शब्दों की भाव-समाधि जैसी हैं स्वामी विवेकानंद की कविताएँ

शब्दों की भाव-समाधि जैसी हैं स्वामी विवेकानंद की कविताएँ

स्वामी विवेकानंद के बारे में अगर एक पंक्ति में कहना हो, तो कहा जा सकता है कि उनका व्यक्तित्व शक्तिमय था। एक गहरा, निर्बंध आवेग लिये हुए। आकाश और दिशाओं को बिजलियों की तरह कँपाता एक शक्ति का स्रोत था उनके भीतर, जो एक साथ हजारों हृदयों को मथ देता था। उनके इस प्रभाव से असंपृक्त रह पाना कठिन था। यहाँ तक कि जो निंदा या उपहास के भाव से उनके निकट आए, वे भी कब मन की सारी मलिनता भुलाकर उनके अपने हो गए, इसका खुद उन्हें ही पता न चलता था। और देश-दुनिया में ऐसे तो अनगिनत लोग थे, जिन्होंने अपना समूचा जीवन इस महान् संन्यासी के महत् कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें महसूस हुआ कि इस चुंबकीय व्यक्तित्व के स्पर्श से उनका मानो पुनर्जन्म हुआ है, और उन्हें जीने का एक नया अर्थ मिल गया।

यह स्वामी विवेकानंद का आध्यात्मिक शक्ति से मंडित, निर्भीक और तेजोदीप्त व्यक्तित्व ही था, जिसने गुलामी की जंजीरों में जकड़ी भारत की दीन-दुखी जनता में एक नई शक्ति का संचार कर दिया। और इस शक्ति के केंद्र में था उनका भावावेगमय हृदय, जिसके भीतर से ऊर्जा का अनवरत विकिरण होता था। उनकी बातों और व्याख्यानों के रूप में। उनके शब्द-शब्द से मानो कविता फूटती थी। उन्हें पढ़ते हुए लगता है, जैसे उनके भीतर हर वक्त एक ऊर्जा-भट्ठी जलती थी। इसलिए अपने रोजमर्रा के जीवन में वे जो कुछ भी कहते, वह काव्यमय था। उनका हर कथन, चिंतन, बोलचाल की भंगिमा, सबमें एक विदेह कवि का वास था। उनके निकट के सभी लोगों ने यह अनुभव किया कि उनका समूचा व्यक्तित्व जितना लोकोत्तर था, उतना ही काव्यमय भी।

सच तो यह है कि विवेकानंद ने कवि हृदय पाया था, जिसकी बानगी उनकी कई सुंदर और अद्वितीय कविताओं के साथ-साथ उनके व्याख्यानों में भी देखने को मिलती है, जिनमें उन्होंने मानो अपना हृदय उँड़ेल दिया है। चाहे वे भारत की हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान व अध्यात्म की परंपरा और वेदांत के बारे में बोल रहे हों या वर्तमान भारत की घोर गरीबी, जातिगत उत्पीड़न, भेदभाव और छिछले धार्मिक अंधविश्वासों पर, या फिर विदेशी धन के बल पर धोखे से भारत की गरीब और भोली-भाली जनता का धर्मांतरण कर रहे चालाक पादरियों के षड्यंत्र पर, उनके शब्द भावनाओं के किसी वेगवान झरने की तरह फूट पड़ते हैं। और उनका सच्चा, निर्मल आवेग खुद-ब-खुद उन्हें कविताओं के रूप में ढाल देता है। इसी काव्य-रस के कारण उनके व्याख्यान सीधे दिल में उतरते हैं और मन को आंदोलित कर देते हैं। देर तक मन पर उनका प्रभाव छाया रहता है। कभी-कभी तो अवाक् कर देने की हद तक। आज पुस्तकों में उन्हें पढ़ते हुए हम जैसी भावनात्मक थरथराहट महसूस करते हैं, उससे कल्पना की जा सकती है कि उन्हें सुननेवाले किस तरह के गहरे चमत्कारिक प्रभाव से गुजरे होंगे।

यही कारण है कि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और रामविलास शर्मा सरीखे हिंदी साहित्य के बड़े कवियों ने स्वामी विवेकानंद की कविताओं से आकर्षित होकर उनके अनुवाद में गहरी रुचि ली। निराला और पंत द्वारा अनूदित विवेकानंद की कविताओं को पढ़ते हुए लगता है, मानो उसमें स्वामी विवेकानंद की भावाकुलता में निराला और पंत के हृदय का आलोड़न भी आकर मिल गया हो। यह भी एक पावन संगम ही है, एक साथ कई महा नदियों का संगम। इसलिए इन कविताओं के हिंदी अनुवाद को पढ़ने का आनंद ही कुछ और है।

इस संबंध में निरालाजी से जुड़ा एक प्रसंग स्वयं रामविलासजी से सुनने का सौभाग्य मुझे मिला। हुआ यह कि निरालाजी ने, जो स्वामी विवेकानंद के वेदांत से बहुत प्रभावित थे, उनके बहुत से व्याख्यानों के साथ-साथ उनकी कविताओं के अनुवाद का भी बीड़ा उठाया। पर विवेकानंद की महावेग में बहती कविताओं का अनुवाद खुद किसी चुनौती से कम न था। निरालाजी उन कविताओं का जो अनुवाद करते, वह समय-समय पर रामविलासजी को भी सुनाया करते थे और रामविलास मुग्ध होकर उन्हें सुनते। पर स्वामी विवेकानंद की एक कविता का अनुवाद करने में निराला को दिक्कत आ रही थी। उन्होंने दो-तीन बार कोशिश की, पर अपने अनुवाद से वे स्वयं ही संतुष्ट नहीं हुए। आखिर खीजकर उन्होंने कहा, ‘डॉक्टर, इस कविता में इतने जटिल भाव हैं कि मुझे लगता है, हिंदी में इसका अनुवाद हो ही नहीं सकता।’ डॉ. रामविलास शर्मा ने इसे एक चुनौती की तरह लिया, और अनुवाद में जुट गए। उन्होंने अत्यंत प्रवाहमय भाषा में स्वामी विवेकानंद की कविता का इतना सुंदर अनुवाद किया कि स्वयं निराला ने मुग्ध होकर उनकी प्रशंसा की।

इससे समझ में आता है कि स्वामी विवेकानंद सिर्फ एक आध्यात्मिक शख्सियत ही नहीं थे, बल्कि वे इससे बड़े, बहुत बड़े थे। उन्हें एक शक्तिमय और आभामंडित व्यक्तित्व मिला था, जिसमें से हुए ऊर्जा-प्रवाह ने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया। साहित्य को भी, और कविता को विशेषकर। उनका आवेग एक गरजते हुए महासिंधु की तरह किसी के बाँधे बँधता न था। इसलिए उनकी कविताएँ हिंदी के बड़े-बड़े महारथियों को चुनौती देती कविताएँ हैं, जिनके अनुवाद के लिए हिंदी के बड़े और दिग्गज कवियों ने सहर्ष अपनी सेवाएँ दीं।

मैं समझता हूँ, अपने लिखे से साहित्य और साहित्यकारों को इस तरह की चुनौती देनेवाली कोई और शख्सियत हमारे यहाँ नहीं है। हाँ, कुछ बाद में चलकर महात्मा गांधी आए और उन्होंने प्रेमचंद समेत हिंदी के बहुत से साहित्यकारों को प्रभावित किया। पर उनका अपना लिखा हुआ ही साहित्य और साहित्यकारों के लिए अभिव्यक्ति की चुनौती बन जाए, ऐसा शायद नहीं हुआ।

कविताओं में हलचल भरे हृदय की छाप

विवेकानंद को महासमाधि लिये आज सौ बरस से अधिक हो गए, पर केवल इस देश में ही नहीं, बल्कि विश्वहृदय में उनके शब्दों की गूँज अब भी सुनाई देती है, इसका कारण वह कविता ही है, जो उनके शब्दों में एक बिल्कुल अलग तरह का आत्मिक आवेग भर देती है। कविता की सबसे बड़ी शक्ति है कि वह सुनते ही सीधे दिल में उतर जाती है। विवेकानंद के व्याख्यान भी ऐसे ही हैं, जो सुनते ही आपके भीतर गूँज पर गूँज पैदा करते हैं और हमेशा के लिए आपकी स्मृति में गड़ जाते हैं। कविता का दूसरा बड़ा गुण है, अद्वितीयता। उसे सुनते हुए लगे कि यह बात तो इस तरह हम पहली बार सुन रहे हैं। विवेकानंद के व्याख्यानों में भी यही अद्वितीयता है, जो उन्हें बार-बार पढ़ने को बाध्य करती है।

पर यही नहीं, सौभाग्य से विवेकानंद ने अपनी भावमग्न दशा को व्यंजित करनेवाली कई सुंदर कविताएँ भी लिखी हैं। ऐसी कविताएँ जो वही लिख सकते थे, और उनमें उनके गहरे हलचल भरे हृदय की छाप है। साथ ही उनकी लंबी गैरिक साधना का तप भी। विवेकानंद ने छोटी-बड़ी कई कविताएँ लिखीं, पर उनमें तीन कविताओं ‘संन्यासी का गीत’, ‘मेरा खेल खत्म हुआ’ और ‘नाचे उस पर श्यामा’ की बहुत चर्चा होती है। इसके अलावा उनकी ‘समाधि’, ‘जाग्रत देवता’, ‘शांति’, ‘प्याला’ और ‘मुक्ति’ भी बहुत सुंदर कविताएँ हैं, जिनमें उनके भीतर के गहरे आत्मिक द्वंद्व, तीव्र मुक्ति-कामना और उदात्त भावों की झलक देखी जा सकती है।

स्वामीजी की ज्यादातर कविताएँ मूल रूप में अंग्रेजी में लिखी गईं, बाद में उनका हिंदी में अनुवाद हुआ। कुछ कविताएँ बँगला में भी लिखी गईं, जो बाद में अनूदित होकर हिंदी में आईं। पर झरने की तरह बहते कविता के शब्दों में अपनी तीव्रतम आभ्यंतरिक हलचल पिरो देने वाले विवेकानंद अंग्रेजी में लिखें या बँगला में, ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। कविताओं के शब्द-शब्द में उनका हृदय बहा आता है और उसके संवेग को सँभालना पाठक के लिए कठिन हो जाता है। यहाँ तक कि हिंदी में अनूदित उन कविताओं को पढ़ने पर भी, पाठक का हृदय एक गहरे शक्तिपात का अनुभव करता है।

स्वामी विवेकानंद की कविताओं में ‘संन्यासी का गीत’ बहुत प्रसिद्ध कविता है, जिसमें उनका समूचा व्यक्तित्व और चिंतन बहुत सघन रूप में सामने आता है। इसे उन्होंने जुलाई, १८९५ में न्यूयॉर्क के थाउजेंड आइलैंड पार्क में लिखा था। कविता मूल रूप में अंग्रेजी में लिखी गई थी और उसे लिखा जाना एक घटना थी। स्वामीजी अपने कुछ प्रिय शिष्यों के साथ कुछ समय के लिए वहाँ रहे थे। उस दौरान वह सुरम्य स्थल मानो गुरु और शिष्यों की गहन आध्यात्मिक अनुभूतियों का आश्रम बन गया। वहाँ के सुंदर प्राकृतिक सौंदर्य के बीच निरंतर गुरु और शिष्यों का निराला आध्यात्मिक संवाद चलता रहा, जिसमें उनके कुछ शिष्यों को तो यीशु की झलक दिखाई दी। गहरी जिज्ञासाएँ और समाधान। यह स्वामीजी के अमेरिकी शिष्यों के लिए एक विरल और कभी न भूलने वाला अनुभव था। स्वयं विवेकानंद मानो एक लोकोत्तर अनुभव से गुजर रहे थे।

वहीं शिष्यों से गहन आध्यात्मिक संवाद के बीच अचानक स्वामीजी कुछ समय के लिए वहाँ से चले गए। उसी समय उन्होंने यह विलक्षण आवेगपूर्ण कविता ‘संन्यासी का गीत’ लिखी, जिसमें एक संन्यासी के रूप में उनके कठिन आदर्शों की एक झाँकी बड़े सुंदर और सघन रूप में सामने आती है—

छेड़ो हे वह तान, अनंतोद्भव अबंध वह गान,

विश्व-ताप से शून्य गह्वरों में गिरि के अम्लान,

निभृत अरण्य प्रदेशों में जिसका शुचि जन्मस्थान,

जिनकी शांति न कनक काम, यश, लिप्सा का निश्वास

भंग कर सका, जहाँ प्रवाहित चित का अविलास

स्रोतस्विनी उमड़ता जिसमें वह आनंद अयास

गाओ बढ़ वह गान, वीर संन्यासी, गूँजे व्योम।

ओम तत्सत ओम।

कविता की ये पंक्तियाँ लगता है, जैसे किसी अरण्य में गूँजती हजारों बरस पुरानी यज्ञ और आहुति की ध्वनियाँ हमारे कानों में पड़कर हमें विकल कर रही हों। क्योंकि ये केवल ध्वनियाँ ही नहीं हैं, उनके भीतर एक स्रोतस्विनी का उमड़ता हुआ आवेग और आनंद भी है। और मुक्तिबोध से शब्द उधार लें, तो ‘एक पुकारती हुई पुकार’ है इसमें! पूरी कविता में यही गूँज, यही पुकार है।

कविता आगे और गहनतम होती जाती है। एक संन्यासी का जीवन निभृत अरण्य प्रदेशों की महाशांति में गूँजते किसी अलौकिक गान की तरह है, जिससे दिशाएँ गूँज उठती हैं और जिसका आनंद भीतर समाता नहीं है। विश्व-ताप से शून्य गिरि गह्वरों में उस अलौकिक गान, उस आनंद का जन्मस्थान बताते हैं। आगे विवेकानंद उस मुक्ति की व्यर्थता की बात करते हैं, जिसकी तलाश में हमारा पूरा जीवन चला जाता है। सच तो यह है कि हम माया के बंधनों से मुक्त हो ही कैसे सकते हैं, जबकि खुद हमने अपने हाथों से पाश को पकड़ रखा है—

कहाँ खोजते उसे सखे, इस पार कि या उस पार,

मुक्ति नहीं है यहाँ, वृथा सब शास्त्र, देवगृहद्वार।

व्यर्थ यत्न सब, तुम्हीं हाथ में पकड़े हो वह पाश,

खींच रहा जो साथ तुम्हें तो उठो बनो न हताश।

छोड़ो कर से दाम, कहो संन्यासी विहँस रोम—

ओम तत्सत ओम।

सच पूछिए तो मुक्ति उन्हीं के पास है, जो कभी मुक्ति-मुक्ति की रट नहीं लगाते। वह धार्मिक कर्मकांडियों और मंदिर-मठों के उच्च-भ्रू वाले अहंकारियों को नहीं, बल्कि उन सीधे-सरल लोगों को मिलती है, जो सुख-साधन जोड़ने की परवाह नहीं करते। वे दूब के नरम पलंग पर सोते हैं और प्रकृति में व्याप्त दिव्य आनंद की स्रोतस्विनी से अपने हृदय का संबंध जोड़ लेते हैं—

मत जोड़ो गृह-द्वार, समा तुम सको कहाँ आवास,

दूर्वादल हो तल्प तुम्हारा, गृहवितान आकाश।

खाद्य स्वतः जो प्राप्त, पक्व या इतर, न दो तुम ध्यान,

खानपान से कलुषित होती आत्मा वह न महान।

जो प्रबुद्ध हो, तुम प्रवाहिनी स्रोतस्विनी समान,

रहो मुक्त निर्द्वंद्व, वीर संन्यासी छेड़ो तान।

ओम तत सत्।

इससे भी बड़ी बात है निंदा और स्तुति में सम रहना। तभी तो हम उस महापाश को खोल पाएँगे, जिसने हमारी आत्मा को जकड़ा हुआ है। उसी पाश से मुक्त होना ही सच्चे आनंद से जुड़ जाना है। लगता है, भगवद्गीता का सारा मर्म ही इन पंक्तियों में उतर आया है। और हम स्वामी विवेकानंद के शब्दों में स्वयं श्रीकृष्ण का ही यह गीता-संदेश सुन रहे हैं—

विरले ही तत्त्वज्ञ करेंगे शेष अखिल उपहास,

निंदा भी, नरश्रेष्ठ, ध्यान मत दो निबंध अयास।

यत्र-तत्र निर्भय विचरो तुम, खोलो माया-पाश,

अंधकार पीडि़त जीवों के दुःख से बनो न भीत।

सुख की भी मत चाह करो, जाओ हे रहो अतीत,

द्वंद्वों से सब, रटो वीर संन्यासी मंत्र पुनीत।

ओम तत्सत ओम।

और जीवन जीते हुए भी मुक्ति का यह अहसास विरला है, जिसमें मैं-तुम या जीव और ईश्वर का फर्क भी विलीन हो जाता है। सब कुछ एक लोकोत्तर आनंद में समा जाता है। इन पंक्तियों को पढ़ते हुए लगता है, मानो स्वामी विवेकानंद खुद अपने जीवन का मर्म बता रहे हों—

इस प्रकार दिन-प्रतिदिन जब तक कर्मशक्ति हो क्षीण,

बंधनमुक्त करो आत्मा को, जन्म-मरण हों लीन।

फिर न रहे गए मैं, तुम, ईश्वर, जीव या कि भवबंध,

मैं सबमें सब मुझमें—केवल मात्र परम आनंद।

कहो तत्त्वमसि संन्यासी, फिर गाओ गीत अमंद—

ओम तत्सत ओम।

किसी निर्जन वन में बहते झरने की तरह प्रशांति लिये इस कविता में हर पद की समाप्ति पर ‘ओम तत्सत ओम’ की गंभीर आवृत्ति मानो उसे एक उदात्त भूमि पर पहुँचा देती है, जहाँ कविता में भावातीत समाधि का आनंद भी समा गया जान पड़ता है।

यह कविता एक तरह की गवाही भी है कि न्यूयॉर्क के एक अरण्य स्थल में, गुरु और शिष्यों का लोकोत्तर संवाद किस आध्यात्मिक ऊँचाई पर पहुँच गया था। विवेकानंद के अमेरिकी शिष्यों के लिए यह गहन आध्यात्मिक अनुभव का क्षण था, स्वयं विवेकानंद के लिए भी। इसीलिए एक तरह की भाव समाधि के क्षण में थोड़ी देर के लिए शिष्य-मंडली को विस्मयाभिभूत छोड़कर, विवेकानंद वहाँ से अनुपस्थित हो जाते हैं। और इसी अबूझ भावदशा में एकांत में जाकर वे यह कविता लिखने के लिए प्रवृत्त होते हैं। यह विवेकानंद का अपना ढंग था, जिसमें उनके व्यक्तित्व की गूँज है। और वही गूँज, गौर से सुनें तो इस कविता के शब्द-शब्द में सुनाई देती है।

स्वामीजी की ऐसी ही भावदशा की एक और बड़ी महत्त्वपूर्ण कविता ‘मेरा खेल खत्म हुआ’ भी न्यूयॉर्क में ही लिखी गई थी, सन् १८९५ के वसंत के दिनों में।  यह कविता भी मूल रूप में अंग्रेजी में लिखी गई थी। कविता में सांसारिक सुखों की निष्फलता के गहरे अहसास के साथ ही उनकी मुक्ति की आकुलता देखते ही बनती है। वे समय की गति के साथ लहरों पर अनवरत तैरते हुए परेशान हैं, क्योंकि यह सब वृथा है, जो उन्हें अब जरा भी नहीं रुचता। जीवन में उठना और गिरना, लगातार चलते रहना और कहीं न पहुँचना, यह तो बड़ा थकाने वाला सिलसिला है। भीषण ताप जैसा। इसमें सुख कहाँ है, आनंद कहाँ है? कविता क्षिप्रता से भरी मुक्त लय में लिखी गई है और शब्द कहीं अधिक सहज और खुले हुए हैं—

समय की लहरों के साथ

निरंतर उठते और गिरते

मैं चला जा रहा हूँ,

जिंदगी के ज्वार-भाटे के साथ-साथ

ये क्षणिक दृश्य एक पर एक आते-जाते हैं।

आह, इस अप्रतिहत प्रवाह से

कितनी थकान हो आई है मुझे,

ये दृश्य बिल्कुल नहीं भाते

यह अनवरत बहाव और पहुँचना कभी नहीं,

यहाँ तक कि तट की दूर की झलक भी नहीं मिलती।

कविता के अंत में वे अपनी मुक्ति-आकांक्षा को प्रकट करते हुए काल के उस पहिए का जिक्र करते हैं, जो बड़ी क्रूरता से हमें कहीं पटक देता है और हम लाचार होकर वहीं एक निरर्थक दिनचर्या का हिस्सा बनकर अपनी सारी शक्तियों को नष्ट कर देते हैं—

बहुत देर से उम्र को ज्ञान मिलता है

जब पहिया हमें दूर पटक देता है,

नए स्फूर्त जीवन अपनी शक्तियाँ इस चक्र को पिला देते हैं

जो चलता रहता है अनवरत, दिन पर दिन, वर्ष पर वर्ष।

यह केवल है माया का एक खिलौना,

झूठी आशाओं, इच्छाओं और सुख-दुःख के अरों से बना

यह पहिया

अंत में बहुत आर्त होकर विवेकानंद माँ जगदंबा को पुकारते हैं, ताकि वे निरर्थक यात्राओं, द्वंद्वों और भीषण ताप से बचाकर उन्हें सामने नजर आते किनारे पर पहुँचने में मदद करें—

मैं भटका हूँ, पता नहीं किधर चला जाऊँ

मुझे इस आग से बचाओ,

रक्षा करो दयामयी माँ इन इच्छाओं में बहने से बचाओ

अपना भयावना रौद्रमुख न दिखाओ माँ

यह मेरे लिए असह्य है

मुझ पर कृपा करो, दया करो

माँ, मेरे अपराधों को सहन करो

माँ, मुझे उस तट तक पहुँचाओ

जहाँ ये संघर्ष न हों

इन पीड़ाओं इन आँसुओं और भौतिक सुखों से परे

जिस विराट् की महा को

ये रवि, शशि, उडुगण और विद्युत् भी अभिव्यक्ति न देते,

महज उसके प्रकाश का प्रतिबिंब लिये फिरते हैं

ओ माँ, ये मृगपिपासा भरे स्वप्नों के आवरण

तुम्हें देखने से मुझे रोक न सकें, मेरा खेल खत्म हो रहा है, माँ

ये शृंखला की कडि़याँ तोड़ो

मुक्त करो मुझे।

कविता में व्याकुल कर देने वाली गहरी तड़प है और एक साधक के रूप में स्वामी विवेकानंद की आर्त पुकार हमारे भीतर हलचल मचा देती है। पर साथ ही, यह जीवन जीते हुए भी जीवन मुक्त होने की प्रेरणा भी देती है।

मूल रूप से बँगला में लिखी गई ‘नाचे उस पर श्यामा’ विवेकानंद की सर्वाधिक शक्तिमय और बहुचर्चित कविता है। अध्यात्म-पथ के साधक का गहरा अंतर्मंथन है इसमें। इसमें विवेकानंद मानो स्वयं को ही संबोधित कर, अपने आप को फटकारते हुए से कहते हैं—

रे उन्मत्त, भुलाता है तू अपने को, न फिराता दृष्टि,

पीछे भय से कहीं देख तू, भीमा महाप्रलय की सृष्टि।

दुःख चाहता, बता उसमें क्या भरी नहीं है सुख की प्यास,

तेरी भक्ति और पूजा में चलती स्वार्थ सिद्धि की साँस।

छागकंठ की रुधिर धार से सहम रहा तू भ्रम संचार,

अरे कापुरुष, बना दया का तू आधार—धन्य व्यवहार।

फोड़ो वीणा, प्रेमसुधा का पीना छोड़ो, तोड़ो वीर,

दृढ आकर्षण है जिसमें, उस नारी माया की जंजीर।

बढ़ जाओ तुम उदधि ऊर्मि, गरज-गरज गाओ निज गान,

आँसू पीकर जीना, जाए देह हथेली पर लो जान।

आगे कविता का स्वर उद्बोधन से भरा हुआ है। अगर हम अपने सच्चे स्वरूप को जानें तो क्या सिर पर चक्कर काटते इस जाल को काट नहीं सकते? एक सच्चा साधक भी तो एक सच्चा वीर ही है और सच्चा वीर क्या कभी डरता है—

जागो वीर, सदा ही सिर पर काट रहा है चक्कर काल,

छोड़ो अपने सपने भय क्यों काटो-काटो यह भ्रमजाल।

दुख भार इस भव के ईश्वर, जिनके मंदिर का दृढ द्वार,

जलती हुई चिताओं में है, प्रेत-पिशाचों का आगार।

सदा घोर संग्राम छेड़ना उनकी पूजा के उपचार,

वीर डराए कभी न, आए अगर पराजय सौ-सौ बार।

चूर-चूर हो स्वार्थ, साध सब न हृदय हो महाश्मशान,

नाचे उस पर श्यामा, लेकर घन रण में निज भीम कृपाण।

कविता में दुष्टों के दलन के लिए भीषण रण में हाथों में कृपाण लिये नाचती काली का चित्र हृदय में एक गहरा प्रकंप पैदा करता है। विवेकानंद की इस आवेगपूर्ण कविता में शक्ति और औदात्य का एक चमत्कारी सहमेल-सा है, जिसे पढ़ते हुए रोम खड़े हो जाते हैं। खासकर ‘नाचे उस पर श्यामा...!’ पंक्ति का प्रभाव इतना गहरा है कि एक बार सुनने के बाद बार-बार मन में नए-नए ढंग से यह कविता गूँजती है। और निश्चित रूप से, एक सच्चे मनुष्य के लिए आत्मिक सहारा भी बनती है।

एक अचरज भरे संसार की छवियाँ

स्वामी विवेकानंद की एक छोटी सी, पर सुंदर कविता ‘समाधि’ मूल रूप से बँगला में लिखी गई थी। और इसमें गहन मुक्ति-क्षण का वह उदात्त चित्र है, जिसमें सूर्य, चंद्र सभी विलीन हो जाते हैं। एक अचरज भरा संसार जहाँ सूर्य भी नहीं है, ‘ज्योति—सुंदर शशांक नहीं, छाया सा व्योम में’ यह विश्व नजर आता है।

इसी तरह एक और अपेक्षाकृत छोटी कविता ‘जाग्रत देवता’ ९ जुलाई, १८९७ को अलमोड़े से एक अमेरिकन मित्र को लिखी गई थी। यह बड़ी उदात्त भावभूमि की कविता है। पर उतनी ही सहज भी। इस कविता में विवेकानंद ने उस देवता की पूजा का आग्रह किया है, जो सब दीवारों और बंधनों से परे है, यहाँ तक कि धर्म के घेरे में भी वह नहीं आता। इसलिए कि वह हर मनुष्य के साथ है और उसके भीतर समाया हुआ है। एक तरह से विवेकानंद की यह कविता मनुष्य और मनुष्यत्व की प्रतिष्ठा की कविता है, जो बड़े ही सहज शब्दों में सामने आती है—

वह जो तुममें है और तुमसे परे भी

जो सबके हाथों में बैठकर काम करता है

जो सबके पैरों में समाया हुआ चलता है,

जो तुम सबके घट में व्याप्त है

उसी की आराधना करो और

अन्य प्रतिमाओं को तोड़ दो।

स्वामी विवेकानंद की एक और छोटी सी कविता ‘प्याला’ मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई थी। कविता प्रतीकात्मक है, हलकी रहस्यात्मकता लिये हुए भी। पर फिर भी, निगूढ़ नहीं। सीधी, सुलझी हुई व्यंजना है। इस संसार में से हर व्यक्ति के हाथ में इच्छाओं का जो कभी न भरनेवाला प्याला है। कविता में उसका बिंब है। सभी उसी प्याले की माया से भ्रमित हैं। इसीलिए ईश्वर तक पहुँचने की राह इतनी कष्टकर और बाधाओं से भरी हुई है। और उससे भी बड़ा सत्य तो यह है कि राह के ये पत्थर स्वयं प्रभु ने रखे हैं, क्योंकि वह चाहता है कि हम मुश्किलों का सामना करना सीखें और यह भी जान लें कि सत्य हमेशा दुर्गम रास्तों पर चलकर ही हासिल होता है—

यही तुम्हारा प्याला है

जो तुम्हें शुरू से मिला है,

नहीं मेरे वत्स, मुझे ज्ञात है

यह पेय घोर कालकूट

वह तुम्हारी मंथित सुरा-निर्मित हुई है

तुम्हारे अपराध, तुम्हारी वासनाओं से

युग, कल्पों, मन्वंतरों से

यही तुम्हारा पथ है कष्टकर बीहड़ और निर्जन

मैंने ही वे पत्थर लगाए जिन्होंने तुम्हें कभी बैठने न दिया।

हालाँकि रास्ता कितना ही दुर्गम क्यों न हो, ईश्वर की करुणा भरी आँख हम पर है और वह चाहता है कि हर बाधा पार करके हम उस तक पहुँचें। हमें उस तक पहुँचना ही होगा, क्योंकि इसके बगैर किसी की मुक्ति संभव नहीं है। हर मान-अपमान में, बगैर यश और गौरव की परवाह किए हमें यह यात्रा जारी रखनी होगी। यों इसका एक आसान तरीका यह भी है कि हम बाहर से अपनी दृष्टि भीतर की ओर फेर लें। अगर आँख बंद करें, तो उस करुणामय को हम अपने सामने पाएँगे। कविता की ये पंक्तियाँ कितनी शीतल और शांतिमयी हैं—

किंतु मेरे वत्स, तुम्हें तो मुझ तक यात्रा करनी ही है

यही तुम्हारा काम है जिसमें न सुख है न गौरव ही मिलता है

किंतु यह किसी और के लिए नहीं, केवल तुम्हारे लिए है

और मेरे विश्व में इसका सीमित स्थान है, ले लो इसे,

मैं कैसे कहूँ कि तुम यह समझो

मेरा तो कहना है कि मुझे देखने के लिए नेत्र बंद कर लो।

अध्यात्म की गहन लोकोत्तर अनुभूति को थोड़े से शब्दों में कैसे बाँधा जा सकता है, यह कविता इसकी मिसाल है।

‘शांति’ कविता का मिजाज कुछ भिन्न है। विचार से बोझिल नहीं, बल्कि एकदम सीधी-सहज थिराई हुई अभिव्यक्ति। इस कविता में विवेकानंद बडे़ सुंदर अल्फाज में सुंदरता, प्रेम, गीत और ज्ञान को व्याख्यायित करते हुए शांति को अंतिम आश्रय बताते हैं, जो जीवन का चरम लक्ष्य है। यह कविता न्यूयॉर्क के रिजले मनर में सन् १८९९ में अंग्रेजी में लिखी गई थी और आज भी बड़ी ताजगी भरी लगती है—

सुंदरता वह है जो देखी न जा सके

प्रेम वह है जो अकेला रहे,

गीत वह है जो जिए बिना गाए

ज्ञान वह है जो कभी जाना न जाए।

जो दो प्राणों के बीच मृत्यु है

और दो तूफानों के बीच एक स्तब्धता है,

वह शून्य जहाँ सृष्टि आती है

और जहाँ वह लौट जाती है,

वहीं अश्रुबिंदु का अवसान होता है

प्रसन्न रूप को प्रस्फुटित करने को,

वही जीवन का चरम लक्ष्य है, और शांति ही एकमात्र शरण है।

कहना न होगा कि शांति यहाँ स्थूल अर्थ में नहीं, बल्कि एक समाधि की अवस्था है। यह वह भावनात्मक क्षण है, जब इंद्रियाँ शांत हो जाती हैं और मन किसी उच्चतर अवस्था में पहुँच जाता है। शांति की इस अवस्था में शून्य से जनमी यह सृष्टि दो तूफानों के बीच की स्तब्धता की तरह, फिर शून्य में लौटती नजर आती है और जीवन की हलचलें थम जाती हैं।

विवेकानंद की एक और सुंदर कविता ‘मुक्ति’ ४ जुलाई, १८९८ को अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस पर लिखी गई थी। उस समय स्वामीजी अपने कुछ अमेरिकी मित्रों के साथ कश्मीर के पर्यटन पर थे। अचानक ४ जुलाई को सुबह उन्होंने अपने अमेरिकी शिष्यों को यह कविता सुनाकर सभी को चकित कर दिया। यह सुंदर कविता बाद में विवेकानंद की एक अनन्य शिष्या और प्रशंसक धीरा माता के पास सुरक्षित रही, और अद्वैत प्रकाशन द्वारा छपे विवेकानंद की कविताओं के संचयन में शामिल है—

ओ देवता, निर्बाध बढ़ो अपने पथ पर

तब तक

जब तक कि यह सूर्य आकाश के मध्य में न आ जाए

जब तक तुम्हारा आलोक विश्व में प्रत्येक देश में फलित न हो

जब तक नारी और पुरुष सभी उन्नत मस्तक होकर यह नहीं देखें कि उनकी जंजीरें टूट गईं

और नवीन सुखों के वसंत में उन्हें नवजीवन मिला।

यह कोई कम आश्चर्य की बात नहीं कि ४ जुलाई को ही, चार बरस बाद सन् १९०२ में विवेकानंद ने इस ऐहिक जीवन से मुक्ति प्राप्त की और महालोक में समा गए। मानो चार वर्ष पहले ही उन्होंने स्वयं अपना समाधि-लेख लिख लिया हो, जिसमें उनके पूरे जीवन-कार्यों और जीवन-लक्ष्य की एकदम मुकम्मल और सधी हुई अभिव्यक्ति है!

स्वामी विवेकानंद की कई कविताओं में प्रकृति की बड़ी अनुपम और मुग्ध कर देने वाली छवियाँ हैं। ‘सागर के वक्ष पर’ कविता भी ऐसी ही विलक्षण और चित्रात्मक कविता है, जिसमें आकाश में घुमड़ते मेघदलों का रागमय सौंदर्य है—

नील आकाश में बहते हैं मेघदल

श्वेत, कृष्ण, बहुरंग

तारतम्य उनमें तारल्य का दीखता

पीत भानु माँगता है विदा

जलद रागछटा दिखलाते।

कविता की आखिरी पंक्तियों में सागर की विराटता का भव्य चित्र है। सागर भव्य है। असीम है। शक्तिमय है। अनेक रहस्यों से मंडित, अनेकांत और विशाल भी, जिसमें सबके गीत, लय, ज्योति, रूपराग और सौंदर्य समा जाते हैं—

नीचे सिंधु गाता बहु तान,

महीमान किंतु नहीं वह,

भारत तुम्हारी अंबुराशि विख्यात है

रूपराग जलमय हो जाते हैं

गाते हैं यहाँ किंतु

करते नहीं गर्जन।

‘प्रलय अथवा गंभीर समाधि’ स्वामी विवेकानंद की एक छोटी सी, लेकिन यादगार कविता है, जिसमें समाधि की सर्वोच्च अवस्था का चित्र है। एक ऐसी निर्विकल्प समाधि, जिसमें सूर्य, चंद्र सब विलीन हो जाते हैं और रह जाती है केवल महा आनंद की अनुभूति। सचमुच एक ऊँचे आध्यात्मिक अनुभव की बड़ी विरल अभिव्यक्ति है यह—

सूर्य भी नहीं है ज्योति सुंदर शशांक नहीं

छाया सा व्योम में यह विश्व नजर आता है,

मनोआकाश अस्फुट भासमान विश्व वहाँ

अहंकार स्रोत ही में तिरता डूब जाता है,

धीरे-धीरे छायादल लय में समाया जब

धारा निज अहंकार मंद गति बहाता है,

बंद वह धारा हुई शून्य में मिला है शून्य

अवाङ्मनसगोचरम, वह जाने जो ज्ञाता है।

जिसे अध्यात्म-जगत् में इंद्रियातीत अनुभव कहते हैं, स्वामी विवेकानंद अपनी भाषा-समाधि के जरिए मानो उसे भी शब्दों में बाँधने का जोखिम उठाते हैं। यों अपने को समेटकर जिस शून्य की अभिव्यक्ति कोई महत्तर योगी करता है, विवेकानंद का कवि उसे बड़ी ही सहज भाषा में व्यक्त कर देता है।

हिंदी-जगत् के लिए यह आनंद की बात है कि स्वामी विवेकानंद ने हिंदी में भी एक प्रगीतात्मक कविता लिखी थी, ‘श्रीकृष्ण संगीत’। गीत में गोपिका प्रसंग के व्याज से गहरी भक्ति तन्मयता और बड़ी सुमधुर संगीतात्मकता है। यह लयात्मक रागबद्ध गीत अनायास स्फूर्त जान पड़ता है—

मुझे वारि बनवारी सैयाँ,

जाने को दे,

जाने को दे रे सैयाँ

जाने को दे। (आजपु भला।)

मेरो बनवारी बाँदि तुम्हारी

छोड़े चतुराई सैयाँ,

जाने को दे।

(आजपु भला,

मोरे सैयाँ।)

गीत की आखिरी पंक्तियों में गोपी की मान-मनुहार का पूरा दृश्य है, ‘जमुना किनारे भरों गगरिया/जोरे कहत सैयाँ,/जाने को दे।’

इससे यह जरूर पता चलता है कि स्वामी विवेकानंद बँगलाभाषी होते हुए भी हिंदी के महत्त्व को जानते थे, और उसमें अपने भावों को प्रकट कर सकने में निपुण थे। जाहिर है, इस भक्तिमय प्रगीतात्मक कविता का महत्त्व भी इस कारण कहीं अधिक बढ़ जाता है।

रोम्याँ रोला ने स्वामी विवेकानंद के बारे में बड़ी सुंदर बात कही है कि उनका व्यक्तित्व ऐसा विलक्षण करिश्माई था कि वे हर क्षेत्र में सबसे अलग, सबसे आगे नजर आते थे। कहीं भी उनके दूसरे स्थान पर होने की कल्पना करना मुश्किल था। उनके भीतर शक्ति का वह अक्षय स्रोत था कि जहाँ भी वे गए, शिखर पर पहुँचे। इस लिहाज से देखें तो बेशक उनकी कविताएँ भी शब्दों की ऐसी सुंदर भाव समाधि लिये हुए हैं कि उन्हें पढ़ते हुए मन के भीतर से एक गहरी पुकार आती है, कि ऐसी कविताएँ सिर्फ और सिर्फ विवेकानंद ही लिख सकते थे, जिनका पूरा जीवन ही एक भावनात्मक समाधि की तरह है।

स्वामी विवेकानंद पराधीनता की पीड़ा और अपमानों से व्यथित भारतीय जनता में एक नया आत्मविश्वास जगाने के लिए आए थे। और उनकी कविताएँ भी, जो शक्ति के विस्फोट की तरह हैं, हमें अपने आपको पहचानने और पूर्ण शख्सियत हासिल करने के लिए ललकारती हैं। शायद इसीलिए विवेकानंद की कविताओं को पढ़े बिना उनकी शक्ति के उद्गम और गहरी आध्यात्मिक विकलता को समझा ही नहीं जा सकता।

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