यादों के दर्पण में मेरे

मुश्किल से दुनिया में मिलते

मन को मीत बनानेवाले।

बडे़ जतन से पाल रखे हैं

दिल का दर्द पाँव के छाले।

 

राजमार्ग ठुकरा पग मेरे,

पगडंडी की ओर मुडे़ हैं।

मीत-मीत के शब्द-शब्द से,

जीवन के संदर्भ जुडे़ हैं।

 

टूट गईं फौलादी कसमें,

सपनों को वनवास मिल गया।

तम ने नहीं मुखौटे बदले,

छल-बल साथ उजास मिल गया।

 

अनजानी आँखों में सहसा,

कभी किरकिरी पड़ जाती है।

सीधी-सच्ची बात शूल सी,

कभी हृदय में गड़ जाती है।

 

प्यार नहीं प्रतिदान माँगता,

उपालंभ चुपचाप सह लेता।

प्रतिवादी बनने से पहले,

मन की बातें मन कह लेता।

 

पीठ फेर ली है बहार ने,

साँसें अब तक सुरभीनी हैं।

ऐसा कुछ घट गया कि जिससे,

मन उदास आँखें गीली हैं।

 

यादों के दर्पण में मेरे,

रूप किसी का अब भी हँसता।

मन-मंदिर की मूर्ति न टूटी,

मंत्र अर्चना के मैं जपता।

क्लाउड-९, अपार्टमेंट्स

फ्लैट नं. ८०६

शास्त्री नगर, मेरठ-२४०००१

हमारे संकलन