नाटक

नाटक

भुवन वर्मा अपनी कार से जा रहे थे। सामने एक लड़की आ गई। उसे हलका सा धक्का लगा और वह भहराकर गिर पड़ी। वार्माजी ने कार से उतरकर उसे उठाया और बोले, ‘‘चोट लग गई है?’’ लड़की ने कहा, ‘‘हाँ।’’ वर्माजी उसे डॉक्टर के पास ले गए। लड़की ने बताया कि उसके पाँव में काफी चोट लगी है। डॉक्टर ने पट्टी की, इंजेक्शन लगाया और कहा, ‘‘सब ठीक है, कुछ भी सीरियस नहीं है।’’

लड़की लँगड़ाकर चलने लगी। वर्माजी ने पूछा, ‘‘कहाँ रहती है, चलिए, वहाँ छोड़ देता हूँ।’’

लड़की कराहती हुई सी बोली, ‘‘मैं तो दूसरे शहर की हूँ, यहाँ यूनिवर्सिटी हॉस्टल में रहती हूँ।’’

‘‘तो चलिए, वहाँ छोड़ देता हूँ।’’ वर्माजी ने कहा।

‘‘वहाँ मेरी देख-देख कौन करेगा? अभी तो ठीक से चल नहीं पा रही हूँ।’’ लड़की बोली।

‘‘तो क्या करूँ? आपको कहाँ छोड़ूँ?’’

‘‘ऐसा कीजिए, कुछ दिन अपने यहाँ रहने दीजिए। पाँव को आराम पड़ते ही मैं हॉस्टल चली जाऊँगी।’’

वर्माजी ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं, कुछ दिन मेरे यहाँ रह लीजिए। आपका नाम क्या है?’’

‘‘कोकिला, कोकिला नाम है मेरा। मुझे अब इसी नाम से पुकारिएगा।’’

कोकिला वर्माजी के यहाँ रहने लगी। लँगड़ाकर चलती थी। दिखा रही थी कि अभी ठीक नहीं हुई; और सब तो ठीक, किंतु अब वह श्रीमती वर्मा पर हुकुम चलाने लगी—‘चाय लाओ, यह लाओ, वह लाओ।’ लड़की पति की कार से घायल हुई है, यह जानकर श्रीमती वर्मा उसकी आज्ञा का पालन कर देती थीं।

कोकिला एक ओर श्रीमती वर्मा से यह व्यवहार कर रही थी, दूसरी ओर वर्माजी पर डोरे डाल रही थी। अजीब अदा से मुसकराकर वर्माजी से बातें करती थी।

एक दिन श्रीमती वर्मा ने अकेले में उसे सहज भाव से चलते देख लिया। वे समझ गईं कि यह लड़की लँगड़ाकर चलने का नाटक करती है। उन्होंने वर्माजी को बताया। वर्माजी समझ गए कि मेरे घर में रहने का इसका यह बहाना है।

उस दिन सवेरे-सवेरे वर्माजी ने कहा, ‘‘कोकिला, तुमने बहुत नाटक कर लिया, अब अपने छात्रावास चली जाओ।’’

कोकिला बोली, ‘‘अब मैं यहीं रहूँगी। सबसे कह दूँगी कि आप मुझे भगाकर लाए हैं और मेरे साथ पति जैसा व्यवहार करते रहे हैं।’’

‘‘ठीक है, कोकिला मैडम, मैं पुलिस बुलाता हूँ, उसके सामने जो कहना है, कह दीजिएगा। आप जानती नहीं, मैं बैंक मैनेजर हूँ।’’

वर्माजी ने पुलिस बुलाने के लिए ज्यों ही फोन पर हाथ रखा, कोकिला ने उनका हाथ पकड़ लिया। उसे मालूम था कि पुलिस उसे पहचानती है। उसे देखते ही कहेगी, ‘अच्छा, तू यहाँ भी डोरे डालने पहुँच गई। चल, थाने में ही डोरे डालना।’

वह बोली, ‘‘ठीक है, मैं हॉस्टल जा रही हूँ।’’

वह चली गई। वर्माजी ने जोर का ठहाका लगाया और बुदबुदाए, ‘ठगी के कितने-कितने तरीके ईजाद कर लिए गए हैं।’

श्रीमती वर्मा खड़ी-खड़ी मुसकरा रही थीं।

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