जग वसंत की अगवानी में बाहर निकला

जग वसंत की अगवानी में बाहर निकला

इधर कई वर्षों से देख रहा हूँ, निर्वेद वसंत के अवसर पर प्रकाशित होनेवाले निबंधों का स्थायी भाव होता जा रहा है और उससे शांत रस झरने लगा है। वसंत की मादकता में अलस हो जाना तो समझ में आता है, पर निर्वेदी हो उठने का कोई कारण नहीं सूझता। वसंत अपने प्रभाव से आपको पागल न बना सका, यह आपकी बलिहारी, पर इस मौसम में आप पर सुस्ती क्यों छाती  जा रही है, यह समझ में नहीं आ रहा है। सनक का समय तो फगुआ का है, होली का है। कहते हैं, फागुन में बुढ़वा देवर लागे। पर ठहरिए, यह वसंत है, वसंत। संवत्सर का सर्वस्व। यह परमपुरुष के यज्ञ का आज्य है—‘वसन्तोऽदीजाज्यं ग्रीष्म इध्म शरध्दविः’ ऋग्वेद में आया है। यह सरस्वती के समारोहपूर्वक पूजन का अवसर है और अपनी जवानी को महान् लक्ष्यों के लिए उत्सर्ग करने के लिए तैयार रहने का समय है। निर्वेद को यहाँ न जगह है, न जगह होनी चाहिए। स्वयं श्रीकृष्ण ने जिस ऋतु को अपना स्वरूप माना है—ऋतूनां कुसुमाकरः ऐसा कहकर, उस ऋतु में कर्म, ज्ञान और भक्ति का ज्वार नहीं महाज्वार उमड़ना चाहिए। उस ऋतु में बचपन, तरुणाई, जवानी ही नहीं, वार्धक्य से भी आगे जाकर लोकसंग्रह की बात करनी चाहिए। एक गीत की कुछ  पंक्तियाँ याद आ रही हैं—

अपने हँसते शैशव से अपनी खिलते यौवन से

प्रौढ़तापूर्ण जीवन से हम करें राष्ट्र आराधन,

हम करें राष्ट्र का अर्चन, हम करें राष्ट्र का अर्चन

हम करें राष्ट्र आराधन—आराधन।

पर नहीं, वसंत आ गया है और हम अपना रोना लेकर बैठे हैं कि आधुनिकता की हवा में अब बगिया को कोई नहीं पूछता है, पनघट सूख रहे हैं आदि-आदि। हम अपना मन इस बात को लेकर खराब किए जा रहे हैं कि अब तिललियाँ नहीं बचीं और आमों पर मंजरियाँ नहीं दीख रहीं। बहुत संभव है, आप व्यस्त और शायद उनसे भी ज्यादा अस्त-व्यस्त जीवन में वसंत की पदचाप सुन नहीं पा रहे हों। पर बात ऐसी है नहीं, वसंत के आगमन की मुनादी हो चुकी है। वसंत आ गया है। वसंत विलस रहा है, यहाँ-वहाँ और न जाने कहाँ-कहाँ! आप जरा खिड़कियाँ तो खोलिए अपने मकान की। आपको दीख जाएगी सामने की लगभग सूख चली वल्लरी पर आ रही कोंपलों की लाली। सप्ताह भर रुक जाइए, यही लाली तरुण हरियाली में बदल जाएगी। फूल-पत्तों से लदी पूरी वल्लरी आप तक  यह संदेश पहुँचा देगी कि वसंत आ गया है। वसंत वत्सर का आह्वान है उठने और जाग जाने का। आप देखें, हमारा कलेंडर कैसे आरंभ होता है। जनवरी का महीना शीत में ठिठुरता है और उसकी जगह पर मुसकराता वसंत फरवरी महीने में आ धमकता है। थका-थका सा शीत जब अपनी निशानी छोड़कर जा रहा होता है तो वहीं से वसंत अपना वैभव गढ़ना शुरू  करता है। वसंत नवनिर्माण है, वह अवशेष की उपेक्षा नहीं, नवरचना की  तपस्साधना॒है।

प्राकृतिक रंग हमारे मनोभावों को शायद सबसे स्वाभाविक और सटीक रूप से अभिव्यक्त करते हैं। रंग हमारे ही नहीं हमारी ऋतुओं के मूड को भी अच्छी तरह से व्यक्त करते हैं। वसंत अपने को पीले रंग में अभिव्यक्त करता है। यही कारण है कि इस ऋतु में पीत वस्त्र धारण करने की परंपरा रही है। इसका कारण स्पष्ट है। सारा उत्तर भारत इस मौसम में सरसों के फूलों से जगमगाते विशाल मैदानों से पट जाता है। सरसों के फूलों का पीलापन ही शायद हमें पीले वस्त्र पहनने को उकसाता है। आदमी है तो आखिर अनुकरणशील ही न। पर महज अनुकरणशील अंधानुकरणशील नहीं। पीले रंग में प्रफुल्ल तत्परता झलकती है। यह रंग आपसे एक सीधा संवाद कर रहा हो, ऐसा लगता है। यह जागृति का रंग भी है, तत्परता का भी। यह रंग सूर्य की भास्वर किरणों का प्रतीक है। वे किरणें, जो जीवन की पोषक हैं और जिनके कारण सूर्य का एक नाम ‘पूशन’ भी है। इसमें मुखरता है, आशावाद है तथा गर्मजोशी भी। पीला गुलाब मित्रता, हर्ष तथा अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक है।

जिस रंग का संबंध जीवन की गतिशीलता से  है, उत्सर्ग की भावना से है, वह रंग है पीला। वैष्णव परंपरा में इस रंग को बहुत महत्त्व दिया गया है। श्रीहरि विष्णु और उनके अवतार श्रीकृष्ण पीतांबर (पीला वस्त्र) धारण करते हैं। हल्दी पीले रंग का सुलभ प्राकृतिक स्रोत है। यह प्रमाणित हो चुका है कि हल्दी में त्वचा को पुष्ट करनेवाले तत्त्व पाए जाते हैं। अनुमान है कि आरंभ में जब चिकित्साशात्र इतना विकसित नहीं था,  संक्रमण से त्वचा की रक्षा के लिए कपड़े को हल्दी में रँगकर पहना जाता होगा। शुभ अवसरों पर किसी प्रकार के संक्रमण से बचने के लिए हल्दी में रंजित वस्त्र ही पहनाए जाते होंगे। इस प्रकार पीत रंजित वस्त्र शुभ अवसर के प्रतीक भी हो गए। भोजपुरी अंचल में आज भी मांगलिक अवसरों पर पीले रंग में रँगी धोती तथा साड़ी पहनी जाती है। विवाह मंडप में वधू को हल्दी से रँगी साड़ी पहनाकर ही बिठाया जाता है। ऐसी साड़ी को ‘पियरी’ कहते हैं। आसन्न ग्रीष्म में जो सूर्य प्रचंड होकर चमकनेवाला है, वह अपना पूर्वाभास भी वसंत के पीताभ रंग में दे देता है। इसपर विचार करने की आवश्यकता है कि वसंत का पीले वस्त्रों से जो सायुज्य है, उसके और कौन से कारण हो सकते हैं।

वसंत के साथ जुड़े होने के कारण पीले रंग को हम वासंती भी कहते हैं। वासंती हमारी अशेष उत्सर्गशीलता का प्रतीक है। उत्सर्ग प्रकृति का भी प्राथमिक गुण है। वृक्षों की महत्ता फलोत्सर्जन के उनके स्वभाव के कारण ही तो है। नदियाँ भी इसीलिए पूजी जाती हैं कि वे अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं, अपनी प्रजा के लिए बहती जाती हैं। इसी प्रकार बादल हैं, सूर्य है और चंद्रमा भी। अपना सर्वस्व उत्सर्ग करके अपने जीवन को सार्थक करनेवाले हमारे प्रणम्य वीरों ने कभी गाया भी था—मेरा रंग दे वसंती चोला। सुभद्रा कुमारी चौहान ने प्राकृतिक परिवेश के परिप्रेक्ष्य में वसंत के निरुस्वार्थ उत्सर्ग भाव को अविस्मरणीय अभिव्यक्ति दी है—

फूली सरसों ने दिया रंग

मधु लेकर आ पहुँचा अनंग।

वधु वसुधा पुलकित अंग-अंग

है वीर वेश में किंतु कंत।

वीरों का कैसा हो वसंत?

अस्तु, मैं इस निबंध के शीर्षक के लिए बाबा नागार्जुन का आभार व्यक्त करते हुए आगे बढ़ना चाहता हूँ। प्रकृति ने हमें जिन विभिन्न ऋतुओं का उपहार दिया है, उनमें वसंत का महत्त्व इस बात के लिए भी है कि वह नवनिर्माण और उत्सर्ग का संदेश एक साथ लेकर आता है, सारा परिवेश बदलते हुए। वसंत अंतर्मन में व्याप्त जड़ता को दूर करने तथा जहाँ हैं वहाँ से आगे बढ़कर सूर्य के महातप का स्वागत करने की प्रेरणा देता है। वसंत तभी हम सबका आराध्य हो जाता है। वसंत हमें प्रमाद से बचने तथा जीवन को सुशोभन बनाने की आकांक्षा का ही दूसरा नाम है। यह हमारे सामाजिक जीवन का शक्तिस्रोत है। वसंत मकर संक्रांति का फलागम है। यह धरती पर औषधियों का कारण है तथा मानवों में काम बनकर उनकी सक्रियता का साक्षी है। श्रीमंत वसंत की आहट निःशेष हो चुके प्राणों में पुलक भर देती है। दिशाओं को स्वच्छ करके दृष्टि का विस्तार करती है तथा मन में उमंग भरकर मित्र-अमित्र का भेद मिटा देती है। वसंत के स्वागत में ठूँठ पलाश भी अपने सिर पर कलगी सजाकर शामिल हो जाते हैं। अज्ञेय ‘ऋतुराज’ नामक अपनी कविता में कहते हैं—पीत वसन दमक उठे तिरस्कृत बबूल अरे ऋतुराज आ गया।’ ऋतुराज अर्थात् वसंत की आहट पाकर सबमें होड़ लग जाती है सज-धज के साथ वसंत की अगवानी करने की। बाबा नागार्जुन के शब्दों में सुनें—

दूर कहीं पर अमराई में कोयल बोली

परत लगी चढ़ने झींगुर की शहनाई पर।

वृद्ध वनस्पतियों की ठूँठी शाखाओं में

पोर-पोर टहनी-टहनी का लगा दहकने

टेसू निकले मुकुलों के गुच्छे गदराए

अलसी के नीले पुष्पों पर नभ मुसकाया

शीत समीर गुलाबी जाड़ा धूप सुनहली

जग वसंत की अगवानी में बाहर निकला।

वसंत की यही अमोघता है कि वह सबको मथकर रख देता है। वह सबको मथकर सबका सर्वोत्कृष्ट भाव बाहर लाता है। बच्चे का बचपन कैसा खिलता है वसंत में देखिए, तरुणाई किस प्रकार उमगती है वसंत में निरखिए, जवानी कैसे हुंकारती है वसंत में लखिए, और बुढ़ापा किस प्रकार मुसकाता है वसंत में जानिए, अगर जानना चाहते हैं तो। रही बात प्रकृति की तो बाबा नागार्जुन की उक्त पंक्तियाँ सामने हैं ही। दिगंत को गुंजरित करती कोयल की काकली कानों में रस घोल रही है। पोर-पोर से पल्लवित पलास आँखों को विश्राम लेने का कोई मौका नहीं देना चाहता। शीतल तथा मंद समीर त्रिविध तापों को हरने को जैसे तैयार ही बैठा है। प्रकृति तथा परिवेश की ये सारी चेष्टाएँ कहती हैं कि सबकी आँखों का तारा हमारा वसंत आ रहा और संसार उसके स्वागत में पलक पाँवड़े बिछाए बैठा है।

जरा यह विचार करें कि संवत्सर में यदि वसंत न होता तो क्या होता। एक वैज्ञानिक इस प्रश्न पर अलग ढंग से विचार करेगा। वह शायद कहे कि तब शीत ऋतु लंबी होगी ऊँचे आक्षांशों पर और ग्रीष्म ऋतु लंबी होगी निचले अक्षांशों पर। पर हम इस दृष्टि से विचार नहीं करेंगे। हम तो कहेंगे कि सारा संवत्सर चक्र ही फिर गड़बड़ा जाएगा। जीवन में जड़ता का लंबा सिलसिला चलेगा या सुस्ती का अछोर विस्तार सबको अपने पाश में लेकर बैठ जाएगा। वसंत जाड़े का प्रगंभ भाव है, उसका परिपक्व फल। यह ग्रीष्म की प्रस्तावना भी है, उसकी तैयारी भी। यह वर्ष भर की निरामयता के लिए जड़ी-बूटी का पौष्टिक अवलेह हो जैसे। आयुर्वेद भी कहता है कि हमें शरीर को वर्षभर दुरुस्त रखने की आवश्यक तैयारी इसी ऋतु में कर ली जानी चाहिए। वसंत पुरातन पर नूतन की विजय का अहिंसक अभियान है। तभी तो सारा जग इस अभियान का साक्षी बनने के लिए बाहर निकल आया है। पक्षियों के रुद्ध कंठ खुले हैं, पल्लवों के पुट विकसित हुए हैं, हवाओं में सनसनी घुली है, सूर्य प्रखर होने लगा है तथा रातें ज्यादा मुखर हो रही हैं। किसी असमिया कवि ने कहा है—

पलाश रंगाली होल

मनो रंगाली होल।

पखिला उरिबर होल

फागुनो आहिबर होल॥

फागुन (वसंत) एक बार फिर से अपने अनूठेपन के साथ, प्रकृति मंच पर आ डटा है। पर उसके सहचर हम क्यों ठिठके खड़े हैं, वह क्या है, जो हमारी जड़ता को जड़े जा रहा है; वह क्या है, जिससे जगाने में कोयल की काकली भी विफल हो रही है। आखिर वह क्या है, जिसके कारण हवा की अनछुई छुअन भी असमर्थ हुई जा रही है हमें पुलकित करने में और तितलियों का लघु ,पर उन्मुक्त जीवन भी खींच नहीं पा रहा है जिसे अपनी ओर? यह है आत्म का अनात्म हो उठना। आत्म-विस्मृति में चले जाना। अपने आप से अनजान हो उठना। गालिब ने फरमाया है—

हम वहाँ हैं, जहाँ से हमको भी

कुछ हमारी खबर नहीं आती।

निर्वेद सच पूछिए तो वसंत ही है, जो हमको हमारी ही खबर लाकर देता है। वसंत का संदेश यह है कि हम अपने आप के प्रति, अपने परिवेश के प्रति और अपने दायित्व के प्रति जाग्रत् रहें। स्वयं के प्रति हमारी जागृति हमें सौंदर्य की साधना की ओर ले जाती है, परिवेश के प्रति हमारी जागृति हमें वृक्षों, जलाशयों, पशु-पक्षियों से जोड़ती है और अपने दायित्वों के प्रति जागृति हमें अपना सर्वस्व निछावर करने को प्रेरित करती  है। विराट् की इसी प्रेरणा से संवत्सर के यज्ञ में वसंत आज्य बना है। हमारे पूर्वजों ने हर युग में वसंत का यह संदेश ग्रहण किया है। इस संदेश से नई पीढ़ी को अवगत कराने का ही एक उपक्रम है वसंतोत्सव का आयोजन। हमारे देश के विभिन्न भागों में ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में भी वसंत अपनी इसी प्रासंगिकता के लिए पूजा जाता है। यह हमारे लिए खेद का विषय होगा कि हम वसंत के आगमन पर निर्वेद के शिकार हो जाएँ। ऐसा यदि होता है तो हमारी एक सामाजिक क्षति होगी।

मुख्य प्रबंधक (राजभाषा) यूको बैंक,

मानव संसाधन प्रबंध विभाग प्रधान कार्यालय

१० बी.टी.एम. सरणी, कोलकाता-७००००१

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