हमारे मोहल्ले के लोग

हमारे मोहल्ले के लोग

हर मोहल्ले में रहनेवालों के अपने वर्गीकरण होते हैं। कुछ की ख्याति झगड़ालू तो कुछ की स्वार्थी की है। झगड़ालू वे हैं, जो मौका ढूँढ़ते रहते हैं बिगड़ने, चीखने-चिल्लाने का। कहीं किसी बच्चे ने खड़े स्कूटर से हाथ लगाकर हाय-हैलो कर लिया तो उसे चपतियाने से वे नहीं चूकते हैं। इस चक्कर में बड़ों के बीच हाथापाई की नौबत भी आती है। कइयों का विचार है कि मोहल्ले के बच्चे कहीं जान-बूझकर उनके धैर्य का परीक्षण तो नहीं कर रहे हैं? कई बार प्रताड़ना का दृश्य मनोरंजक भी हो जाता है। आगे तेज भागते गप्पू, पप्पू और पीछे-पीछे अपना पाजामा सँभालते, उनका पीछा करते, क्रोधाग्नि में सुलगते, बड़बड़ाते वर्माजी। कुछ बुजुर्गों को आपातकाल की नसबंदी याद आती है, जब उन्होंने सड़क पर, सफेद कोट पहने एक डॉक्टर को, अस्पताल से नस कटवाने गए, तड़ी होते अपने शिकार के पीछे दौड़ते देखा था। वक्त की नियति ही बीत जाना है। आपातकाल भी कैसे टिकता? बस उसकी सुधियाँ शेष हैं।

स्वार्थी अकसर वे कहलाते हैं, जो दूध, चाय, चीनी, पैसे वगैरह ले तो जाते हैं वक्त-जरूरत पर, किंतु सौदा इकतरफा है। कोई उनसे माँगे तो ‘नही है’ का अनपेक्षित उत्तर ही अपेक्षित है। ऐसा नहीं है कि आर्थिक दृष्टि से इनकी हालत पतली है, पर ‘मनुष्य एक निकृष्ट स्तर का स्वार्थी प्राणी है’ जैसी अवधारणा को सिद्ध करने, कुछ नमूने तो होने ही होने। यों ऐसे इनसानी कैक्टस हर मोहल्ले, क्षेत्र, धंधे, दफ्तर, शहर की शोभा हैं। कुछ की कीर्ति-गाथा, वायरल फीवर की तरह फैलती है, कुछ बेचारे उपेक्षा की गुमनामी में पड़े रहते हैं। मोहल्ले के बाहर उनके नाम तक की चर्चा नहीं है। इसके भी लाभ हैं। यदि उन्होंने मोहल्ला बदला तो वे नए सिरे से अपना भीख का धंधा शुरू कर सकते हैं। ऐसी संभावना नहीं है कि अतीत उनके आड़े आए।

मोहल्ले का एक सामान्य अनुभव है कि कोई भी आदमी दूसरे की प्रशंसा खुले दिल से कभी नहीं करता है। तारीफ का दौर कुछ यों प्रारंभ होता है, ‘‘फलानेजी इनसान तो नेक हैं, बोल-चाल में बहुत अच्छे हैं, पर आपसे क्या छिपाना, मदद किसी की नहीं करते हैं’’, या फिर, ‘‘उनकी एक ही कमजोरी। भ्रष्ट तो नहीं हैं पर सुरा-सुंदरी का मोह कुछ अधिक ही है।’’ ऐसे अंत के बाद तारीफ करनेवाले ने एक तीर से दो दाँव खेल लिये, तारीफ  की तारीफ  की और चरित्र-हनन का चरित्र-हनन। सुननेवाला कोई शीर्ष मूर्ख ही होगा, जो प्रशंसा के इस पुल को पार कर प्रशंसित नायक के दर्शन करने का कष्ट करे।

ऐसे भी इक्कीसवीं सदी के बाजार युग में कोई किसी से स्वार्थवश ही मिलता है, वरना सब अपने डिजिटल अकेलेपन में ही खुश हैं। किसी के पास टी.वी. है तो कोई ट्विटर, वाट्सएप या फेसबुक का लतियल है। संचार सुविधा में चिप बाबा का ऐसा योगदान है कि लोग इंग्लैंड-अमेरिका के अपने रिश्तेदारों से तो ‘फेस बुक’ या ‘फेस टाइम’ पर संपर्क करने में सफल हैं, पर अपने आसपास रहनेवाले के ‘फेस’ तक से अनजान हैं।

जो अपेक्षाकृत समृद्ध हैं, वे विदेशों की सैर के शौकीन हैं। उन्हें पता है कि जीवन नश्वर है और घूमने-जानने का दायरा अपार। समय के सही उपयोग से वे दुनिया को जानते हैं, भले ही अपने देश से अनभिज्ञ रहें। देश के अज्ञान से उन्हें आत्म-गौरव का अनुभव भी होता है। वे सेमिनार-गोष्ठी में अपने विदेश-गमन और वहाँ की सभ्यता-संस्कृति के किस्से ऐसे सुनाते हैं, जैसे यह शोध उनकी खुद की हो। वे भूलते हैं कि वे केवल उन देशों की प्रचार-सामग्री रटकर दोहरा रहे हैं।

विदेशों की बात हो और हिंदी-कवि पीछे रह जाएँ, यह संभव नहीं है। जैसे गंदगी में मच्छर-मक्खी हैं, वैसे ही हर मोहल्ले में कवि पाए जाते हैं। मोहल्ले के एक परिचित युवाकवि एक वृद्ध गीतकार की सेवा और देखभाल के लिए उनके साथ विदेश गए थे। वहाँ उन्होंने अपनी हँसोड़ तुकबंदियाँ सुनाईं। तालियाँ बटोरीं। महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के पते नोट किए और गीतकार का आशीर्वाद पाया। तब से वे हर वर्ष अमेरिका का एक चक्कर लगाते हैं। उन्होंने गीतकार से लंदन के संपर्कों की फेहरिस्त भी पा ली है। अब उनके एक पंथ से दो काज हो जाते हैं। उनकी अतिशय धनलोलुपता की काफी प्रसिद्धि है। अब वे लंदनवालों से भी किराया वसूलते हैं और अमेरिकावालों से भी, जब कि खर्चा एक ही टिकट का पड़ता है। कविताओं पर जब तालियाँ पिटती हैं, तब वे दोहरे हो-होकर आभार प्रगट करते हैं।

उन्हें मुगालता है कि श्रोताओं को कविताएँ पसंद हैं जब कि दर्शक उनकी शक्ल और भाव-भंगिमाओं पर हँसते हैं। उनका परिचय देते संयोजक उनकी बीस विदेश यात्राओं का बखान नहीं करें तो पहले के युवा और वर्तमान के अधेड़ कवि रूठ जाते हैं। एक बार तो वे मंच से बर्हिगमन भी कर गए थे। संचालक ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय कवि नहीं संबोधित किया था। कवि को अपनी विदेश यात्राओं पर ज्यादा गर्व है कि भारतीय होने पर, यह कहना कठिन है। वे सबसे अपनी विदेशों में अपार लोकप्रियता का जिक्र जरूर करते हैं। वृद्ध गीतकार अब उनके स्मृति-पटल से ओझल हैं। बस कभी कभी दारू में बहककर वे इतनी आत्म-स्वीकृति दोस्तों से कर लेते हैं कि विदेश-यात्रा से उनके मंचीय पारिश्रमिक में काफी इजाफा हुआ है। पहले उन्हें चार-पाँच सौ मिलते थे, अब वे दस-बारह हजार से कम में खुद को नहीं बेचते हैं।

मोहल्ले की विविधताओं का अंत यहीं नहीं है। मुल्क का हर मोहल्ला बिना किसी स्वघोषित जनसेवक के अधूरा है। ऐसे स्वैच्छिक कहते हैं कि वह किसी सियासी दल से संबद्ध नहीं हैं, पर चुनाव के समय हर एक को झाँसा देते हैं कि एकमुश्त राशि के बदले वे मोहल्ले के वोट थोक में उन्हें दिलवा देंगे। इनका सेवा-भाव प्रशंसनीय है। हर बीमारी, विवाह, मृत्यु, दुर्घटना के अवसर पर ये उपस्थित रहते हैं। शहर के हर अफसर से इनका पहचान का दावा है। हर नेता के घर इनकी पहुँच है। किसी को पुलिस पकड़े या गुंडे-बदमाश किसी लड़की को छेडें़, ये थानेदार से लेकर पुलिस कप्तान तक को फोन घुमाने को प्रस्तुत हैं। कभी-कभार मामला गंभीर हो तो ये खुद भी थाने जाने से नहीं कतराते हैं। थानेदार से इनका संवाद रहता है, ‘‘देखिए, जल्दी उचित काररवाई कीजिए वरना हमें कप्तान साहब से शिकायत करनी पड़ेगी।’’ कप्तान साहब को ये गृहमंत्री के नाम से हड़काते हैं। अभी तक यह पता नहीं कि आज तक जनसेवक की ऐसी धमकियों का क्या असर हुआ है।

सबको पता है कि बिना खर्चे-पानी के आजकल कुछ मुमकिन नहीं है। जाने जनसेवक को मजबूरी में बिचौलिए की भूमिका भी निभानी पड़ती है। पुलिस हो या अन्य सरकारी विभाग, वहाँ के बड़ों से सौदेबाजी का जिम्मा इन्हीं का है। यहाँ तक कि किस विभाग में नियुक्ति का कितना रेट है, इस तक के विश्वसनीय सूत्र भी यही हैं। लोग कहते हैं कि शर्माजी खुद भी कहीं कार्यरत हैं तो विश्वास नहीं होता है। मोहल्ले के लोगों ने तो इन्हें सुबह से शाम तक यहीं घूमते, बतियाते या पान की दुकान पर दरबार लगाते ही देखा है।

वे ऐसे अपवाद हैं, जो बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक के आदर्श हैं। युवाओं से इन्होंने प्रश्नपत्र ‘आउट’ करने का ठेका लिया है, उसमें भी दिक्कत लगे तो उन्हे नकल करवानेवाले गैंग से भी मिलवाया है। इन कामों में न स्नेह-मोहब्बत का सवाल है, न मुरव्वत का। नियत खर्चापानी तो देना ही पड़ता है। कुछ माँ-बाप महत्त्वाकांक्षी हैं। उनका अरमान है कि उनकी संतान ‘टॉप’ करे या सूबे में दूसरे-तीसरे नंबर पर तो आए ही आए। जनसेवक यह ‘सेवा’ भी मुहैया करवाते हैं। बस धनराशि में एक-दो गुना बढ़ोतरी से कोई कैसे इनकार करे?

जनसेवक की ईमानदारी पर किसी भ्रष्ट तक को संदेह नहीं है। जो हाथ में लिया, उस काम को पूरी लगन से पूरा करने का प्रयास उनकी विशेषता है। तभी तो विभिन्न विभागों में नौकरी दिलवाने के खर्चे का जिम्मा इन्हीं को सौंपा जाता है। कभी-कभार तो स्थिति अविश्वसनीय हो जाती है। जैसे एक लिखित परीक्षा में नकल से पास प्रत्याशी नौकरी का इच्छुक था। प्रश्न-पत्र ‘ऑब्जेटिव’ आनेवाला था। हर सवाल के तीन-चार संभावित उत्तर और उनमें एक को ‘टिक’ करने का विकल्प, जानकार के लिए आसान है। अज्ञानी के लिए कठिन।

नकलची प्रत्याशी ने जनसेवक से जानना चाहा, ‘‘अंकलजी, यहाँ कोई नहीं है जो हमारी मदद कर दे?’’ अंकलजी ने रास्ता सुझाया, ‘‘बस बेटा, एक रास्ता है। तुम कुछ भी मत करना। प्रश्न-पत्र को कोरा छोड़ देना। बाकी सब हो जाएगा। लिखित परीक्षा से लेकर साक्षात्कार और नियुक्ति होने तक सिर्फ  पाँच लाख की ‘रेट’ है। अपने बाबूजी से बात कर लो। वे सहमत हों तो हम कोशिश करें?’’

बाबूजी को क्या एतराज होता? वे जानते थे कि नौकरीशुदा बेटे की दहेज के बाजार में कीमत और बढ़ जाएगी। जितना अभी खर्चेंगे, उससे कहीं ज्यादा वसूलेंगे। उन्होंने तत्काल जनसेवक को बुलाया और धनराशि उपलब्ध करवाई, ‘‘भैयाजी! यह खयाल रखिएगा कि कोई चूक न हो। खून-पसीने की कमाई है और हमने पेट काटकर बचाई है।’’

जनसेवक ने उन्हें अश्वस्त किया कि रकम मंत्री के खाते में जानी है और इसमें धाँधली का प्रश्न ही नहीं है। सही उत्तर प्रश्न-पत्र बनानेवाली एजेंसी के लोग ही भरेंगे और ‘भैया’ का चयन शर्तिया होगा। बाबूजी ने फिर जनसेवक को चलते-चलते प्रस्ताव दिया, ‘‘देखिए! कोई भी जरूरत हो तो बताएँ। हमारे भैया की जिंदगी का सवाल है। इसमें हमें कामयाब होना ही होना है।’’

जनसेवक ने उन्हें फिर से सफलता का भरोसा दिलाया। एकबारगी उसका मन हुआ कि कुछ अपना मेहनताना भी माँग ले। फिर उसे अपनी सेवा की साख का ध्यान आया। साख बढ़ी तो और आसामी फँसेंगे। उस का ‘कट’ तो पाँच लाख की राशि में था ही। ज्यादा लालच बुरी बला का सोचते हुए वह वापस लौट गया। लौटते वक्त अपने आप ही मुसकरा रहा था। मोहल्ले में कैसे-कैसे लोग बसते हैं। कितनी गंभीरता से बाबूजी ने ‘खून-पसीने’ की कमाई का जुमला उछाला था, जबकि पूरी दुनिया इन की भ्रष्टाचारी प्रवृत्ति से परिचित है। फिर उसे अपनी निजी अनुभव याद आया। उसका इतने लोगों से पाला पड़ा है। जो जितना भ्रष्ट है, वह उतना ही ईमानदारी का दम भरता है।

जनसेवक के व्यक्तित्व का ऐसा जादू है कि वह सबकी प्रशंसा का पात्र है। जिनके काम उसके पैसा लेने के बाद भी नहीं हो पाते हैं, वह उनका पैसे लौटा देता है। पर उन्हें यह बताने से भी नहीं चूकता है कि ‘‘हमने तो सरकारी विभाग में भी सबको बता दिया है कि उनके पैसा लेने से हमें कोई नैतिक आपत्ति नहीं है, बस इतना जरूरी है कि काम हो जाए। नहीं होने की दशा में ईमानदारी का तकाजा है कि पैसा लौटाया जाए।’’ जनसेवक का दावा है कि वर्तमान के समाज या सरकारी विभाग में सदाचार का यही इकलौता मानक है। ज्यादातर इस तक का भी अनुपालन नहीं करते हैं।

मोहल्ले में कुछ सरकारी सेवा में भी हैं। जनसेवक की ऊँचे संपर्कों की धाक ऐसी है कि उन्हें भी अपने प्रमोशन और मनचाही पोस्टिंग के लिए उसी का सहारा है। ‘ना’ जैसा नकारात्मक शब्द उसके शब्दकोश में नहीं है। सबके काम करवाने के प्रति उसका नजरिया सकारात्मक है। कुछ के हो जाते हैं, कुछ के नहीं होते हैं। अधिकतर वह किसी के लिए कुछ भी नहीं करता है, बस मौके-बेमौके ऐसों से मिले तो उन्हें यह सूचना देने के अतिरिक्त कि उसने उचित स्तर पर बात कर ली है और उसे ताज्जुब है कि अभी तक कुछ क्यों नहीं हुआ? ‘लगता है फिर याद दिलाना पड़ेगा’ की टिप्पणी के साथ वह उन्हें निराशा के अँधेरे से पल भर को उबारकर फूट लेता है।

उसे आभास है कि समृद्ध हो या गरीब, सबकी अपनी-अपनी समस्याएँ हैं। सुखी कोई नहीं है। वह स्वीकार करता है कि उसका और ज्योतिषी का उसूल समान है। दोनों ग्राहकों में झूठी आस जगाने की कमाई खाते हैं। उसका करवाया कोई काम या ज्योतिषी की एक भी भविष्यवाणी सच हो जाए तो लोगों को याद रहता है। दस भविष्य वाणियों का झूठ या काम न होना, किसे याद है? फिर स्वैच्छिक समाजसेवक की ईमानदारी तो ऐसी है कि वह पैसे लेता ही नहीं, लौटा भी देता है। अंततः धार्मिक देश में बात प्रारब्ध पर आ अटकती है, ‘‘उस का क्या दोष है? उसने तो पूरी कोशिश की, अपनी (या किसी और की) किस्मत ही खोटी है।’’

अचानक एक दिन सेवक के घर छापा पड़ा और तब से वह गायब हैं। हमारे मोहल्ले में शंकालु भी बसते हैं। उनका मत विभाजित है। कुछ कहते हैं कि ‘‘जमाना ईमानदारों का नहीं है। सी.बी.आई. ने पैसे खाकर एक समर्पित जनसेवक को बदनाम करने की साजिश रची है।’’ दूसरी टोल की मान्यता है कि ‘‘जरूर दाल में कुछ काला है। अपने परिवार और जान के अलावा नेता एक तो दूसरों की सेवा नहीं करते हैं तो इसे किस जन-कल्याण के पागल कुत्ते ने काटा था कि यह मोहल्ले में सब की निस्स्वार्थ सेवा करे?’’ कुछ ऐसे भी हैं, जिनका विचार है कि इस पूरे केस में सियासी षड्यंत्र है। ‘शासक दल’ को समाज-सेवक की बढ़ती लोकप्रियता रास न आई। चुनाव में एक-एक सीट बेशकीमती है। वह चुनाव लड़ता तो शर्तिया जीतता। इसीलिए आदेश देकर ‘केंद्रीय अन्वेषण कम, अनुपालन अधिक, ब्यूरो को उसके पीछे लगा दिया गया है।’’

हमारे मोहल्ले में देश की विविधताओं का प्रतिनिधित्व है, उसकी प्रतिक्रियाओं में भी!

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

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