उत्तराखंड के चारों धाम की यात्रा

उत्तराखंड के चारों धाम की यात्रा

पैरों में पर लग गए, मन में भरी उमंग।

अब चलो बदरीधाम को, आप हमारे संग॥

गगनचुंबी हिमालय पर्वत की शृंखलाएँ, बर्फीली चोटियाँ, चाँदी-सी चमकीली हिमशिलाएँ पिघलकर सैकड़ों फीट नीचे गिरती जल-धाराओं के साथ झरने, नदी रूप में परिवर्तित होते, सर्पीले वेग से बहती धाराएँ, तटों पर पहरा देते देवदार के हरे-भरे ऊँचे वृक्ष किसका मन नहीं मोह लेते!

पत्नी सहित हमारा सात सदस्यी यात्री दल चार धाम की यात्रा पर निकल पड़ा। वर्ष २००३ के मई माह का मध्य है, यहाँ बहुत गरमी पड़ रही है, गरमी से बेहाल तपते दिवस में ही झाँसी, दिल्ली होते हुए करीब १२ बजे हरिद्वार स्टेशन पर पहुँच गए। कुछ देर ठहरकर ट्रेन चल दी, देखते क्या हैं कि कुल ६ सदस्य ही रह गए। हुआ यह कि सभी लोग सामान उतारने में लग गए थे और हमारी रिश्ते की भाभीजी ने सोचा कि बाथ से निपट लें। बस ट्रेन चल पड़ी। भाभीजी की होशियारी काम नहीं आई। हम लोगों ने अगले स्टेशन मास्टर को फोन किया। चार पहिया वाहन लेकर के अगले स्टेशन से भाभीजी को वापस लाकर समूह में शामिल किया। इस घटना से सभी साथियों को यह बात समझ में आ गई कि थोड़ी सी असावधानी यात्रा में परेशानी का कारण बन जाती है। वहाँ से चलकर शहर में एक अच्छे से होटल में आरामदायक कमरों में ठहर गए। आज ही कल की यात्रा की व्यवस्था करनी थी और सात बजे शाम को गंगाजी की संसार-प्रसिद्ध भव्य आरती में भी शामिल होना था।

उत्तराखंड के चार धाम की यात्रा दो स्थानों द्वारा सड़क मार्ग से प्रारंभ होती है—हरिद्वार और ऋषिकेश। हम लोग हरिद्वार से यात्रा प्रारंभ करनेवाले हैं। उल्लेखनीय है कि अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर दीपावली को यात्रा पूर्ण होती है। ट्रांसपोर्टर के एजेंट होटलों और धर्मशालाओं से संपर्क साधे रहते हैं। ये लोग हमारे पास भी पहुँच गए। सो छोटी गाड़ी से ही सात सदस्यों की संपूर्ण यात्रा की बात हो गई। हम लोग छह बजे ही गंगा तट के लिए चल दिए। गंगाजी के किनारे मंदिर के समीप घाट पर हजारों लोग एकत्र हैं। यहाँ साधु-संत सामूहिक रूप से सैकड़ों आरतियाँ ऊँ-आकार में घुमाकर माँ गंगा की आरती कर रहे हैं। संपूर्ण तीर्थ का साक्षात्कार हो रहा है। ऐसा अनुभव होता है, मानो हमारे हृदय में ज्ञान प्रकाश प्रज्वलित हो गया हो। अनुपम दृश्य, संसार प्रसिद्ध भव्य आरती के दर्शन कर धन्य हो गए। वहाँ से लौटकर ९ बजे तक वापस होटल आए तो वह एजेंट मिला, उसे और यात्री मिल गए थे। उसने छोटी गाड़ी का प्रोग्राम निरस्त कर मिनी बस कर ली थी। कुल ३५ यात्री हो गए थे। सीट आरामदायक २×२ की थी। रात्रि विश्राम हरिद्वार में करके प्रातः यात्रा पर निकलना था। सामान्यतः हरिद्वार से चार धाम यात्रा का कार्यक्रम छोटी गाड़ी से ९ दिन, बड़ी गाड़ी से १० दिन का तथा गढ़वाल मंडल की टूरिस्ट बसों के द्वारा यह समय ११ दिन और १० रात्रि का होता है।

वेद-पुराणों में वर्णित है कि चार युगों के चार धाम हैं। जो देश की चार दिशाओं में स्थापित हैं—बदरी विशाल, रामेश्वर, द्वारकापुरी एवं जगदीश पुरी। इन तीर्थों के दर्शन करने से मनुष्य पापों से मुक्ति पाता है और समस्त दोष नष्ट हो जाते हैं। बदरीतीर्थ के लिए यमनोत्तरी से यात्रा प्रारंभ की जाती है। यमनोत्तरी से गंगोत्तरी, केदारनाथ, तत्पश्चात् बदरी विशाल में यात्रा समाप्त होती है। परंपरानुसार इन चार धाम की यात्रा पश्चिम से प्रारंभ कर पूर्व दिशा में समाप्त की जाती है। उत्तरांचल में स्थित इस तीर्थ को देवभूमि कहते हैं, जो कि साक्षात् स्वर्ग यानी बैकुंठ धाम है। जैसे गूँगे व्यक्ति को अत्यंत मीठा फल खिलाया जाए तो उसका स्वाद वह कह नहीं सकता, उसकी अनुभूति ही कर सकता है, यहाँ वैसा ही आनंद प्राप्त होता है—अकथनीय! यह यात्रा अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर दीपावली के पश्चात् अक्तूबर-नवंबर तक ही चलती है, क्योंकि फिर अधिक वर्षा, बर्फ गिरने के कारण मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। याद रखें—ऊपरी बर्फीले हिस्से में पहुँचने पर यदि घबराहट होती है तो गरम पानी पीना चाहिए, जिससे बहुत राहत मिलती है। नाश्ते के लिए अधिकांशतः सूखे मेवे इत्यादि ही रखना अच्छा रहता है।

चूँकि श्रीबदरीनाथ धाम के पट अक्षय तृतीया यानी सतयुगी दिवस को खुलते हैं। पूजा-अर्चना होती है तो इसके साथ ही उत्तरांचल के धामों की यात्रा प्रारंभ हो जाती है। क्षेत्रवासियों के लिए भी रोजगार प्रारंभ हो जाते हैं। भोजनालय एवं ठहरने के स्थान भी साफ-सफाई कर तैयार कर दिए जाते हैं। १९ मई सोमवार को सभी सहयात्री तैयार होकर मिनी बस में बैठे। हम सब सातों लोग भी बैठ गए। चालक के पीछे बगलवाली दरवाजे के पास खिड़की के समीप बाईं ओर की दो सीट मिल गई। जिससे आगे के मनमोहक दृश्य आराम से दृष्टिगत होते रहे। ठीक प्रातः ७ बजे बस चल पड़ी। सभी यात्रियों ने गंगाजी को प्रणाम किया। हम गंगाजी के समानांतर मार्ग से चल रहे थे कि दाईं ओर देहरादून मार्ग पर मुड़ते ही भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा है, जो जलधारा के बीच शोभायमान है। शिवजी को प्रणाम कर आगे बढ़ रहे हैं। सड़क मार्ग के दोनों ओर हरे-भरे जंगल बडे़ सुहावने और मनमोहक हैं। कहीं-कहीं आम के पेड़ भी, जिनमें आम के गदरारे फल लगे हैं। जैसे चाँदनी रात में कदंब के फूल चमकते हैं। भाँति-भाँति के वृक्ष, टेड़े-मेड़े रास्ते पर भागती लक्जरी बस, बहुत आनंद आ रहा है। ढाबे, चाय-नाश्ते की दूकान, सभी कुछ रास्ते में उपलब्ध है। हम लोग दोपहर को एक छोटे से भोजनालय पर रुके। वहाँ स्वादिष्ट भोजन किया और मार्ग के लिए पानी की बोतलें भरने लगे थे तो गाइड ने बताया कि आगे से स्वच्छ पानी भर लेना। दोपहर के बाद एक पहाड़ी के पास ड्राइवर ने बस रोक दी कि पानी पी लें। वहाँ पहुँचकर बहुत आश्चर्य हुआ, बहुत से यात्री तो खुशी से नाचने लगे। इतना ठंडा स्वच्छ जल कभी देखा ही नहीं था। पहाड़ में एक पाइप लगा देने से अविरल धारा में बह रहा है। थोड़ा रुककर आगे प्रस्थान किया। रास्ते में कई प्रकार के वृक्ष और गुलमोहर फूल रहे हैं। रंग-बिरंगे, नीले, नारंगी, लाल, पीले फूलों से पेड़ लदे हैं। यमनोत्तरी के किनारे हनुमान चट्टी (२१५ किलोमीटर) पर रात्रि विश्राम किया।

२० मई को प्रातः ७ बजे सभी यात्री तैयार हैं और बस को यहीं छोड़ आगे बढ़ रहे हैं। यमनोत्तरी की ओर ७ कि.मी. का रास्ता छोटी गाड़ी से तय करना पड़ता है। जब जानकी चट्टी तक पहुँच जाते हैं तो यहाँ से ७ कि.मी. ऊपर पर्वत के सँकरे रास्ते से ही पैदल चढ़ना पड़ता है। जो लोग पैदल नहीं चल पाते हैं या चढ़ाई चढ़ने में असमर्थ होते हैं, उनके लिए घोड़े, डोली तथा पिट्ठू आदि साधन हैं। घोड़े का किराया ३५०-४००, पिट्ठू का लगभग ४००-५०० एवं डोली का १६००-१७०० रुपए तक तय होने के अनुसार लगता है। इसके लिए यह सावधानी बरतनी चाहिए कि ऊपर ले जानेवाले घोड़े, डोली, पालकी से संबंधी व्यक्ति का स्थानीय जनपद के द्वारा प्रमाणित परिचय-पत्र उनके पास होता है, यात्रियों को जाने के पहले यह कार्ड अपने पास या अपने सहयात्री के पास अवश्य रखवा लेना चाहिए, जो यात्रा पूरी होने पर संबंधित व्यक्ति को वापस कर दिया जाता है। रास्ते में बहुत ही ऊँचे, विशाल पर्वत हैं। पर्वतों के किनारों से ऊपर कुंड तक पहुँचने का मार्ग है, जिसके बगल से यमनोत्तरी की धारा बहती है। यमनोत्तरी सूर्य की पुत्री, यमराज की बहन हैं। यमनोत्तरी की ऊँचाई समुद्र तल से ३१६५ मीटर है। दिन में मौसम सुहावना लेकिन अपराह्न दो बजे से बूँदाबाँदी, कभी-कभी अधिक वर्षा भी होने लगती है। रात्रि में बहुत बर्फ गिरती है, यहाँ ठहरने के लिए धर्मशाला इत्यादि की अच्छी व्यवस्था है। यमनोत्तरी की साँवली-सलोनी, स्वच्छ जलधारा इतने वेग से बहती है, जिसको देखकर साक्षात् देवी शक्ति की अनुभूति होती है। वास्तव में ऐसा लगता है कि महाशक्ति के रूप में यह जलधारा देवी माँ का अंश है। संपूर्ण मार्ग में एक तरफ यमनोत्तरी का किनारा तो दूसरी ओर संकीर्ण पहाड़ी मार्ग है।

यहाँ पहाड़ों के ऊपर बस्तियाँ हैं। जीवकोपार्जन के लिए आम के बगीचे, पहाड़ी ढलानों पर छोटे-छोटे खेत बनाकर कृषि करते हैं। मई में गेहूँ की फसल पककर कटने को तैयार है तथा कुछ कट रही है एवं दूसरी नई गेहूँ की फसल बोई भी जा रही है। आलू वगैरह की खेती भी यहाँ की जाती है। पहाड़ों के ऊपर से झरने बहते हैं, झरने के पानी से ही लोग पीने का तथा बाकी निस्तार का काम चलाते हैं। किंतु यह स्थिति हनुमान चट्टी के पूर्व है। हनुमान चट्टी से जानकी चट्टी और वहाँ से आगे का रास्ता तथा पहाड़ बर्फीले हो गए हैं, जो अधिकांशतः बर्फ से ढके रहते हैं। पर्वत के ऊपर ही यमनोत्तरीजी का मंदिर तथा गरम पानी का कुंड है। इस कुंड में लोग स्नान कर थकान मिटाते हैं और बहुत ही सुख का अनुभव करते हैं। इसका तापमान लगभग १८५ फॉरनेहाइट रहता है; यात्री लोग इस कुंड में चावल पकाकर देवी को अर्पित करते हैं। यहाँ दर्शनीय स्थल सूर्यकुंड, दिव्यशिला तथा इसके पूर्व लाखा मंडल का शिवलिंग मंदिर है, जहाँ कौरवों ने लाक्षागृह का निर्माण पांडवों को जलाने के लिए कराया था। स्नान-दर्शन आदि करने के पश्चात् बहुत से यात्री वहीं ऊपर धर्मशाला में रुक जाते हैं तथा अधिकांश वापस हनुमान चट्टी आकर विश्राम करते हैं, जहाँ पर आवास एवं भोजन की अच्छी व्यवस्था है।

तीसरे दिवस माँ यमनोत्तरी को प्रणाम कर प्रातः ६ बजे से तैयार होकर बस में बैठ गए और पापनाशिनी पवित्र गंगाजी के उद्गम की दिशा में चल दिए। सर्पाकार लहराता संकरा सड़क मार्ग, ऊँचे-नीचे पहाड़ों के किनारे जहाँ हजारों मीटर ऊँचे पर्वत और नीचे सैकड़ों मीटर गहराई में तीव्र गति से बहती जलराशि, हरे-भरे वृक्ष, आधे बर्फ  से ढके हुए, ऐसा अनुपम दृश्य, जहाँ मनुष्य सांसारिक मायाजाल से विरक्त स्वर्गानंद की अनुभूति करता है। यमनोत्तरी से गंगाजी मंदिर की दूरी मात्र २०७ किलोमीटर है, किंतु इस यात्रा में स्नान, भोजन आदि के लिए अल्प विराम देते हुए संपूर्ण दिवस लग जाता है। औसत २०-२५ किलोमीटर से अधिक नहीं चल पाते, संकरे ऊँचे-नीचे दुर्गम मार्ग हैं। बड़कोट के पास तिराहा धरासु से गंगाजी का साथ मंदिर एवं गौमुख तक निरंतर चलता है। एक किनारे गंगाजी दूसरी ओर पहाड़, बीच में बहुत ही संकीर्ण मार्ग है। जहाँ से दो वाहन आसानी से क्रॉस नहीं हो पाते और दूसरी ओर २०००-२५०० मीटर की गहराई है। पहाड़ों पर घेरकर रोड बने हैं। इसी रास्ते से गंगनानी पहुँचते हैं। यह स्थान लगभग २५०० मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ पर गरम पानी का कुंड है, मंदिर जाने के पूर्व यात्री यहाँ पर स्नान करते हैं। यह प्रकृति की अद्भुत लीला है, जहाँ एक ओर खौलता हुआ जल का स्रोत है, वहीं दूसरा स्रोत बर्फ के समान ठंडे पानी का है।

यहाँ से करीब ५५ कि.मी. आगे जाने के पश्चात् भागीरथी के दाएँ तट पर गंगादेवी का मंदिर है। हिमालय की पर्वत-शृंखलाओं में गंगामाता का उद्गम है। शिवपुराण के आधार पर स्वर्ग की पुत्री गंगा देवी जल स्वरूप नदी का रूप लेकर राजा भगीरथ के पूर्वजों को पाप से मुक्त करने के लिए घोर तपस्या कर भगीरथ के द्वारा पृथ्वी पर लाया गया। शिवजी ने गंगा देवी का वेग कम करने के लिए अपनी जटाओं में धारण किया। इस स्थल को भागीरथी के नाम से जाना जाता है। गंगा देवी का मंदिर उद्गम स्थान से १९ कि.मी. पूर्व में ही निर्मित है, जिसकी ऊँचाई समुद्र तल से ३१४० मीटर है। जहाँ से गंगाजी का उद्गम है, उस स्थान को ‘गौमुख’ कहा जाता है। हनुमान चट्टी से गंगोत्तरी की दूरी सड़क मार्ग के द्वारा २०७ कि.मी. है। यह मंदिर १८वीं शताब्दी में गोरखा कमांडर अमरसिंह थापा द्वारा बनवाया गया था, ऐसा बताया जाता है। मंदिर में गौमुख से निकलती बर्फ पिघलकर धीमी गति से बहती हुई शिलाखंडों के साथ हल्की, भूरी, सुनहरी रंग की पडूली जलधारा देखकर साक्षात् देवी माँ के रूप और शक्ति का आभास होता है।

गौमुख तक पैदल अथवा खच्चरों से जाते हैं, यह मार्ग बहुत ही कठिन और दुर्गम है। सामान्यतः यात्री मंदिर से ही पूजा आदि करके वापस लौट आते हैं; गौमुख तक बहुत कम लोग जाने का साहस जुटा पाते हैं। वैसे तो गौमुख से आगे ही तपोवन, नंदनवन लगभग २५ कि.मी. दूरी पर हैं, जहाँ पर हमारे ऋषि-मुनियों ने समाधि लगाकर तपस्याएँ कीं, किंतु वर्तमान समय में उस स्थान तक पहुँचना और दर्शन करना भी एक अलौकिक अनुभूति है। यहाँ पर जलमग्न शिवलिंग, केदार ताल, नंदनवन, तपोवन, गौमुख, भैरोंघाटी, हरसिल, गंगनानी, मनेरी इत्यादि बहुत ही सुंदर स्थान हैं। इसके अलावा यदि कोई अधिक समय तक यात्रा करना चाहे तो नचिकेता ताल, डोंडी ताल, दयारा बुग्याल, टेहरी इत्यादि स्थान हैं, किंतु सामान्यतः यात्री गंगा माँ के मंदिर में अर्चना कर सड़क मार्ग से वापस होकर उत्तरकाशी में विश्राम करते हैं अथवा गंगोत्तरी मंदिर पर ही रुक जाते हैं; क्योंकि छोटी-बड़ी सभी गाडि़याँ मंदिर तक सुगमता से पहुँच जाती हैं। यहीं से गंगोत्तरी का जल किसी बरतन अर्थात् गंगाजली में भर लेना चाहिए, क्योंकि यही गंगाजल प्रसिद्ध रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग में शंकर भोले की प्रतिमा पर अर्पित किया जाता है, जिसकी स्थापना स्वयं श्रीरामजी के द्वारा त्रेता युग में की गई थी।

चौथा पड़ाव २२ मई को था; पवित्र पापनाशिनी गंगामाई के स्वर्णमयी रंग के पडूले, भूरे रंग की तीव्रगामी जलधारा में स्नान कर मंदिर में दर्शन-पूजन कर गंगाजली में गंगाजल विधि-विधान से पूजन कर भर लिया। गंगाजी को प्रणाम करके दोपहर १२ बजे सभी लोग यात्री बस में सवार हो उत्तरकाशी के लिए गंगाजी के किनारे से संकरी सड़क पर चल रहे हैं। दूसरी ओर गगनचुंबी पहाड़ और हरे-भरे जंगल हैं। अपराह्न से थोड़ी वर्षा प्रारंभ हो गई है। सड़क पर आगे गाडि़यों का जाम लगा है। पता चला कि पहाड़ों से मिट्टी फिसल रही है। मिट्टी के साथ ही बड़े-बड़े पत्थर नीचे गिर रहे हैं। रोड साफ करनेवाले कर्मचारियों ने उन्हें हटाया और वहाँ लगभग दो घंटे रुकने के पश्चात् आगे चल दिए। यात्रा का आनंद लेते हुए १०० कि.मी. चलकर उत्तरकाशी में दर्शन-पूजन कर रात्रि विश्राम किया।

२३ मई को पाँचवें दिन उत्तरकाशी में स्नान-ध्यान, पूजा-अर्चन, दर्शन कर ठीक ७ बजे सभी लोग तैयार होकर बस में आ चुके हैं। फुहार पड़ रही है, रास्ता लंबा है, इसलिए पहुँचने की शीघ्रता है। मार्ग बहुत सुहावना है। बीच-बीच में बादलों से झाँकते सूर्यदेव अपनी किरणों से बर्फीले पहाड़ों पर चमक बिखेर देते हैं। पहाड़ों के ऊपर और बीच के समतल स्थानों पर बस्तियाँ बहुत ही आकर्षक लग रही हैं। यहाँ के स्त्री-पुरुष गठीले बदन के, गौर वर्ण, सुंदर और परिश्रमी होते हैं। यहाँ की महिलाएँ पशुओं को घास, पेड़ों के पत्ते और स्वयं के लिए खाद्य सामग्री अपनी पीठ पर लादकर ले जाती हैं। पीठ पर बाँस की डलिया लगाए रहती हैं। इसी में रखकर बाजार से खाद्य सामग्री तथा अन्य सामान ले जाती हैं।

उत्तरकाशी से टेहरी के मार्ग से होकर दुर्गम पहाडि़यों की ऊँचाइयों वाले पहाड़ी रास्तों से होकर सड़क मार्ग से जाते हैं। टेहरी में बहुत ही ऊँचे पहाड़ हैं, जो पास-पास सटे हैं, इन्हीं दो पहाड़ों को बाँधकर टेहरी बाँध बनाया जा रहा है, उसमें अथाह जलराशि एकत्र होगी। टेहरी से तिलवारा होकर गौरीकुंड पहुँचते हैं, इस मार्ग में जो पहाड़ों की शृंखलाएँ हैं, उनमें पत्थरों की आकृति गोलाकार है। छोटे पत्थर, बड़े आकार के पत्थर सभी सालिग्राम की तरह हैं। ये करोड़ों वर्ष पुराने पहाड़ हैं, यहाँ आज भी खुदाई में गोलाकर पत्थर ही निकलते हैं तथा जगह-जगह से पानी के झरने। यात्री केदारनाथ पहुँचने के पहले गौरीकुंड पहुँचते हैं, रात को वहीं विश्राम किया जाता है। गौरीकुंड में स्नान करने के लिए गरम जल का कुंड है। यात्री इसी में डुबकी लगाते हैं। यहाँ पर कुंड के समीप ही गौरी देवी का मंदिर है, इसी मंदिर के पास से कुंड में गरम जलधारा बहती है। इस कुंड में स्नान करने से शरीर की थकान, रोग, चर्मरोग इत्यादि दोष से मुक्ति पा लेते हैं। रास्ते में भोजन करने के लिए अल्प विश्राम कर, पहाड़ों से झरनों का निर्मल जल पीते हुए, घुमावदार संकरे मार्गों से चलकर २३० कि.मी. की दूरी पूर्ण कर गौरी कुंड आ पहुँचे। शाम हो रही है। यहाँ के नियमानुसार शाम ६ बजे के बाद आगे वाहन नहीं चलाए जाते हैं। जहाँ शाम हो गई, वहीं रात्रि विश्राम करना पड़ता है। हम लोग गौरी कुंड पहुँच चुके हैं। पहाड़ के नीचे बस्ती है। छोटा सा बाजार भी है। ठहरने के लिए होटल, धर्मशालाएँ हैं। हम लोग एक अच्छे से होटल में रुक गए। कुछ लोग धर्मशाला में ठहर गए।

२४ मई को छठे दिन प्रातः कुंड में स्नान कर १४ कि.मी. पहाड़ पर चढ़ाई की यात्रा मंदिर तक पहुँचने के लिए करनी है। गौरी कुंड से यह यात्रा पैदल, पिट्टू, पालकी, खच्चर आदि से यात्रा की जाती है। यहाँ मेरी पत्नी श्रीमती सुधा पालकी में बैठी और उसी से वापस आईं और मैं खच्चर पर सवार हुआ। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि एक व्यक्ति ४-६ खच्चर रखता है और सभी पर सवारी बैठाकर ले जाता है। खच्चर इतने प्रशिक्षित होते हैं कि अपनी सधी हुई चाल से दुर्गम रास्तों पर पाँव जमाकर चलते रहते हैं। सबसे कठिन वापसी में उतरते हुए लगता है, जिस यात्री को अधिक भय लगता है तो खच्चर के साथ चलनेवाला उसकी लगाम पकड़कर चलता है। मंदिर खुलने का समय प्रातः ७ बजे से अपराह्न १ बजे तक है, लेकिन दर्शनार्थियों की अधिक संख्या में पहुँच जाने पर शाम ४ बजे तक पट खुले रहते हैं। श्रीकेदारनाथ भगवान् शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। यह तीर्थ मंदाकिनी नदी के किनारे पर समुद्र तल से ३५८९ मी. की ऊँचाई पर स्थित है।

इस मंदिर का निर्माण आठवीं सदी में आदिशंकराचार्य द्वारा कराया गया था। केदारनाथ में हिमालय का नाम कैलाश पर्वत है, जिसमें अलग दो नाम प्रसिद्ध हैं, एक मेरु पर्वत तथा दूसरा सुमेरु पर्वत तथा तीसरा हनुमान टाप के नाम से जाना जाता है। इन पर्वतों के शिखर अधिकांश समय बर्फ से ढके रहते हैं। महाभारत के अनुसार भगवान् शिव ने तपस्या के लिए हिमालय पर भैंसे का रूप धारण किया था, ताकि उन्हें कोई पहचान न सके। पांडव वनवास के दौरान जब हिमालय पर गए तो भीम ने भगवान् शिव को पहचान लिया, यह बात शिवजी समझ गए और वहाँ से भागने लगे, तब भीम ने पीछे से उनके दोनों पैर पकड़ लिये व स्तुति की, शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए। शरीर का पृष्ठ भाग वहीं रह गया जो कि केदारनाथ के रूप में शोभायमान है तथा भैंसे का अग्रभाग मुख काठमांडू (नेपाल) के मंदिर में प्रतिष्ठित हुआ, जो कि पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। केदारनाथ पंचकेदार हैं, जिनकी पूजा भिन्न-भिन्न प्रकार से की जाती है, जैसे केदारनाथ में पृष्ठभाग, तुंगनाथ में शिवलिंग तथा बाहु, रुद्रनाथ में मुख, मदमहेश्वर में नाभि तथा कलेश्वर में जटा के रूप में शिव अर्चना की जाती है।

केदारनाथ धाम में दर्शनीय स्थल हैं—केदारनाथ मंदिर, शंकराचार्य की समाधि, चोरावाड़ी, यह स्थान बहुत ही आकर्षक है। झील में तैरती हुई बर्फ  बहुत सुहावनी लगती है। इसी झील मार्ग से युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग गए थे, ऐसी किंवदंती है। अन्य स्थान बासुकी ताल ६ कि.मी. ऊँचाई ४१३५ मीटर, सुंदर झील, ब्रह्म कमल यहीं पाया जाता है। सोनप्रयाग २० कि.मी., सोनगंगा और मंदाकिनी के संगम का सुंदर स्थान है। गुप्तकाशी ४९ कि.मी., यह स्थान अर्द्धनारीश्वर विश्वनाथ मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। ऊखीमठ ६० कि.मी, यह भगवान् शिव का सर्दियों का निवास स्थान है। अगस्त्य मुनि ७३ कि.मी., मंदाकिनी नदी के किनारे अगस्त्य ऋषि का मंदिर है, अब इस स्थान से यात्रियों की सुविधा के लिए हेलीकॉप्टर से मंदिर पहुँचने की व्यवस्था हो गई है, जिसमें पूजा का सभी सामान तथा वापसी की व्यवस्था रहती है।

रुद्रनाथ पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण का स्थान है, कहते हैं कि मरणोपरांत मृत आत्माएँ यहीं से वैतरणी नदी को पार करती हैं, तब उन्हें दूसरे जीवन में प्रवेश मिलता है। इस मंदिर में भगवान् शिव की मुखाकृति की पूजा की जाती है। कल्पेश्वर वही स्थान है, जहाँ दुर्वासा ऋषि ने कल्प वृक्ष के नीचे घोर तपस्या की थी। ऋषि-मुनि व तपस्वी मंदिर के गर्भगृह में स्थापित चट्टान पर बैठकर आज भी तपस्या करते हैं। यह चट्टान शिवजी की जटा के रूप में पूजी जाती है। पंचकेदार दर्शन कर हमने रुद्रनाथ में पूर्वजों का श्राद्ध-तर्पण किया। कल्पेश्वर की शिला को स्पर्श कर भगवान् भोलेनाथ का चरण वंदन, ध्यान कर रात्रि विश्राम भी केदारधाम में ही किया।

सातवें दिन समुद्र तल से लगभग ३६०० मीटर की ऊँचाई पर भोलेनाथ केदारनाथ धाम का प्रातः दर्शन जीवन में अविस्मरणीय रहेगा। यहाँ पर पर्वतों की अधिक ऊँचाई और बर्फीली हवाओं के दबाव में साँस फूलती है, मुँह सूखता है, क्योंकि अधिक ऊँचाई होने पर यहाँ ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, इसलिए यात्रियों को नेक सलाह है कि गरम पानी पिएँ तथा सूँघने के लिए कपूर साथ में ले जाएँ, गरम पानी औषधि का काम करता है। यहाँ पंडों से सावधान रहें, इनके जाल में न फँसें। उत्तराखंड के चारधाम में सबसे अधिक केदारनाथ धाम के पंडा श्रद्धालुओं को ठगते हैं। केदारधाम से वापस गौरीकुंड आ रहे थे कि बाईं ओर करीब एक हजार मीटर से गिरता हुआ झरना देख मन वहीं ठहर गया। रात्रि विश्राम गौरी कुंड में किया गया।

आठवें दिन गौरी कुंड से बदरीनाथ धाम की दूरी छोटे, संकरे, घुमाव और चढ़ाईदार रास्ते से शुरू की, यह दूरी २२७ कि.मी. है। इसलिए गौरी कुंड से जोशी मठ तक यात्रा कर विश्राम करते हैं। यहाँ से जोशी मठ के लिए प्रातः ७ बजे प्रस्थान किया। बदरीनाथ धाम पहुँचने के लिए केदारनाथ से वापस रुद्रप्रयाग आना पड़ता है, रुद्रप्रयाग से गौचर कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, चमोली, पीपलकोठी होकर जोशीमठ तक पहुँचते हैं। जोशीमठ में रात को विश्राम करते हैं। दीपावली के बाद से यहीं भगवान बदरीनाथ निवास करते हैं। कहते हैं कि ६ महीने बदरीनाथ भगवान् की पूजा-अर्चना मनुष्य करते हैं और ६ महीना देवता। जब मंदिर अक्षय तृतीया को खोला जाता है, उस समय मंदिर की ज्योति जलती हुई मिलती है, जो इसका साक्षात् प्रमाण है। जोशीमठ से बदरीनाथ भगवान् तक बहुत ही संकरा वनवे है। जब यात्रियों का एक काफिला निकल जाता है तब दूसरे को आने का रास्ता दिया जाता है। जोशीमठ से प्रस्थान करके ८ कि.मी. की दूरी प्रातः मंदिर पहुँचने के लिए पूरी की जाती है। इसके पूर्व की यात्रा कर्णप्रयाग से जोशीमठ तक दुर्गम पहाड़ों से होकर है।

कर्णप्रयाग से आगे पहाड़ों पर बहुत ऊँचाई में बस्ती बसी है और लोग छोटी-छोटी क्यारियाँ में मिट्टी डालकर कृषि करते हैं, जिसमें फसलें पक रही हैं। पहाड़ों को ऐसे तराशा गया है कि मैंने एक ऊँचे पहाड़ पर सात घेरे लगाकर ऊपर ऊँचाई तक पहुँचने के लिए इसकी गिनती की है। पहाड़ को सात बार सड़क मार्ग से घेरा गया है। रुद्रप्रयाग से पीपलकोठी तक पहाड़ों पर पानी नहीं है, लोग अलकनंदा का जल पीते हैं। पीपलकोठी से आगे पहाड़ों से झरने फूटने लगते हैं। वहाँ स्वजल ग्राम के बोर्ड लगे हैं अर्थात् गाँव में पानी पीने की जल व्यवस्था प्रकृति के द्वारा ही उपलब्ध है। पहाड़ों पर बर्फ  जमी है, पर्वत बहुत ऊँचे हैं, गेहूँ की फसल तैयार होते हुए वहाँ देखी है। संपूर्ण मार्ग में एक किनारे पहाड़ दूसरी ओर अत्यंत गहरी तीव्र गति से बहती हुई अलकनंदा का साथ है। आज रात्रि विश्राम जोशीमठ में किया गया।

आज यात्रा का नौवाँ दिन है। साक्षात् विष्णु के धाम सत्ययुग का सबसे पावन धाम उत्तरांचल की देवभूमि में बदरीविशाल का मंदिर अलकनंदा के दाएँ तट नीलकंठ पर्वतमाला की पृष्ठभूमि पर स्थित है। ऐसा सुंदर आध्यात्मिक साक्षात् विष्णुधाम इस संसार में कहीं नहीं है। यह अद्वितीय है, महान् है। कहते हैं कि प्राचीन समय में यहाँ पर बदरीफल (बेर) के पेड़ों का घना वन था। समुद्र तल से १०३०० फुट पर स्थित है। मंदिर के दोनों ओर नर-नारायण पर्वत की ऊँची शृंखलाएँ हैं। मई माह के प्रथम सप्ताह में अक्षय तृतीया के दिन तक बदरीनाथ मंदिर के पट खुलते हैं।

जोशीमठ से बदरीनाथ धाम के रास्ते पहाड़ों पर ऐसे सुंदर रंग-बिरंगे फूल खिले हैं, जो कालीन सा बिछा हुआ प्रतीत होता है। इसी मार्ग से भगवान् विष्णु के धाम पहुँचते हैं। मंदिर की ऊँचाई लगभग १५ मीटर है तथा यह तीन भागों में विभाजित है—गर्भगृह, दर्शन मंडप और सभा मंडप। गर्भगृह में भगवान् विष्णु की साँवली-सलोनी प्रतिमा विराजमान है। इसी मंदिर के नीचे तप्तकुंड अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है, जिसमें गरम पानी आता है, इसी कुंड में स्नान करने के पश्चात् भगवान् के दर्शन करते हैं। मौसम इतना सुहावना होता है कि नर-नारायण पर्वत की शृंखलाएँ बर्फ  से आच्छादित गगनचुंबी शिखर आसमान को छूते हुए दृष्टिगत होते हैं। बादलों की घटाओं में शिखर की ऊँचाई विलीन हो जाती है। अधिकांश समय अपराह्न ३ बजे से वर्षा प्रारंभ हो जाती है और रात्रि में मौसम अत्यधिक ठंडा हो जाता है। मंदिर खुलने का समय प्रातः ७ बजे से दोपहर १ बजे तक, अधिक दर्शनार्थी होने पर मंदिर ३-४ बजे तक खुला रहता है। इसके पश्चात् प्रत्येक शाम को ६ बजे आरती होती है व ८ बजे शाम तक मंदिर खुला रहता है।

बदरीनाथ धाम में ठहरने के लिए बहुत ही अच्छी आवासीय सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जिनमें अच्छे होटल, सामान्य होटल, धर्मशालाएँ हैं। यहाँ की जलवायु मई माह से ५ से ० डिग्री तक पहुँच जाती है। जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर तक यह १७-१८ डिग्री तक रहता है। नवंबर में दीपावली के पश्चात् यहाँ का तापमान ० डिग्री से नीचे पहुँच जाता है। वैसे तो यहाँ पर कम-से-कम २-३ दिन अवश्य रुकना चाहिए, क्योंकि प्रकृति का जो नजारा है, उसमें होनेवाले परिवर्तन सुबह-शाम नर-नारायण पर्वत की ओर निहारकर देखे जा सकते हैं तथा जो नजदीकी स्थान हैं, उनका भ्रमण किया जा सकता है, जैसे ब्रह्मकपाल, शेषनेत्र, चरण पादुका, नीलकंठ, मातामूर्ति मंदिर ३ कि.मी., अलकनंदा के दोनों तट पर बदरीनाथजी की माँ का मंदिर है। भाणागाँव ४ कि.मी. है। यह भारत-तिब्बत सीमा पर हिंदुस्तान का अंतिम गाँव है। इसमें अधिकांशतः मंगोलियन जाति के लोग रहते हैं। यहाँ व्यास गुफा, भीमकुंड, बसुधरा प्रपात जैसे दर्शनीय स्थल हैं। अब पुनः वापस मंदिर स्थल पर पहुँचते हैं, जहाँ पर बदरीनाथ मंदिर के समीप स्थित गरम कुंड से पहुँच मार्ग पुल के पास तिराहे पर जाते समय दाहिनी ओर रुद्राक्ष की मालाएँ उचित कीमत पर मिल जाती हैं। यह उत्तरांचल देवभूमि का साक्षात् बैकुंठ धाम है, जहाँ साधना, तपस्या, मन की शांति एवं पाप-मुक्ति करने के लिए अच्छा स्थान है।

दसवें दिन बदरीनाथ धाम में दर्शन, पूजन-अर्चन, वंदन कर सभी ने ७ बजे प्रातः तैयार होकर वापस हरिद्वार के लिए प्रस्थान किया। बदरीनाथ से हरिद्वार की दूरी २८० कि.मी. है। प्राकृतिक छटाओं का आनंद लेते हुए सूर्यास्त होने तक हरिद्वार आकर विश्राम किया और जो अन्य लोग साथ बस में गए थे, वे वहीं हरिद्वार से अपने गंतव्य को चले गए। अगले दिवस गंगा माँ के चरणों में नमन कर हम लोग रेलवे से वापसी यात्रा करते हुए दिल्ली, झाँसी होकर सकुशल पृथ्वीपुर आ गए। देवभूमि हिंदुस्तान का स्वर्ग है। चारधाम की यात्रा जीवन में एक बार अवश्य करनी चाहिए।

आनंद भवन, मेनरोड पृथ्वीपुर

जिला-टीमकगढ़-४७२२३६ (म.प्र.)

दूरभाष : ९४२४३४५३५५

हमारे संकलन