काहे फिरत बौरानी हो रामा

होली मानव के इतिहास में उतनी ही पुरानी है, जितना शैशव की अपेक्षा-यौवन। होली को हम अनादिकाल से यौवन मानते आए हैं। ‘भविष्योत्तर पुराण’ में उसका जैसा वर्णन मिलता है, वैसा ही आजकल यह प्रचलित भी है। ‘जैमिनीय पूर्वमीमांसा’ में ‘होलिकाधिकरण’ अलग से एक अध्याय है। बौद्धों के ‘धम्मपद’ में ‘बालनक्खत्त’ का बड़ा मनोरम वर्णन है। ‘बालनक्खत्त’ का का अर्थ होता है, ‘मूर्खों का समारोह।’ वात्स्यायन का ‘कामसूत्र’ तो इसके वर्णन से बहुत ही सुरभित है। सातवीं सदी के हर्षवर्धन का वर्णन तो बड़ा ही हृदयग्राही है। उदयन की कौशांबी में जिस प्रकार होली मनाई जाती थी, उसकी कल्पना से आज भी मन पुलक उठता है। १०२० ई. के लगभग महमूद गजनवी की राजसभा के एक विद्वान् अलबरूनी भारत पधारे थे। उन्होंने अपने लिखे हुए यहाँ के वृत्तांत में बड़ी विशदता से होली का वर्णन किया है। मुगल बादशाह तो बराबर होली खेलते थे। बेगमों के साथ जहाँगीर के होली खेलने का एक चित्र भी मिलता है।

सच तो यह है कि यह ऋतु ही विलास की ऋतु है। यौवन बड़ी उद्दामता से अपने निकट की शैशव और जरा नाम की दोनों अवस्थाओं पर अपना प्रभाव डालने से नहीं चूकता। जो यौवन में होते हैं, उनकी रक्षा तो इस मौसम में शिव के भी बूते की बात नहीं।

प्रकृति का स्पष्ट और पारदर्शी सौंदर्य देखना हो तो इस अवसर पर गाँवों में चले जाइए। वहाँ की रमणियाँ इस समय प्रकृति की विचरती हुई शोभा सी महसूस होती हैं। वहाँ लगता है, पुरुष जाति वसंत और नारी जाति ऋतु बनकर यौवन समारोह बना रहे हों। सुनिए, वहाँ से कैसा मधुर स्वर आ रहा है—

आइउँ पिताजी की चोरी, भला केउ रंग न छाँडै़।

पहिलिन होरी ससुरजी से खेल्यों।

खेल्यों घुँघटवा की ओट॥ भला.॥

दुसरिन होरी जेठजी से खेल्यों।

खेल्यों बरोंठवा की ओट॥ भला.॥

तीसर होरी देवरजी से खेल्यों।

खेल्यों नयनवा की ओट॥ भला.॥

चौथी होरी बलमजी से खेल्यों।

खेल्यों जोबनवा की ओट॥ भला.॥

सखियाँ एक-दूसरे से इस ऋतु में कोमल अनुभूतियों की आत्मीयता की बड़ी बौरानी छेड़छाड़ करने लगती हैं। बताइए, इसका क्या जवाब है—

काहे फिरत बौरानी हो रामा, सखि नैहर में।

आइ गए तोरे गौने क दिनवाँ बहुत रहत अलसानी हो रामा।

खेलत खात बरस बहु बीते सो बस ह्वै है कहानी हो रामा।

वास्तविकता तो यह है कि होली के महीनों पूर्व जड़-चेतन समेत सारी सृष्टि की नस-नस में संगीत समा उठता है। वन-उपवन गा उठते हैं। युवतियों की आँखों में कामदेव अँगड़ाइयाँ लेने लगता है। फूल चिटख उठते हैं। भौंरों की गूँज पर मधु चू-चूकर बरस पड़ता है। इस अवसर के जुलूस देखते ही बनते हैं। लगता है, प्रकृति जैसे स्वयं सितम ढाती हुई चल रही हो। रास्ते में जाती हुई भीड़ पर मकानों के छज्जों से अपनी चितवनों को दाएँ-बाएँ फेंकती हुई कामिनियाँ रंग छिड़कने लगती हैं तो उस समय पुरुष बाहर से भी सराबोर हो उठता है और भीतर से भी। इस अवसर के गीत क्या होते हैं और कैसा उन्माद पैदा करते हैं, यह बताने का नहीं, अनुभव करने का विषय है—

नकबेसर कागा ले भागा

सैयाँ अभागा ना जागा!

कृष्ण को अहीर जाति का समझकर उनकी प्रियतमा उनका कैसा परिहास कर रही हैं—

बने-बने गइया चरावै रे कन्हइया,

घरे-घरे जोरत पिरीत।

आनकी बिअहिया क सान मार आवै,

आखिर त जतिया अहीर।

एक कामिनी अपनी सहेली के कमनीय कलेवर में उभरते हुए यौवन का चित्रण कैसी मदिरता से कर रही है, देखिए—

अमवा क लाग टिकोरवा रे सँगिया,

गूलरि फरी है हड़फोरि।

गोरिया क उकसा है छाती क जोबनवा,

पिया के खेलौना रे होई॥

किसी नायिका को अपनी देह और मन पर उद्दामता से तुरंत प्रभाव डालनेवाले यौवन की अनुभूति नहीं है देखें—

बईद-हकीमवा बुआलो कोई गुइयाँ,

कोई लेओ री खबरिया मोर।

खिरकी से खिरकी ज्यों फिरकी,

फिरत दुओ पिरकी उठल बडे़ जोर॥

एक होली गीत का रस लीजिए—

होरी खेलन जनि जाहु लाल

कोऊ रंग डारि दीहैं।

ब्रज की नारि समै मदमाती

तोहिके पकडि़ लै जइहैं।

छीन लेइहैं पट भाल मुरलिया

सिर पर चुनरी ओढइहैं।

बेंदी भाल नयन बिच काजर

नकबेसर पहिरइहैं।

माँग में सेनुर कान में गहना

बार में चोटी लगइहैं।

विश्वनाथ करि जोरि विनय करैं

तोहिके नाच नचइहैं।

एक और होली गीत द्रष्टव्य है, जिसकी ब्रज में सर्वत्र गूँज है—

आज बिरज में होरी रे रसिया!

होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया॥

उड़त गुलाल लाल भए बादर,

केसर रंग में बोरी रे रसिया!

बाजत ताल मृदंग झाँझ डफ,

और मँजीरन जोरी रे रसिया!

फेंट गुलाल हाथ पिचकारी,

मारत भर-भर झोरी रे रसिया!

इत सों आए कुँवर कन्हैया,

उत सों कुँवरि किसोरी रे रसिया!

नंदगाँव के जुटे हैं सखा सब,

बरसाने की गोरी रे रसिया!

दोउ मिलि फाग परसपर खेलैं,

कहि-कहि होरी-होरी रे रसिया!

होली वसंत ऋतु की कीर्ति है, समारोह है। कालिदास ने लिखा है कि इन दिनों काम स्त्रियों के रोम-रोम में समा उठता है। वे आनंद में इतनी विभोर हो जाती हैं कि उनका चलना-बोलना भी कठिन हो जाता है। टेढ़ी भौंहों से उनकी चितवन बड़ी कँटीली लगने लगती हैं। मद से अलसाई हुई रसीली स्त्रियाँ प्रियंगु, कालीयक और चंदन मिले केसर के घोल में कस्तूरी मिलाकर अपने गोरे-गोरे अंगों पर चंदन का लेप लगाने लगती हैं। अपनी प्रियाओं-पत्नियों से दूर रहने के कारण जिनका जी बेचैन हो रहा है, वे यात्री जब मंजरियों से लदे हुए आम के पेड़ों को देखते हैं तो अपनी आँखें बंद करके रोते और पछताते हैं कि कहीं मंजरियों की भीनी-भीनी महक उनके रोम-रोम को मदिर न कर दे, आकुल न कर दे और विह्वल न कर दे।

प्रस्तुति :नलिनी मिश्र

ए-१/६३, ऐक्टर-बी,

अलीगंज, लखनऊ-२२६०२४

दूरभाष :९९८४७६२६५८

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