काल-दंश

काल-दंश

कथा उपनिषद् की है। ऋषि उद्दालक के पुत्र नचिकेता ने यमराज से कई प्रश्न पूछे। उनमें से एक प्रश्न था—‘मृत्यु के बाद जीवात्मा कहाँ जाती है? उसका वास कहाँ होता है? उसका साक्षात्कार किस प्रकार हो सकता है?’

यही प्रश्न-विकलता वासु के मन में जगी थी। वह नचिकेता की तरह प्रवर बुद्धिवाला नहीं था। उसे केवल एक निष्ठुर दृश्य क्रूर मनोयंत्रणा दे रहा था।

‘नानी माँ, नानू को जमीन पर क्यों सुलाया गया है? वे आँखें नहीं खोलते, कुछ भी बोलते नहीं, क्यों?’

निखिला को सांत्वना देनेवाले लोगों का ताँता लगा हुआ, ‘आप शोक नहीं करें, सभी दैहिक पीड़ाओं से मुक्त हो चुके हैं आपके पति!’

‘काल के कठोर दंश से कभी कोई बच पाया है?’

‘यह नश्वर संसार है। हर किसी को सर्वस्व त्यागकर यहाँ से जाना होता है।’

तत्त्वज्ञानी गुरु अपूर्वानंदजी नेत्र बंद किए बैठे हुए—काया क्षरित हुई है। आत्मा निर्लेप है। पद्म परिमल बनी वह चेतना पराचेतना की ओर उन्मुख है।

‘नहीं, कोई परिताप नहीं। उठो, निखिला बिटिया, राजीव के महाप्रयाण की तैयारी करो।’

श्रीमद्भगवद्गीता का उच्चार—नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि...

शास्त्रों के द्वारा काया का वेध हो सकता है, जीवात्मा का नहीं।

शब्दास्त्रों से छलनी किया गया राजीव का सुकुमार शरीर! सुवर्ण-सी दमकती काया हिमशीतल, पीत कमल-सा मुख चिर म्लान...!

राजीव ने बाहरी चमक-दमक और क्षणिक सौंदर्य से कोसों दूर ज्ञान-विज्ञान की दुनिया में परितोष पानेवाले सत्य का समाहार अपने जीवन में किया था—

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः।

धन से आज तक किसी मनुष्य की तृप्ति हुई है भला?

वैभव का अतिरेक मन-प्राणों में मिथ्याभिमान की सड़ाँध उत्पन्न करता है। अयाचित धन मदांध बना देता है। रिश्तों का अनल दाह तो उसी दिन हो गया था, जिस दिन राजीव को उस दुर्वह सत्य का ज्ञान हुआ था।

उपनिषदकार एक बार फिर समक्ष है—सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, अग्नि सबके अस्त होने के पश्चात् आत्मा की ज्योति ही शेष रहती है। उस ज्योति को प्रखर से प्रखरतम बनाना ही जीवन की सिद्धि है।

चरम वैदुष्य से भरा राजीव का परिवार आत्मिक ऊर्जा से संपन्न अध्यवसायी पिता, अहर्निश परिवार की सेवा में जुटी अन्नपूर्णा माई!

ज्ञान-विभव से संपन्न उनके सपनों का नीड़—श्री निकेतन। चेतना को निरंतर विद्या की ऊर्जा से संवलित करनेवाली वह पैतृक आश्रय-स्थली। ग्राम-तिवारीपुर, डाकखाना-दहिवर। रत्नदेव तिवारी की गौरवशाली वंश-परंपरा के प्रकाश-स्तंभ लोकनाथ तिवारी। गुरुपद की गरिमा को द्विगुणित करनेवाले ऋषितुल्य राजीव के पिता।

राजीव का पालन-पोषण गोस्वामी तुलसीदास के स्वर्णिम शब्द-भंडार के बीच हुआ था—

आवत ही हरषे नहीं, नैनन नाहिं स्नेह।

तुलसी तहाँ न जाइए, जहँ कंचन बरसे मेघ॥

विद्याव्यसनी, निरभिमानी प्रकृति के पिता की सौम्य संतान राजीव। शीतल टोले का किराएवाला मकान। छोटकी आजी के कंठ से फूटते सोहर का उछाह बनकर प्रतिध्वनित था—

चइत के रामनवमी

श्रीराम जनम लिहले हो,

ललना, बाजे लागल अवध बधाव,

महल उठे सोहर हो!

खूब गोरा, बड़ी-बड़ी आँखों से पहली बार दुनिया को देखने-परखने की कोशिश करता राजीव।

यह नाम योगेश्वरी आजी ने दिया था, कमल पुष्प की तरह सुकुमार, सलोना है मेरा यह पौत्र! इसे राजीव लोचन कहकर बुलाया जाए।

छोटकी फुआ लहकती-चहकती भावज से इसरार कर बैठी थी—

‘ए भउजी, चान-सुरुज अइसन चमकत-दमकत पूत पवले बाड़ू। हम चाँदी के पाजेब, सोना के करनफूल लेब...।’ सात वर्षीया बड़ी बहन कल्याणी की जिद होती, ‘माई, हम भाई को गोदी में लेंगे, किसी को छूने नहीं देंगे। छोटकी फुआ उसके गाल छूती है। हमें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। इसके गाल मैले हो जाएँगे न।’

माई हँस देती।

‘देखिह बबुनी, सँभार के।’

कल्याणी बड़ी-बूढि़यों सी आश्वस्त करती, ‘हमारे भाई को कुछ नहीं होगा।’

‘हम उसे जमीन पर उतरने देंगे तब न!’

तीनों भाई-बहनों के बीच कहा-सुनी होती, तकरार बढ़ जाती, तब भी राजीव स्थिर बैठे मंद-मंद मुसकराते रहते।

‘छोड़ो न दीदी, सबको अपनी गलती का पछतावा होगा।’

माई की खीझ तत्क्षण तत्क्षण मिसरी घुली हँसी में बदल जाती—

‘बबुनी, किसी जनम का जोगी-जती है तुम्हारा यह मँझला भाई। चलो, इसकी रोटी का इंतजाम करना है।’

राजीव विद्यालय का पाठ पूरा करने में लगे रहते। माई दरवाजे पर खड़ी आवाज लगाती—‘ए बबुआ, कब से हँकार लग रही है। भूख-प्यास नहीं लगी? सब आकर थाली-कटोरा पीटते हैं। एक तुम हो कि कितबियन संग मगजमारी करते रहते हो। कभी किसी चीज की फरमाइश नहीं। कवन माटी के बने हो बचवा?’

नवरात्र-पूजन के लिए गाँव से विजयानंदजी बुलाए जाते।

भाई-बहनों का जन्मांगचक्र उनके सामने रखा जाता। योगेश्वरी आजी की तत्परता देखने योग्य होती। राजीव की शनि दशा चल रही है, कम-से-कम सतहत्तर हजार वैदिक मंत्र से जप अभीष्ट है। शेष कार्य हम निपटा लेंगी।

महाराजजी का प्रथम आदेश कल्याणी के लिए होता—‘बचिया, भाई को नहला-धुलाकर साथ ले चलना होगा। हम पूजन सामग्री लिए आते हैं। शिवालय में संकल्प होगा।’

माई आश्वस्त हो जाती, ‘अब सब संकट शिवजी हर ली हैं, हमार राजीव बबुआ अजर-अमर होइहें।’

राजीव हँसते थे, ‘दीदी, वह दोहा तुमने पढ़ा है न, आए हैं सो जाएँगे। मेरी हिंदी पाठ्य-पुस्तक में पूरा दोहा लिखा है। माई को पढ़कर सुना दो।’

गुरु अपूर्वानंद के निर्देशानुसार महाप्रयाण की तैयारी पूरी हो चुकी है। रचना सुमन का आर्तनाद—

‘पापा, आप कहाँ चले गए? यह क्या हो गया?’

प्रसिद्ध जीवविज्ञानी राजीव, चरक, सुश्रुत संहिताओं का ज्ञान रखनेवाले राजीव! देह-विवर में प्रविष्ट काल-व्याधि का पूर्वानुमान लगाते राजीव!

‘निखिला, मेरी माई इसी सांघातिक रोग से जूझती असमय चली गई थी। तुम घबराना मत, मैं भी अंतिम साँस तक पराभव स्वीकार नहीं करूँगा।’

मुंबई का सुप्रसिद्ध कैंसर चिकित्सालय। पाँच वर्ष से लेकर पचासी वर्ष तक की रुग्ण कायावाली मानवता का आर्तनाद।

यंत्रणादायी चिकित्सा प्रविधि! पहियोंवाली कुरसी पर जाँचघर की ओर जाते राजीव ने निखिला से परिहास करना चाहा था—

‘घबराओ नहीं, हम अकेले नहीं हैं। इस लंबी कतार को देखो, नानक दुनिया सब संसार।’

किस प्रकार आत्मस्थ होते चले गए थे राजीव!

‘रक्त कैंसर। धन लेवा, जान लेवा यह रोग...। कहाँ से जुटा पाएँगे इतनी धनराशि?’

मुंबई एयरपोर्ट से खुराना अतिथिशाला और अस्पताल तक का व्ययकारी सफर। निखिला का रोम-रोम प्रार्थनामय था—‘हे सिद्धिविनायक, मंगल करें। मुंबामाई, मेरे सुहाग की रक्षा करना, माँ।’

निखिला के छोटे भाई ने स्मरण दिलाया था—‘आपकी छोटी ननद यहीं घाटकोपर में रहती है, न दीदी?’

सप्ताह भर बाद रागिनी भाई-भावज से मिलने अतिथिशाला में आई थी। सरकारी तेल कंपनी में उच्च पदस्थ अधिकारी नीलेश राज ने छूटते ही व्यंग्य किया था—

‘क्या राजीवजी, रह गए आप भी दो कौड़ी के प्राध्यापक ही। इस छोटी सी चाल में आप लोग कैसे रह रहे हैं? हमें बताया होता, हमारे बँगले में एक कमरा आप दोनों के लिए रिजर्व था। रही बात आपके दामाद और साले साहब की, तो ये दोनों प्राणी हमारे आउट हाउस में एडजस्ट हो जाते।’

बचपन वाली निर्लेप मुसकान राजीव का रक्षाकवच बनी हुई थी।

‘निखिला, इस समय हम आपदाग्रस्त हैं। कोई आक्रोश नहीं, किसी से कोई उपालंभ भी नहीं। बाबूजी कहा करते थे—धीरज, धरम, मित्र अरु नारी, आपातकाल परखिए चारी। यों कातर मत हो। तुम मेरी शक्ति हो। हमें दृढतापूर्वक इस व्याधि से लड़ना होगा।’

चिकित्सालय के कैंसर विशेषज्ञ डॉ. नवीन ने परामर्श दिया—‘डॉ. राजीव, आप विज्ञान के विद्यार्थी हैं। आशा है, मेरी किसी भी बात को अन्यथा नहीं लेंगे। कीमो चिकित्सा झेल सको, ऐसी आपकी शरीर दशा नहीं है। आप घर जाएँ और...’

मरण-पीड़ा की गहनता के भीतर से उपजा असीम धैर्य भाव—‘धन्यवाद, डॉक्टर साहब। मेरे पिता असाध्य रोगों का उपचार होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति से किया करते थे। अंततः यही एक निदान दिखाई पड़ रहा है। चलो निखिला, घर चलें।’

निखिला रो पड़ी थी—‘यहाँ के लोग डॉ. भदानी का नाम ले रहे हैं। एक दिन रुक जाते तो उनसे भी...’

‘कोई लाभ नहीं है।’

‘एक बार...’

‘तुम्हारी जिद है तो ठीक है।’

डॉ. भदानी के आलीशान नर्सिंग होम में बैठे राजीव का मन वृंदावन में बना हुआ था—‘हे नाथ, करुणासिंधो दीन बंधु कृपां कुरु... श्री कृष्ण एव शरणं मम।’

धन-क्रीड़ा की महानगरी में कुशल कारोबारी की तरह डॉ. भदानी उनके समक्ष थे।

‘किसने कह दिया कि कीमोथेरैपी आपके लिए अनुकूल नहीं होगी। फीस जमा करें और भरती होने की प्रक्रिया पूरी कर लें।’

राजीव ने नरमी से प्रश्न पूछा था, ‘सर, कृपया यह बताएँ कि इस प्रयोग के बाद मेरे जीवित रहने का संयोग कितना होगा?’

डॉक्टर की उपेक्षा भरी दृष्टि दुस्सह थी—‘यह कैसे बताया जा सकता है?’

निखिला पति का इंगित समझ गई थी—‘चलो।’

उसने अंतिम प्रयास किया था—‘डॉक्टर साहब, कोई दवा...?’

डॉ. भदानी उदासीन भाव से आगे गढ़ गए थे।

मेटेरिया मेडिका के पृष्ठों से अपना नाता जोड़ लिया था राजीव ने। महर्षि हैनिमन की मधुर चिकित्सा प्रणाली का आश्रय लेकर ही उनके पिता ने अपनी संतानों को स्वस्थ व सबल बनाया था।

निखिला को अच्छी तरह स्मरण था। सासु माई अपने खीझ भरे गरवीले स्वर में कहा करती—‘तुम्हारे ये जो ससुर हैं न, सिर से पैर तक पक्के औढरदानी। होमियोपैथी की शीशियाँ ऐसे बाँटते हैं कि पूछो मत। कहते हैं कि नौकरी से छुटकारा पाने के बाद अपनी डिस्पेंसरी खोलेंगे, गरीब-गुरबा का मुफ्त इलाज करेंगे।’

निखिला अपनी सासु माई की लाड़ली बहुरिया थी।

राजीव हँसकर चुटकी लिया करते—‘तुमने मेरी माई का मन चुरा लिया है। तुम्हारी अम्माँ ने सबका मन लुभाने की विद्या बचपन में ही सिखा दी थी?’

निखिला की माँ ऐसे देवोपम दामाद को पाकर निहाल थीं—‘कजरौटा ले आव लोगनि, बबुआ के कवनो कुदीठ ना लागे।’

निखिला इकलौती बिटिया थी। अगुवाई करने आए अर्जुनदेव शास्त्री के समक्ष राजीव के पिता ने संशय व्यक्त किया था।

‘हमारा अध्ययन, अध्यापन का अध्यवसाय है। हम सरस्वती के उपासक हैं। पुलिसिया महकमे में पली बालिका हमारे घर में अपने आप को व्यवस्थित कर पाएगी?’

करबद्ध प्रार्थनारत निखिला के पुलिस अधिकारी पिता समक्ष थे—‘मेरी बेटी आपके परिवार की कसौटी पर अक्षरशः खरी उतरेगी। इसकी महतारी ने इसे सर्वगुण संपन्न बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।’

विजयानंद पुरोहितजी गाँव से बुलाए गए थे। उनकी पोथी खुली रह गई थी—‘ए बच्चा बाबू, छत्तीस गुणों की मैत्री देख रहा हूँ। अद्भुत मिलान है, जातक-जातिका की जन्म कुंडलियों का। अब विलंब केहि कारन...?’

राजीव का कक्ष भीतर से बंद था।

माई ने धीरे से साँकल बजाई थी—‘ए बबुआ, बरतुहार लोग आए हैं, तुम्हें नीचे...’

वह एकबारगी असहज हो उठे थे। यह मेरा संघर्षकाल है, अभी लंबी पढ़ाई बाकी है। रासबिहारी उनके निकट आकर बैठ गए थे। ‘आपको कोई बाधा नहीं होगी बबुआजी, आपका एक संकेत हमारी बच्ची के लिए आदेश होगा।’

आनन-फानन में सभी औपचारिकताएँ पूरी कर ली गई थीं। गोपाली चौक से पान, सुपारी, नारियल, आरण्य देवी की लाल चुनरी और वर रक्षा की रस्म पूरी। दूसरे दिन माई-बाबूजी होनेवाली पुतोहू की मुँह दिखाई कर आए थे।

माई की पुलक मिसराइन काकी के आगे उजागर थी और अपनी शशक टोली को गाजर-मूली खिलाते राजीव का रोम-रोम श्रवणमय था।

‘काकीजी, अपने राजीव के लिए ऐसी ही कनिया की खोज थी, जैसे सुन्न, सुभेरव हमारे बबुआ, वैसी ही सोन-पुतरी सी कनिया, सुकुमार, सुलच्छनी।’

निखिला के साथ राजीव का पहला संवाद था, ‘अत्यंत स्वाभिमानी शिक्षक पिता की संतान हैं, हम सब भाई-बहन। आपको भी इस घर की मर्यादा का निर्वाह करना होगा।

‘.... ... ...’

‘मेरी माई ने बहुत कष्ट सहे हैं, उनकी छाया बनकर रहना होगा।’

‘.... ... ...’

मेरे बाबूजी का अध्यवसाय देखा न, उनकी शिष्य मंडली, उनके बंधु-बांधवों, समस्त गुरुजनों की आश्रय-स्थली है हमारा यह श्री निकेतन। माई की तरह ही अतिथि-सत्कार में पारंगत होना होगा।

‘.... ... ...’

‘हमारी छोटी बहन रेवा अपरिपक्व मस्तिष्क वाली बालिका है। नन्हे शिशु की तरह उसका पालन-पोषण करना होगा।’

‘.... ... ...’

निखिला का दत्तचित्त मौन और राजीव की झुँझलाहट, ‘मैं बकवास कर रहा हूँ क्या? तुमने कुछ सुना भी?’

दूधिया दाँत, मद्धिम प्रकाश में अपनी चमक दिखलाते कौतुकी हो उठे थे—‘सुनिए जी, हमने सब समझ-बूझ लिया। जो कुछ अभी आपने सुनाया न, वह सब हमारी अम्माँ ने पहले ही बता दिया है। अब आप अपने खरगोशों को बिछावन से नीचे उतारेंगे। हमें नींद आ रही है, सुबह जल्दी उठना भी है।’

माई प्रफुल्लित थी।

‘अभी तो भोर के चार बजे हैं। अभी उठ गई कनिया?’

‘माई, आप हटिए न। तरकारी हमें काटने दीजिए।’

घर-गृहस्थी के छोटे-बडे़ कामों के साथ निखिला ने श्री निकेतन के विशाल ग्रंथागार को सहेजने का दायित्व उठा लिया था।

सास के सामने उसकी वह मनुहार, ‘माई, हम अपनी पढ़ाई पूरी करेंगी।’ बाबूजी की ओर से सहर्ष अनुमति थी।

‘अवश्य! तुम अपनी परीक्षा की तैयारी करो बहू, राजीव का साहित्य पक्ष भी सशक्त है, वह तुम्हारी मदद करेंगे।’

यदा-कदा राजीव चुहल की भंगिमा में होते—‘थाना, पुलिस, कैदी, हाजत, चोर, डकैत, गिरहकट; इस शब्दावली को सुनकर बड़ी हुई हो। सूर, तुलसी, कबीर को पढ़ा-गुना है? निराला, महादेवी को निकट से जाना है कभी?

‘.... ... ...’

‘नहीं न? तो एक बात अचछी तरह जान लो, हमारा यह घर साहित्य-तीर्थ है। माई का मौन समर्पण और बाबूजी की अनहद शब्द-साधना। इन दोनों को आत्मसात् कर सको तो जीवन धन्य हो जाएगा।’

राजीव के मुँह से निकला हर शब्द निखिला के लिए पावन मंत्र था।

विजयानंदजी नवरात्र संपन्न कराने के लिए आते और सबके सामने निखिला की प्रशंसा के पुल बाँध देते—‘साबुदाने की ऐसी खीर मैंने कहीं नहीं खाई। बच्चा बाबू, आपकी यह पुतोहू साक्षात् अन्नपूर्णा है।’ बाबूजी का आह्लाद अपनी चरमसीमा पर होता।

‘अपनी बहू को विद्या-निपुण बनाना है भाई, साहित्य में इसकी विशेष अभिरुचि है, इसे एम.ए., पी-एच.डी. करानी है।’

माई का आदेश था, ‘रसोई-पानी से तुम्हारी छुट्टी, दिन-रात पढ़ाई में जुट जाओ। फर्स्ट क्लास लाओगी, तभी हमको संतोष होगा।’

निखिला सास की प्राण-पुतली बन चुकी थी।

अकसर अपनी अम्माँ से कहा करती, ‘ऐसी गौरी सास भगवान् सबको दें।’

पंद्रह वर्षीया रेवा का अबोध बालपन—‘भाभी, तुम हमको छोड़कर कहीं नहीं जाओगी न?’

राजीव की पहली नियुक्ति राँची के एक महाविद्यालय में हुई थी।

निखिला जार-बेजार रो पड़ी थी, ‘हमें श्री निकेतन से दूर कहीं नहीं जाना। माई-बाबूजी को छोड़कर कतई नहीं।’

माई ने असीम धैर्य का परिचय दिया था, ‘सुनो बहू, राजीव बाहरी भोजन नहीं खा सकते। तुम हमारी चिंता छोड़ो। चुपचाप राँची जाने की तैयारी करो।’

मोराबादी के छोटे से किराएवाले मकान में शुक-सारिका का नीड़ सजा था। पुराना वेस्पा स्कूटर, विज्ञान की पोथियों से भरा थैला और नए शिक्षक के स्वागत में चहकते विद्यार्थीगण।

पारिजात सी सुगंध भरी निखिला की गृहस्थी, रचना-सुमन, राजीव की दो नन्हीं प्रतिकृतियाँ, जीवन एक सुंदर विभव सा।

तभी वह दुस्सह संवाद मिला था—माई नहीं रहीं।

सुंदरकांड के विरहविकल राम की चेतना बाबूजी के भीतर समा गई।

कुवलय, बिपिन कुंत बन सरिसा।

बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥

जे हित रहे, करइ तेइ पीरा।

ऐसा भयावह विछोह! प्रबुद्धता के अनंत विस्तार का यंत्रणा-विवर में सिमटकर रह जाना।

राजीव निखिला की प्रार्थना अश्रु-ज्वार में विलीन हो गई थी।

‘तुम्हारी माई चली गई, रेवा का दाय मुझ पर छोड़ गईं, इस अबोध जीवात्मा के माता-पिता की भूमिका मुझे निभानी है।’

राजीव अनुमान की आँखों से सबकुछ देख रहे थे।

बाबूजी के पत्रों से श्री निकेतन के बदलते हुए परिवेश का अनुभव होने लगा था।

‘इस घर का सारा पुण्य अपने साथ समेटकर तुम्हारी माई चली गई। मेरी सेवा-निवृत्ति और उनकी चिर विदाई, दोनों एक साथ। अब जीवन पराश्रित हो चुका है। मैं स्वयंपाकी नहीं बन सका, तुम्हारी माई के हाथ की बनी स्वादिष्ट रसोई ने मुझे यह अवसर कहाँ दिया। निखिला बहू यहाँ होती तो...’

विजयानंद पुरोहित के बेटे नंदलाल राँची आए थे। अपने स्वाभिमानी पिता के घोर एकाकीपन और घर-आँगन की उच्छेद कथा सुनकर राजीव-निखिला ने श्री निकेतन जाने का निश्चय किया था।

वह घर श्री विहीन हो चुका था। बाबूजी का दीर्घ सधित मौन आँसुओं में मुखर था, ‘मैं पराश्रित हो चुका हूँ। अब जीने का कोई अर्थ नहीं रह गया, राजीव बेटे। तुम्हारी माई समय रहते चली गई, यह अच्छा हुआ। कैसे सहन कर पाती वह?’

राजीव ने कुछ पूछना चाहा था, ऐन वक्त पर नव्य गृहस्वामिनी ने ससुर के कक्ष में पदार्पण किया था।

‘कब से भोजन तैयार है। कितनी बार आवाज लगाई, तब आना पड़ा। फिर मत कहिएगा कि रोटी ठंडी हो गई।’

निखिला ने टोकना चाहा था, ‘रेवा बिना खाए सो गई है। दोपहर में भी उसने खाना नहीं खाया था।’

रसोईघर में बरतनों की खट-पट के बीच रवीना बहू की झल्लाहट स्पष्ट सुनी जा सकती थी—

‘दो दिनों के लिए क्या आए, इन दोनों ने नाक में दम कर दिया। ऐसा ही मोह-छोह है तो ले क्यों नहीं जाते इन दोनों को अपने साथ।’

राजीव हतप्रभ थे। पाँच वर्षों के भीतर घर का ऐसा निर्मम परिवेश। रिक्त हस्त बाबूजी और दुरभिसंधि रचते हुए रक्त-संबंधों का नाग-दंश।

मस्तिष्क-स्राव की दाहक दशा, रक्तचाप का भारी तनाव, आकाशगंगा की दूधिया तरंग सी बाबूजी की हँसी न जाने किस शून्य में सिमट गई थी।

वाणी रहित, किंतु मौन इंगित से वह दुस्सह कथा कहते हुए—

‘रेवा की सुरक्षा के एवज में श्री निकेतन दे दिया। तुम दोनों का अपराधी हूँ। हो सके तो क्षमा कर देना।’ कुछ भी समझना शेष नहीं रह गया था। विघटनवादी प्रपंच के शिकार, मस्तिष्क-शिराओं की दर्द भरी ऐंठन का सारा खिंचाव आँखों में समेटकर बाबूजी शांत हो गए थे।

बाबूजी के श्राद्ध का दिन, श्री निकेतन से राजीव-निखिला की अंतिम विदाई का दिन।

‘माई-बाबूजी चले गए। घर की सुख-शांति भी चली गई। इस पैतृक घर से हमारा दाना-पानी हमेशा के लिए उठ गया।’

बाबूजी की चिता का अनलदाह राजीव की चेतना का अंतर्दाह बनकर रह गया था।

होमियोपैथी के जाने-माने चिकित्सक डॉ. त्रिखा ने दो टूक शब्दों में प्रश्न किया था—‘ऐसी सांघातिक बीमारियों का सीधा संबंध शारीरिक व मानसिक तनाव से भी हुआ करता है। राजीव, आप निहायत भाव-प्रवण इनसान हैं। आपको किसी भी प्रकार के अवसाद से बचना होगा। जीवनीशक्ति बनाए रखें, मैं आपके लिए प्रार्थना करूँगा।’

अभिशप्त पितृत्व का दुस्सह भार अपनी चेतना में धारते बाबूजी की वेदना, विकल आँखों का पथरायापन राजीव के भीतर अमिट हो चुका था। संसार की समस्त कटुता को अपनी हासोज्ज्वल छवि से क्षणमात्र में विस्मृत करनेवाले उस महामानव ने अपने ही घर में पराजय पाई थी।

राजीव का जीवन ओषधियों का अनुगत बनकर रह गया था। सिनॉथस क्यू, आर्सेनिक एल्ब, माइरिका, लेसिथिन, आर्स आयड, मिलफोलियम क्यू...

निखिला अनार का रस बनातीं, राजीव ठठाकर हँस पड़ते, ‘कभी नियमित रूप से फल, दूध का सेवन किया नहीं, इस रोग ने मुझे शुद्ध फलाहारी बना दिया। देवघर के प्रमुख पंडाजी ने गणना की थी, शनि का मार्केश है। विशेष शिवाराधना का अनुकूल परिणाम होगा।’

राजीव का वह हृदय विदारक हास, ‘मेरी माई ने मेरे लिए अखंड व्रत-उपवास किया था पंडितजी। अब कोई जप-तप नहीं। डॉ. त्रिखा ने ठीक पहचाना है। रक्त-संबंध की प्रवंचना ही मेरे इस रोग का प्रयोजन है। मैं निर्लिप्त भाव से गोविंद की शरण में जाना चाहता हूँ।’

चिकित्सक हैरान थे, किसी भी दवा का कोई असर नहीं। नित्य नए उपसर्गों का उभार...।

निखिला ने विनती की थी, ‘चलिए, हम लोग कहीं और चलते हैं।’

राजीव अनायास गंभीर हो गए थे, ‘अब कहीं नहीं जाना। तुम अपनी देवी माँ से इतना निवेदन कर सकती हो, मुझे वेदना रहित सहज मृत्यु का वरदान चाहिए।’

निखिला की वह आर्त पुकार, ‘आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? मेरे लिए क्यों नहीं सोचते? आपको ठीक होना होगा।’

राजीव के नीलोत्पल नयन प्राणप्रिया भार्या के आँसुओं की तरलता में डूब गए थे—‘तुम्हारे लिए यह छोटा सा घरौंदा है न पारिजात। तुम यहीं रहोगी और मैं? मैं भी तुम्हारे आस-पास ही रहूँगा न।’

एक अघोषित अनुभूति और राजीव का चिर मौन, ‘मैं कहीं जाऊँगा नहीं, इसी पारिजात में मेरा अधिवास होगा।’

उपनिषदों के अध्येता, विज्ञानवेत्ता डॉ. राजीव की आत्मा को मुक्ति पथ की ओर ले जाने के निमित्त अनुष्ठान प्रारंभ किया जा चुका है।

तिलोदक लिये नन्हा दौहित्र वासु सम्मुख है—

ॐ नमो वः पितरो रसाय...

बालक की मनोदशा चक्रवात में फँसे नरम-नाजुक पंखों वाले पाखी सी है।

उसका रुदन एक बार फिर प्रश्न बनकर फूटता है, ‘नानी माँ, नानू को किसने मारा? मुझे बताओ, मैं उसे छोड़ूँगा नहीं।’

अशरीरी  चेतना का निस्सीम राग पारिजात के कण-कण में स्पंदित है।

यह रक्त कैंसर नहीं, मेरे रक्त-संबंधों का काल-दंश है। स्वार्थ के विषदाह से मुक्ति पाने के लिए यह अनलदाह ही वरेण्य था। समस्त बंधुवादी संज्ञाओं का विस्मरण मेरी देह-व्याधि का एकमात्र निदान।

अंततः यही उपचार मेरी नियति थी।

ॐ शांति, शांति, शांतिः॥

मोराबादी-८४३००८,

राँची

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