पं. दीनदयाल उपाध्याय काया दुर्बल, सबल आत्मबल

पं. दीनदयाल उपाध्याय काया दुर्बल, सबल आत्मबल

मेरा संघ कार्य से संपर्क १९६२ में आया। उसी वर्ष के संघ शिक्षा वर्ग में प्रथम वर्ष के प्रशिक्षण के लिए प्रयाग गया था। अपने प्रखर चिंतन के लिए बहुचर्चित पंडित दीनदयालजी से मिलने की अभिलाषा ही स्वयंसेवक की थी। वे संघ कार्य के आदर्श पुरुष थे। उनके व्यक्तित्व में शंकराचार्य की मेधा, बुद्ध की करुणा और विवेकानंद की तार्किकता का अनुपम समन्वय था।

उन दिनों संघ सर्किल में दीनदयालजी को लेकर एक मृदु-मधुर चुटकुला प्रचलित था। संघ की अखिल भारतीय बैठकों में संघ के प्रचार प्रमुख मान. बाबा साहेब आप्टे दीनदयालजी से कहा करते थे पंडितजी। अमुक विषय पर पक्ष में यदि विचार देना हो तो क्या तर्क दिए जाने चाहिए। दीनदयालजी समस्या का गहन विवेचन करके पक्ष में अनेक तर्क देते।

अपने मृदु-मधुर हास से सभागार को आलोकित करते हुए बाबा साहेब फिर पूछते—पंडितजी, यदि हमें इस समस्या के विरुद्ध जाना हो तो क्या तर्क होना चाहिए। दीनदयालजी अनेक तर्कों से विषय का विश्लेषण करते हुए उसके विरुद्ध अनेक तर्क प्रस्तुत करते। वातावरण आनंद-हास से भास्वर हो उठता।

१९६४ में कानपुर के संघ शिक्षा वर्ग में मैं द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण लेने आया था। दीनदयालजी अपने सामाजिक, राजनीतिक चिंतन के प्रारूप को समझा रहे थे, जिसे उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ नाम दिया था। बैठक में एक स्वयंसेवक ने कहा—एकात्म मानववाद को आसानी से कैसे समझाया जा सकता है? दीनदयालजी ने कहा—मैं संघ की भाषा में समझाता हूँ। जीवन के चार मोहरे हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, हमें चारों का खयाल रखना चाहिए, जो मोहरा कमजोर हो। उस पर टूट पड़ना चाहिए।

परमपूज्य गुरुजी दीनदयालजी को बहुत प्यार करते थे। जब भी एकात्म मानववाद को दीनदयालजी समझाते, गुरुजी ध्यान से सुनते। १९६५ में मैं संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए नागपुर में था। बंगाल के एक स्वयंसेवक से गुरुजी ने पूछा—किसका बौद्धिक अच्छा लगा। स्वयंसेवक ने कहा, दीनदयालजी का। गुरुजी स्नेहसिक्त वाणी में बोले—उनकी बात मत करो। हमारे बीच वे ही तो प्रचारक और विचारक दोनों हैं।

१९६६ में वाराणसी में आयोजित संघ शिविर में श्रीगुरुजी ने दीनदयालजी के समर्थन में परम आत्मीय व्याख्यान दिया, उन्होंने कहा लोग कहते हैं कि जनसंघ मेरी कृपा कटाक्ष पर जीता है। मैं कहता हूँ, हाँ। जनसंघ का कार्य मैंने एक ऐसे व्यक्ति को दिया, जिसे मैं लौट आने को कहूँ तो वह गंगा नहाएगा और सत्यनारायण की कथा सुनेगा, और फिर कहेगा कि आपने मुझे नर्क जाने से बचा लिया।

दीनदयालजी और अटलबिहारी वाजपेयी के जीवन को संघ समर्पित करने में भाऊराव देवरस का बड़ा हाथ है। एक बार लखनऊ से प्रकाशित ‘राष्ट्र धर्म प्रकाशन’ को घाटे पर चलने के कारण व्यवस्थापकों को बंद करने की सलाह बाबूराव को दी गई। उन्होंने दीनदयालजी से प्रकाशन की स्थिति देखने के लिए कहा।

दीनदयालजी ने बैठक ली। सभी ने बंद करने की सलाह दी। दीनदयालजी ने कहा—बंद करने में समर्थ है। किंतु उन्होंने देखने को कहा, इसका मतलब है कि भाऊराव चाहते हैं कि प्रकाशन चले। दीनदयालजी भारतीय संस्कृति कोष की स्थापना की। धन-संग्रह करके प्रकाशन को चलाया गया।

दीनदयालजी अपने ममेरे भाई से मिलने के लिए आगरा जानेवाले थे। उन्होंने फोन से आने की सूचना दे दी। संयोगवश उन्होंने एक दिन जाने का कार्यक्रम बना लिया। वे अचानक आगरा पहुँच गए। उन्हें देखकर परिवार के लोग रोने लगे। दीनदयालजी चकित थे। उन्होंने पूछा, क्यों रो रहे हो? परिवारजनों ने बताया—आप तो कल आनेवाले थे। जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने रेलवे स्टेशन पर आपके भव्य स्वागत की तैयारी की है।

दीनदयालजी ने कहा—चिंता मत करो। मैं अटलबिहारी वाजपेयी नहीं हूँ। मुझे कोई जानता नहीं। मैं कल दस मिनट पहले स्टेशन पहुँच जाऊँगा। आप मेरा स्वागत वहाँ कर दीजिएगा।

दीनदयालजी के जीवन का एक प्यारा चुटकुला है। मैं स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था। एक सज्जन ने आकर नमस्कार किया। मैंने भी सप्रेम नमस्कार किया। वे सज्जन कुछ देर मेरे पास खड़े रहे। फिर बोले—आपने मुझे पहचाना? पिछले महीने आप मेरे घर आए थे। मैंने न पहचानने के लिए क्षमा माँगी। इतने में उन सज्जन का कोई नेता आया, उन्होंने जोर से उसे पुकारा—अरे भाई, आओ, मिलो, ये संघ के बड़े नेता श्री अटलबिहारी वाजपेयी हैं।

दिल्ली स्टेशन पर कहीं जाने के लिए दीनदयालजी ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। उसी ट्रेन से संघ के कुछ कार्यकर्ता भी जा रहे थे। दीनदयालजी प्रथम श्रेणी में और कार्यकर्ता तृतीय श्रेणी के थे। कार्यकर्ताओं के साथ यात्रा का मोह-संवरण न कर पाने के कारण उन्होंने कहा, मैं भी आप सबके साथ यात्रा करूँगा।

कार्यकर्ताओं ने कहा, तृतीय श्रेणी में भीड़ होती है, घुसना कठिन होता है।

दीनदयालजी ने कहा—आप मुझे खिड़की से खींच लेना। आपने मुझे राजनीति में भेजा है। राजनीति में राजद्वार नहीं मिलता है। वहाँ खिड़की से घुसकर राजद्वार खोलना पड़ता है। सभी कार्यकर्ता हँस पड़े।

अध्यक्ष, रामायण सेंटर

यूनियन पार्क, रॉयल रोड

मॉरीशस

इ-मेल : ramayanacentre@yahoo.com

हमारे संकलन