पाठालोचन : प्रो. डी.एल.एन. के स्मृतिपूर्ण मार्गदर्शन के साथ

पाठालोचन : प्रो. डी.एल.एन. के स्मृतिपूर्ण मार्गदर्शन के साथ

मै सूर के महाराजा कॉलेज की विद्वत्ता का एक संभ्रांत इतिहास है। कन्नड़ भाषा के ही नहीं, विद्वत्ता की खान उस महाविद्यालय में उसके नाम की सार्थकता उस बीसवीं सदी में भी थी। कहाँ वह भारत का गौरव, महान् शिक्षक सर्वपल्ली राधाकृष्णन, वह राष्ट्रकवि कुवेम्पु, प्रो. एस.बी. रंगण्णा, प्रो. राघवाचार, प्रो. रामचंद्र राव गिनते जाओ, गिनते ही रह जाओगे, वह शैक्षणिक वातावरण, सांस्कृतिक हावभाव; इन सबके बीच वह कन्नड़ विभाग के प्रोफेसर लोग ‘सरस्वती शृति महती महीयताम्’ आज भी महाराजा कॉलेज की सीढि़यों के बीच बैठी मंदस्मिता महती सरस्वती शान से विराजती है।

उसी महाराजा कॉलेज के दो दिग्गज विद्वान्, कन्नड़ विभाग के आचार्य ती.नं. श्रीकंठय्या और डी.एल. नरसिंहाचार थे। दोनों के बीच वह आदरभाव, सख्य भाव एक आदर्श गुरुकुल की याद दिलाता है। उनके आश्रम में पढे़ विद्यार्थी आज तक अपनी विद्वत्ता और सामर्थ्य को संसार के चारों ओर फैला रहे हैं। आश्चर्य की बात, वह सौ प्रतिशत ‘ए’ क्लास विद्यार्थी साहित्य और भाषा विज्ञान प्रशासन, भाषण कला सभी में विद्वान्, ऐसे गुरु मनीषियों में से डी.एल. नरसिंहाचार एक सरल जीव शोध की सभी दिशाओं के उद्भट विद्वान् द्वारा रची ‘कन्नड़ पाठ संपादन’ वाली पुस्तक का आज भी कोई सानी नहीं।

ती.नं. श्री ने भारतीय काव्य मीमांसा ग्रंथ की रचना कर कन्नड़ भाषा के विद्यार्थियों के लिए काव्यशास्त्र और रस सिद्धांत को सरल-सुगम बनाया तो डी.एल.एन. ने पाठालोचन पर ‘कन्नड़ ग्रंथ संपादन’ पर एक कालजयी ग्रंथ की रचना कर पाठालोचन को, उसके इतिहास को कन्नड़ के विद्यार्थियों को सुलभ बनाया।

प्रो. डी.एल.एन. मेरे गुरु थे। गुरु कहते ही उनका वह कायिक-बौद्धिक चेहरा सामने आ खड़ा होता है। अभूले-अमिट वह पारंपरिक तिलक, धोती, कमीज, कोट, टोपी; प्रोफेसरवाले उनके उस छोटे से कमरे में बैठकर विद्यार्थियों को बढ़ाते समय दर्शित उनकी सहज आत्मीयता व आदरणीय व्यक्तित्व अभूला है। पढ़ाने में कोई दिखावा नहीं, सहज शोधात्मक, गवेषणात्मक दृष्टि, कोई भी विषय पढ़ाने को तैयार, लगता भी नहीं था कि लोग बैठकर उनके आश्रम में पढ़ रहे हैं। इस प्रकार के प्रोफेसर आजकल बहुत कम मिल पाते हैं, उनके स्मरण के साथ उनसे रचित उक्त ग्रंथ के कुछ अंशों का आधार ग्रहण कर पाठालोचन को परिभाषित कर कुछ प्रमुख बिंदुओं को प्रस्तुत करने का यहाँ उद्देश्य है।

पाठालोचन पूर्व-पश्चिम और संभावनाएँ

पाठालोचन को कन्नड़ भाषा में ‘ग्रंथ संपादन’ कहा जाता है और अंग्रेजी में टेक्सचुअल क्रिटिसिज्म कहते हैं। अपने समय में हमने अंग्रेजी के ए.ए रिचर्डस के ‘टेक्सचुअल क्रिटिसिज्म’ नामक ग्रंथ के बारे में सुना भी था।

चूँकि अपनी छात्र दशा में इसको एक अध्ययन का विषय नहीं बनाया था। इस विषय की हमें एक अध्यापक से स्थूल जानकारी मिली थी। पौर्वात्य और पाश्चात्य देशों में काफी समय से इस दिशा में गंभीर चिंतन जरूर हुआ है।

पाठालोचन का उद्देश्य स्पष्ट है—मूल पाठ की सुरक्षा। प्राचीन ग्रंथों की पाठ परिशुद्धता की सुरक्षा। ऐसे समय में, जबकि लिपि का चिंतन और विकास नहीं हुआ था और लिखने के लिए कागज की खोज नहीं हुई थी, प्राचीनकाल के चिंतक-मनीषियों ने वाचन की परंपरा को गठित किया था।

इस परंपरा में दो तकनीकों का महत्त्व था—एक तो अनुकरण व अनुरणन। इस परंपरा में निरंतर अभ्यास और विद्यार्जन के लिए पूर्ण कालावधि समर्पण आवश्यक था। इस कारण समाज का एक वर्ग इस कार्य के लिए समर्पित था।

भाषा चूँकि पैतृक संपदा नहीं और वैयक्तिक ध्वनि यंत्रों द्वारा मूल पाठ का अनुकरण होता था, भाषा कभी स्थिर या शून्य नहीं हो सकती, मूल पाठ में ध्वन्यंतर का होना स्वाभाविक हुआ करता है।

भारतीय जीवन में इस कारण ग्रंथ संपादन के कई मजबूत तरीके अपनाए गए। वेदों का हर शब्द, समास, प्रत्यय और अक्षर बिना किसी परिवर्तन के आज तक सुरक्षित होते हुए आए हैं।

आज तक इस अर्थ में, हालाँकि वेद ग्रंथस्थ हो चुके हैं, तब भी गुरु-शिष्य परंपरा में गुरु मुखेन वेदों के स्वर पाठ की और मूल ग्रंथों की सुरक्षा होती आई है।

वेदोच्चारण में क्रम पाठ, पद पाठ, जटा पाठ, धन पाठ आदि क्रम अपनाकर पाठों की सुरक्षा हुई है। ‘पद पाठ’ यानी हर शब्द को उसकी पिछली और अगली संधि, समास, प्रत्यय आदि को विश्लेषित कर उच्चारण करना है। एक ही शब्द को उसके पिछले शब्द के साथ जोड़कर, एक बार उसके अगले शब्द के साथ जोड़कर, दूसरी बार उसका उच्चारण करना क्रम पाठ होता है। जैसे समझ लीजिए—ए, बी, सी, डी नामक चार शब्द हैं, उन्हें एबी, बीसी, सीडी कहकर उसका पठन करना।

जैसे संगीत की पहली कक्षा में एक विद्यार्थी को अष्टताल के साथ जोड़कर ‘सा रे ग म प ध नि सा, सा नि धा प म ग रे स’ को द्वितीय तृतीय चतुर्थ आवृत्तियों में दो-दो, तीन-तीन तथा पूर्ण पंक्तियों की पुनरावृत्ति द्वारा राग और कंठ पाठ की शिक्षा दी जाती है, उसके बोध से पूर्व वेदों के उच्चारण में पहली बार अनुलोम, दूसरी बार विलोम, तीसरी बार अनुलोम द्वारा उच्चारण किया जाता है। फिर जटा पाठ में ए बी, बी ए, बी सी, सी बी, बी सी के रूप में उसके उच्चारण को देखा जा सकता है। ‘अग्नि मीळे पुरोहितम्’ को इस दृष्टि से उच्चारण कर पद पाठ की सुरक्षा पर ध्यान दिया जा सकता है।

‘जटा पाठ’ के बाद धन पाठ की बात आती है। इसमें आठ प्रकार का क्रम अपनाकर वेदपाठ की सुरक्षा की गई है। इस क्रम को वेदाध्ययन में उदात्त-अनुदात्त और स्वरित के रूप में पहचाना गया है। एक ऊपर की ध्वनि, मध्यमा तथा निचली ध्वनि। संगीत के अभ्यासी को यही ‘आरोह-अवरोह’ के रूप में सिखाया जाता है।

‘धन पाठ’ में ए बी, बी ए, ए बी सी, सी बी ए, ए बी सी और बी सी, सी बी, बी सी डी आदि क्रम अपनाए जाते हैं।

वेद यद्यपि प्रमुख रूप से चार माने जाते हैं, ऋग्वेद में कुल १०१७ अथवा १०२३ सूक्त हैं। सामवेद के ऋक् में ७५ को परे रखकर बाकी सब ऋग्वेद से ही लिए गए हैं। यजुर्वेद के ऋक् में करीब ७०० ऋग्वेद के ही हैं, बाकी सब या तो गद्यभाग हैं या सूक्त। अथर्ववेद में ७३० सूक्त और ६००० ऋक् हैं। इनमें भी १२०० ऋक् ऋग्वेद से ही लिए गए हैं। अथर्ववेद में दो-तिहाई अंश गद्य में हैं। इस कारण विद्वानों के मतानुसार ऋग्वेद पाठ सीखकर बाकी अंशों को आसानी से पठन कर सकते हैं।

वेदों के अलावा भारतीय पुराण ग्रंथों की सुरक्षा भी वाचन के माध्यम से होती आई है। अंतर मात्र यह है कि रामायण और महाभारत के लिए वेदों के पठन का क्रम नहीं अपनाया गया। इस कारण पाठालोचन की समस्या उद्भूत हुई। प्रायः यह भी हुआ होगा कि इनको वेदों की तुलना में उतना पवित्र नहीं माना गया, हर व्यक्ति के जीवन की साधना का अथवा अज्ञात को खोज निकालने की दिशा में प्रयत्न नहीं हुआ।

एक और बात भी कि ये दोनों बृहदाकार ग्रंथ थे। पीढि़यों के साथ भाषा का प्रवाह और नई भाषाओं का जन्म और नई संस्कृतियों के साथ संपर्क के कारण भी मूल पाठ की सुरक्षा में कठिनाई आई होगी।

अध्ययन तथा जन-जीवन के साथ जोड़कर देखने से भी पता चलता है कि जमीनी जन-जातियों के जीवन के साथ जुड़कर कई प्रकार की रामायण और महाभारत की कथाओं का विकास हुआ है और होता रहा है। इसके अलावा भारत में लिपियों के ईजाद से भी ग्रंथों को लिपिबद्ध करने की परंपरा का आरंभ हुआ होगा। पीढ़ी-दर-पीढ़ी वाचन के माध्यम से बहते आए इन पुराण ग्रंथों में मूल रूप की सुरक्षा नहीं हुई होगी।

‘निघंटु’—कोश का पर्यायवाची शब्द है; पाठ अथवा ग्रंथ संपादन के कार्य में मूल पाठ की सुरक्षा के उद्देश्य से कोशों की रचना का महत्कार्य जो हुआ, इसे एक ऐतिहासिक घटना माना जा सकता है। ‘निघंटुओं की व्याख्या भी इसी उद्देश्य से लिखी जाती रही। उदाहरण के लिए, यास्काचार्य रचित निघंटु और उस पर देवराज यज्वन द्वारा रची गई व्याख्या।

यज्वन द्वारा दी गई एक व्याख्या हमें प्राप्त होती है। वह कहते हैं, हस्तलिखित प्रतियों में कुछ अर्थों को देते समय लेखक ने कुछ शब्दों को ज्यादा डाल दिया है, कुछ और प्रतिलिपियों में कुछ शब्द लुप्त हो गए हैं। कुछ अन्य प्रतिलिपियों में मूल शब्दों को हटाकर, कुछ दूसरे शब्दों को जोड़ा गया है; अक्षर बदल गए हैं, इस तरह कोशों में बहुत अव्यवस्था बनी हुई है, इन हस्तलिखित प्रतिलिपियों में नियमों का पालन नहीं हुआ है, निर्वचन का स्वरूप शास्त्रीय स्वरूप का नहीं, इस कारण नैघंटिक खंड जैसे नष्ट स्वरूप का बना हो।

वह यह भी कहते हैं कि अपने वंश में निरंतर शास्त्राध्ययन होता रहा है, वेंकटाचार्य के पुत्र माधव द्वारा रचित भाष्य ग्रंथ में नाम आख्यात, स्वर निपात, वाक्य रचना आदि का क्रम सोचकर कई प्रदेशों से लाई गई कई हस्तलिखित प्रतियों का परीक्षण कर पाठ को परिशुद्ध बनाया गया है। देवराज यज्वन ने अपने समय से पूर्व के व्याख्याकार स्कंद स्वामी, भट्ट भास्कर मिश्र, माधव आदि द्वारा दिए गए अलग-अलग पाठों को अंकित किया है और साथ ही उसके पाठ को शुद्ध बनाने का प्रयत्न किया है।

यही नहीं, भारतीय वेदांत की परंपरा में भी हमें निरंतर पाठ परिशुद्धि के कई निदर्शन मिलते हैं।

तेरहवीं सदी में मध्वाचार्य ने अपने ‘भारत तात्पर्य निर्णय’ नामक ग्रंथ में लिखा है—

क्वचित् ग्रन्थान् प्रक्षिपंति क्वचित् अंतरितानपि।

कुर्युः क्वचिच्व्यत्यासं प्रमादात् क्वचिदन्यथा॥

अनुत्पन्ना अपि ग्रन्था व्याकुला इति सर्वशः।

सत्सन्नाः प्रायशः सर्वे कोट्यंशेपि न वर्तते॥

उस पर वादिराज तीर्थ अपनी व्याख्या देते हैं। तात्पर्य यह कि मूल पाठ के साथ प्रक्षेपों को जोड़ने और उसे शुद्ध पाठ के संपादन की कोशिश हमारे यहाँ पहले भी होती आई है। प्रश्न यह उठता है कि पाठालोचन की नौबत क्यों आती है।

चिंतकों के अनुसार इसका कारण एक तो दुर्मति होती है; दूसरा यह प्राचीन ग्रंथों का आधार ग्रहण कर अपने मत-धर्मों के प्रचार हेतु कुछ अपने श्लोकों की रचना कर, मूल ग्रंथ में जोड़ देना और अपने वाद की पुष्टि में मूल ग्रंथ की कुछ ऐसी बातें, जो अपने धर्म के विरुद्ध हो, उसे छोड़ देना; कहीं कही गई बात को दूसरी जगह मोड़कर लिख देना आदि। और कई बार ऐसा भी होता है कि विद्वान्, नकलकार अनजाने अथवा अपने ज्ञान को जोड़ने के लिए भी मूल पाठ को मिटा देते हैं।

यह भारतीय पाठालोचन का स्वरूप रहा। पाठालोचन की आवश्यकता के कुछ उदाहरण रहे तो पाश्चात्य साहित्य में भी इसके अपवाद बहुत कम मिलते हैं, पश्चिम के साहित्य में एक तो ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल है, दूसरी तरफ ग्रीस के साहित्य में उपलब्ध काव्य, नाटक, शास्त्र, रोमन साहित्य, संस्कृति और यहूदी संस्कृति के तीन प्रवाह हमें प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं।

इन तीनों से संबंधित साहित्य की मात्रा बहुत बड़ी व विस्तृत है। इन सबके अध्ययन-पाठालोचन की वहाँ पुरानी परंपरा है। उदाहरण के लिए, कहा जाता है कि मिस्र के राजा टालेमी प्रथम के समय से ही यानी ई.पू. ३२३-२८५ तक ग्रंथ संपादन का कार्य संपन्न हो चुका था। जीनोडोटस टालेमी के दरबार का एक नामी विद्वान् था। उसने होमर के काव्यों का एक शब्दकोश तैयार किया था। उसने ई.पू. २७४ करीब ईलियड और ओडिसी काव्यों की पुरानी प्रतियों के आधार पर उसका पाठ संपादन किया था। उसने इन काव्यों को २४ अध्यायों में बाँटा था। प्रक्षेपवाली पंक्तियों को (+) निशान बनाकर दिखाया था।

जीनोडोटस का शिष्य अरिस्टोफेनिस था। उसने प्रक्षेपों को ही नहीं, ग्रंथ संपादन में कई पहचान, संकेत-चिह्नों को ईजाद किया। नक्षत्र का चिह्न, जहाँ अर्थ अस्पष्ट हो,? का चिह्न, प्रक्षेप अधिक हों, उनको अंकित करने और पुनरुक्तियों के लिए ‘>’ चिह्नों का उसने प्रयोग किया।

उसका शिष्य था अरिस्टर्कस। कहते हैं, उसने अलेक्सांड्रिया शहर में व्याकरण ग्रंथ संपादन की एक पाठशाला खोली थी। उसमें ४० विद्यार्थी थे। होमर के काव्यों का इसने दोबारा संपादन किया था।

जिन संकेत चिह्नों का उपयोग किया गया, वे निम्नानुसार हैं—

(१) + (कटार का संकेत चिह्न) प्रक्षेप पंक्तियों को इंगित करता है।

(२) > (वाण का संकेत) : भाषा, विषय में प्रक्षेप।

(३) > जीनो और अरिस्टार्कस के पाठ भेदों को दर्शित करता है। दोनों के विचारों में अंतर दर्शित करता है।

IV * अन्यान्य स्थानों पर पुनरावर्तित चरण

V * (Sigma) प्रक्षेप का संदेह सूचक

VI B (Anti Sigma) पदक्रम में हेराफेरी को दर्शित करता है।

इसके पाठालोचन के प्रमुख अंश निम्नानुसार हैं—

(१) होमर के भाषा वैलक्षण्य का गहरा अध्ययन

(२) प्रतिलिपियों के आधार पर ही निर्णय पर पहुँचते हैं; विरोधी पाठ के रहते उसी कवि के अन्य प्रयोगों को देखना; उहा को आधार बनाकर परिवर्तन सुझाते समय तटस्थ रहने की सावधानी बरतना।

(३) विषय विस्तार के लिए उसके द्वारा लिखी गई टिप्पणियाँ। इसने जो पाठ शुद्धि का क्रम अपनाया है, वह दूसरे लोगों की तुलना में काफी शास्त्रीय स्वरूप का है। उसने अपने संपादन कार्य में दो तरीके की हस्तलिखित प्रतियों को आधार बनाया। एक तो उसके स्वामी के नामवाला और दूसरा, जहाँ जिस प्रदेश में मिले हैं, उसका उसमें उल्लेख हो। उसने इसके अलावा अपने समय में प्रचलित पाठों की प्रतियों का भी उपयोग किया।

पाठालोचन संबंधी उपरोक्त पाश्चात्य रीतियों की यह एक पीठिका मात्र है, उसका अपना लंबा इतिहास है। आलेख की सीमा के कारण यह आरंभिक उल्लेख मात्र है। फिर स्वाधीन भारत में और बीसवीं सदी के आरंभकाल से ही साहित्य प्रेमियों ने कई तरह के प्रयत्नों से ग्रंथालोचन का कार्य किया है, दुर्लभ ग्रंथों को लक्ष्य बनाया है।

यहाँ के लोकजीवन में आज भी वाचकीय परंपरा में कई लोककाव्य बिखरे पडे़ हैं। बोडो रामायण, भीलोनु भारथ, कन्नड़ में कई लोक महाकाव्य जैसे मंटेस्वामी पद, मले मादेश्वर काव्य, जनपद रामायण, जनपद महाभारत, निमाड़ का सिंगाजी महाकाव्य; ये कुछ उल्लेख मात्र हैं, जिन सबका संपादन समकालीन विद्वज्जनों ने किया है।

आज के संदर्भ में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के साधन से रिकॉर्ड ध्वनिमुद्रण सुलभ साध्य बना है। लोक जीवन में पारंपरिक गायकों के कई परिवार हैं, जो गाते हुए लोककाव्यों को सुरक्षित रखते हैं। इन लोक-वाचक काव्यों के संपादन में एक कठिनाई यह आती है कि वाचन की शैलियाँ और कथा-स्वरूपों में भिन्न परिवार और भिन्न स्थानों के अनुसार अंतर आता है। समस्या यह कि किसे प्रामाणिक माना जाए?

ऐतिहासिक दृष्टि से और कथा-भाषा की दृष्टि से आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसी उद्देश्य से पृथ्वीराज रासो को अर्ध-प्रामाणिक कहा और वीसलदेव रासो को अप्रामाणिक माना। वर्तमान समय में उपरोक्त तथा अन्याय लोक काव्यों के संपादन में उपस्थित विभिन्न स्वरूपों को यथावाचकीय स्वरूप में ही संपादित किया जा रहा है। साहित्य अकादेमी ने भी लोनु भारथ के संपादन में यही क्रम अपनाया है।

मध्य प्रदेश की आदिवासी लोककला अकादमी ने पिछले वर्षों में, लोकजीवन में उपलब्ध इस प्रकार के कई लोककाव्यों का संकलन कर जनता को उपलब्ध कराया है। दक्षिण कन्नड़ जिले में एक भूताराधन की परंपरा है। आदिवासी जीवन का यह आराधन होता है। यह एक प्रकार से लोक रंगमंच का स्वरूप भी माना जा सकता है। इसमें काव्य नाम की वस्तु के अभाव में भी भूत के लिए प्रयुक्त भाषा अपरूपी होती है, जिसका सामाजिक भाषा से कोई संबंध नहीं होता।

इस प्रकार के लोकनाट्य संबंधी तत्त्वों का ग्रंथ संपादन अत्यंत कठिन कार्य हुआ करता है। जापानी ‘नो’ मंच की इससे तुलना की जा सकती है।

भूताराधन की विषयवस्तु उसके अर्थात् भूताराधन के भेद, जैसे जालाटा उसका एक भेद है। उसके पात्र, उनका समय संदर्भ के साथ महत्त्व, उसमें प्र्रयुक्त परंपरा आदि सबको गं्रथस्थ किया है, मंगलूर विश्व विद्यालय के कुलपति चिन्नप्प गौड़ा ने। भूताराधन कई प्रकार के होते हैं, उनके कई नाम होते हैं। उस प्रकार के ग्रंथ का पाठ-संपादन चूँकि अभी तक एक ही व्यक्ति द्वारा हुआ है, प्रस्तुत तसवीर घटित मंचीय स्वरूप का वर्णन आदि द्वारा एक विनूतन रीति अपनाकर हुआ है, वास्तव में आकर्षण का विषय है।

कंप्यूटर-इंटरनेट के आगमन के साथ पाठांतरों का, वाचकीय स्वरूपों की विविधता का आधार बनाकर संपादन किया जाता है, यह तरीका काफी सुविधाजनक माना जा सकता है।

नए युग के साथ, नए उपकरण पाठ संपादन के सुगम मार्ग के द्वार खोल रहे हैं। आशा है, उन वैज्ञानिक तरीकों से हम इतिहास की सही जानकारी पाठ-संपादन को सुगम बना सकती है।

१३०४, प्रथम ‘सी’ मेन, द्वितीय स्टेज

ब्लॉक-९, नगरभावी, बेंगलुरु-५६००७२

दूरभाष : ९४४८८५६१७४

हमारे संकलन