लोकगीतों में राम का स्वरूप एवं आस्था

लोकगीतों में राम का स्वरूप एवं आस्था

लोकगीत भारतीय समाज के हृदय के स्वतंत्र उद्गार हैं। लोकगीतों में राम के स्वरूप का संबंध सामाजिक, धार्मिक, पारिवारिक मर्यादाओं पर परिभाषित होता है। राम के स्वरूप का संबंध भारतीयता की संस्कृति, सभ्यता एवं मानवीय आदर्शों की ऐतिहासिकता से जुड़ा है। राम के स्वरूप व आस्था का वर्णन केवल लोकगीतों में ही नहीं बल्कि राम का स्वरूप व आस्था भारतीय समाज से बाहरी समाज तक अपना विशद रूप धारण कर चुका है। अतः यह कहना आवश्यक है कि राम का स्वरूप व आस्था विश्वव्यापक है। राम के स्वरूप की व्याख्या विद्वानों एवं लेखकों ने अनेक रूपों में करते हुए संगीतात्मक एवं भक्त्यात्मक रूप से मुक्त कंठ द्वारा की है। लोकगीतों में राम के स्वरूप एवं आस्था की पूर्ण विविधता देखने योग्य है। राम लोकगीतों के स्वरूप ही नहीं बल्कि प्राणिमात्र के दिलों के स्वरूप भी हैं। भारतवर्ष विविध जातियों व वर्गों का देश है। सामाजिक व पारिवारिक व्यवस्था में हर वर्ग व जाति का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है।

हमीरपुर जनपद में कभी किसी धार्मिक समारोह में या व्रत, त्योहार-पर्वों के अवसर पर लोग अपनी वाणी द्वारा लोकगीतों के माध्यम से राम के स्वरूप को चरितार्थ करते हैं। लोग अपने मनोभावों के द्वारा मुक्त कंठ से गायन करके लोकगीतों में राम के स्वरूप को देखते हैं। डॉ. श्याम परमार के अनुसार, लोकगीतों में विज्ञान की तराश नहीं, मानव संस्कृति का सारल्य और व्यापक भावों का उभार है। भावों की लडि़याँ लंबे-लंबे खेतों सी स्वच्छ, पेड़ों की नंगी डालों सी अनगढ़ और मिट्टी की भाँति सत्य हैं। लोकगीतों में सहजता, रसमयता, मधुरता आदि गुण रहते हैं। संक्रांति, मेलों, उत्सवों और अन्य पर्वों पर लोग अपने स्वरों में राम के स्वरूप व आस्था को लोकगीतों का रूप देते हैं। अनेकों प्रकार से लोकगीतों के द्वारा राम के स्वरूप को परिभाषित किया जाता है। जैसे कि शिशु के जन्म पर, नामकरण और मुंडन पर लोकगीतों के द्वारा राम के स्वरूप को दरशाया जाता है। शिशु के जन्म के कुछ दिन बाद शिशु को झूले में लिटा दिया जाता है और महिलाएँ गीत गाती हैं—

‘मेरे लला राम झूल-झूल, तेरी टोपी में लागे फूल।’

लोकगीत ही मनुष्य को मानवता की प्रत्येक राह का मार्गदर्शन कराते हैं। प्राणिमात्र के अंदर छिपी हुई भावनाएँ एवं भक्तिदायक उद्गार, जो कभी भी बाहर आने के लिए मार्ग नहीं खोज पाते, लेकिन लोकगीतों के माध्यम से तथा मानसिक स्वर लहरियों के द्वारा सब भावनाएँ व उद्गार गीत के द्वारा अपना रास्ता बाहर आने के लिए खोज लेते हैं। लोकगीत राम का स्वरूप है और राम लोकगीत की आस्था बन चुके हैं। ईश्वर-सृजित सृष्टि का कोई ऐसा कोना नहीं, जगह नहीं, जहाँ गीत किसी-न-किसी रूप में विद्यमान न हों। जहाँ गीत-संगीत है, वहाँ लोक है। लोक और गीत का सृष्टि के आरंभ से पुनीत एवं अटूट संबंध है। लोक और गीत के माध्यम राम का स्वरूप व आस्था है। इसलिए तभी इसे लोकगीत कहा जाता है।

लोकगीतों में राम का स्वरूप व आस्था पहले ही निहित है। यही कारण है कि जीवन का कोई पक्ष अथवा आयोजन ऐसा नहीं है, जिसमें गीत स्वरों की भागीदारी न हो। गीत हमारे समूचे सांस्कृतिक जीवन की रीढ़ हैं। गीत-संगीत मानव की मुक्ति-गाथा का प्रथम प्रणव है। मानसिक तुष्टि, आत्मिक तृप्ति का पर्याय संगीत की सुख-सृष्टि की आधारभूमि है। मानव की तो बात क्या, हिंसक पशु भी संगीत स्वरों से वशीभूत हो जाते हैं । भैंस के समक्ष बीन और वीणा के सुमधुर तानों का कोई महत्त्व नहीं, लेकिन साँप और मृग तो बीन और वीणा के स्वराकर्षण से बँधे हुए मृत्यु को स्वीकार कर लेते हैं। अतः गीत-संगीत जीवन को गति देनेवाला, भूख के बाद का भोजन और थकान के बाद की नींद जैसा है। जब लय और गीत एक बिंदु पर मिल जाते हैं, तभी गीत का जन्म होता है।

हिमाचल प्रदेश भारतवर्ष के राज्यों में लोकगीतों के क्षेत्र में एक अग्रणी प्रदेश रहा है। यहाँ के प्रति धार्मिक आस्थाएँ जुड़ी हैं। हमीरपुर जनपद की तो बात क्या, राम तो जनमानस लोकगीतों के नायक एवं भारतीयों के धार्मिक आस्था के स्वरूप हैं। धार्मिक आस्था के प्रति हम लोकगीतों के माध्यम से कोटि-कोटि नमन करते हैं, क्योंकि उनके आश्रय से जल-थल और नभलोक दृष्टिगोचर हो रहा है। लोकगीतों में राम भक्तों के अधीन है। जो थोडे़ से ही राम को पाया जा सकता है, लेकिन उनको कुछ दिया नहीं जा सकता है। उनके बिना संसार में सच्चा सहाई कौन है। अतः श्रीराम सबके सखा, मित्र, माता व पिता हैं।

लोकगीत शास्त्रीय संगीत की पौधशाला हैं। लोग अपनी लोकगाथाओं एवं गीतों के द्वारा बस यही प्रार्थना करते हैं कि मेरा शुभ और अशुभ, लाभ-हानि, जय-पराजय, हे राम! तुम्हारे हाथों में है। हे प्रभु, जो उचित समझें, वही कीजिए। यह सबकुछ तो धार्मिक आस्था के द्वारा लोकगीतों में राम का स्वरूप परिभाषित होता है। शोध के अनुसार एवं लोगों के मौखिक साक्षात्कार व चर्चा से यह पाया गया है कि यह सिर आपके चरणों में झुका रहे, जिह्वा आपके गुणगान में लगी रहे, यह सब धार्मिक आस्था का प्रतीक और लोकगीतों में राम है। धार्मिक आस्था के चलते हमीरपुर जिले (हि.प्र.) में गाया जानेवाला लोकगीत प्रकार है—

‘अधी-अधी राती रामा तेरी याद जे आई

सुतियाँ दी निंद्र गआई ओ मेरे राम!

देयाँ ओ देयाँ सीते तू सिरे दे सलुए

मीरा जेईया गुजरिया जो देणी ओ मेरे राम!

अधी-अधी राती रामा तेरी याद जे आई,

मरी धरी जावे मीरा जेई गुजरी

घर विच झगड़ा पुआया ओ मेरे राम!

अधी-अधी राती रामा तेरी याद जे आई।’

लोकगीतों में राम के स्वरूप की धार्मिक आस्था छिपी है। लोकगीत हमारी अपनी सामाजिक संपत्ति हैं। इन लोकगीतों के द्वारा समाज की नवचेतना जीवंत रहती है। लेकिन इन दिनों लोकगीतों को गाने की परंपरा खत्म होती जा रही है, क्योंकि वर्तमान समय में समाज और परिवारों में बिखराव आ गया है। लोकगीतों को गानेवालों का क्रमशः दिन-प्रतिदिन अभाव होता जा रहा है, लेकिन फिर भी लोकगीतों में राम का स्वरूप धार्मिक आस्था के द्वारा देखने को मिलता है। किसी-न-किसी रूप में राम के स्वरूप को परिभाषित करती हुई जगह अगर कहीं है तो वह लोकगीतों में ही है। आज भी गाँवों की स्त्रियाँ चलते-फिरते, उठते-बैठते गाती रहती हैं—

‘मेरा राम जपण नू दिल करदा

पर घर दा धंधा नहीं मुकदा

मेरा राम जपण नू दिल करदा!

इस प्रकार से अनेकों धार्मिक आस्था के लोकगीत हमीरपुर जनपद में गाए जाते हैं, जिनमें राम के स्वरूप के प्रति आस्था झलकती है। लोकगीतों में राम के स्वरूप व आस्था की परंपरा युग-युगांतर व प्राचीन तथा अति विस्तृत है।

गाँव-कैहरवीं, डाक-बलोह, तहसील-भोरंज,

जिला-हमीरपुर-१७७०२९ (हि.प्र.)

दूरभाष : ०९४१८०४८२५३

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