जाऊँगा।’

पति की बात सुनकर भी सुमित्रा मौन ही बैठी रहीं। खिड़की से बाहर यथावत् देखती रही। उन्हें अपनी पत्नी का यह व्यवहार असहज लगा। अतः उन्होंने पुनः पूछा, ‘तू किन विचारों में डूबी है? आज तेरी मान्नता पूरी हो गई है। तदुपरांत यदि कोई अन्य मनौती हो तो वह भी बता दे, मैं उसे भी पूर कर दूँगा।’

‘अब मान्यता, मनौती, कष्ट कुछ भी नहीं है।’ सुमित्रा ने खिड़की में से बाहर नजर फैलाए और कहा, ‘पर एक इच्छा होती है, बताऊँ?’

‘कह भी दे। तेरी हर इच्छा की पूर्ति करने की भगवान् ने मुझे क्षमता दी है, अवसर दिया है।’

‘नहीं, नहीं दी।’ सुमित्रा ने एक लंबा साँस लेकर कहा।

‘ऐसी कौन सी इच्छा है जो मैं पूरी नहीं कर सकता हूँ?’ जसवंत राय ने उत्सुकता से पूछा।

‘मेरी इच्छा है, आप अगले जन्म में रेलवे फाटक के चौकीदार बनें और मैं आपकी अर्द्धांगिनी बनूँ।’ और तत्पश्चात् चेहरा पति की तरफ करके पूछा, ‘कहिए, क्या आप मेरी यह इच्छा पूरी कर सकते हैं।’ जसवंत राय बुत से खडे़ रह गए।

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अजमेर (राज.)

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