सोचकर रह गया दंग

सोचकर रह गया दंग

आमने-सामने

मोटी-ताजी एक बिल्ली ने अपने घर के

ड्राइंग-रूम में आकर मुझे देखा

और यकायक रुक गया,

उसे वहाँ मेरी निरीक्षा नहीं थी शायद

नहीं, सोमवार सभी अपने-अपने ऑफिस

चले गए हैं, यह दोपहर तो सचमुच नहीं

कुछ बेचैनी से मेरी ओर ताका

हमारी आँखें आपस में टकराईं, पहले कौन

मुँह मोडे़, ऐसी एक हालत

अघोषित-युद्ध में लग गए दोनों,

एक बिल्ली की आँखें

इतनी निश्चल होती हैं,

यह मुझे नहीं था मालूम।

अकड़ी पूँछ, तने बाल, गडे़ हुए पाँव के नख

कुल मिलाकर चढे़ हुए धनुष के समान बिल्ली

उसने आक्रमण किया था अभी-अभी,

मेरी संपूर्ण दृष्टि मंडल को

मैं भूला-भटका, इतिहास पूर्व भूखंडों में

अपरिचित समुद्रों में गिरा जैसे फिर भी

मैंने आँखें बंद नहीं कीं,

बिल्ली ने भी आँखें बंद नहीं कीं।

मनुष्य और मृग के लिए कोई मूलभूत

विशेष स्थिति में खड़ी थी बिल्ली मेरे सामने

बिल्ली के लिए बिल्ली ही जिद बनकर

एक बिल्ली की आँखें इतनी अनाथ होती हैं

यह नहीं था मुझे मालूम।

आखिर हारा तो मृग ही,

या सोचा इस प्रकार

मैंने तना हुआ वह शरीर

धीरे-धीरे खिसककर

चली गई बिल्ली, बिल्ली की गति में

इस प्रकार जब मेरी नजर

यकायक हुई शून्य तो

लगा मुझे कि मान लेना था मुझे

बिल्ली के लिए बिल्ली का स्वाभिमान

और मैंने कमाया ही क्या?

जीना है तो जीना है बाहुबली के समान।

सब कुछ त्यागने से

एक बिल्ली की आँखों में

इतनी उदासीनता रहती है,

यह मुझे नहीं था मालूम।

पीट का दिया हुआ बाइबल

मुझसे ही खरीदा हुआ कुरान

उपनिषद्, जो घर में था

ग्रंथ साहेब जो मँगाया गया था

रखता हूँ सभी को एक साथ

देखेंगे

कि होता क्या है

होता कुछ भी नहीं है।

अलादीन का तिलिस्मी लैंप

अलादीन का तिलस्मी लैंप आज

लगा मेरे हाथ

धूल थी उस पर सैकड़ों बरसों की

इतने समय तक न जाने कहाँ छिपा था

सोचकर रह गया दंग

इच्छा हुई रगड़कर देखने की

लाकर रख दिया पोंछने का कपड़ा।

रगड़ा तो भूत को उठ जाना चाहिए

‘देखो’ कहकर हाथ बाँधकर खड़ा होना चाहिए।

मैं तो डरनेवाला नहीं हूँ,

कहानी मालूम है न पहले ही।

मनचाहे काम को तुरंत कराकर

भूत को भूत की आजादी दूँगा

मैं गुलामी का विरोधी हूँ।

रगड़ने से भूत आएगा क्या,

इतने बरसों बाद

इस बीसवीं सदी के अंत में?

भूत भी भूल गया होगा,

इस तरह की लंबी निद्रा में

अपनी जादूगरी कमाल

बहुत देर तक इस प्रकार की उलझन में पड़कर

एक कहानी को खत्म करने की संभावना से हटकर

लैंप को ही तोड़ डाला

एक पंक्ति धूप की,

चली गई बादल की ओर

धूल के समान भूत या भूत के समान धूल

सब कुछ अब एक समान

अब भूत आजाद, कहानी भी सुरक्षित

आज हमें जो करना है, यही है।

नवनीत, द्वितीय क्रॉस, अन्नाजी राव लेआउट

प्रथम स्टेज, विनोबा नगर, शिमोगा-५७७२०४ (कर्नाटक)

दूरभाष : ०९६११८७३३१०

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