देहदान

देहदान

बहुत देर से टेलीफोन की घंटी बज रही थी। अपने कमजोर कदमों को घसीटते हुए मास्टर त्रिलोकीनाथ शर्मा अपनी टूटी-फूटी चारपाई से उठकर बहुत कठिनाई से दूसरे कोने में रखी मेज तक पहुँचने में सफल हुए। इतनी दूरी तय करने में ही उनकी साँस धौंकनी की तरह चलने लगी थी। मेज पर पिछले तीस साल से टेलीफोन का एक चोगा रखा था। अस्वस्थ होते हुए भी इसे मास्टरजी नियमित रूप से साफ  करते थे। बाहर अधिक सर्दी होने अथवा बर्फ पड़ने पर वह भले ही पूजा करने से पहले नहाने का नागा कर जाएँ, परंतु इस चोगे की सफाई करने से नहीं चूकते थे। हर इतवार को कई बार गीला कपड़ा मार-मारकर इसे चमका देते थे। जब-जब उन्हें अपने प्रवासी पुत्र ललित की याद आती, वह इस चोगे पर प्यार से हाथ फेरकर कल्पना में ही उसका सिर सहला लिया करते थे। वह कभी भी इस मेज और कुरसी पर स्वयं नहीं बैठते थे, जिस पर तीस वर्ष पूर्व उनका पुत्र ललित कुछ दिनों के लिए बैठा था।`

तीस वर्ष पूर्व मास्टरजी सहित संपूर्ण गाँव ने गाजे-बाजे के साथ ललित को अपना भविष्य उज्ज्वल करने के लिए अमेरिका विदा किया था। शायद ही कोई ऐसा घर था, जिसका कोई सदस्य उस विदाई समारोह में भाग लेने के लिए गाँव की सीमा तक न पहुँचा हो। आखिर उस छोटे से गाँव के लिए यह एक अभूतपूर्व घटना थी। उस गाँव से तो क्या, अब तक उस पूरे जिले से कभी कोई व्यक्ति अमेरिका नहीं गया था।

मास्टर त्रिलोकी नाथ शर्मा के अथक प्रयासों से जिस वर्ष उनके गाँव में प्राइमरी स्कूल खुला था, उसी वर्ष उनके इसी कच्चे घर में ललित का जन्म हुआ था। उससे पहले शर्माजी को प्रतिदिन मीलों पैदल चलकर दूर गाँव के एक छोटे से स्कूल में पढ़ाने के लिए जाना पड़ता था। उस गाँव में भी मात्र दस-पंद्रह बालक-बालिकाएँ विद्यालय में आते थे। इसके लिए भी मास्टरजी को कितना परिश्रम करना पड़ा था, यह वही जानते हैं। कैसे उन्हें एक-एक घर का दरवाजा खटखटाकर बच्चों के अविभावकों को इसके लिए मनाना पड़ा था। वास्तव में शिक्षा की हवा अभी तक भारत के इस दूरस्थ क्षेत्र को छू नहीं पाई थी। न ही प्रशासन की ओर से इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास हुआ था। जब उस स्कूल में एक समीप के गाँव में रहनेवाले अध्यापक की नियुक्ति हुई तब शर्माजी ने अपने गाँव में स्कूल खुलवाने के लिए सरकार से पत्र-व्यवहार शुरू किया था। गाँव में मास्टरजी ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें पत्र लिखना आता था। उन्हीं के प्रयासों से उसी वर्ष गाँव में एक उप-डाकघर की भी स्थापना हुई थी। धीरे-धीरे गाँव में थोड़ी-बहुत समृद्धि आने लगी थी और लोगों को शिक्षा का महत्त्व समझ में आने लगा था। संयोग से मास्टरजी के एक पुराने छात्र का पितामह संचार मंत्री बन गया था। उसने न केवल मास्टरजी के घर तक बल्कि हिमाचल प्रदेश के अनेक छोटे-छोटे गाँवों तक टेलीफोन की सुविधा पहुँचा दी थी। अब तक किसी व्यक्ति के घर में टेलीफोन होना बहुत सम्मान की बात थी। मास्टरजी का तो वैसे भी लोग बहुत आदर करते थे।

इस जर्जर-कच्चे से घर से लगती हुई उनके पास तीन बीघा जमीन थी, जिस पर शर्माजी और उनकी पत्नी थोड़ी-बहुत सब्जियाँ पैदा करके कुछ अतिरिक्त कमाई जुटा लेते थे। पाँचवीं कक्षा के बाद ललित अपनी पढ़ाई जारी रख सके, इसके लिए शर्माजी ने उसे अपनी दूर के रिश्ते की एक बहन के पास शिमला के समीप एक कस्बे में भेज दिया था। जहाँ से उसने दसवीं की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली। जब ललित दसवीं पास करके गाँव वापस लौटा, वह दिन गाँववालों के लिए ऐतिहासिक और उत्सव जैसा था। ऐसा उत्सव गाँव में कभी-कभार तब मनाया जाता था, जब वहाँ पर किसी नेता का आगमन होता था अथवा जिस दिन चुनावों के लिए मतदान का दिखावा होता था। चुनाव वाले दिन पूरे गाँव के लिए किसी बाहुबली प्रत्याशी द्वारा खाने और दारू पीने की व्यवस्था की जाती थी। एक ही मतदान केंद्र पर दरोगाजी द्वारा सबके मतों का गुप्त दान हो जाता था।

मास्टरजी के साथ-साथ अब ललित भी उच्च शिक्षा प्राप्त करके कहीं अच्छी नौकरी करने की लालसा मन में पालने लगा था। ललित की माँ जानकी देवी इस बात के पूरी तरह से विरुद्ध थीं। वह किसी भी मूल्य पर ललित को किसी बड़े शहर में भेजने के लिए तैयार नहीं थी। उसका मत था कि यदि एक बार बच्चे को शहर की हवा लगी तो वह अपने माँ-बाप के किसी काम का नहीं रहता, परंतु शर्माजी को अपने दिए गए संस्कारों और ललित की समझ-बूझ पर पूरा विश्वास था।

मास्टरजी ने अपनी पत्नी से असहमत होते हुए दो टूक शब्दों में अपना निर्णय सुना दिया था, ‘यदि मेरा मेधावी पुत्र विदेश जाकर भी पढ़ना चाहेगा तो मैं किसी भी सीमा तक जाकर ललित को विदेश भेजने में आना कानी नहीं करूँगा।’ जोश में उन्हें इस बात का ध्यान भी नहीं रहा कि उनकी इतनी औकात ही नहीं थी। आमतौर पर शर्माजी अपनी पत्नी की किसी बात का विरोध नहीं करते थे। ललित के लिए ऊँची शिक्षा का जो यज्ञ त्रिलोकीनाथजी ने करवाया, उसमें उनकी तीन बीघा भूमि सामग्री बनकर स्वाहा हो गई। मास्टरजी के माथे पर एक भी शिकन नहीं आई, जबकि जानकी देवी निरंतर कहती रहीं, ‘एक ओर तो हम अपने बेटे से वंचित होने जा रहे हैं, दूसरी ओर जो थोड़ी सी भूमि पुरखों से मिली है, उससे भी हाथ धो बैठेंगे।’ शर्माजी को सुनहरे भविष्य के लिए यह सौदा बहुत सस्ता दिखाई दिया था।

दिल्ली शहर की चकाचौंध और हॉस्टल में रहनेवाले समृद्ध सहपाठियों ने ललित की प्रतिभा को देखते हुए उसे अमेरिका जाने के सपने दिखाने प्रारंभ कर दिए। इस प्रकार उन्हें ललित द्वारा तैयार किए जानेवाले ‘नोट्स’ सहज ही उपलब्ध हो जाते। वह स्वयं भी उड़कर अमेरिका जैसे स्वर्ग में पहुँचने के मनसूबे बनाने लगा। वह दिन-रात पढ़ने लिखने में व्यस्त रहने लगा। उसका इस बात की ओर तनिक भी ध्यान नहीं था कि उसके माता-पिता किस प्रकार अपना पेट काट-काटकर उसकी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। वह तो किसी भी प्रकार देश से बाहर निकल जाने के सपने सँजोने लगा था। अभी वह बी.कॉम के अंतिम वर्ष की परीक्षा दे ही रहा था कि एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने उसे अमेरिका में जॉब देने का ऑफर दे दिया। अंधा क्या चाहे, दो आँखें। ललित को लगा जैसे लॉटरी निकल आई हो। मास्टरजी को लगा कि हमारे ही नहीं, पूरे गाँव के भाग्य खुल गए। उन्हें लगा था कि अब उनके दलिद्दर के दिन तो समाप्त होंगे ही, गाँव की उन्नति का मार्ग भी खुल जाएगा। उन्होंने कई बार पढ़ा था कि अनेक प्रवासी भारतीय अपने गाँव के विकास के लिए वहाँ से बड़ा मोटा पैसा भेजते हैं। एकल विद्यालयों के विषय में तो उन्हें पक्की जानकारी थी कि उनके लिए अनेक प्रवासी भारतीय धन उपलब्ध करवाते हैं।

अमेरिका में ललित को किसी प्रकार की कठिनाई होनेवाली नहीं थी, क्योंकि जिस कंपनी में उसकी नियुक्ति हुई थी, वहाँ रहने आदि की व्यवस्था करने का सारा दायित्व उसी का था। जल्दी ही ललित के फोन प्रति सप्ताह घर पर आने प्रारंभ हो गए और अपने इस नियम को उसने कभी भंग नहीं किया। शर्मा दंपती इसी बात से प्रसन्न थे कि उनके बेटे का भविष्य बन रहा है और उसने उन्हें भुलाया भी नहीं। जब कभी वह अपने पिता से पूछता कि आपको पैसे की कोई आवश्यकता तो नहीं है, वह अपने स्वाभिमानी स्वभाववश यह कहकर टाल देते कि बेटा जब जरूरत होगी तो तुम्हें ही तो बताएँगे। तुम्हारे सिवा इस दुनिया में हमारा और है ही कौन? हाँ, अपने कुशल-मंगल के बारे में सूचित करते रहना, हम यहाँ पर प्रसन्न हैं। जानकी हर बार यह कहती थी कि जब भी संभव हो, एक बार मिल आओ, परंतु वह किसी-न-किसी बहाने इस बात को अनसुनी कर देता था। ऊपर से प्रसन्न दिखनेवाली जानकी भीतर-ही-भीतर बेटे के गम में घुलने लगी थी। उसका मन कहता था कि अब वह जीवन में अपने बेटे से कभी मिल नहीं पाएगी। इस पर मास्टरजी कहते, ‘भली मानस, कुछ दिनों की बात है, उसके पैर जम जाएँ तो वह उसको विवाह के लिए वापस बुला लेंगे और फिर यदि तुम चाहोगी तो वापस नहीं जाने देंगे। बहू बेटे से खूब सेवा करवाना।’

जब कभी उसके रिश्ते की बात होती, शर्माजी गरदन ऊँची करके इनकार कर दिया करते। वैसे भी विदेश में नौकरी कर रहे लड़के का रिश्ता लेकर आनेवाला बहुत सोच-विचारकर ही इतना साहस करता था। एक दिन फोन पर ललित ने बताया कि उसने अपने साथ काम करनेवाली कन्या डॉली जॉनसन के साथ विवाह करने का निश्चय किया है। उसने बताया कि मैं आपके अमेरिका आने की तैयारी कर रहा हूँ। इतना सुनते ही शर्मा दंपती के पैरों तले की जमीन खिसक गई। उन्हें यह स्पष्ट दिखाई देने लगा कि अब उनका बेटा कभी स्वदेश नहीं लौटेगा। मास्टरजी ने उसके माध्यम से इस गाँव और जिले की उन्नति के जो सपने देखे थे, वह ताश के पत्तों की तरह बिखरते दिखाई देने लगे।

जानकी, जो पहले ही उसके गम में घुली जा रही थी, बहुत अधिक चिंतित रहने लगी। उसने चारपाई पकड़ ली। आसपास कहीं अच्छे इलाज की व्यवस्था नहीं थी और शिमला, चंडीगढ़ अथवा दिल्ली जाकर इलाज करवाना उनकी समर्थ्य से बाहर था। सेवानिवृत्त होने के बाद वैसे भी उनका गुजारा थोड़ी सी पेंशन और कुछ बच्चों को ट्यूशन के दम पर होता था। इसके अतिरिक्त दोनों के पास पासपोर्ट तक नहीं थे। यदि किसी तरह पासपोर्ट बन भी जाए और ललित टिकट भेज दे तब भी अमेरिका का वीजा मिलना एक जंग जीतने के समान था। इसके अतिरिक्त जानकी के गिरते हुए स्वास्थ्य और अन्य विवशताओं के सामने उन्होंने हथियार डाल दिए और बेटे-बहू को फोन पर ही आशीर्वाद देकर अपने मन को सांत्वना दे ली। अपने जाननेवालों और गाँववालों को भी मास्टरजी ने समझा दिया कि बेटे की जिद के बावजूद वह लोग वीजा न मिलने के कारण अमेरिका नहीं जा पा रहे।

अब तक ललित ने एक बार भी कभी भारत आने की बात नहीं की थी; बल्कि एक बार जब गाँव के निवासियों ने मिलकर गाँव की सौवीं वर्षगाँठ पर उसे सम्मानित करने का कार्यक्रम बनाया तब भी उसने कह दिया कि ऐसे छोटे-मोटे सम्मान का उसके जीवन में कोई महत्त्व नहीं है। वह अमेरिका में बहुत अच्छी कंपनी में, बहुत ऊँचे पद पर काम कर रहा है, इसलिए अब वह भारत आना ही नहीं चाहता। अपनी इज्जत बचाने के लिए मास्टरजी ने गाँववालों से माफी माँगते हुए कह दिया था, अपनी व्यस्तताओं के कारण उसका भारत आना संभव नहीं है, परंतु यह बात उन्हें बहुत अंदर तक चुभ गई थी।

जल्दी ही डॉली गर्भवती हो गई। अब उसे अपनी माँ सरीखी किसी महिला की आवश्यकता का अहसास हुआ, परंतु अब तक जानकी का स्वास्थ्य बहुत गिर चुका था। इसलिए उसका वहाँ जाना संभव नहीं था और वह लोग यहाँ आना नहीं चाहते थे। जिस दिन ललित के यहाँ पुत्र का जन्म हुआ उसी, सप्ताह जानकी अपने बेटे और पोते को देखने की लालसा मन में लिये इस संसार से विदा हो गई। जब इसकी सूचना ललित को दी गई तो उसने कहा, ‘ऐसी स्थिति में मेरा वहाँ आना संभव नहीं। वैसे भी अब मेरे आने से होगा क्या। जो होना था हो चुका। जब तक मैं आने की व्यवस्था करूँगा, आप सभी संस्कार संपन्न कर चुके होंगे। वैसे भी मैं ऐसे आडंबरों में विश्वास नहीं करता तो बेकार ही मैं अपना समय और पैसा क्यों बरबाद करूँ।’ अब मास्टरजी को अहसास हुआ कि जानकी ठीक ही कहती थी कि एक बार बच्चा बाहर गया तो कभी नहीं लौटेगा, परंतु हमेशा ऐसा तो नहीं होता। अधिकांश युवक निरंतर अपने माँ-बाप से मिलने अथवा उनके सुख-दुःख में सम्मिलित होने के लिए आते ही हैं। यदा-कदा माता-पिता को भी अपने पास रहने के लिए बुलाते हैं। अब तो ललित के साथ उनका रिश्ता टेलीफोन की एक तार के माध्यम से ही जुड़ा हुआ था। बहुत चाहने पर भी वह इस डोर को तोड़ना नहीं चाहते थे। उनका दुनिया में कोई और था ही नहीं। हमेशा हँसमुख रहनेवाले मास्टरजी गुमसुम रहने लगे और किसी-न-किसी प्रकार जीवन के शेष दिन अपनी संगनी के अभाव में अकेले ही काटने लगे। उनका बलिष्ठ शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा। फिर भी वह किसी प्रकार अपनी पेंशन और अड़ोस पड़ोस की कृपा, सहायता अथवा सहयोग पर आश्रित होकर जीवन व्यतीत करने लगे। ललित की ओर से उनका मन बहुत खट्टा हो गया था, परंतु वह इसे जाहिर करना नहीं चाहते थे। उन्होंने टेलिफोन के इस चोगे को ही अपना पुत्र मान लिया था, जिसके साथ वह अपना सुख-दुःख बाँट लेते थे। कभी हँस लेते थे और प्रायः चुपचाप रो लिया करते थे। यदा-कदा ललित औपचारिकतावश यह पूछ लिया करता था कि उन्हें पैसे की कोई जरूरत तो नहीं, परंतु अपने आप उसने कभी यह नहीं सोचा कि आखिर मेरे जन्मदाता की हालत क्या होगी और उनका गुजारा कैसे चलता होगा?

कँपकँपाते हाथों से उन्होंने टेलीफोन का चोगा उठाया तो ललित ने बहुत हर्ष भरे स्वर में कहा, ‘पिताजी, आपका पोता इतना बड़ा हो गया है कि अपनी गर्लफ्रेंड के साथ दक्षिणी अमेरिका के कुछ देशों में भ्रमण के लिए गया है। वह तो चाहता था कि वह एक बार भारत आए और अपने पिता के गाँव को देख ले, परंतु मैंने ही समझाया कि अपनी इस गर्लफ्रेंड को लेकर उस गंदे से गाँव में जाकर क्या करोगे और वहाँ जाकर कहाँ ठहरोगे। आस-पास कोई पाँच सितारा होटल भी तो नहीं है। फिर इस आयु में आपको भी असुविधा होती। इसका ध्यान करके मैंने ठीक निर्णय लिया न पिताजी।’

‘हाँ बेटा, आपका फैसला तो हमेशा से ही ठीक रहा है। मैंने भी गत दिनों एक निर्णय किया है, ताकि मेरे बाद आपको किसी प्रकार का कष्ट अथवा समस्या न हो। गत दिनों हमारे गाँव में एक कैंप लगा था, उसमें मैंने अपनी देह का दान कर दिया है।’ इतना कहकर मास्टरजी ने फोन काट दिया और अपने कमजोर हाथों से झुर्रियों में लुप्त होने से पहले ढलकते आँसुओं को पोंछ लिया और निढाल होकर पहली बार उस कुरसी पर बैठ गए।

८२, साक्षर अपार्टमेंट्स,

ए-३, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-११००६३

दूरभाष : ९८१०३९५२२३

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