राजस्थान राज्य अभिलेखागार की अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि

राजस्थान राज्य का भूमि अभिलेखागार बीकानेर में है। उस समय मुख्य राज्यों की जो राजधानियाँ थीं, उनमें नवनिर्मित राजस्थान राज्य के मुख्य कार्यालयों को वितरित करने का निश्चय किया गया। राज्य अभिलेखागार द्वारा १० लाख से अधिक रिकार्डों का डिजिटलाइजेशन लेखागार बीकानेर और निदेशालय में स्थापित करना तय हुआ। यह उचित ही था, क्योंकि बीकानेर नरेश महाराज गंगा सिंह ने अपने समय में अपनी रियासत के विभिन्न सरकारी महकमों के आधुनिकीकरण के अनेक प्रयास किए थे। प्रशासनिक सेवा में आने के उपरांत राजस्थान हमारी कर्मभूमि रही। राजस्थान के इतिहास, शौर्य और बलिदान की गाथाओं से जो भावनात्मक लगाव बचपन से ही था, वह भावनात्मक आकर्षण आज भी वैसा ही है। वहाँ के अनेक स्थलों को देखने के बाद, कुछ साहित्य पढ़ने और राजस्थान में कई प्रसिद्ध इतिहासकारों से मिलने के बाद उसमें वृद्धि ही हुई। वर्ष १९९४ के नवंबर में मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडि़या के सचिव होने का अवसर मिला। उस समय हम नौसिखिया थे, व्यावहारिक प्रशिक्षण उत्तर प्रदेश में समाप्त कर १९९३ में ही अपनी कर्मस्थली काडर में पहुँचे थे। सुखाडि़याजी के पास ही शिक्षा और संस्कृति विभाग थे। उनकी भी आकांक्षा थी कि राजस्थान के हर क्षेत्र में आधुनिकता के मूल्य और कार्य-प्रणाली लाई जाए। साथ-ही-साथ पुरातत्त्व और हमारी पारंपरिक प्राचीन विरासत का भी संरक्षण हो। मुख्यमंत्री के सचिव होने के नाते एक आयोजन में अगले वर्ष जाना हुआ। अपनी आदत के अनुसार अभिलेखागार और म्यूजियम देखने गया तथा दोनों से बहुत प्रभावित हुआ। म्यूजियम से कुछ पुस्तकें भी खरीदीं।

एक अंतराल के बाद फिर अभिलेखागार को देखने गया, उसमें काफी कुछ और विकास हुआ था। प्रसन्नता हुई कि देख-दिखाव की दृष्टि से भी व्यवस्था ठीक है। उनके कुछ नए प्रकाशन भी लिये। इतिहास केवल राजा-महाराजाओं का इतिहास नहीं है, वह जनता का भी इतिहास है; सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं वैचारिक जनस्पंदन का भी इतिहास है। यह वहाँ की कलाओं और स्थापत्य तथा परिवर्तनशील समय पर भी प्रकाश डालता है। अभिलेखागार इतिहास लेखन और अपनी अस्मिता पहचानने के बडे़ साधन हैं। इसलिए सरकारों को उनकी अहमियत समझनी चाहिए और उनको हर प्रकार से सुविधाएँ प्राप्त होनी चाहिए। खैर, यह तो अपने में महत्त्वपूर्ण है ही, किंतु कुछ आश्चर्य हुआ, हमें जब हमारी पुत्री अनुराधा चतुर्वेदी, जो दिल्ली के योजना एवं वास्तुकला विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर है, अपने कुछ विद्यार्थियों के साथ बीकानेर गई थी, अभिलेखागार की सामग्री के डिजिटलाइजेशन में हुई प्रगति के बारे में बताया। यह सामग्री शोधार्थियों के लिए ऑनलाइन (www.rsad.rajasthan.gov.in) पर उपलब्ध है। अब तक राजपूताने के रजवाड़ों के ७० लाख ऐतिहासिक और प्रशासनिक रिकॉर्ड डिजिटलाइज्ड हो चुके हैं। उनमें आठ लाख चौंतीस हजार पन्ने जयपुर राज के, तोजी और अरसहा रिकॉर्ड, तेरह हजार पन्ने विभागीय प्रकाशनों के और दो लाख पन्ने जोधपुर महकमा-खास के हैं। बीकानेर रजवाडे़ के रिकॉर्ड बड़ी संख्या में ऑनलाइन पर उपलब्ध हैं। इसी प्रकार अलवर, जयपुर, जोधपुर, किशनगढ़, सिरोही, भरतपुर, झालावाड़, अजमेर आदि के रिकॉर्ड भी आसानी से ऑनलाइन पर देखे जा सकते हैं। यह जानकर प्रसन्नता हुई कि उन्होंने एक अच्छी आर्काइवल लाइब्रेरी भी शोधार्थियों की सुविधा के लिए तैयार की है। यह सब तभी संभव है, जब अभिलेखागार को अच्छा नेतृत्व प्राप्त हो। इसलिए इसके निदेशक डॉ. महेंद्र खडगावत बधाई के पात्र हैं। यह आश्चर्यजनक उपलब्धि उन्हीं की सूझबूझ का परिणाम है। वे न केवल अपने सहयोगियों को मार्गदर्शन प्रदान कर सके बल्कि इसके लिए उनको उत्साहित भी किया। पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय ने डॉ. खडगावत को अपने उल्लेखनीय कार्य के विषय में विस्तार से बताने के लिए आमंत्रित किया है। इतिहास के लेखन और शोध के लिए डॉ. खडगावत की यह बड़ी देन है। आशा है, इसे और विस्तार देने में सफल होंगे।

हमें यह जानकर हर्ष हुआ कि पूर्व निदेशक डॉ. नाथूराम खडगावत (स्वर्गीय) की संपादित पुस्तक ‘१८५७ इन राजस्थान’ का पुनर्मुद्रण हो गया है। इस पुस्तक के लिए सुखाडि़याजी ने ही डॉ. नाथूराम खडगावत को प्रोत्साहित किया था। ‘Rajasthan Through Ages’ को तीन भागों में तैयार कर प्रकाशित किया जाए, इसकी भी परिकल्पना सुखाडि़याजी के समय ही हुई थी। प्रथम खंड छप भी गया था। बिहार के तत्कालीन राज्यपाल श्री आर.आर. दिवाकर ने एक वृहद ग्रंथ ‘Bihar Through Ages’ के प्रकाशन का आयोजन किया था। वह एक अच्छा उदाहरण सामने आया था। सुखाडि़याजी से विचार-विमर्श में यह निर्णय हुआ कि नई शोध में जो सामग्री मिले, उसको देखते हुए ‘Rajasthan Through Ages’ का तीन भागों में इस प्रकार प्रकाशन होना चाहिए—प्राचीनकाल, मध्यकाल और अर्वाचीन राजस्थान के निर्माण तक। राजस्थान सरकार अब तीन भागों का हिंदी में अनुवाद कराने की व्यवस्था करे। एक समय डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने राजपूताने के कई रजवाड़ों के अलग-अलग इतिहास प्रकाशित कर बहुत प्रशंसनीय कार्य किए थे। अब आवश्यकता है कि नए परिवेश में आज के राजस्थान के सब रजवाड़ों का सम्मिलित इतिहास प्रकाशित हो। राजस्थान और देश के लिए यह सुखाडि़याजी का अमूल्य अवदान है। इसके साक्षी और सहायक होने के कारण ही हमने इसकी चर्चा की है। यह सर्वविदित है कि राजस्थान के रजवाड़ों के संपर्क गुजरात से लेकर सुदूर दक्षिण तक थे। मध्य एशिया से व्यापार का रास्ता राजस्थान होकर ही था। जयपुर के राजा सवाई जयसिंह तो अफगानिस्तान से कामरूप तक अपनी दूरदर्शिता में बहादुरी की छाप छोड़ आए थे। गुरु गोविंद सिंह राजस्थान होते हुए ही नांदेड़ गए थे। वीर बंदा बहादुर भी गुरु के दो निर्दोष बालकों को दीवार में चुने जाने के प्रतिशोध के लिए राजस्थान होते हुए पंजाब पहुँचे थे। इतिहास शोध के लिए राजस्थान में बहुत सामग्री बिखरी पड़ी है। राजस्थान अभिलेखागार के तत्त्वावधान में फारसी फरमानों के प्रकरण में एक काम और अच्छा हुआ है कि ‘मुगलकालीन भारत’ एवं ‘राजपूत शासक’ तीन भागों में प्रकाशित किया है। वास्तव में एक सक्रिय अभिलेखागार भविष्य की पीढि़यों के लिए एक विशेष देन है।

भारत रत्न बिसमिल्ला खाँ

२०१५ में इसी स्तंभ में सूचना दी गई थी कि अगले वर्ष श्रीमती एम.एस. सुब्बालक्ष्मी और शहनाईवादक उस्ताद बिसमिल्ला खाँ की जन्म शताब्दी है और उनके विषय में कुछ विशेष चर्चा करेंगे, पर लंबी अस्वस्थता के कारण वह संभव नहीं हो सका। अतएव अब उनके विषय में कुछ चर्चा करना उचित रहेगा। भारत सरकार ने दोनों को ‘भारत रत्न’ से आभूषित किया। उस्ताद बिसमिल्ला खाँ बडे़ नर्म दिल के व्यक्ति थे। शहनाई को उन्होंने न केवल जनप्रिय बना दिया, बल्कि उसको क्लासिकल म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंटस की श्रेणी में प्रतिष्ठित कर दिया। पद्मभूषण पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी की स्मृति में स्थापित ‘हमारा लखनऊ पुस्तकमाला’ का ४१वाँ पुष्प हाल ही में प्रकाशित हुआ है। नाम है ‘लखनऊ का आकाशवाणी रेडियो स्टेशन’ और लेखक हैं श्री नवनीत मिश्र, जो न केवल लखनऊ रेडियो में करीब ३१ वर्ष कार्यरत रहे, बल्कि स्वयं एक उच्च कोटि के कहानीकार हैं। अपने इस छोटे से मोनोग्राफ में उन्होंने भारत में रेडियो तकनीक का प्रवेश और प्रस्तार की चर्चा करते हुए लखनऊ रेडियो के विकास और उससे जुड़ी कुछ नामचीन हस्तियों का जिक्र किया है। पुस्तिका बहुत दिलचस्प है, नवनीत मिश्र साधुवाद के पात्र हैं। उस्ताद बिसमिल्ला खाँ के संबंध में जो कुछ उन्होंने लिखा है, उसको पाठकों के लिए उद्धृत करना चाहूँगा। ‘यह सम्मान उस्ताद बिसमिल्ला खाँ को ही प्राप्त हुआ कि पं. नेहरू के समय से ही १९४७ में स्वाधीनता दिवस और १९५० में गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले से उनकी शहनाई का कार्यक्रम आयोजित किया जाता रहा। यह सम्मान भी उस्ताद बिसमिल्ला खाँ साहब को ही नसीब हुआ कि आकाशवाणी केंद्रों की पहली सभा का शुभारंभ उनकी शहनाई की मंगलध्वनि से होता है।’

बिसमिल्ला खाँ साहब के मन में रेडियो के प्रति बहुत कृतज्ञता का भाव रहता था। वे खुले मन से इस बात को स्वीकार करते थे कि यदि रेडियो न होता तो देश-दुनिया के लोग बिसमिल्ला खाँ को न जान पाते। वे जब कभी रेडियो स्टेशन आते तो प्रवेश करने से पहले रेडियो स्टेशन के फाटक पर वहाँ की धरती को छूकर आँखों से लगाते और स्टेशन निदेशक से अवश्य मिलते। रेडियो पर उनका शहनाई-वादन का पहला कार्यक्रम लखनऊ रेडियो स्टेशन से प्रसारित किया गया था। डुमराव (बिहार) में उनका जन्म २१ मार्च, १९१६ को दरबारी गायक श्री बचई खाँ के घर हुआ था और अपने चाचा अलीबख्श ‘बिलायतू’ से शहनाई बजाना सीखने लगे थे, जो काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाईवादक थे। बिसमिल्ला खाँ में गंगा और सरस्वती के प्रति अगाध श्रद्धा थी। एक बार अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में वहाँ शहनाई शिक्षक के रूप में उनके उपस्थित रहने का प्रस्ताव रखा और उसके लिए उनकी शर्तें जाननी चाहीं। उस्ताद बिसमिल्ला खाँ ने बस एक ही शर्त रखी कि गंगा नदी को अमेरिका ले आइए, मैं भी अमेरिका में बस जाऊँगा।

बनारस को परिभाषित करते हुए वे कहा करते थे, ‘जहाँ बना रहे रस, वही है बनारस।’ उस्ताद बिसमिल्ला खाँ काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान् शंकर के सामने शहनाई बजाते तो लोग इस मंगल वाद्य को सुनकर भक्तिरस में डूब जाते और वही बिसमिल्ला खाँ जब मोहर्रम में काले लिबास में शहनाई पर नौहर की मर्मभेदी मातमी धुन बजाते हुए सड़कों पर निकलते तो आसुँओं से रोते हुए लोगों की भीड़ उनके पीछे चला करती थी। पत्नी की मृत्यु के बाद वे अपनी शहनाई को ही अपनी बेगम कहते थे। २१ अगस्त, २००६ में जब उनका निधन हुआ तो उनकी इच्छानुसार उनकी बेगम अर्थात् उनकी शहनाई को भी उनके साथ ही खाक-ए-सुपुर्द कर दिया गया। पिछले दिनों उनकी चाँदी से चढ़ी हुई पाँच-छह शहनाइयों, जो उनके प्रशंसकों ने समय-समय पर उनको भेंट में दी थीं, की चोरी का मामला समाचार-पत्रों में आया। शीघ्र ही पता लगा कि उनके एक पौत्र ने ही उन्हें एक सुनार को बेच दिया। सुनार और पौत्र तो गिरफ्तार हो गए, पर शहनाइयों की चाँदी तो गल ही चुकी थी। अब उनका परिवार चाहता है कि उनके घर को उनकी स्मृति में म्यूजियम बना दिया जाए और उनका जो कुछ सामान है, उसको भी प्रदर्शन के लिए रख दिया जाए। राज्य सरकार और भारत सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। अभी यह जानकारी मिली है कि बिहार सरकार ने उनके जन्मस्थान डुमराव में उनकी एक मूर्ति लगाने का निर्णय लिया है और एक म्यूजियम भी बनाने का निश्चय किया है। यह अच्छा है, बिहार उनको अपना मानता है। डुमराव उनकी जन्मभूमि थी, किंतु कर्मभूमि तो वाराणसी रही, इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार को भी पीछे नहीं रहना चाहिए। वहाँ पर शहनाई सिखाने की व्यवस्था की जा सकती है। खाँ साहब के परिवार में सिवा एक पुत्र के, जो उनका शहनाई पर साथ देता था, किसी अन्य ने शहनाई बजाना नहीं सीखा। खाँ साहब भी अपने कार्यक्रमों में व्यस्त रहते थे और उन्होंने भी शहनाई प्रशिक्षण की ओर ध्यान नहीं दिया।

उनका परिवार बड़ा लंबा-चौड़ा था और हमेशा पैसे की तंगी रहती थी। शहनाई बजाते हुए वे टिप्पणियाँ भी करते रहते थे, जो बहुत दिलचस्प होती थीं। अपने और परिवार के बारे में बहुत कुछ कह जाते। भारत की ओर से मांट्रियल केंस एवं आर्ट फेस्टीवल और ओसाका टे्रड फेयर में उन्होंने शिरकत की। संभवतः दुनिया के अनेकानेक देशों की राजधानियों में उनके कला-कौशल का प्रदर्शन हुआ। विश्वभारती और बनारस विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा। संगीत नाटक अकादमी के वे फेलो नामित हुए। पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण और अंत में भारत रत्न से वे सम्मानित किए गए। खाँ साहब के बारे में कहा जाता है कि वे हवाई सफर से बहुत डरते थे और उससे बचने के लिए असंभव माँगें रख देते थे। उनको जब एडिनबरा फेस्टीवल के लिए निमंत्रित किया गया तो उन्होंने शर्त रखी कि पहले उन्हें और उनके सहयोगियों को मक्का-मदीना ले जाया जाए और इस तरह उन्होंने हज भी कर डाली। इस प्रकार से खाँ साहब की कुशाग्र बुद्धि और व्यावहारिकता का भी पता चल जाता है। श्रीमती सुब्बालक्ष्मी के विषय में अगले अंक में लिखना संभव होगा। सवाल यही है कि खाँ साहब के स्तर की शहनाई की गूँज अब कब सुनाई देगी?

टाटा उद्योग समूह का विकास

देश-विदेश में टाटा उद्योग की प्रतिष्ठा एवं नाम है। १९वीं सदी के उत्तरार्ध में जमशेदजी नसेरवान टाटा (जे.एन. टाटा) चाहते थे कि व्यापार से धन कमाने के लिए भारत में लोहे और इस्पात बनाने का कारखाना डाला जाए। अंग्रेजी राज के समय दिल्ली का घोर विरोध था। बड़ी दौड़-धूप कर बिहार में उन्होंने इस कारखाने के लिए जमीन की व्यवस्था की। जमशेदनगर का विकास वहीं हुआ। जे.एन. टाटा बडे़ दृढप्रतिज्ञ, धैर्यवान और अध्यवसायी थे। कारखाना शुरू करने के लिए टेक्नीशियन और इंजीनियरों की जरूरत थी। जो उस जमाने में भारत में उपलब्ध नहीं थे। उसके लिए उन्होंने अमेरिका जाना निश्चय किया। जापान से अमेरिका जानेवाले जहाज में संयोग से उनका मिलना स्वामी विवेकानंद से हुआ। स्वामीजी शिकागो में आयोजित सर्वधर्म सभा में भाग लेने जा रहे थे। बातचीत के दौरान जमशेदजी ने स्वामीजी को अपना मंतव्य बताया। स्वामीजी ने उनके विचार का पुरजोर समर्थन किया, परंतु कहा कि कुछ दिनों के लिए तो आप अमेरिकी टेक्नीशियन और इंजीनियर मँगा सकते हैं, अंग्र्रेज सरकार इसकी विरोधी है, अतएव भविष्य में भारत में ही इंजीनियर, टेक्नीशियन और वैज्ञानिक तैयार करने होंगे। तभी संभव होगा देश में औद्योगीकरण। हर प्रकार के कारोबारी तैयार करने होंगे। यह सब स्वदेशी आंदोलन के पहले की बात है। इस सुझाव में कितनी दूरदर्शिता और सूझबूझ निहित है। बंगलौर (अब बंगलुरु) में Institute of Science की स्थापना इसी का प्रतिफल है। इस्पात का कारखाना प्रारंभ करने के लिए अच्छी धनराशि की भी आवश्यकता थी। उस समय के बैंक भी सरकार के रुख को देखते हुए मदद को तैयार नहीं थे। निर्धन देश के सीमित साधनोंवाले निवासियों ने दस-दस रुपए के बॉण्ड खरीदकर जमशेदजी को प्रोत्साहित किया। उनका इस्पात का कारखाना देशभक्ति और विकास की आकांक्षा का प्रतीक बन गया।

मूल कंपनी टाटा ऐंड संस है और उसके अंतर्गत अनेकों कंपनियाँ हैं। शायद ही कोई क्षेत्र हो, जहाँ टाटा की भागीदारी न हो। यही नहीं, शिक्षा, समाज-कल्याण आदि क्षेत्रों में भी टाटा द्वारा स्थापित ट्रस्टों और फाउंडेशनों ने अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किए हैं। कारोबार में नैतिकता, गुणवत्ता में विश्वास और सामाज केंद्रीय नीतियों के लिए टाटा प्रबंधन प्रसिद्ध रहा है। टाटा ऐंड संस के चेयरमैन, केवल एक बार छोड़कर, टाटा परिवार के ही रहे हैं। रतन टाटा जो पूर्व चेयरमैन थे, उन्होंने अपने भाई को छोड़कर एक अन्य सहयोगी सिरस मिस्त्री को चेयरमैन बनवाया। मिस्त्री के परिवार पालोन्नजी का भी टाटा ऐंड संस में एक बड़ा शेयर है। कुछ समय के बाद रतन टाटा ऐंड संस के बोर्ड में मतभेद शुरू हो गए। बोर्ड द्वारा सिरस मिस्त्री को हटाकर चार महीने के लिए रतन टाटा को फिर अध्यक्ष बनाया गया, ताकि इस बीच उपयुक्त व्यक्ति को चिह्नित किया जाए। अखबारों में सिरस मिस्त्री के बयान आने लगे। मुकदमेबाजी शुरू हो गई। सरकारी नियंत्रक संस्थान सेवी आदि के पास भी शिकायतें गईं। धीरे-धीरे मिस्त्री को टाटा ऐंड संस की अन्य औद्योगिक इकाइयों से भी हटा दिया गया। विशेष शेयर होल्डर्स की बैठक में भी रतन टाटा का पलड़ा भारी रहा। टाटा का नाम जो उद्योग-जगत् में सदैव सर्वोपरि रहा, विवाद में फँस गया। भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में ही नहीं, प्रत्युत विश्व की सब आर्थिक पत्र-पत्रिकाओं में तरह-तरह की टिप्पणियाँ आईं। काफी शंकाएँ प्रकट की गईं। प्रशासन के स्तर पर या अदालतों के स्तर पर यह खींचातानी चलती रहेगी, पर टाटा कंपनियों की व्यवस्था ठीक से चल निकली है। विवाद बहुत कुछ फिलहाल थम गया है। खेदजनक यही है कि एक उद्योग समूह, जो भारत का गौरव माना जाता रहा है, वहाँ भी विवाद प्रारंभ हो गया। टाटा नाम की जो विश्वनीयता रही है, उसको धक्का लग सकता है। संतोष का विषय यह है कि टाटा ऐंड संस के बोर्ड ने टाटा समूह में ही काम करनेवाले व्यक्ति को अब चेयरमैन चुना है, जो पारसी नहीं हैं और उनकी शिक्षा-दीक्षा भी भारत में हुई है। वे एक मेधावी तमिल ब्राह्मण हैं, नाम है एन चंद्रशेखरन। उनके अन्य दो भाई भी उन्हीं की तरह अन्य संस्थानों में कार्य कर रहे हैं। चंद्रशेखरन टाटा कंसल्टेंसी सर्विलेंज टाटा उद्योग की एक इकाई के चेयरमैन थे। चंद्रशेखरन को संगीत में विशेष रुचि है, अपनी संस्कृति और परंपराओं का आदर करते हैं। प्रायः मैराथन दौड़ों में भाग लेना उन्हें बहुत पसंद है। अपने सिद्धांतों के पक्के, निर्णयात्मक क्षमता के धनी वे आज के औद्योगिक विश्व की प्रतिस्पर्धा और चुनौतियों से भलीभाँति परिचित हैं। साथ-ही-साथ टाटा उद्योग समूह की क्या उपलब्धियाँ हैं, परंपराएँ हैं, आज की क्या समस्याएँ हैं और क्या संभावनाएँ हैं, उनके भी जानकार हैं। आशा है, वे टाटा उद्योग समूह को वांछित मार्गदर्शन प्रदान करेंगे।

एक नए उद्योग समूह इनफोसिस और नारायण मूर्ति के नाम से सब परिचित हैं। इनफोसिस की कहानी सूझबूझवाले और दूरदर्शी युवा एंटरप्रेनोयरिओ की है। सूचना तकनीकी क्षेत्र में उसका भी नाम है। पिछले दिनों में उसके बोर्ड में भी नई तथा पुरानी पीढ़ी के दृष्टिकोण के मतभेद की बात अखबारों में आई, टी.वी. और अखबारों में साक्षात्कार भी आए। नैतिकता के सवाल भी उठे हैं। आज के समय की माँग के अनुसार परिवर्तन अपेक्षित है, यह भी कहा जा रहा है। किंतु जिन मूल्यों और विजन को लेकर इनफोसिस की स्थापना हुई, उनको नकारा नहीं जा सकता है। नियंत्रक संस्थान सेवी के अध्यक्ष ने इस विवाद के विषय में आश्वस्त किया है कि कोई चाहे कितना भी ऊँचा व्यक्ति हो, यदि कानून और मर्यादाओं की कोई अवमानना हुई है तो सेवी सख्त से सख्त काररवाई करेगी। इनफोसिस की प्रतिष्ठा और भविष्य के हित में है कि उसका बोर्ड भी आत्म-संतुलन रखे। उद्योग-जगत् में तभी वे अपनी अविश्वसनीयता और सफलता को संरक्षण प्रदान कर पाएँगे। अधिक नहीं कहना है। आशा है, जो मतभेद हैं, उनका निराकरण सहजता से हो जाएगा।

कानून को हाथ में लेने का औचित्य

पिछले दिनों जयपुर में जब फिल्म निर्माता और निर्देशक भंसाली अपनी फिल्म ‘पद्मावती’ की शूटिंग के लिए गए; हीरो-हीरोइन के रूप में रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोन वहाँ उपस्थित थे। स्थानीय ‘श्री राजपूत करनी सेना’ के सदस्यों ने फिल्म निर्माता भंसाली के साथ मारपीट की, तो कलाकारों को मुंबई वापस जाना पड़ा। ‘करनी सेना’ के अध्यक्ष ने मारपीट को टी.वी. पर वाजिब ठहराया। उनको आशंका थी कि रानी पद्मावती को विकृत रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। किसी तथाकथित स्वप्न के सीन के बारे में उन्हें एतराज था। हम नहीं जानते कि उन्होंने स्क्रिप्ट देखी थी? यह भी पता नहीं कि ‘करनी सेना’ ने भंसाली से इस बारे में कुछ बातचीत की थी। हीरोइन पादुकोन ने एक बयान में कहा भी कि पद्मावती के चरित्र को किसी गलत तरीके से पेश करने का सवाल ही नहीं। अलाउद्दीन खिलजी का रोल अदा कर रहे रणवीर सिंह ने भी इसी बात को अन्य शब्दों में दोहराया। मीडिया और बॉलीवुड ने इस विवाद को अभिव्यक्ति के अधिकार का प्रश्न बनाया, पर हम उस विवाद में नहीं पड़ना चाहते हैं। हमारा पूर्ण विश्वास है कि ऐतिहासिक तथ्यों के साथ फिल्मों में खिलवाड़ नहीं होनी चाहिए, विशेषतया जहाँ आस्था और भावनाओं का प्रश्न है। हमारा कहना है, अगर कोई आशंका थी तो पहले निर्माता और कलाकारों से पूछताछ तो कर लेनी थी। कानून अपने हाथ में लेना कहाँ तक वाजिब है। यह हमारा प्रश्न है? कुछ लोग पद्मावती के अस्तित्व को ही नकारते हैं। उनका कहना है कि सूफी कवि जायसी के पद्मावत में ही उनका चरित्र दरशाया है, वह एक आख्यान है। कोई ऐतिहासिक विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं है। पर कुछ चीजें जनस्मृति में ऐसी घुलमिल जाती हैं कि वे घटनाएँ और व्यक्ति जीवंत हो जाते हैं। बचपन से ही रानी पद्मावती की शौर्यगाथा करोड़ों आदिवासियों के साथ हमारे दिल और दिमाग पर छाई हुई है।

पांडेजी का खंडकाव्य ‘जौहर’ कभी दसियों बार पढ़ा और उसके शब्द अब भी कानों में गूँजते हैं। जौहर खंडकाव्य आज भी रोमांच पैदा करता है। हमारे लिए रानी पद्मावती की स्मृति वंदनीय है। राजस्थान में जयपुर आने के बाद पहले बलिदान और शौर्यतीर्थ के दर्शन करने हम और पत्नी तथा कुछ मित्रों के साथ चित्तौड़ गए थे। किंतु उनके नाम की दुहाई देकर ऊधम मचाना, असामाजिक तत्त्वों को प्रोत्साहित करना और कानून को हाथ में लेना कहाँ तक उचित है? इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका भी शंका पैदा करती है। पुलिस कानून के पालन के लिए है या कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों या समुदाय की आज्ञा पालन के लिए? राज्य सरकार की उदासीनता भी विचित्र लगती है। बाद में आश्चर्य हुआ, जब केंद्र के एक मंत्री, जो जयपुर गए थे, उन्होंने करनी सेना की काररवाई को पूरी तरह उचित बताया। हम एक संवैधानिक व्यवस्था में रह रहे हैं, केंद्र का राज्यमंत्री कानून को हाथ में लेने का समर्थन करे, यह उस शपथ के विरुद्ध है, जो उसने ली है। मंत्री बनने पर आज जब अराजकता और आक्रामकता की बयार देश में जोर पकड़ रही है, तो मंत्रियों को अपने व्यवहार और वाणी पर और भी नियंत्रण तथा संयम रखना चाहिए। उमा भारतीजी का हम बहुत आदर करते हैं। उन्होंने बड़े गर्व से कहा कि जब वे मुख्यमंत्री थीं तो बलात्कारियों की पहले अच्छी तरह मरम्मत करवाती थीं। अपने बयान को उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ एक दूसरी जनसभा में दोहराया। इस कॉलम में हम महिला उत्पीड़न के बारे में बार-बार और अनेक दृष्टिकोणों से लिखते रहते हैं, और आगे भी लिखेंगे। अपनी शासन-व्यवस्था की कमजोरियों को सीनाजोरी से नहीं ढका जा सकता है। यह विचारणीय प्रश्न है।

पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री मोदी का जवाब

कांग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज्यसभा में दिए गए भाषण से तिलमिला गई है, जो उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण की बहस के बाद प्रत्युत्तर के रूप में दिया था; विशेषतया उन्होंने जो इशारा पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के विषय में किया। नोटबंदी की बहस में मनमोहन सिंह ने उसकी कटु आलोचना करते हुए ‘व्यवस्थित लूट और प्लंडर’ की संज्ञा दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय उपस्थित थे, और उनके भाषण के बाद वे उनके पास गए तथा हाथ मिलाया। इसका प्रत्युत्तर उन्होंने राष्ट्रपति के भाषण के समय देना उचित समझा। उन्होंने कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह एक लंबे अरसे तक वित्तमंत्री और उसके बाद प्रधानमंत्री रहे तथा आर्थिक मामलों में उनका वर्चस्व रहा। १९९२ के स्टॉक एक्सचेंज के घोटाले के उपरांत इतने घोटाले हुए, पर उन पर कोई आँच नहीं आई, वे बचे रहे। उन्होंने कहा कि स्नानघर में रेनकोट पहनकर नहाने की कला डॉ. साहब ही जानते हैं। विमुद्रीकरण की बहस में मनमोहन की आक्रामकता पर यह मोदी का उत्तर था। एक उदाहरण यहाँ हम देना चाहेंगे। सिक्योरिटी और स्टाक एक्सचेंज के घोटाले के विषय में तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने बहस के दौरान यहाँ तक कह दिया था कि क्या वे अपनी नींद इस स्कैम के कारण खो दें। हम उस समय सांसद ही नहीं, रामनिवास मिर्धा की अध्यक्षता में जो जॉइंट संसदीय समिति बनी थी, उसके सदस्य भी थे। वित्तमंत्री की हैसियत से वे समिति के सामने पेश हुए थे। प्रशासन में पूर्व सहयोगी रहने के कारण हमने पूर्व वित्तमंत्री और वित्तसचिव रहे रिजर्व बैंक के गवर्नर से कई सवाल किए। अनेक सदस्यों ने काफी पैने सवाल किए थे, जिनका उन्होंने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया था। मोदी के कटाक्ष को कांग्रेसी सदस्य अब पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री का अपमान कह रहे हैं। वैसे हमने कई बार लिखा है कि राजनैतिक वाद-विवाद का स्तर गिरता जा रहा है। आज का वाक्युद्ध इसी प्रकार का है।

प्रधानमंत्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने और उसके पहले कोई कम कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया था। उनकी तुलना हिटलर-मुसोलिनी से की गई। सोनिया ने उन्हें मौत का सौदागर कहा, विषबीज बोनेवाला कहा। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी किसान यात्रा के उपरांत अपने स्वागत समारोह में दिल्ली में जो कुछ कहा, क्या यह आज के प्रधानमंत्री का अपमान नहीं है? लोग भूले नहीं हैं, जब डॉ. मनमोहन सिंह योजना आयोग के सदस्य, उपाध्यक्ष थे, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने योजना आयोग के सदस्यों को एक ‘वंच ऑफ जोकर्स’ यानी ‘मसखरों की जमात’ कहा था। क्या ये सम्मानीय शब्द हैं? स्वयं राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कैबिनेट के प्रस्ताव को नॉनसेंस कहकर फाड़ डाला था। यह अच्छा हुआ कि वह ऑर्डिनेंस नहीं आया, पर राहुल गांधी का वह व्यवहार तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रति क्या आदर प्रदर्शन था?

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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