'घी के बिना होम-हवन नहीं, बेटी के बिना संसार नहीं'

'घी के बिना होम-हवन नहीं, बेटी के बिना संसार नहीं'

एक क्रांतिकारी कदम के रूप में मोदी सरकार का देश के सबसे कम लिंगानुपात और ऑनरशिप किलिंग के प्रांत हरियाणा से प्रारंभ किया ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान भारतीय लोक-परंपरा के लोकपुरुष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आज के समाज में हमारी लोक-परंपरा की वापसी है। एक तरह का पुनरुज्जीवन है।

आज ‘बेटी बचाओ अभियान’ पर हर पत्र-पत्रिका में सहस्रों पन्ने रँगे जा रहे हैं। मीडिया दिन-रात ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ पुकार रहा है, पर हमारे देश में लोक परंपरित हमारे जीवनदर्शन में लोक परंपरा अपने गीतों की कुछ पंक्तियों में सृष्टि के युग्मराग के एक तार ‘बेटी की जीवन में अनिवार्यता’ के लिए न जाने कब से यह कहती आई है। बुंदेलखंड का लड़की के विवाह का एक लाड़ी/बन्नी गीत है—

काँकर कुइया खुदाऊ राजा आजुल

बा पै रँहट चलाऊ हो रामा

रँहट को पानी आजी रानी ए पिबाऊ

तो धीय को गरभ खसि जाय न हो रामा

धीय बिन होम न होय राजा आजुल

धीय (बेटी) बिन जग संसार न हो रामा!

इस तरह के अनेकानेक लोकगीतों की दो-दो पंक्तियों में समाहित सामाजिक संवेदनाओं से सराबोर जीवन के सत्य हमारी आज की स्थितियों पर सोचने के सही संकेत देते हैं।

आणविक सभ्यता और कंप्यूटर से हुई क्रांति से मिटी समय और स्थान की दूरियों में सिमटी, मानवीय संवेदनाओं के इतने क्षरण के बावजूद अभी भी, आज भी, हमारे समाज में बेटी की विदाई जीवन का सबसे कारुणिक प्रसंग है। जब बेटी घर के कोने-आले में रखी गुडि़याँ, रोती सहेली और जन्म से अब तक का बाबुल का आँगन छोड़, अपने ससुर के घर जाती है।

बेटी की विदाई की इस स्थिति में महर्षियों का ज्ञान-वैराग्य, वैज्ञानिकों की तथ्य यथार्थपरक समझ कोई सहायता नहीं करती। जानकी की विदाई पर जनक, जो विदेह कहे जाते थे, उनका भी धैर्य चुक गया, ज्ञान की मर्यादा मिट गई। कण्व ऋषि तक शकुंतला की विदाई नहीं सह सके थे।

मैंने अपने भाई ‘पृथ्वी’ मिसाइल और अग्नि-५ मिसाइल के निर्माता-निदेशक पद्मभूषण डॉ. वी.के. सारस्वत को अपनी बेटी की विदाई पर फूट-फूटकर रोते हुए देखा है। दूसरे छोटे भाई चर्म और कुष्ठ रोग विशेषज्ञ डॉ. पी.के. सारस्वत को बेटी अक्षदा की विदाई करते हिचकियाँ भरते रोते देखा है।

पर लड़की की यह विदाई, यह बिछोह कितना जरूरी, कितना अपरिहार्य व अनिवार्य है समाज के लिए, यह तथ्य सत्य लोक-परंपरा में स्वयं विदा होती हुई बेटी, उसके रथ का डंडा पकडे़ खडे़ रोते हुए भाई को बहन समझाती हुई बताती है—

‘भाई, मेरे रथ का डंडा छोड़ दो। हम समाज में यदि अपनी बहन-बेटी दूसरों को देंगे नहीं और दूसरों की लेकर आएँगे नहीं तो यह संसार चलेगा कैसे?’

बेटी की विदाई का गीत है

छोटे बीरन पकर्यो रथ कौ ओ डंडा

हमरी बहिन कहाँ जाए हो...?

छोड़ो बिरन मेरे रथ कौ ओ डंडा

अपनी न देंगे, पराई न लेंगे।

लोक-चलन कैसे होय हो?

धरती-चलन कैसे होय हो?

जिअ जग कौ, ब्यौहार ओ...

गीत की दो पंक्तियों में व्यक्त विश्व लोकवार्त्ता में व्यापक स्तर पर मान्य ‘क्रॉस ब्रीड’ का तथ्य तो समझाता, अनिवार्यता बताता ही है, बहन-बेटी के बिछोह के दुःख को सहने की शक्ति भी देता है—और गीत में आए ‘अपनी’ ‘पराई’ शब्द क्या एक अभिव्यंजित अर्थ ध्वनित करते हुए आज वे लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसा एक घोष वाक्य या नारा नहीं देते?

‘बेटी देओ, बेटी लाओ,

दहेज दावानल पी जाओ।

बेटी की जुदाई के इस करुण प्रसंग में परिवारजनों और परिचितों के लाड़-प्यार के बीच पाल-पोसकर बड़ी की गई बेटी को अपने से अलग कर, पराई बना, दूसरे के हाथों में सौंपने का दुःख तो है ही। बेटी के अनिश्चित भविष्य की आशंकाओं और आज आए दिन सामने आते चले जा रहे दहेज हत्या, वधू दहन, उत्पीड़न, अत्याचारों, दुर्व्यवहार के मामलों का दुःख भी नहीं है क्या?

लोक-परंपरा में वधू दहन के तत्काल बचाव के लिए पहली होली पर नई बहू को सुसराल में न रहने देने जैसे रीति-रिवाज भी बनाए हैं। सौ बातों की एक बात, इनके पीछे का यथार्थ जो भी हो, आज की सामाजिक परिस्थितियों में सारी विसंगतियों पर सोचने, लोकपरंपरित, शाश्वत सत्यों के प्रकाश में परीक्षण की जरूरत क्या नहीं है? उत्तर ‘हाँ’ है।

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